એક વૈષ્ણવ ની મનોવ્યથા

श्री रुपचंद खंडेलवाल “भूप”
(जबलपूर)..की मनोव्यथा..

एक बार फिर आओ वल्लभ,
कहकर तुमको रहा बुलाता !
अच्छा हुआ न आये भगवन,
आ जाता तो कहां बैठाता ?
ठेके पर चल रही बैठकें,
खुली मंदिरों में दुकानें,
चंदे सै होती है सेवा,
बिकता प्रसाद है सभी ठिकान
अष्ट छाप अब नहीं,
नहीं है चौरासी वा दो सो
बावन,
तनुवित्तजा नहीं अब,
तनुजा और वत्तजा लोक-
लुभावन,
नहि पुष्टि सिध्धांतों से अब,
रहा किसी का कोई नाता
रहे अखिल भारतीय आप
ईससे आगे ना बढने पाये।
हम अन्तरष्टीय हुए,
झंडे विदेश में भी कहरावे।
अब अन्तर्ब्रह्मान्डीय बन जायें,
शीध्र यह अभिलाषा हैं ।
कार्य न कोई भारी है यह,
पूर्ण सफलता कि आशा है.
यदपि न अभी पूर्ण पारीवारिक,
फिर भी अदम बढाया जाता।।
अच्छा हुआ न आये भगवन,
आ जाते तो कहां बैठाता ?
ठाकुरजी लन्दनन
अमेरिकादिक में,
मन्दिर में रहते हैं ।
. वृंदावंन बन गया वहीं,
पूर्वी कीडा करते रहते हैं।।
सेवा करती वहां गोपियां,
जिन्हें न मासिख छूने पायै।
करते है नित नवीन मनोरथ,
अपटुडेट वैष्णव मन भाये,
सेवा-सरि पाखंड -सिंधु में,
मिलि,न तुमसे देखा जाता
अच्छा हुआ न आये भगवन,
आ जाता तो कहा्ँ बैठाता
सतयुग चार तीन त्रेता में,
द्वापर दो कलियुग में ए
बचा धर्म का पैर,
चल रहा विज्ञापन की लाठी टेक
पुष्टिमार्ग की सेवा भी अब,
मिश्री से पुष्ट हो रही हे पुष्ट हो रही ,
सौ अधर्म में,पांच धर्म को,
मन माना है कष्ट दे रही,
सत्य कहां जा छिपा न इसका,
” भूप ” न कोई उत्तर दे पाता।।
अच्छा हुआ न आये भगवन,
आ आते तो कहाँ बैठाता ?
क्रमांश… ” एक बार फिर आओ वलल्भ,रटता रहता मुझे बुलाता ! ”
आधार.. ग्रंथ.. जिन श्री वल्लभ रुप न जान्यो.

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