*जो एक समय श्रीहरिरायजी राजभोग पश्चात श्रीगोकुलनाथजी के पास पधारे… और विनती की…*
*तातचरण भोजन का समय हुआ है…आप भोजन हेतु पधारे..*
*उस समय गोकुलनाथजी अति ग्लानी से बिराजे और श्री हरिरायजी की विनती सुनी नही….*
*तब श्री हरिरायजी जाने की तातचरण कुछ चिंतित है इसलिए श्री हरिरायजी मौन खड़े रहे…*
*एक प्रहर बीतने के बाद श्री गोकुलनाथजी को ज्ञात हुआ की श्री हरिरायजी सामने खड़े है…*
*तब श्री गोकुलनाथजी ने कही अरे! बावा तुम कब पधारे?*
*तब श्री हरिरायजी कहे की! 1 प्रहर बीत गया भोजन की खबर देने आयो हतो आपको चिंतित देख मोन खड़ा रहा…*
*तब श्री गोकुलनाथजी ने हरिरायजी से आज्ञा करी के! हरिराय हम श्री ठाकुरजी को प्रसाद केसे ले सके….*
*हमसे कोई सेवा ना बने….* *श्रंगार करे तो प्रभु को हमारे नख लग जाय….*
*सामग्री करे तो कुछ भूल हो जाय….*
*नित्य कोई ना कोई अपराध हमसे हो जाता है सो हम इस महाप्रसाद के लायक नही है…*
*तब श्री हरिरायजी बड़ी देन्यता से विनती करे की…* *जो तात आप जो कहो हो उसमे कोई संशय नही है… जो आप बड़े हो तो आप सब जानो हो…*
*श्री आचार्यचरण आज्ञा करे है की देह टिकने के लिए महाप्रसाद लेना चाहिए पेट भरने के लिए नही…*
*भगवद सेवा में देह का विनियोग हो इसलिए महाप्रसाद लेना चाहिए…*
*जो आप एसी आज्ञा करो तो सामान्य जीव भगवद प्राप्ति केसे कर सके??*
*तब श्री गोकुलनाथजी आज्ञा किये की…. इस अपराध की निवृत्ति एक ही प्रकार से संभव है….*
*84 252 भगवदीय वैष्णव का नाम लेने मात्र से सारे अपराध की निवृत्ति हो सके…. सो इन वैष्णवो की नामावली सदा सर्वदा करनी जिससे सारे अपराध दूर हो जाय…*
*तब श्री गोकुलनाथजी ने श्री हरिरायजी को 84 252 वैष्णवो की नामावली सुनाई।।*
*श्री हरिरायजी अपने जीवन में सदा इस नामावली का पाठ कर ही भोजन करने पधारते।।*
*रसासागर श्री गोकुलनाथजी की जय।।*
*शिक्षासागर श्री हरिरायजीमहाप्रभु की जय।।*