: *श्री गोकुलनाथ जी कृत 84 वैष्णवन की नामावली…*
*( नित्य ही प्रसाद लेवे के पहले याको पाठ करवे को आग्रह जरूर राखनो…)*
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*”श्रीविट्ठलमहं वंदे स्वकीयजन वल्लभं…|*
*चतुरशीति भक्तानां व्यक्ति कुर्वे यथार्थत: …||1||*
*दामोदर कृष्णदासौ पुनः दामोदरस्तथा…|*
*पद्मनाभश्च तुलसां पार्वती-रघुनाथक: …||2||*
*रजो पुरुषोत्तमो रुक्मिणी गोपालदासक: …|*
*सारस्वतो रामदासो गदाधरं महानस्तथा…||3||*
*वेणी माधवदासौ च अम्माक्षत्राणी वैष्णवी…|*
*हरिवंशश्चगोविंदो क्षत्री गज्जनधावन: …||4||*
*नारायणो ब्रह्मचारी क्षत्राणी जीयदासक: …|*
*देवाकपूर क्षत्री च दिनकर: पुरुषोत्तम: …||5||*
*मुकुन्द: प्रभुदासश्च प्रभु त्रिपुरादासकौ…|*
*पूर्णमल्लो यादवेंद्र: काश्मीरो माधवस्तथा: …||6||*
*गुसाँइदास गोपालो श्रीपद्मारावलस्तथा …|*
*जोशी पुरुषोत्तमो ज्ञेयो जगन्नाथो समन्वय: …||7||*
*नरहरि राणा व्यास: क्षत्राणी रामदासकौ…|*
*गोपालो कृष्णदासश्च प्रोहितो रामदासक: …||8||*
*बुलामिश्ररामानंदौ विष्णुजीवनदासकौ …|*
*सारस्वतौ भगवान भगवान मुख्य सेवक: …||9||*
*गौडो अच्युतदासश्च अच्युतस्चक्रतीर्थक: |*
*कन्हैयाशालक्षत्री च नरहरिदासकस्तथा …||10||*
*लघुपुरुषोत्तमो गोपालदास जनार्दनौ …|*
*कविराजो गड्डू स्वामी उत्तमश्लोकदासक: …||11||*
*इश्वरोत्तम श्लोकाख्यो राजा माधवको तथा …|*
*सिहनंदे सासु बहु परमानंदसूर कौ …||12||*
*बाबा वेणु कृष्णदास छकडा वासुदेवक: …|*
*एक क्षत्राणी आनंददासो विश्वंभरस्तथा …||13||*
*ब्राह्मणी अथ कायस्थ नारायण स्त्रियस्तथा …|*
*अन्यमार्गीय कायस्थ दासो दामोदरस्तथा …||14||*
*सिहनंदे च क्षत्राणि जगतानंदकस्तथा …|*
*इंद्रप्रस्थै चैकक्षत्री जट गोपालदासक: …||15||*
*कृष्णदास: कुंभनश्च वाडवो बादरायण: …|*
*वैष्णवो संतदासश्च सुन्दरदास मावजी …||16||*
*नरहरिदास संन्यासी पांडे सद्दुभवानीका …|*
*श्रीमदाचार्य भक्तानां नामानि बहवस्तथा …||17||*
*तथापि स्वात्मपाठार्थे लिखितानिति क्षम्यतां …|*
*वार्तायां परिशोध्यानि सर्वदा वैष्णवैर्जनै: …||18||”*
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*इति श्रीमद्वल्लभाचार्य भक्तानां श्रीमद् गोकुलनाथ जी कृत नामावली सम्पूर्ण …*
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जो एक समय श्री हरिरायजी राजभोग पश्चात श्री गोकुलनाथजी के पास पधारे… और विनती की…
तातचरण भोजन का समय हुआ है…आप भोजन हेतु पधारे…
उस समय गोकुलनाथजी अति ग्लानी से बिराजे और श्री हरिरायजी की विनती सुनी नही….
तब श्री हरिरायजी जाने की तातचरण कुछ चिंतित है
इसलिए श्री हरिरायजी मोन खड़े रहे…
1 प्रहर बीतने के बाद श्री गोकुलनाथजी को ज्ञात हुआ की श्री हरिरायजी सामने खड़े है…
तब श्री गोकुलनाथजी ने कही अरे! बावा तुम कब पधारे?
तब श्री हरिरायजी कहे की! 1 प्रहर बीत गया भोजन की खबर देने आयो हतो
आपको चिंतित देख मोन खड़ा रहा…
तब श्री गोकुलनाथजी ने हरिरायजी से आज्ञा करी के! हरिराय हम श्री ठाकुरजी को प्रसाद केसे ले सके….
हमसे कोई सेवा ना बने…. श्रंगार करे तो प्रभु को हमारे नख लग जाय….
सामग्री करे तो कुछ भूल हो जाय….
नित्य कोई ना कोई अपराध हमसे हो जाता है सो हम इस महाप्रसाद के लायक नही है…
तब श्री हरिरायजी बड़ी देन्यता से विनती करे की…जो तात आप जो कहो हो उसमे कोई संशय नही है… जो आप बड़े हो तो आप सब जानो हो…
श्री आचार्यचरण आज्ञा करे है की देह टिकने के लिए महाप्रसाद लेना चाहिए पेट भरने के लिए नही…
भगवद सेवा में देह का विनियोग हो इसलिए महाप्रसाद लेना चाहिए…
जो आप एसी आज्ञा करो तो सामान्य जीव भगवद प्राप्ति केसे कर सके??
तब श्री गोकुलनाथजी आज्ञा किये की…. इस अपराध की निवृत्ति एक ही प्रकार से संभव है….
84 252 भगवदीय वैष्णव का नाम लेने मात्र से सारे अपराध की निवृत्ति हो सके….सो इन वैष्णवो की नामावली सदा सर्वदा करनी जिससे सारे अपराध दूर हो जाय…
तब श्री गोकुलनाथजी ने श्री हरिरायजी को 84 252 वैष्णवो की नामावली सुनाई।।
श्री हरिरायजी अपने जीवन में सदा इस नामावली का पाठ कर ही भोजन करने पधारते।।
रसासागर श्री गोकुलनाथजी की जय।।
शिक्षासागर श्री हरिरायजीमहाप्रभु की जय।।
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