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સેવા 

​lप्रश्‍न : सेवाकी रीतमें लिख्यो होवे है के आज ऐसे सेवा करनी, या दिन ऐसे सेवा करनी … पर फिर भी कभी कोई बात समझमें नहीं आवे या रीतमें जैसे लिख्यो होवे वा प्रकारसु सेवा करनी आती नहीं होवे तो वा समय प्रभुकी कैसे प्रकारसुं सेवा करनी?
समाधान : सबसु पहली बात तो ये है के जो भी लिख्यो गयो है वो बडी समझसु और बडे भगवत्सुखके विचारसु लिख्यो गयो है. वो समझ और वो भगवत्सुखको विचार यदि अपन्कु समझमें आते होवें तो अपनकु वो भी समझमें आ जायेगो के वामें कितनो करनेसु सेवाकी रीत भी निभ जायेगी और प्रभुको सुख भी निभ जायेगो.
 वसन्त ऋतुमें जैसे वसन्त राग गानेको ऋतुक्रम है. पर वसन्त ऋतुमें सुबह शुद्ध वसन्त नहीं गाके ललितवसन्त गानो ये बात तो जाकी सङ्गीतमें गहरी पेंठ होवे वाकु ही सूझ सके है, हरेककु समझमें नहीं आ सके है. और साधारण आदमी यदि ललितवसन्त गावे जाये तो भी वसन्त गाते-गाते ललित निकल जाये और ललित गावे जाये तो वसन्त छूट जाये. ललितवसन्त तो वो ही गा सके है के जाकी दोनों रागन्पे अच्छी पकड होवे.

 एक बात बताउं, दाल-भातके करते खीचडी बनानो रसोईमें सरल होवे है. पर रागमें यासु उलटो होवे है. दो रागकु मिलाके गानो बहुत कठिन है. एक राग शुद्ध गानो बहुत सरल है. ऐसे ही दो तालमें एक संग गानो बहुत कठिन है. एक तालमें गानो बहुत सरल है. बंबईमें हमारे एक परिचित खांसाहब हैं. उनने एक दिन मेरे सामने अपने दोनों हाथ और दोनों पैर सु एक ही समय चार अलग-अलग ताल बजाके बताई अपने जैसेन्केलिये ये असम्भवसी बात है. क्योंके एक ताल सोलह मात्राकी, दूसरी दस मात्राकी, तीसरी बारह मात्राकी और चौथी ताल नौ मात्राकी. ऐसी चार तालन्की खाली-भरी एक साथ कैसे गिन सकें? आप गिनके देखो. एक पैरसु बारह मात्राकी ताल गिनो, दूसरे पैरसु नौ मात्रा गिनो … अपन नहीं गिन पायेंगे. या तो बारह मात्रा ही गिनते रहेंगे या नौ मात्रा. ये तो बहोत अभ्यास होवे तो ही हो पावे. यासु रागन्कु मिलानो बहोत कठिन है. पर यदि अपन ये नहीं कर पावें हैं तो ठीक है. ठाकुरजीने अपनकु वैसी योग्यता नहीं दी है तो अपने ठाकुरजी भी अपन जैसो गायेंगे वामें प्रसन्न रहंगे.
 श्रीगुसांईजीकी सेवक एक डोकरीकी वार्तामें आवे है के वा डोकरीके घरमें रसोई करवेकी सुविधा नहीं हती. श्रीगुसांईजीके वहांसु वाकेलिये महाप्रसादकी पातल आती हती. डोकरी वो पातल वाके ठाकुरजीकु भोग धरके पीछे खुद भोजन करती. कोई वैष्णवने जाके श्रीगुसांईजीकु या बातकी फरीयाद करी के डोकरी प्रसादी पातल अपने ठाकुरजीकु भोगमें धरे है. श्रीगुसांईजीकु भी ये बडो नागवार (अनुचित) लग्यो. डोकरीकु बुलवाके श्रीगुसांईजीने वासु ऐसो करवेको कारण पूछ्यो. वाने श्रीगुसांईजीकु कही के खायी भयी पातलपेसु उठके पाछो वामें नहीं खानो वो आप ब्राह्मणन्के घरके बच्चान्केलिये नियम होयगो, हमारे घरके बच्चाएं तो खाते-खाते खेलवे चले जायें और खेलते-खेलते खावे लग जायें हैं. आपके नियम हमारे यहां नहीं पले हैं. श्रीगुसांईजीने कही के तेरी बात सच्ची. ‘‘तेरी बात सच्ची’’ कहके श्रीगुसांईजीने अपने घरमें वाकी रीत नहीं मानी. आशय ये हतो के वाकी बात वाके घरमें सच्ची.

 तो बात समझो के चाहे रूपा पौरिया होवे, चाहे ये डोकरी होवे, चाहे रजस्वलाकु सेवाकी छूट दी वो होवे या फिर गोविन्द स्वामीने ठाकुरजीकु कंकड मारे वो वार्ता होवे ˆऐसी सब वार्तान्के तात्पर्य दोनों हो सके हैं. एक तो ये के अपन भी उनको अनुकरण कर सके हैं ऐसो तात्पर्य निकालें. अथवा ऐसो भी रहस्य समझ्यो जा सके है के उनको सम्बन्ध उनके ठाकुरजीके संग जा तरहको हतो वामें वा बातकी शोभा है. अपनो सम्बन्ध यदि अपने ठाकुरजीके सङ्ग वैसो है तो वैसो करनेमें कोई हानि नहीं है. और यदि वैसो सम्बन्ध यदि अपनो अपने ठाकुरजीके सङ्ग नहीं है तो कोईको खोटो अनुकरण करवेकी जरूरत नहीं है. यासु ही जब गोविन्द स्वामीने ठाकुरजीकु पकडके कुंडमें स्नान करायो तब श्रीगुसांईजीने उनसु पूछी के क्या ब्रह्म छू सके है? गोविन्दस्वामीने बडो अच्छो उत्तर दियो के ब्रह्म तो नहीं छू जावे पर आपके घरकी मेंड छू जावे. यदि गिरिधरजीने कोईकु छू लियो होतो तो क्या श्रीगुसांईजी उनकु स्नान कराये बिना घरमें घुसवे देते? गोविन्दस्वामीके उत्तरपे श्रीगुसांईजीकु चुप होनो पडेगो. गिरिधरजीकु तो बिना स्नान कराये घरमें घुसवे नहीं देते. तो क्या ठाकुरजीकु आप गिरिधरजीसु कम मान रहे हो यदि गिरिधरजीकु स्नान करनो पडेगो तो फिर ठाकुरजी क्यों स्नान नहीं करेंगे ठाकुरजी छू जायेंगे तो उनकु भी स्नान करनो ही पडेगो. ये तो एक तात्पर्य भयो. अब समझो के कोई ऐसे कह दे के गिरिधरजी तो स्नान नहीं करेंगे, वो तो हमारे बालक हैं, पर ठाकुरजीकु तो स्नान करनो पडेगो. तब तो उलटो अर्थ हो गयो. अपनने तो अपरस नहीं पालवेकी सब छूट लेली, ठाकुरजीकु फंसा दिये. ये ठीक बात नहीं है.
 सेवारीतिकी बारीकीकु समझो तो सब बात समझमें आ जायेगी. ऋतुक्रमकी सेवामें भी ये ही बात है. रूपा पौरियाकु राग-तालको कोई ज्ञान नहीं हतो, सब कीर्तन वो एक ही तरहसु गातो हतो. पर फिर भी ठाकुरजी वासु प्रसन्न हते. और ऐसी बात भी नहीं हती के रूपा पौरियापे ठाकुरजी प्रसन्न हते करके गोविन्दस्वामीके कीर्तन ठाकुरजीकु पसन्द नहीं आते हते. या बाजु गोविन्दस्वामीके पद भी आपकु पसन्द आवे हैं तो वा बाजु रूपा पौरियाके भी पद पसन्द आवे हैं. या बाजु आपकु राधाजी भी पसन्द आवे हैं तो वा बाजु कुब्जा भी पसन्द आवे है. आदमीके साथ ये तकलीफ है के वाकु राध तो अच्छी लगेगी पर कुब्जा दीखेगी तो खुद भग जायेगो. ठाकुरजीमें ऐसी सामर्थ्य है के उनकु कुब्जा भी पसंद आवे है और राधा भी पसंद आवे है. ठाकुरजीमें ऐसी सामर्थ्य है के उनकु जूठो भी पसन्द आवे है और ब्राह्मणके हाथकी पक्की मरजादसु सिद्ध भयी सामग्री भी पसंद आवे है. शबरी तो भील हती. शास्त्रके अनुसार भीलकु तो शूद्रसु भी अधिक अशुद्ध मान्यो गयो है. वैसे भीलको भी पाछो जूठो ठाकुरजीने अरोग्यो है.
 ठाकुरजीकु रिझानेमें गभराने जैसी कोई बात ही नहीं है. यामें रहस्य बस इतनोसो है के ठाकुरजीकु एक बखत अपनो मानो. ये ठाकुर मेरो है, मेरे माथे बिराज रह्यो है, याकु मोकु रिझानो है. फिर तो खुद ठाकुर तुमकु बता देगो और तुम ठाकुरकु बता दोगे के ऐसे नहीं, ऐसे करनो है. नागर ग्रन्थावली उठाके देख लो, नागरीदासजीने अपनी पसंदके रागके पद उनके ठाकुरजीके सामने गाये हैं के नहीं? दयारामभाईने उनके रागन्में कितने सारे प्रभातियाके पद गाये हैं. प्रभातिया अपने यहां राजस्थानमें कहां गवें हैं? अपने यहां ‘सामेरी’ राग गवे है. ये राग उत्तरभारतीय राग ही नहीं हतो. ये हमारे दक्षिण भारतको राग हतो. हम लोग उत्तरमें आये तब सामेरी राग लेके आये. ये राग प्रबोधिनीके दिन गवे है : ‘‘ब्रज वेद बिदित बरसानो, ब्रषभान गोप तहां रानो’’. प्रबोधिनीके दिन या रागमें कीर्तन नहीं गवे तो हमकु शादी जैसो लगे ही नहीं है करके हमने या रागमें कीर्तन गायो. तुमकु ये राग नहीं आतो होवे तो मत गाओ.
मथुरा घरके गोस्वामी बालक खयालवाले श्रीपुरुषोत्तमजी जिनने वा जमानामें छप्पन व्रजयात्रा करी हती उनकु यात्रा करते बखत कीर्तन गाने पसंद नहीं आते हते करके उनने रसिया गाने शुरु किये. उनसु पहले पुष्टिमार्गमें रसिया गाये ही नहीं जाते हते. अब स्थिति ये है के यदि होरीके दिनन्में रसिया नहीं गावें तो सूनो-सूनो लगे है. अब रसिया ठाकुरजीकु पसंद आ गये हैं. अपन गायेंगे तो ठाकुरजीकु पसंद आने लग जायेगो. अपनकु गानो आ रह्यो है तो वैसे गाओ; नहीं आ रह्यो है तो जैसो आवे वैसो गाओ.
 बहुत पहले जब दादाजी (नि.ली.गो.श्रीदीक्षितजी) बीमार पड गये तब मैं ठाकुरजीकु पधराके किशनगढ अकेलो आया हतो. मोकु तो रसोईमें तीन वस्तु बनानी आती हती खीर, खीचडी और मसालाभात. चौथी कोई सामग्री सिद्ध करनी मोकु आती ही नहीं हती. हमारे ठाकुरजी क्या करते? ठाकुरजी भी वो ही अरोगते. क्या करनो चौथी कोई चीज आवे तो अरोगावें न
 पद्मनाभदासजीकी वार्तामें आवे है के वो ठाकुरजीकु भोगमें केवल छोला धर पाते हते. एक बार जब वो अडेल श्रीमहाप्रभुजीके दर्शनकेलिये गये तब श्रीमहालक्ष्मीजीने उनकी परिस्थितिकु देखके रसोईकेलिये सीधो-सामग्री भिजवाई. पद्मनाभदासजीने मथुराधीशजीसु पूछी के महाराज आपकी क्या इच्छा है? आपकु छोला चलेंगे के छप्पनभोग अरोगने हैं? मथुराधीशजीने आज्ञा करी के मोकु तो तेरे छोला अरोगने हैं. चल, अपन दोनों यहांसु रवाना हो जायें. उनने ठाकुरजीकु पूछ्यो, ठाकुरजीने जवाब भी दियो है. पर अपन जब ठाकुरजीसु पूछें ही नहीं हैं तब ठाकुरजी भी सोचते होयेंगे के जब याके खुदके मनमें कोई स्पष्टता नहीं है तो फिर मैं क्यों बोलूं अपने मनमें स्पष्टता होनी चहिये के ये मेरो ठाकुर है और मोकु ही वाकु रिझानो है.
 एक बात समझो के कोईकी मां कानी (काणी) होवे तब भी बच्चाकु वाकी मां प्यारी ही लगती होवे है. गाम भले वाकु कुरूप कहेतो होवे पर बच्चाकु वो बात समझमें नहीं आती होवे है. मां और बच्चा दोनों एक-दूसरेसु रीझे भये हैं. वामें मां कानी है के नहीं वाको कहां सवाल है? ऐसे ही, यदि अपने माथे बिराजतो ठाकुर अपनेसु रीझ्यो भयो है तो अपन जैसे हैं वैसेकी सेवा वो स्वीकारेगो. कोई कानेकी सेवा ठाकुरजीकु अच्छी लगे है करके अनावश्यक अपनकु अपनी एक आंख फोडवेकी जरूरत नहीं है. दो आंख हैं तो वैसे बने रहके सेवा करो. ठाकुरजीकु वासु कछु फर्क नहीं पडे है. लोग कानेको मुंह देखनो अपशगुन माने हैं. ठाकुरजी कभी काने सेवककु ऐसे नहीं कहेंगे के तु मेरी मंगला मत करायो कर. ठाकुरजी तो ये ही आज्ञा करेंगे के मेरो कानो सेवक मोकु बडो अच्छो लगे है.
 तुम अपरस पाल रहे हो तो ठाकुरजी प्रसन्न हो जायेंगे के देखो, मेरो भक्त कितनी अपरस पाले है. तुम्हारे ठाकुरजी भी तुम्हारे संग अपरस पालवे लगेंगे. तुमसु अपरस नहीं पल रही है तब भी ठाकुरजी शबरीके बेर अरोगने तैयार हैं ‘‘दुर्योधनके मेवा छांडे शाक विदुर घर खाई, सबसे ऊंची प्रेमसगाई’’. ‘‘सबसे ऊंची प्रेमसगाई’’ या आत्मविश्‍वासकु रखके सेवा 
अंश प्रवचन ऋतु -उत्सव ,मनोरथ गोस्वामी श्रीश्याम मनोहरजी  (किशनगढ़-पर्ला )

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तिल भर भी चरण शरण की दुरी ना हो,

***जय श्री कृष्णा ***

💠💠💠💠💠💠💠💠

. *🌻🌻 “सुप्रभातम” 🌻🌻*

तिल भर भी चरण शरण की दुरी ना हो,

तिल भर भी आपके स्वरुप की विस्मृति ना हो,

तिल भर भी आपका नाम ना छूटे,

तिल भर भी आपसे दृष्टी ना हटे,

हमारे तिल भर की सेवको..

मेरु समान मानने वाले  –

.          प्रभु ऐसी कृपा करे..!!

प्रभु को तिलवा आरोगाते समय,

.     मन मे यह ही भाव रखे..!!

.       ::::                       ::::

.  🙏🙏 जय श्री कृष्ण 🙏🙏

.  💐💐 जय श्री वलभ 💐💐તીલ 

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પતંગોત્સવ  

पुष्टि के नभ में भक्ति की, मेरी चँग स्वच्छंद अमँद ऊढ़े.

दृढ़ सिद्धाँतन की डोर बंधे, अरू छोर श्रीवल्लभ हस्त गहे.

नेह समीर उछँग चले, अरू अपसिद्धाँतन की काट करे

बस चाह यही प्रभु जैसे चहैं,परि चंग को संग न भंग करे

वल्लभीयन कों सँग रहैं, चित चाह प्रभु सुख की ही रहै.

रहूँ श्याम चरण शीतल छैंया,तिल भर हूँ मन न अनत रहै.

यही अभिलाषा के साथ कि या डोर कूं प्रभु कभी विलग न करें आप सर्व वैष्णवन कूं उत्सव की खूब खूब बधाई

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सा॰प्रकरण प्रवचन ११/१  

​🍁सा॰प्रकरण प्रवचन ११/१

हमारे धर्म अर्थ काम के अनियंत्रित बहाव कू नियंंत्रित करवे के लिये शास्त्र ने कुछ नियम घड़े हैं।शास्त्र को स्पष्ट विधान है कि धर्मार्थकाम को proportionate उपयोग हर व्यक्ति के लिये आवश्यक हैं हम कई लोक सिद्ध उपाय इनकी पूर्ती के लिये पसंद करें ये अपूर्व विधी कहावे। व्यक्ति तब ही अस्वस्थ होवे जब वह याको  मनघढ़ंत तरीके सूं use करे है. जब शास्त्र इनको regularise करे वो नियमविधि कहावे।केवल धर्म ही करनो,केवल अर्थ, केवल काम व केंवल मोक्ष के ही उपाय को addiction कुछ न कुछ अस्वास्थ को ही कारण बने हैं.धर्मार्थकाममोक्ष को एक दूसरे के अविरोध सूं संपादन करते आनो चाहियै. धर्म को इतनो अतिरेक नहीं कि अर्थ को अभाव हो जाये अर्थ के पीछे इतनो नहीं दौड़नो के धर्म सों ही विमुख हो जायें .काम के पीछे भी इतनो नहीं पड़नो कि वामें अर्थ पूरो फूंक जाय शास्त्र ने इनकूं संपादन करिवे की systematic guideline अपन कूं प्रदान करी है वही शास्त्र हमकू समझावे है कि धर्म विरोधि अर्थोपार्जन मत कर अर्थ विरोधि धर्म मत कर अर्थोपार्जन को हेतु काम होवे  वा हेतु को शास्त्र धर्म की तरफ मोड़े। जासूं धर्म व अर्थ मिल के काम को रेग्युलेट करें।चतुष्ट्य को अविरोध से संपादन करनो ये शास्त्र की सच्ची तत्वदृष्टि है।संस्कार,स्वधर्मपालन के हमारे कर्तव्य व हमारी वृत्ति कैसी होनी ये शास्त्र ही हमकू समझावे।जब ये समझ में आवे तो महाप्रभुजी की दृष्टि समझ में आयेगी कि भक्ति के लिये धर्मार्थकाम होने चईयै ओर हमने भक्ति को धर्मार्थकाम को साधन बना लियो है। ये समझ में आयो तो याके पीछे रहे भये तत्व कू जानवे की जिग्यासा जगेगी  महाप्रभुजी के या हार्द सूं परिचित होनो ही तत्वविद्ता है कि यामे मूल तत्व कृष्ण की भक्ति है जाके लिये हमारे त्रैवर्गिक आयास को योजन महाप्रभुजी करनो चाह रहे हैं संपूर्ण भागवत के ये तत्व को ज्ञान हमकू होयगो तो कभी हम भागवत कू अपने अर्थोपार्जन को जरिया नही बनायेंगे। (पुज्य जैजै)

संकलन,,,, ललित जी,,,,,,

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