अथ श्रीमत्प्रभुचरण श्रीविठ्ठलेश्वर विरचित:
प्रथम विज्ञप्ति
कियान्पूर्व जीवस्तदुचितकृतिश्चापि कियती।
भवान्यत्सापेक्षो निजचरणदाने बत भवेत।।
अत: स्वात्मानंत्त्वस्वं निरूपममहत्वं व्रजपते।
समीक्ष्यास्मन्नेत्रे शिशिरय निजास्याम्बुजरसै:।।१।।
हे ब्रजपते! आप अपने चरण कमल को दान करिवे में साधन की अपेक्षा राखोगे तो अति ही दुःख होयगो, कारण? कहाँ तो यह क्षुद्र जीव और कहाँ याकी उचित कृति है? जासूं कि यह जीव आपकूं प्राप्त कर लेय! अत: आप अपने अनुपम महत्त्व कौ बिचार करिके दर्शन देयकें अपने मुख-कमल के रससों हमारे नेत्रन को शीतल करो।।१।।
स्वदोषांजानामि स्वकृतिविहितै: साधनशतै।
रभेद्याम् स्त्यक्तुं चापटुतरमना यद्यपि विभो।।
तथापि श्रीगोपीजनपदपरागांचितशिरास्वत्वदीयोेऽस्मा र्ति श्रीब्रजनृपन शोचामि मुदित:।।२।।
हे विभो! यद्यपि मैं दोषन कूं जानत हूँ। जो मेरे वेद विहित सैकरन साधन करिवे पर भी नष्ट नहीं होय सके हैं। अत: मैं अपने दोषन कूं त्यागिवे में अति असमर्थ हूँ। तो भी हे ब्रजराज! मेरो मस्तक श्रीगोपीजनन के चरणकमल के पराग से अंकित होयवे सूं मैं आपको ही हूँ, ऐसो मानिकें परम प्रसन्न रहिकें शोच को त्यागन करत हूँ।।२।।
धृतं यदर्थेवपुरेतदासीत्तदिच्छया यभ्दविता तदस्तु।
प्रभो कृपलो यदि रोचते ते विज्ञापनीयं न कदापि किंचित्।।३।।
जिनके अर्थ यह शरीर धरयो है, तिनकी इच्छा ते जो होय सो होय। जो कृपालु प्रभु को रुचित है, तो हमकूं किंचित भी प्रार्थना करनी उचित नहीं है।।३।।
यतंतरेण क्षणमप्यशक्यं यो मन्यमान: सदिनान्यमुनि।
नयामि तेनापि विना यदित्थं किमस्ति कापट यमितोेऽधिकं मे।।४।।
जिन श्री गोवर्धनधर के अंतरायमें एक क्षणहु रहिनों अशक्य मानतो हतो, सो उनके बिना दिन रात रहत हूँ, अत: मेरो यासूँ अधिक कहा कष्ट है?।।४।।
आसारै: पीडितं स्वं ब्रजमवितुमधादाशुगोवर्धनान्द्रि।
दावाग्निदह्यमानं तमपिवदमिताऽसह्य भक्तार्तिभीति:।।
गोपस्त्रीविप्रयोगानलमुशमयन्नेति गोष्ठं दिनांते।
सोऽति श्रीगोकुलेश: किमिति करूणया मामिहोपेक्षते स्वम्।।५।।
जिन प्रभुने इन्द्र के कोप सूं मेघ द्वारा पीडित ब्रज की रक्षा करिवे कूं श्रीगोवर्धन कूं धारण करि, एवं अपने भक्तों कूं अग्निमें दग्ध होते भये ग्वालबालरूपी ब्रजभक्तन कूं आर्तियुक्त और भयभीत देखिकें सहन नहीं होय सको, अत: आपने चारों और प्रज्विलत अग्नि को पान कर, एवं गोपस्त्रियों के विप्रयोगानल को शान्त करन हेतु सायंकाल समय गोष्ठ में पधारकें उनके हृदय के तापको शमन कर आनन्दानुभूति प्रदान करिवे वारे हे करुणामय श्रीगोकुलेशप्रभु अपने निज भक्तोंकी उपेक्षा को कारण कहा है? ।।५।।
जानामि मंदाभाग्योेऽहं यदार्थं गोकुलेश्वर:।
भक्तक्लेशा सहिष्णुत्वस्वभावं कुरुतेेऽन्यथा।।६।।
आशातृणावलंबेन त्वद्वियोगान्धिवरिधिम्।
अनुग्रहगरिष्ठोेऽतितरामिह तराम्यहम्।।७।।
मैं मंदभाग्य हूँ, ऐसो मोकूं आभास होय है, याही सूं श्रीगोकुलेश्वर प्रभुने भक्तोंके क्लेश सहन करिवे को विपरीत स्वभाव धारण कर लियो है।६।।
हे नाथ! आपके वियोगकी व्यथारूपी समुद्र में डूबतो भयो, मैं अति कठिन अनुग्रह की आशा के तृणावलबंन से अवश्य तरूँगो।।७।।
अंबुदस्य स्वभावोेऽयं समये वारि मुंचति।
तथापि चातक: खिन्नो रटत्येव न संशय:।।८।।
यद्यप्यहमपराधी तथापि तव चरणसेवकोेऽस्म्येव।
एवं सत्येवं मयि करणं नैवोचितं नाथ।।९।।
मेघ को तो यह स्वभाव ही है, कि वह समय आने पर जल वृष्टि करे, तो भी चातक पक्षी तो खिन्न होयके अपनी रटना में लग्यो ही रहे है। यामे संशय नहीं है।।८।।
यद्यपि में अपराधी हूँ, तो भी आपको चरणसेवक हूँ, अत: सेवक को त्याग करनो उचित नांहि है।।९।।
काल कर्माधीनता यत्करोषि मयि सुन्दर।
तदप्यनुचितं यस्मात्वदीयोेऽसम्युररीकृत:।।१०।।
स्वतंत्रत्वेन मर्यादां मनुषे नैव चेत्प्रभो।
श्रीगोकुलप्रभुरसि तेनौवं दीनतां ब्रुवे।।११।।
हे सुन्दर! आप मोकूं काल और कर्म के आधीन करत हो सो उचित नांहि है। मैं तो आपको ही अंगीकृत हूँ।।१०।।
हे प्रभो! आप स्वतंत्र हो, यासूं आप मर्यादा कूं काहे कूं मानों, परि आप श्रीगोकुलेशप्रभु हो, यासूं हम आपके समक्ष दीनता करत हैं।।११।।
सर्वसाधनशून्योेऽहं सर्वसामर्थ्यवान्भवान्।
श्रीगोकुल प्राणनाथ न त्याज्योेऽहं कदापि वै।।१२।।
यत्करिष्यमि तन्नाथस्वत: एव करिष्यसि।
अतो मुहु: किं बदामि श्रीगोपीजनवल्लभ।।१३।।
हे श्री गोकुलपति! प्राणनाथ! मैं सर्व साधन रहित हूँ। और आप सर्व सामर्थ्यवान हैं। यासूं मैं कदापि त्यागिवे योग्य नहीं हूँ।।१२।।
हे नाथ! हे गोपीजन वल्लभ! आप जो कछु करोगे स्वतः ही करोगे, अत: मैं बारंबार काहेकूं कहूँ।।१३।।
एकोेपि रेणुव्रजभूषणांढया: पातुक्षम: सर्वत एव सर्वम्।
अशेषतत्पादसरोजरेणु सनाथ सर्वस्य कुतोेऽस्तिमे भि:।।१४।।
ब्रजके भूषण श्रीस्वामिनीजी के चरणकमलकी एक रेणु भी सब प्रकारके समस्त जीवनको उद्धार करिवे में समर्थ है, सो मैं तो उनके चरण कमलकी अशेष रेणुकाओं से कृतार्थ भयो हूँ, तो मोकू भय कहाँ?।।१४।।
घुणंकीटवदेव योतरंतश्चरति प्राणभृतामशेषसारम्।
अपगच्छति नाप्युपालयक्षेर्व्रजनाथ प्रणय: स किं सुखाय।।१५।।
हे ब्रजनाथ! जो प्रणय घुटकीट के समान प्राणियों के हृदयमें प्रवेश करके संपूर्ण सारको हरण कर लेय है। जो किट उपाय करिवे परहु बाहर नहीं निकसत है। ऐसो प्रणय कहा सुखकारक है?।।१५।।
त्वन्नामोच्चारणेेऽप्यस्ति न जीवेष्वधिकारिता।
अलौकिकत्त्वात्वन्नामस्त्वद्वाचोेऽलौकिकत्वत:।।१६।।
एवं सत्यपि जानामि त्वनमादिप्रभाववित्।
उद्यदेव स्वयोग्यत्वां कुर्वदेवहि राजते।।१७।।
हे नाथ! आको नाम उच्चारण करिवे को जीव कूँ अधिकार नहीं हैं, कारण आपको नाम अलौकिक है, और जीव की वाणी लौकिक है।।१६।।
ऐसो होते भये भी आपके प्रभावयुक्त नामकूँ मैं जानुं हूँ, जो कि उदय होयके जीवमें अपनी योग्यता की स्थापना करे है।।१७।।
त्वदंगीकृतयो जीवेष्वधिकारा यत: प्रभो।
अतस्तेन विचरार्हा: कृपां कुरु कृपानिधे।।१८।।
हे प्रभो! जो जीव आपके अंगीकृत है, सोही जीव आपको नाम गृहण करनेको अधिकारी है, परि यह अंगीकृत विचार करिवे योग्य नांहि, अत: हे कृपानिधे! आपही कृपा करो।।१८।।
साधिका भवतु साधितार्थताबाधिताथविहिताधिकारिता।
कापि कापि गतिरुत्सुकास्मयहंराधिकाचरण दासिका परम।।१९।।
मेरे सिद्ध किये भये सबरे अर्थ मानसीव्यथा होय, तथा समस्त उत्तम अधिकार वाधक रूप होंय, एवं कहूं पे कोहू गति होय, तोहू मैं श्रीराधिकाजी के चरण की परम दासी होयवे कूं परम उत्सुक हूँ।।१९।।
मदीयोऽयमिति ज्ञात्वा न कस्मै त्वं प्रसिदसि।
यादृशस्तादृशो वाहं तव चेक्तिं बिलंबसे।।२०।।
आचार्यचर्णोरूक्तं दैन्यं त्वत्तोषसाधनम्।
स्वल्पं बहुतरं वापि तदस्तीति प्रसीद मे।।२१।।
हे नाथ! जाकूं आप जान लेय हो, वाके गुण दोषनकूं अवलोकन नांहि कर, वापे कृपा ही करत हो, तासूं मैं जैसो हूँ, आपको ही हूँ। तासू अब बिलम्ब काहे को करत हो?।।२०।।
श्रीआचार्य चरण ने कह्यो है कि आपकूं सन्तुष्ट करिवे को साधन दीनता ही है, सो थोडी घनी जैसी कछु मेरे में होय, वाहीसूं आप मोपे प्रसन्न होय।।२१।।
प्रभुस्त्वमेव मे नाथ यत्करोषि वरं हि तत्।
तथाप्यधीरतामेव मानसं मेेऽवलम्बते।।२२।।
यदि प्रसन्न एवासि त्वदीयोेऽहं न चान्यथा।
न चेदहं सथैवास्मि स्मर स्वानुग्रहं मयि।।२३।।
हे प्रभु! मेरे नाथ आपही हो, सो जो कछु करोगे सो उत्तम ही करोगे, तोहू मेरो मन अधीर व्है रह्यो है।।२२।।
यदि आप प्रसन्न हो तो भी मैं आपको हूँ, और अप्रसन्न होय तोहू आपही को हूँ, काहू अन्य को तो हूँ नहीं, यासूं मोपे जो अनुग्रह कियो है, वाकूं स्मरण करो।।२३।।
यादृशि मे कुतिर्नाथ तस्या फलमिदं कियत्।
यादृशस्त्वं प्रभु: किन्तु तादृगेव विधीयताम्।।२४।।
अपि मे सापराध्य शिक्षितस्याप्यजानत:।
हा नाथ पालनीयस्य किमुपेक्षोचिता तव।।२५।।
हे नाथ! जैसी मेरी कृति है, वाको यह फल मोकूं कब तक भोगनो पड़ेगो, जैसे आप प्रभु हो वैसो ही करनो आपकूं उचित है।।२४।।
हा नाथ! यद्यपि मैं अपराध सहित हूँ, अशिक्षित हूँ, अज्ञान हूँ, तोहूं कहा! पालन करिवे योग्य की उपेक्षा करनो आपकूं उचित है?।।२५।।