निःसाधनभाव

महाप्रभूजी के वचन है “निजेच्छातः करिष्यति” । इस निजेच्छा का मतलब क्या? जैसे एक मछली को टब में छोड़ देते हैं तब वह उस टब में इस कोने से उस कोने तक फिरने में स्वतन्त्र है, तलमे रहे या ऊपर तैरे, स्थिर रहे या दोड़ा दोड़ करे सब उसकी इच्छा पर निर्भर है, यह है जीवकी इच्छा, उसकी स्वतन्त्रता।किन्तु वह कितना भी प्रयत्न करे, पुरूषार्थ करे उस टबके बाहर नहीं निकलसकती, यह है प्रभू की इच्छा। माने जैसे भगवान के षडैश्वर्य हैं, वैसे जीवमे भी ऐश्वर्य है, भले वो समुद्रके सामने बूंद जितनो ही हो।

दूसरी बात लौकिक कामों में हम सतत प्रयास करते हैं।बच्चे को स्कूलमें दाखिल करना हो तो, स्कूल का स्तर कैसा है क्या पढाया जाता है, वाहनकी सुविधा है या नहीं, फीस कितनी है, सब बातों का विचार करते हैं, बड़े हो गये तो, कौनसा करियर चुने, एम, बी, ए, का क्या स्कोप है, आई, टी, का क्या स्कोप है, सी, ए, का क्या स्कोप है? बच्चे की रुची किसमें है, सब विचार करते हैं।शादी ब्याहके लिए कितनी छानबीन करते हैं।तब यह नहीं सोचते हैं कि प्रभूकी इच्छा होयगी तो हो जायेगा। विडम्बना है कि, जब भी आध्यात्म की बात धर्म की बात, साधना की बातआती है, हमें याद आ जाताहै कि प्रभू की इच्छा ही नहीं है, मैं क्या कर सकता हूं?

तीसरी बात- निःसाधनभाव, जो पुष्टिमार्ग की महत्वपूर्ण थीम है।इसका मतलब है हम यथासाध्य जो कुछभी करते हैं, उसमें कृत्तत्वाभिमानको त्याग कर यह भाव रखते हैं कि मैंने कुछ नहीं किया, सब प्रभूने मुझसे करवाया है, हालांकि करते हम ही हैं, इसीका नाम निःसाधनभाव है।,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

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