१९७७ का विपक्षी गठ बंधन २०२४ का विपक्षी गठबंधन भाग – १
१९७७का गठबंधन क्यों हुआ था?
विपक्षी गठबंधन के समय शासक पक्ष नहेरुवीयन इंदिरा कोंग्रेस पक्ष था जो कोंग्रेस (आई) यानी कि, कोंगी नामसे जाना जाता था.
प्रस्तावनाः
कोंग्रेसका पक्षका जन्म कब हुआ?
१९२०में कोंग्रेसने अपना ध्येय पूर्ण स्वराज्य का घोषित किया. तबसे कोंग्रेसका जन्म हुआ.
ऐसा क्यों?
पक्ष हमेशा अपने ध्येय से और उस ध्येयको कैसे प्राप्त करना उसके तरिकेसे जाना जाता है. संपूर्ण स्वराज्यका तरिका था अहिंसक आंदोलन.
१९२० में कोंग्रेसमें जो गुट बाजी चलती थी उसका अंत हो गया और लोकमान्य टीळख और गोपालकृष्ण गोखलेके गुट मिल गये. १९२० से १९४६ तक के कोंग्रेसके इतिहासकी हम चर्चा नहीं करेंगे. अनेक विपक्षोंका जन्म हुआ और नष्ट भी हुए. अनेक आंदोलन भी हुए और बंद भी हो गये. किंतु इसके अंतर्गत आम जनता अति जागृत हो गयी थी. और इस कारण अंग्रेज सरकारको लगा कि अब उन्हे जान पडेगा. अंग्रेज सरकारने अपनी आदत के अनुसार ऐसा सोचा कि हम भारतको अनेक टूकडोमें विभाजित करके ही जायेंगे ताकि भारत सौ साल तक सक्षम बन ही न शके. भारतकी जनता को फर्जी इतिहास पढाके, भारतको और धर्म को आधार बनाके भारतको हिंदुस्तान, पाकिस्तान, दलितीस्थान, खालिस्तान, द्रविडीस्तान, एवं देशी राज्योंको उकसाके उनको स्वतंत्र हिंदुस्तानसे अलग रहेनेका विकल्प भी दिया था. चर्चील को अनुभूति भी हो गयी थी के स्वार्थी और भ्र्ष्ट और लालची लोग इकट्ठा रह ही नहीं पायेंगे.
लेकिन उसने महात्मा गांधी, सरदार पटेल, क्रिपलानी, जयप्रकाश नारायण, विनोबा भावे, कनैया लाल मुंशी, मोरारजी देसाई, चक्रवर्ती राजगोपाला चारी आदि कईयोंको अक्षम और उलज़े हुए मानने की गलती की. गांधीजीने सबको संभाला और नहेरु और जीन्ना के सिवा सबको मना लिया. नहेरुने सोचा कि यही सबसे अच्छा मौका है सत्ता प्राप्तिका और प्रधान मंत्री बनने का. वे कोंग्रेसको तोडनेके लिये सज्ज हो गये. नहेरुने बोला जीन्नाको तो मैं अपने कार्यालयमें चपरासीके पद पर भी नहीं रखुंगा. इस तरह हिंदुस्तान और पाकिस्तान ऐसे विभाजन होना सुनिश्चित हो गया.
पक्षमें एक केंद्रीय कार्यकारी समिति होती है और विभागीय कार्यकारी समितियां होती है. विभागीय समितियां आम सदस्योंसे जूडी हुयी होती है.
आम सदस्य जनतासे जुडे हुए ते है.
नहेरु, संगठन कक्षा पर मजबुत नेता नहीं थे. पर आम जनतामें ठीक ठीक लोकप्रिय थे. आम जनता को नौटंकी पसंद होती है, और नहेरुभी नौटंकी बाज थे. इसलिये उत्तरभारतमें वे युवाओंमें लोकप्रिय थे (क्यों कि नेताजी सुभाष चंद्रबोज़ का अभाव था). गांधीजीको नहेरुका चरित्र मालुम था. गांधीजीने सोचा यदि कोंग्रेस का विभाजन हो गया तो कोंग्रेस कमजोर बन जायेगी और जो केबीनेट मीशन आया है उसके साथ विभाजन के विषय लेनदेन में दबाव बनानेमें अक्षम रहेगी. यदि नहेरुको पक्षप्रमुख नहीं बनाया तो वह कोंग्रेसको तोडकर समाजवादी कोंग्रेस बना देंगे और उनको उत्तरभारतमें समर्थन भी मिल जायेगा. तो एक और टूकडा बन जायेगा. नहेरुको कुछ मुस्लिम नेताओंका भी समर्थन प्राप्त था. नहेरुने स्वयं कहा था कि वे वैचारिक तरिकेसे ख्रीस्ती हूँ. गांधीजीने सरदार पटेलको विश्वासमें ले के नहेरुको पक्षके प्रमुख बना दिया.
गांधीजीने कोंग्रेसको आदेश दिया कि केबीनेट मीशनका ही बहिष्कार करो. लेकिन कोंग्रेस कारोबारी इसके उपर सहमत नहीं थी. गांधीजीने केबीनेट कमीशनके साथ संवाद करनेमें अपनी सदस्यता रद कर दी. उन्होंने कहा जिस कोंग्रेसने विभाजके लिये संमति दी हो, उस संवाद समितिका मैं हिस्सेदार नहीं रह सकता. कोंग्रेसको जो कुछ भी करना है वह अपनी जवाबदारी पर करें. जीन्नाने डाईरेक्ट एक्षन का एलान किया और दंगे फसाद होने लगे तो गांधीजीने कहा मै इन दंगोंको रोकनेमें सक्षम हूँ. क्या आप लोग सक्षम है? गांधीजीने देशके विभाजन के लिये सहमति दे दी.
सरदार पटेल की मुत्सद्दीसे भारतका दो ही टूकडोमें विभाजन हुआ. सरदार पटेलने साम, दाम, और दंड के तरिके अपनाके सभी देशी राज्योंका भारतमें विलीनीकरण कर दिया. देशी राज्योंके भारतमें विलीनीकरणसे सरदार पटेलका कद बहूत ही बढ गया था.
गांधीजीने बोला “अब कोंग्रेसका ध्येय पूरा हो गया है. अब कोंग्रेसका विलय कर दो.“ अब यदि कोंग्रेसके टूकडे भी हो जाय तो भी कोई हर्ज नहीं था. यह बात लंबी है. इस लिये इस बात को यहीं पर ही विराम देते है.
१९४८ जानवरीमें गांधीजीका खून हो गया. और चूनाव आते आते सरदार पटेलका भी देहांत हो गया. अब नहेरुका संगठन पर संपूर्ण कबजा हो गया. और उन्होनें अपने प्रतिस्पर्धीयोंको एक एक करके निकम्मे बनाना चालु किया, और जो प्रतिस्पर्धी थे वे भी कोंग्रेस छोडके अलग हो गये. और कुछ नेताओंने अपना पक्ष भी बना लिया. अब कोंग्रेस नहेरुवीयन कोंग्रेस बन गयी.
इस प्रकार विपक्षोंका जन्म हुआ.
एक तरफ भ्रष्ट और सत्ताकी लालची नहेरुवीयन कोंग्रेस थी. और दुसरी तरफ नैतिकतासे जूडे हुए भीन्न भीन्न वैचारधारा वाले विपक्ष थे.
क्रमशः
शिरीष मोहनलाल दवे