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Archive for June, 2023

१९७७ का विपक्षी गठ बंधन २०२४ का विपक्षी गठबंधन भाग – ३

१९७५ में जनता फ्रंटकी जीतके बाद की घटनाएं

राजनारायण नामका एक वाचाल संसद सदस्य, जो इंदिरा गांधीके सामने प्रत्याषी था, उसने अल्लाहबाद की उच्च न्यायालयमें एक अर्जी दाखिल की थी कि इंदिरा गांधीने अवैध तरिकोंसे चूनाव प्रचार किया है इसलिये इंदिरा गांधीका चूनाव रद किया जाय.  न्यायालयने इस याचिकाके अनुरुप निर्णय दिया. अपने निर्णयमें   उच्च न्यायालयने इंदिराके चूनावको रद किया और इंदिराको ६ वर्षके लिये चूनावके लिये अयोग्य घोषित किया.

इंदिरा गांधीको त्यागपत्र देना चाहिये था. लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. वह प्रधान मंत्रीके पद पर चालु रही. एवं २५ जूनको देशमें आंतरिक आपात्कालका अध्यादेश जारी किया. सभी विपक्षी एवं इंदिरासे विरोधी विचार रखवाले नेताओंको और समाचार माध्यमोंके कर्ता हर्ताओंको बिना केस चलाये, बिना वजह बतायें, बिना अपराधके अस्तित्वके बावजुद, कारावासमें धकेल दिया. समाचार पत्रों पर सरकारको बिना बतायें समाचारकी प्रसिद्धि पर रोक लगायी. इसमें सभी विपक्षोंके सदस्योंके अतिरिक्त सर्वोदयके नेताओंको, सर्वोदय मुखपत्रोंके तंत्रीगणको, एवं इंदिरा विरोधी वकिलोंको, इंदिरा विरोधी एन.जी.ओ.के ट्रस्टीगण … अदि कुल मिलाके ६५०००+ लोगोंको अनियतकालके लिये कारावासमें धकेल दिया.

आज इसी कोंगीके नहेरुवीयन फरजंद, इंदिरा गांधीके इन कदमोंको भूल कर अपनेको लोकशाहीके स्थापक, लोकशाहीके संरक्षक बताके अपनी दुहाई देते हुए अपनी ही पीठ थपथपाते है.

शासक पक्ष कोंग्रेसके सामने एक विपक्षी संगठन बनानेका कारण क्या था?

पहेले हम यह देख लें कि, शासक पक्ष (नहेरुवीयन कोंगी पक्ष)  कैसा था?

नहेरुवीयनोंका एकाधिकार वाद, नहेरुवीयनोंका दोघलापन, नहेरुवीयनोंका गैर लोकतांत्रिक तरिकोंसे गैर लोकतांत्रिक मूल्योंका संविधानमें समावेश करना, नहेरुवीयनोंका भ्रष्टाचार, नहेरुवीयनोंकी अनीतिमत्ता, नहेरुवीयनोंके जूठे वादे, आपात्कालकालमें नहेरुवीयनोंकी अमानवीय कार्यशैली, नहेरुवीयनो द्वारा आपात्कालमें किया गया लोकतांत्रिक मूल्योंपर उग्र  प्रहार, … ये सब नहेरुवीयन कोंग्रेसका चरित्र था

उस समयके विपक्षीनेता कैसे थे?

एक भी विपक्षीनेता पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं था, तो सजाका तो प्रश्न ही नहीं उठता है,

विपक्षके एक भी नेताने जूठ भी बोला नहीं था, चाहे वह सभा हो या न्यायालय,

विपक्षके एक भी नेताने कोमवादके समर्थनमें   बयान या क्षेत्रवादके समर्थन में बयान नहीं दिया था,

विपक्षके सभीनेता नीतिमत्ताके और लोकशाही मूल्योंके समर्थक थे

विपक्षके नेताओंने अपने पक्षका, “जनता दल”में विलय कर दिया था

विपक्षका सर्वमान्य नेता कौन था?

विपक्षका सर्वमान्यनेता महात्मा गांधीवादी एवं अणीशुद्ध जयप्रकाश नारायण था.

प्रवर्तमान समायमें तो विपक्षकी परिस्थिति उल्टी ही है.

हालमें विपक्षका सर्व मान्य नेता कौन है? कोई नहीं,

हालके विपक्ष के नेताओंकी नीतिमत्ता क्या है?

हरेक नेताके उपर कोइ न कोइ गफला करनेका, न्यायालय द्वारा प्रमाणित प्रथम दर्शी आरोप है, कुछ नेता क्रीमीनल केसमें दंडित है, कुछ शिर्षनेता  गण जमानत पर है, विपक्षके कुछ नेतागण जूठ बोलनेकारण भी दंडित है और कुछ विपक्षीनेताके उपर केस चल रहा है, एक भी नेता अणिशुद्ध नहीं है. सभी नेता क्षेत्रवादी है, कोमवादी है, विभाजनवादी है, दोघलापनवाले है, विपक्षके नेता  चर्चा के लिये न तो तैयार है न तो संवादके लिये तैयार है, विपक्षके प्रवक्ता किसी भी मुद्देपर स्थायी मुद्दे पर चर्चा नहीं करते.  इनके अनेक प्रमाण है.  हालका विपक्ष, एक पक्षमें विलयित नहीं है. सभीने अपने अपने पक्षको जिंदा रक्खा है,

हालका शासक पक्ष कैसा है?

नेता नरेंद्र-टीम (मंत्रीमंडल)के एक भी सदस्यके उपर कोई भी तर्क पर आधारित या तो न्यायालय प्रमाणित प्रथम दर्शी आरोप भी नहीं है. सर्वोच्च न्यायालयने तो जब कोंगीका केंद्रमें  शासन था तब जो जांच कमिटी बनी थी उसके द्वारा ही नरेंद्र मोदीको कोंगीके शासन अंतर्गत  ही क्लीन चीट मिली हुई है.

शासक पक्षने कभी कोमवादी बयान दिया नहीं है,

शासक पक्षने कभी भी क्षेत्रवादी बयान दिया नहीं है,

शासक पक्षने तो भारतीय संविधानमें जो लिंग आधारित, धर्म आधारित, क्षेत्र आधारित प्रावधान घुसाये थे उन गैर- लोकतांत्रिक प्रावधानोंको सही ढंगसे हटाया है. सही अर्थमें लोकशाही मूल्योंकी स्थापना की है. हालका शासक पक्ष चर्चाके लिये सज्ज है.

तो फिर प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि,

उस समय १९७७में नीतिमत्तावाले जनतादलकी सरकार, कोंगीको पराजित करके और संपूर्ण बहुमत प्राप्त करनेके बाद भी क्यों तूट कर गीर गयी?

संस्कृतमें एक श्लोक है,

एकेनापि कुवृक्षेण दह्यमानेन वन्हिना,

दह्यते तद् वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं यथा

जैसे एक वृक्षके कोनेमें रहा अग्नि सारे वनको जलादेता है, वैसे ही एक कुपूत्र सारे कुलको खतम कर देता है.

एक सत्तालालची नेता (ब्लेकशीप) अपनी सत्तालालसामें पूरे पक्षको खतम कर देता है. ऐसा ब्लेक शीप था चौधरी चरण सिंह.

चरण सिंहने अपनी सत्तालालसेमें पुरे जनता पक्षको खतम कर दिया. चौधरी चरण सिंहने इंदिराका सहारा लिया और मोरारजी देसाईकी सरकारको गीरा दिया. और बादमें इंदिराने, अपना सहारा वापस लेके चरण सिंहकी सरकारको गीरा दिया. संसदमें चरण सिंह ४५ सेकंडसे भी कम समयके लिये प्रधान मंत्रीकी कुर्सी पर बैठ पाये थे.

तो हालके विपक्षी गठबंधनका क्या हाल होगा?

अरे भैया, पहेले गठबंधन तो बनने दो.

याद करो. अयोग्य और अनीतिमान नेता संपूर्ण बहुमत मिलनेके बाद भी देशको तहस नहस कर सकता है. और फिर देश अस्थिर हो जाता है. भ्रष्टाचारीयोंके लिये शासन खूला हो जाता है. भारतने ऐसा समय देखा ही है जहाँ अप्र्च्छन्न और प्रच्छन्न जयचंदो कि कमी नहीं.

प्रकृतिने हमें नरेंद्र मोदी जैसा उत्कृष्ट नीतिमत्तावाला, आर्षदृष्टा, कुशल नेता भेजा है. हमें भटकना नहीं है.

यदि आप एक ही मुद्दे पर असहमत है तो चर्चाके लिये सामने आ जाओ. तर्क हीन एवं हवाई बातें मत करो. भारतमें चर्चाको ही प्राधान्य देना भारतकी पहेचान है.

शिरीष मोहनलाल दवे

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१९७७ का विपक्षी गठ बंधन २०२४ का विपक्षी गठबंधन भाग – २

चालाक एवं दंभी नहेरु

नहेरुने १९५०से १९६४ के अंतर्गत अनेक जूठ बोले, एवं अनीतियाँ अपनायी. जिनमें चीनके साथ वाली देशके हितको अपार नुकशान पहोंचानेवाली नीति, चीनका भारत पर आक्रमण और चीना भारतकी ९१००० चोरस मील भूमिपर कब्जा,    मेनन वाला जीप स्केंडल, पारसी सदस्य एवं नहेरु विरोधी फिरोज़ घांडी द्वारा आरोपित   मूंद्रा प्रकरण … काश्मिर समस्या …  आदि कई कारण सामेल थे जिनके लिये केवल और केवल नहेरुका ही उत्तरदायी थे.

नहेरु एक चालाक सियासती नेता थे. उन्होनें कामराज प्लान लाके, अपने विरोधीयोंको कमजोर किया और संगठन पर अपनेवालोंकी  पकड जमायी.

मोरारजी देसाईको मंत्री मंडलसे निकालके उनको कमजोर किया.  मीथ्या एवं फरेबी शपथ लिया की जब तक खोयी हुई भूमि वापस नहीं लेंगे, तब तक  हमारा पक्ष चैनसे बैठेगा नहीं. लता मंगेशकरसे “ओ मेरे वतनके लोगों जरा आंखमें भरलो पानी … ऐसा गीतका आलाप करवाके, दुश्मन ने हमें दगा दिया (दुश्मन दगा नहीं देगा तो और कौन देगा?)  अपनेको दयनीय अवस्थामें स्थापित किया. समाचार माध्यम भी नहेरुके समर्थक थे. नहेरुने संगठनमें अपनीक टीम “सींडीकेट” बनायी. कामराज आदीको विश्वासमें लेके उनकी पूत्री इंदिराको अपना अनुगामी बनानेका पूर्व प्रपंच किया.  १९६४में नहेरुका आराम करते करके अवसान हुआ. १९६५में पाकिस्तानने भारतको कमजोर मानके  आक्रमण किया. रुसने मध्यस्थी की और तत्कालिन प्रधान मंत्री लालबहादुर शास्त्री  पर दबाव डाला कि “दोनों देश अपनी अपनी जीती हुयी भूमि वापस करे” ऐसे एग्रीमेंट पर दस्तखत करें. शास्त्रीजीकी मृत्यु विवादास्पद है. ऐसी तो कई मृत्यु विवादास्पद है. एक और.

पूर्व निर्धारित योजनाके अनुसार मोरारजी देसाईका हक डूबोके, इंदिरा गांधीको  प्रधान मंत्री बनाया गया. इंदिरा गांधी सियासती मामलोमें कुशल थी लेकिन प्रशासनमें कमजोर थी. १९६७के चूनावमें कोंग्रेसने बहुमत तो हांसिल किया. लेकिन वह बहुमत पतला बहुमत था. इंदिरा  प्रशासनमें कमजोर थी.  व्युह रचनाके मुताबिक इंदिराने समाजवादी समाज रचना के आधार पर बेंकोका राष्ट्रीयकरण किया. इसका समाचार माध्यमो द्वारा खूब प्रचार हुआ. कोंग्रेसमें दो गुट तो हो ही गये थे. मूडीवादी और समाजवादी.

सींडीकेटने देखा कि इंदिरा गांधीने साम्यवादीयोंके साथ गुप्त गठबंधन किया है, तो सिंडीकेटके नेतागण अपना समर्थन मोरारजी देसाईको देने लगे.

देशके प्रमुखके चूनावमें कोंग्रेसका प्रत्याशी संजिव रेड्डीको बनाया. यह बाद इंदिरा गांधीको मंजूर नहीं थी. “आत्मा की आवाज़ पर वोट दो” इस बातको फैला के अपने अंगत पसंदगीके प्रत्याषी वीवी गिरिको जिताया.

कोंग्रेसका विभाजन

१९६९में  इंदिरा गांधीने फर्जी कोंग्रेसी सदस्यो बना के कोंग्रेसकी असाधारण सभा बुलायी, जगजिवन रामको प्रमुख बनाया और नहेरुवीयन कोंग्रेसका  कोंग्रेस (जगजीवनराम यानी इंदिरा यानी कोंगी) और कोंग्रेस (संस्था यानी ओर्गेनाईझेशन = कोंगो) ऐसा नामकरण हुआ. १९७०में लोकसभाका चूनाव हुआ तो इंदिराको प्रचंड बहुमत मिला. क्यों कि इंदिराने ऐसी हवा फैलायी कि उसके पिताजी और स्वयंको तो बहुत कुछ करना है लेकिन यह बुढ्ढे सीडीकेटके लोग हमको काम करने नहीं देते थे और है.  समाचार माध्यमोंने इस बातको पूर जोशसे फैलाया था.

पाकिस्तानके चूनावमें मुजीबुर रहेमान का पक्ष विजयी हुआ. वे पूर्व पाकिस्तानी थे. वहाँ के लश्करी शासक को यह मंजूर नहीं था. पूर्व पाकिस्तानमें हिंसक/अहिंसक आंदोलन चालु हुआ. अनेक हिंदुओंका और बंगाली मुस्लिमोंका कत्ल हुआ. पूर्व पाकिस्तानसे काफी बिहारी मुस्लिम एवं हिंदु निराश्रीत बनके भारतमें आये. वैसे भी ऐसा सिलसिला तो १९६५से ही पश्चिम पाकिस्तानसे भी चालु ही था. पाकिस्तानने भारत पर हमला कर दिया ताकि पाकिस्तानकी अपनी समस्यांसे  अपने लोगोंका ध्यान हटें.

अनिर्णायक  एवं अज्ञानी इंदिरा

निराश्रितोंका लगातार आना चालु ही था. इसके कारण इंदिरा गांधी पर सैन्य कार्यवाही करने का दबाव था. लेकिन इंदिरा गांधी अपनी वंशानुगत आदतसे अनिर्णायक अवस्थामें थी. उस परिस्थितिमें पाकिस्तानने भारत पर आक्रमण कर दिया. भारतीय सेना तो जवाब देनेके लिये तयार ही थी. भारतने विजय पायी. लेकिन इंदिरा गांधीने इस विजय को संपूर्ण पराजयमें परिवर्तित कर दिया. जीती हुई भूमि वापिस नहीं करेंगे ऐसी शपथ लेनेके बाद भी इंदिराने सिमला समज़ौतेमें पाकिस्तान को ९१००० पाकिस्तानी सैनिकोंको वापस कर दिया और भूमि भी वापस कर दी. इतना ही नहीं पाकिस्तान हस्तगत काश्मिर की भूमि भी जो भारतीय सेना ने जिता था वह भी वापिस कर दिया. भारतका एक भी सेनानी कैदी पाकिस्तानने परत नहीं किया.

गुजरातके विधान सभाके  चूनाव और नवनिर्माण आंदोलन

गुजरातके विधान सभा चूनाव १९७१में वैसे तो कोंगीको बडी जीत हुयी थी. १६५मेंसे १४० सीटोंपर विजयी हुई थी. इंदिराने अपना मुख्य मंत्री बनाया. बहुमत चिमनभाई पटेलके पक्षमें था फिर भी घनश्याम भाई ओझा को मुख्य मंत्री बनाया. चीमनभाई ने आंतरिक बगावत की और इंदिरा द्वारा स्थापित मुख्य मंत्रीको हटाके स्वयं उस स्थान पर कायदेसे आ गये. कोंग्रेसके आंतरिक कलहसे शासन अव्यवस्थित था. महंगाई चरम सीमा पर थी. गुजरातमें नवनिर्माण आंदोलन  “करप्शन हटाओ” नामसे शुरु हुआ. मूंगफलीके तेलका गुजरातमें बडा कारोबार चलता है. चिमनभाईने वचन दिया कि ९ रुपये प्रति किलोसे  भाव आगे नहीं बढेगा. लेकिन दुसरे दिन ही ९.२५ रुपये प्रतिकिलो हो गया. आंदोलनमें तेजी आयी. “चिमन भाई पटेलको हटावो” के सूत्रपर आंदोलन तेजी पकडने लगा. इंदिरा गांधीने चिमन भाई पटेलको हटाया और राष्ट्रपति शासन लगाया. इसीके अंतर्गत कोंग्रेस (संस्था) और अन्यदल भी आंदोलनमें सामेल हो गये थे. महात्मा गांधीके अनुयायी जयप्रकाश नारायण भी “भ्रष्टाचार हटाओ” के आधार पर चलते आंदोलनसे प्रभावित हो गये थे. आंदोलन महद् अंशोंमें अहिंसक था. चिमनभाई के मुख्यमंत्री पदसे हटानेसे वे खुलकर इंदिराके सामने आ गये थे. उन्होंने एक पुस्तक भी प्रकाशित की कि इंदिरा गांधीने कैसे पैसे बनाये. गुजरातका विपक्ष संगठित हो गया था. एक जनता फ्रंट (जनता मोर्चा) बना. और १९७५के विधान सभा चूनावमें इस जनता फ्रंटकी जीत हुयी.

यह जीत भ्रष्टाचारके सामने नीतिमत्ता की जीत थी.

गुजरातकी जीतसे प्रेरित होकर जयप्रकाश नारायणने देशव्यापी आंदोलन शुरु किया.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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१९७७ का विपक्षी गठ बंधन २०२४ का विपक्षी गठबंधन भाग – १

१९७७का गठबंधन क्यों हुआ था?

विपक्षी गठबंधन के समय शासक पक्ष नहेरुवीयन इंदिरा कोंग्रेस पक्ष था जो कोंग्रेस (आई) यानी कि, कोंगी नामसे जाना जाता था.

प्रस्तावनाः

कोंग्रेसका पक्षका जन्म कब हुआ?

१९२०में कोंग्रेसने अपना ध्येय पूर्ण स्वराज्य का घोषित किया. तबसे कोंग्रेसका जन्म हुआ.

ऐसा क्यों?

पक्ष हमेशा अपने ध्येय से और उस ध्येयको कैसे प्राप्त करना उसके तरिकेसे जाना जाता है. संपूर्ण  स्वराज्यका तरिका था अहिंसक आंदोलन.

१९२० में कोंग्रेसमें  जो गुट  बाजी चलती थी  उसका अंत हो गया और लोकमान्य टीळख और गोपालकृष्ण गोखलेके गुट मिल गये. १९२० से १९४६ तक के कोंग्रेसके इतिहासकी हम चर्चा नहीं करेंगे. अनेक विपक्षोंका जन्म हुआ और नष्ट भी हुए. अनेक आंदोलन भी हुए और बंद भी हो गये. किंतु इसके अंतर्गत आम जनता अति जागृत हो गयी थी. और इस कारण अंग्रेज सरकारको लगा कि अब उन्हे जान पडेगा. अंग्रेज सरकारने अपनी आदत के अनुसार ऐसा सोचा कि हम भारतको अनेक टूकडोमें विभाजित करके ही जायेंगे ताकि भारत सौ साल तक सक्षम बन ही न शके. भारतकी जनता को  फर्जी इतिहास पढाके,  भारतको और धर्म को आधार बनाके भारतको हिंदुस्तान, पाकिस्तान, दलितीस्थान, खालिस्तान, द्रविडीस्तान, एवं देशी राज्योंको उकसाके उनको स्वतंत्र हिंदुस्तानसे अलग रहेनेका विकल्प भी दिया था. चर्चील को अनुभूति भी हो गयी थी के स्वार्थी और भ्र्ष्ट और लालची लोग इकट्ठा रह ही नहीं पायेंगे.

लेकिन उसने महात्मा गांधी, सरदार पटेल, क्रिपलानी, जयप्रकाश नारायण, विनोबा भावे, कनैया लाल मुंशी, मोरारजी देसाई, चक्रवर्ती राजगोपाला चारी आदि कईयोंको अक्षम और उलज़े हुए मानने की गलती की. गांधीजीने सबको संभाला और नहेरु और जीन्ना के सिवा सबको मना लिया. नहेरुने सोचा कि यही सबसे अच्छा मौका है सत्ता प्राप्तिका और प्रधान मंत्री बनने का. वे कोंग्रेसको तोडनेके लिये सज्ज हो गये. नहेरुने बोला  जीन्नाको तो मैं अपने कार्यालयमें चपरासीके पद पर भी नहीं रखुंगा. इस तरह हिंदुस्तान और पाकिस्तान ऐसे विभाजन होना सुनिश्चित हो गया.

पक्षमें एक केंद्रीय कार्यकारी समिति होती  है और विभागीय कार्यकारी समितियां होती है. विभागीय समितियां आम सदस्योंसे जूडी हुयी होती है.

आम सदस्य जनतासे जुडे हुए ते है.

नहेरु, संगठन कक्षा पर मजबुत नेता नहीं थे. पर आम जनतामें ठीक ठीक लोकप्रिय थे. आम जनता को नौटंकी पसंद होती है, और नहेरुभी नौटंकी बाज थे. इसलिये उत्तरभारतमें वे युवाओंमें लोकप्रिय थे (क्यों कि नेताजी सुभाष चंद्रबोज़ का अभाव था). गांधीजीको नहेरुका चरित्र मालुम था. गांधीजीने सोचा यदि कोंग्रेस का विभाजन हो गया तो कोंग्रेस कमजोर बन जायेगी और जो केबीनेट मीशन आया है उसके साथ विभाजन के विषय लेनदेन में दबाव बनानेमें अक्षम रहेगी. यदि नहेरुको पक्षप्रमुख नहीं बनाया तो वह कोंग्रेसको तोडकर  समाजवादी कोंग्रेस बना देंगे और उनको उत्तरभारतमें समर्थन भी मिल जायेगा. तो एक और टूकडा बन जायेगा. नहेरुको कुछ मुस्लिम नेताओंका भी समर्थन प्राप्त था. नहेरुने स्वयं कहा था कि वे वैचारिक तरिकेसे ख्रीस्ती हूँ. गांधीजीने सरदार पटेलको विश्वासमें ले के नहेरुको पक्षके प्रमुख बना दिया.

गांधीजीने कोंग्रेसको आदेश दिया कि केबीनेट मीशनका ही बहिष्कार करो. लेकिन कोंग्रेस कारोबारी इसके उपर सहमत नहीं थी. गांधीजीने केबीनेट कमीशनके साथ संवाद करनेमें अपनी सदस्यता रद कर दी. उन्होंने कहा जिस कोंग्रेसने विभाजके लिये संमति दी हो, उस संवाद समितिका मैं हिस्सेदार नहीं रह सकता. कोंग्रेसको जो कुछ भी करना है वह अपनी जवाबदारी पर करें. जीन्नाने डाईरेक्ट एक्षन का एलान किया और दंगे फसाद होने लगे तो गांधीजीने कहा मै इन दंगोंको रोकनेमें सक्षम हूँ. क्या आप लोग सक्षम है? गांधीजीने देशके विभाजन के लिये सहमति दे दी.

सरदार पटेल की मुत्सद्दीसे भारतका दो ही टूकडोमें विभाजन हुआ. सरदार पटेलने साम, दाम, और दंड के तरिके अपनाके सभी देशी राज्योंका भारतमें विलीनीकरण कर दिया. देशी राज्योंके भारतमें विलीनीकरणसे सरदार पटेलका कद बहूत ही बढ गया था.

गांधीजीने बोला “अब कोंग्रेसका ध्येय पूरा हो गया है. अब कोंग्रेसका विलय कर दो.“ अब यदि कोंग्रेसके टूकडे भी हो जाय तो भी कोई हर्ज नहीं था. यह बात लंबी है. इस लिये इस बात को यहीं पर ही विराम देते है.

१९४८ जानवरीमें गांधीजीका खून हो गया. और चूनाव आते आते सरदार पटेलका भी देहांत हो गया. अब नहेरुका संगठन पर संपूर्ण कबजा हो गया. और उन्होनें अपने प्रतिस्पर्धीयोंको एक एक करके निकम्मे बनाना चालु किया, और जो प्रतिस्पर्धी थे वे भी कोंग्रेस छोडके अलग हो गये. और कुछ नेताओंने अपना पक्ष भी बना लिया. अब कोंग्रेस नहेरुवीयन कोंग्रेस बन गयी.

इस प्रकार विपक्षोंका जन्म हुआ.

एक तरफ भ्रष्ट और सत्ताकी लालची नहेरुवीयन कोंग्रेस थी. और दुसरी तरफ नैतिकतासे जूडे हुए भीन्न भीन्न वैचारधारा वाले विपक्ष थे.

क्रमशः

शिरीष मोहनलाल दवे

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