Feeds:
Posts
Comments

Archive for February, 2025

क्या भारत सही अर्थमें जनतांत्रिक राष्ट्र है?

यह मुद्दा अधिक चर्चास्पद है.

वैसे तो किसीभी मुद्देको चर्चास्पद बनाया जा सकता है. तो इस मुद्देको क्यों चर्चास्पद बननेमेंसे क्यूँ रोका जाय?

एक बात तो अवश्य है कि सभी में कुछ न कुछ तो ध्यानाकर्षक प्रश्न है और कुछ न कुछ सच्चाई भी है.

स्वतंत्र राष्ट्र (ईंडीपेंडंट), लोकशाही राष्ट्र, गणराज्य राष्ट्र, रामराज्य, जनतांत्रिक राष्ट्र (रीपब्लिक राष्ट्र). इन सभी शब्दोंके भीन्न भीन्न अर्थ हो सकते है.

लेकिन सबसे प्रथम हमें राष्ट्र शब्दका अर्थ समज़ना पडेगा.

जिस विस्तारको अपनी संस्कृतिक (धरोहर) प्रणालीयाँ है और वहाँ की जनता उनको आदरणीय मानती है वह राष्ट्र है.    

स्वतंत्र राष्ट्र (ईंडीपेंडंट)

जो राष्ट्र अन्य राष्ट्र द्वारा शासित नहीं है वह स्वतंत्र राष्ट्र है.

जैसे कि १५ अगस्तके १९४७ के पहेलेके भारतमें. न तो नियम हमारे थे, न तो शासन हमारा था. सबकुछ अंग्रेज का था. भारतवासी उनमें कुछ भी परिवर्तन नहीं कर सकते थे. जो कुछ भी होता था वह अंग्रेजोके आधिन था.

तो क्या हम १५ अगस्त १९४७ के पश्चात् स्वतंत्र राष्ट्र थे?

हाँ भी और ना भी.

हाँ. इस लिये कि हम तत्कालिन नियमोंमें परिवर्तन कर सकते थे. लेकिन ब्रीटन के स्वर्वोच्च पदधारीकी (क्राउनकी) अनुमति लेनी पडती थी. ब्रीटीश शासनमें एक प्राणाली थी कि ब्रीटनकी जनप्रतिनिधिसभा  अपना प्रस्ताव, एक बार पारित करके क्राउनके पास भेजे, तो ब्रीटनका सर्वोच्चपदधारी उस प्रस्तावको, पूनर्विचार करनेके लिये वापस भेज सकता है. भारतकी जनप्रतिनिधिसभा को भी यह प्रणाली बाध्य थी. ब्रीटनकी तरह भारतीय जनप्रतिनिधियोंको वह प्रस्ताव पूनः पारित करना पडता था. वैसे तो उस समय ऐसी कोई घटना घटी नहीं थी, लेकिन यह एक नियम था. इस प्रकार हम पूर्ण रुपसे स्वतंत्र नहीं थे.

इसके अतिरिक्त, नियम भी हमारे नहीं थे. हाँ एक बिंदु अवश्य था कि हम चाहे तो हमारा जनप्रतिनिधि मंडल अवश्य अपना प्रस्ताव पूनः पारित करके भेजे तो ब्रीटनके सर्वोच्च पदधारीको, उसके उपर अनुमोदनके हस्ताक्षर (वहांकी प्रणालीके अनुसार) करने पडते थे. अंतिम स्थितिमें हमारे जनप्रतिनिधि मंडलका निर्णय मान्य बनता था. इसलिये हम अंततः गत्त्वा स्वतंत्र थे.  

लोकशाही राष्ट्र, गणराज्य राष्ट्र, रामराज्य, जनतांत्रिक राष्ट्र (रीपब्लिक राष्ट्र). इन सभी शब्दोंके भीन्न भीन्न अर्थ हो सकते है. और इन सबकी तुलना सापेक्ष रीती से भी हो सकती है. सापेक्षवाद समाजशास्त्रमें भी लागु पडता है.

लोकशाहीमें जनता सर्वोच्च है.

लेकिन जनता कोई एक व्यक्ति नहीं है. जनता तो व्यक्तिओंका समूह है. समूह भी अनेक प्रकारके विभागीय समूहोंका बना हुआ होता है. यदि क्या योग्य है और क्या अयोग्य है उसका निर्णय बहुमतसे किया जाय, तो सापेक्ष रुपसे अल्प संख्यावाले समूह को अन्याय हो भी सकता है. और होता भी है. ऐसी व्यवस्था एक गणराज्य राष्ट्रकी कक्षामें आती है. लेकिन यह आदर्श व्यवस्था नहीं है. ग्रीसमें गण राज्य था. नियम तो वहां पर भी थे. भीन्न भीन्न समूहोंकी बारी आती थी. न्याय करनेमें भी बारी आती थीं.

यदि मानवीयता पर आधारित सर्वजन हितवाले नियम बनाये जाय तो ठीक रहेगा, ताकि किसी भी व्यक्ति को अन्याय न हो. इसको कहा गया संविधान. चूंकि इसकी रचना जनसमूहों द्वारा मनोनित प्रतिनिधियोंके द्वारा हुई थी इसको जन तांत्रिक संविधान कहा गया. संविधान व्यवस्था बनाता है.

राम राज्य और जनतंत्रमें क्या अंतर है.

जनतंत्र वह है जहां सत्य माननीय बनता है. पी. जी. मावलंकरके शब्दोंमे कहें तो, लोकशाही वह है जहां सत्यका आदर होता है. लेकिन आदरका अर्थ है उसका अमल करना.

सत्य क्या है? जो सर्व जनके लिये श्रेय है वह सत्य है? लेकिन श्रेय क्या है? यह परिस्थितियोंके उपर आधारित है. परिस्थितियां तो बदलती रहेती है.

रामराज्य तबतक लोकशाही बना रहता है जब तक राम जैसा शासक बना रहेता है तब तक. रामने उस समयकी सामाजिक प्रणालीयों के अनुसार शासन किया.

प्रणालीयों पर संशोधन करनेका अधिकार किसको था? ऋषीयोंको यह अधिकार था. राजाको यह अधिकार नहीं था. राजा यदि इस अधिकारको ले लें, तो अनाचार, दुराचार, और अराजकता ही फैल जायेगी. “कहाँ खो गये हाडमांस के बने राम” इस ब्लोगमें हमने विस्तारसे चर्चित किया है.

१९५०में हमने संविधान लागु किया. लेकिन कई लोगोंका मानना है कि २६ – ०१ – १९५० में भी हम “जनतंत्रवादी राष्ट्र” बने नहीं. क्यों कि नियम और प्रणालीयां तो वही की वही रक्खी गई थीं. उसका भारतीय संस्कृतिसे संबंध नहीं था. “राष्ट्र” तो अपनी संस्कृतिसे बध्ध होता है.

कुछ लोग ऐसा मानते है कि हमें जो स्वतंत्रता मिली वह तो एक १०० सालके करार पर ही मिली है. सौ सालके बाद हमे “भारत” अंग्रेजोंको वापिस करना होगा. वैसे तो इस मुद्दे की सत्यताके लिये कोई आधार नहीं दिखाया गया है. क्यूँ कि, कुछ लोग तर्ककी शुध्धतामें मानते नहीं है. क्या करें !! असत्यको पूनः पूनः प्रसारित करने से उसका प्रभाव सत्यसे भी अधिक बन जाता है.

कुछ लोग मानते है कि राष्ट्रमंडलका प्रमुख, “ब्रीटीश क्राउन” ही होता है और हमें उनको “कर”का (टेक्ष का) भूगतान देना पडता है इसीलिये हम आज़ाद नहीं है. इन बातोंके उपर अधिक चर्चाका अवकाश है.

सत्य यही है कि हम एक गौरवशाली राष्ट्र बननेकी दिशामें शीघ्रतासे गति कर रहे है. जहां नियम भी हमारी संस्कृतिके अनुरुप होगे, प्राणालीयां भी हमारी संस्कृतिके अनुरुप होगी, प्रगति भी हमारी संस्कृतिके अनुरुप होगी, और हमारा देश विश्वगुरु होगा.

शिरीष मोहनलाल दवे

चमत्कृतिः                                         FIRE GOD AND FIRE

हमारी संस्कृतिको कैसे परिभाषित किया जाय?

वसुधैव कूटुंबकम् * (पृथ्वी एक कूटुंब है)

आत्मनः प्रतिकुलानि परेषां न समाचरेत् (जो स्वयंके लिये प्रतिकुल है उसको अन्य पर मत थोपो)

ईशावास्यं ईदं सर्वं, यत्किंचित जगत्यां जगत, तेन त्यक्तेन भूंजिथाः मागृधः कस्यचित् धनं,

[सर्वत्र ईश्वर ही ईश्वर है. उसने (जो छोडा है) उसको त्याग पूर्वक उपभोग कर. किसीकी संपत्ति मत छीन]

कर्मण्येव अधिकारऽस्ते मा फलेषु कदाचन ।  [ कर्म (कैसे) करना उसके उपर ही तेरा नियंत्रण है, कर्मके परिणाम तेरा नियंत्रण नहीं है)

अहिंसा परमो धर्म* (* कन्डीशन्स लागु). दंडका विधान न्यायालय ही करेगा. दंडका अमल शासन करेगा.

चातुर्वर्णं मया (प्रकृति द्वारा) सॄष्टं, गुण कर्म विभागसः [मनुष्य (अपने व्यवसायकी) पसंदगी अपने वलण (प्राकृतिक गुण)से सुनिश्चित करता है.]

एकं सत् विप्राः बहुधा वदंति (सत्य एक ही है लेकिन विद्वान लोग उसका वर्णन अनेक रीतिसे करते है.)

मा नः स्तेनेन ईशतः (हम पर चोरोंका शासन न हो) ऋग्वेद     

ॐ नमः शिवाय  [ उत्पत्ति (एक स्थितिका  परिवर्तन दुसरी स्थितिमें ), स्थिति और नाश, करनेवाला यह कल्याणकारी ब्रह्माण्डोंके समूह को(शिवको) नमस्कार] 

Read Full Post »