संघ – द्वेषी गेंग और एम. के. गांधी – द्वेषी गेंग एक ही जहाजके प्रवासी
गेंग और पक्ष में क्या भीन्नता है?
गेंग को अपना स्वार्थ होता है. अपने निश्चित स्वार्थकी प्राप्तिके लिये साधन शुध्धिका उपयोग करना आवश्यक नहीं है. अपनी मान्यता सही है, वह दिखानेके लिये जूठ बोलना पडता है, तो कोई हर्ज नहीं . संस्कृतकी पौराणिक भाषा में स्वार्थके लिये कर्म करने वालोंको राक्षस कहेते है. स्वार्थ सिध्धिके लिये मायावी भी बनना पडता है.
स्वार्थमें क्या क्या आता है?
यदि स्वार्थ सिध्धिमें केवल ख्याति लिख दें तो भी चलेगा. क्योंकि ख्यातिसे जो आनंदकी प्राप्ति एवं सुविधा मिलती है वह अनुपम है.
पक्ष भी एक समूह है. लेकिन उसका ध्येय “सर्वजन हिताय सुखाय” होता है. कैसे उस ध्येयको प्राप्त करना उसकी प्रक्रिया होती है. अगर देश जनतांत्रिक है तो उस देशमें कायदे और कानून होते है उसको आधिन रहकर जनजागृतिकी प्रक्रियाओंके द्वारा ध्येय प्राप्त किया जा सकता है. या उसका अनादर करके भी चर्चा सभा द्वारा जनजागृति लायी जा सकती है.
(पढें http://wwwDOTtreenetramDOTwordpressDOTcom Do you believe in Non-violent agitation and democracy?).
यदि पक्ष हिंसामें मानता है, तो और वह हिंसाका प्लान बनाएगा. यदि कोई पक्षीय व्यक्ति पकडा गया तो उसको सज़ा भूगतनेके लिये तयार रहना चाहिये. कानून भंग द्वारा भी आंदोलन किया जाता है. उसमें भी उसकी सज़ा भूगतनेके लिये तयार रहेना चाहिये.
मूल बात क्या है?
मूल बात है “चर्चा का विषय” और “ऋतु”. फल, फुल, सब्ज़ियाँ, धान्य … ये सबकी अपनी अपनी ऋतुएं होतीं है.
चर्चाके विषयके बारेमें भी ऐसा होता है.
दो अक्तूबर और ३०वी जनवरी के आसपासके दिन “एम. के. गांधी” पर लेख लिखनेकी या अपनी वीडीयो क्लीप बनानेकी और प्रसारित करनेकी, एक ऋतु है. दो अक्तूबर एम के गांधीका जन्म दिन है और ३० जनवरी एम. के. गांधीका मृत्यु दिन है.
यदि गांधीजीकी छूट पूट बुराई ही करनी है तो हर दिन वैसे तो आवकार्य है. लेकिन यदि ऋतुकालमें बुराई करें तो अच्छा रहेता है. कुछ अधिक मात्रामें श्रोतागण/वाचकगण मिल जाता है. यदि आप लेख लिखनेके लिये या वीडीयो क्लीप बनानेके लिये सक्षम नहीं है तो कोई बात नहीं. आप अन्य महानुभावोंकी वीडीयो क्लीप या लेख प्रसारित करके आत्म संतुष्टि या आत्मतुष्टि ले सकते है. अपनी पीठ भी थप थपा सकते है. आप गर्व भी कर सकते है कि मैं कैसा तटस्थ, निडर, और देश प्रेमी हूँ कि सत्यको उजागर करनेमें अपना योगदान दे सकता हूँ? ऐसा करनेमें मैं कोई युग-पुरुषको भी छोडता नहीं हूँ. इस महापुरुषको पढा नहीं तो क्या हुआ? हरेक आदमीको सत्य को ही प्राधान्य देना चाहिये. महानुभावसे सत्य महान है. “सत्यम् एव जयते” मेरा मुद्रालेख है.
गोडसेने एम के गांधीका खून किया तो उसने अपने कारण भी तो बताये थे. और वे सभी कारणोमें सच्चाई थी. गोडसेने जो अपना निवेदन न्यायाधीशके समक्ष दिया उसके उपर सरकारने आम जनतासे गुह्य(प्रतिबंधित) क्यूँ रक्खा? गोडसेका निवेदन गुह्य रक्खा इससे ही सिध्ध होता है कि गोडसेके निवेदनमें कही गयी बातोंमें सच्चाई थी और गांधीने मुस्लिमोंका पक्ष लिया था, ताकि मुस्लिमलोग, अधिक से अधिक हिंदुओंको मार सके.
न्यायाधीशने स्वयं कहा था कि “यहां उपस्थित लोगोंकी भावनाके अनुसार मैं यदि न्याय करुं तो गोडसे को बाइज्जत बरी करना चाहिये.”
उपरोक्त कथन क्या न्यायादेशका हिस्सा है? पता नहीं सर जी !!! लेकिन बोल दो न, न्यायादेशका हिस्सा है. … सबकुछ चल जाता है.
और भी एक बात लिख दो. गोडसे का निवेदन सूनके उपस्थित लोगोंमेंसे प्रचंड बहुमत लोग यही सोचते थे कि गोडसेको बाइज्जत बरी किया जायेगा. लेकिन उसके स्थान पर न्यायालयने अपने हृदयपर पत्थर रखके गोडसेको देहान्त दंड सूनाया. इस दंड विधान को सून कर कई माताएं बेभान हो गये, कई पुरुष फुट फुट कर रोने लगे. एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था कि उसकी आंखे गीली न हुई हो. उस जमानेका “जेन जी” न्यायाधीशकी हत्या करने पर उतर आये. पूलिसदलने बडी मुश्किलसे न्यायधीशोंको बचाया.
उस समय तो पुराणकार का जमाना नहीं था, लेकिन यदि जब भी कभी पुराणकारका युग आयेगा तो “गांधी-वध” पुराणमें लिखा जायेगा कि जब गोडसेको देहांत दंडकी सज़ा हुई तो ईन्द्रराजाने भारत देशको दशकों तक वर्षासे वंचित कर दिया. महाकाल शिवजी भी महाकालीके साथ रोने लगे थे. उन्होने भारतदेश पर मरकीकी महामारी फैला दी, और बादमें भारत वर्ष पर युध्ध झोंक दिये, चीनने तो भारतको नोंच नोंच कर मरणासन्न कर दिया. देशको दशकों तक बरबाद करके अतिकंगाल बना दिया.
नारदजीने व्यासजी से पूछा कि “हे विद्यावान व्यासजी, जब भारत देश बरबाद और कंगाल हो गया तो फिर उसका उध्धार कैसे हुआ?
व्यासजी उवाच ; “ हे ब्रह्मसूत नारदजी, आपकी ज्ञान पानेकी उत्सुकतासे मैं अति प्रसन्न हुआ हूँ. हे मूनी राज वैसे तो महाकाल भारतदेशकी जनतापर या एम. के. गांधी पर क्रोधित नहीं थे. लेकिन क्या करें महाकालको भी अपनी थीअरीके अनुसार काम करना पडता है. किसी न किसीको निमित्त बनाना पडता है. ऐसा ही समज़ो कि, गांधीजीका काम पूरा हुआ था, और गोडसे को अपने किये की सज़ा मिली.
मोतिलालके वंशको बरबाद करना था. तो उसके घरमें नहेरु नामका राक्षस पैदा किया. यह नहेरु बडा मायावी था. उसने एम. के. गांधीकी सीढी बना दी और वह उपर ही उपर जाने लगा. इस नहेरुने अपना अनुगामी उसकी पूत्री ही बनके रहे, उसकी जाल बनाके रक्खी थी. इस जालमें उसने उनके अपने प्रच्छन्न और अप्रच्छन्न दुश्मनोंको फसाया. उसने अपनी पुत्रीको यह कला सीखा दी थी कि, अपने दुश्मनोंको किस विद्यासे मौतके घाट उतारना. अपने कुकर्मोंसे नहेरू को अश्वने मारा. इंदिरा और जनरैल भींदरानवाले ने एक दुसरेको दगा दिया. और दोनोंने एक दुसरेको मारा/मरवाया.
हिराबाई ने महाकालका १२ साल तप किया. महाकाल प्रसन्न हुए और बोले मैं तुमसे प्रसन्न हूँ. मांग मांग तुम्हे क्या चाहिये? कुबेरका खजाना चाहिये तो कुबेरका खजाना मांग. राम का राज्य चाहिये तो रामका राज्य मांग.
हिराबाईने बोला मुज़े कुछ भी नहीं चाहिये. मुज़े सिर्फ विकसित भारत चाहिये.
महाकालने कहा अरे भारतके उपर तो मेरे चार ही नहीं सहस्र हाथ है. इस समय तो मैं भारतकी जनताको सिखाता हूँ कि सत्य और असत्य के भेदको आत्मसात करो. हे हिराबाई, तेरी जो तीसरे नंबरकी संतान नरेंद्र है उसके उपर मैंने बडा जीम्मा रक्खा है. वह भारतवर्षको विश्वगुरु बनाएगा. हे हिराबाई तू अपने लिये कुछ मांग.
हिराबाईने कहा हे महाकाल आपमेरी अन्य संतानोंको उत्तम चरित्रवान संतान बना दो. क्योंकि महापुरुषकी कोई न कोई संतान या संबंधी, नापाक हरकतें करते है. जैसे कि महात्मा गांधीके कोई पूत्र…..
महाकाल बोले अरे हिराबाई मैंने नरेंद्र मोदीकी पत्नीको कस्तुरबासे भी महान मनोबल दिया है. उसकी महानता, नीतिमत्ता और त्याग वास्तवमें नरेंद्र मोदीसे भी अधिक है.
(क्रमशः)
शिरीष मोहनलाल दवे
चमत्कृतिः
हतः शत्रुः कृतम् मित्रम् , रत्नमाला न हारिता ।
नालेन पिबता तोयम् , भवता साधुवानर__॥
[पंच तंत्रकी कथामेंसे है; चतुर बंदर जलाशय में रहने वाले राक्षस से बचने के लिए पानी पीने के लिए कमल की डंडी (कमलनाल) का उपयोग करता है, जिससे राक्षस उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाता।]महात्मा गांधीने जो तथा कथित गलतियां(!) की थी, वह नरेंद्र मोदी करनेवाला नही है.