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Archive for October, 2025

क्या कुछ मी – लोर्डज़, न्यायिक कर्तव्योंको निभानेमें विश्वसनीय है?

लगता तो नहीं है. वैसे तो कई मी – लोर्ड्ज़ मीथ्या (अनावश्यक) कथन  कर देते है. यह बात अति सामान्य है कि जहाँ “सुओ मोट्टो” (स्वयं संज्ञान) लेना अत्यंत आवश्यक है वहाँ वे मौन धारण करते है. इस बातके अनेक उदाहरण मिलते है.

जे. एल. नहेरुके अनेक कदम जनतंत्र / संविधान / मानवीय अधिकारोंके विरुध्ध थे तो भी वे मौन रहे थे. कश्मिर (जे.के.)का संविधान और ३७० एवं ३५ए. “स्वयं संज्ञान” का संविधानमें प्रावधान होना जनतंत्रमें होना अनावश्यक था. नहेरु इंदिराके ऐसे कुकर्मोंकी सुची बनावे तो केवल सूचीका ही एक पुस्तक हो जायेगा.

आप कहोगे कि आज तो बीजेपी सरकारके विरुध्ध आदेश देना या अवांच्छित (अनकॉल्ड) टीप्पणी करना सियासती शृंगार है, तो पहेले मी – लॉर्ड्ज़ ये शृंगार क्यों अपनाते नहीं थे?

तो इसका उत्तर  सूनो.

नहेरु – ईंदिराके शासनकालमें विपक्षी नेताओंकी अज्ञात व्यक्तिओं द्वारा या आकश्मिक एवं गुह्य हत्याएं होती थी. तो इससे आप समज़ ज़ाओ.

मनुष्यको सबसे प्यारा क्या होता है?

अपना प्राण ही तो होता है.

दुसरा होता है सुखमय निवृत्त काल.

ममताने क्या किया था?

आपने देखा होगा कि गत विधान सभा चूनावके समय पश्चिम बंगालमें, ममताने क्या किया था?

वह खुले आम सरकारी अफसरोंको  धमकी देती थी कि आपको निवृत्ति के बाद बॅंगालमें ही रहेना है. अरे ! ममता तो गवर्नर तक को धमकी देती थीं. केंद्रीय एजंसीयोंको पश्चिम बंगालमें जाँच तक नहीं करने देती थी. केंद्रीय एजंसीके अफसरोंको गिरफ्तार कर देती थी. ममता खूद धरना पर बैठ जाती थी.

याद करो गत चूनावमें उसके पक्षने बहुमत तो हांसिल कर दिया लेकिन वह स्वयं, अपने निर्वाचन क्षेत्रसे हार गयी. ममताने अपने निर्वाचन क्षेत्रके गरीब मतदारोंका क्या हाल किया था? उसने मुस्लिमों द्वारा इन गरीब मतदारोंपर बेरहमीसे हमला करवाया था. उनके उपर आतंक फैलाया. उनके घर जला दिया.  उनको अपने घरोंमेंसे निकालके भगाया था. उन्होंने भागकर आसाममे आश्रय लिया था. आज भी उनका ठिकाना पडा नहीं है. और जिन मुस्लिमों द्वारा इन हिंदुओं पर हमला करवाया था वे आतंकवादी लोग आरामसे पश्चिम बंगालमें घुम रहे है. किसीके भी उपर एक एफ. आई. आर. तक नहीं हुआ. दंडित करनेकी तो बात ही भूल जाओ.

मुख्य चूनाव आयुक्तने मुख्य मंत्रीसे यह पूछा था

याद करो जब गोधरा काण्ड के बाद गुजरातमें हिंदु – मुस्लिम दंगा हुआ था. उसमें कुछ मुस्लिम परिवारोंने स्थानांतर किया था और उनको सरकारने रहेने की व्यवस्था कर दी थी. कुछ महिनोंके बाद, सब मुस्लिम लोग अपने घर पर वापिस भी आ गये थे. चूनाव आ रहा था. तब उस समयके मुख्य चूनाव आयुक्तने मुख्य मंत्रीसे यह पूछा था कि “पहेले ये बताओ कि सभी मुस्लिम लोग अपने घर वापस आ गये या नहीं? अभी कितने बाकी है?

मुख्य मंत्रीने कहा था, कि अभी एक भी मुस्लिम परिवार निराश्रित केंपमें नहीं है.

आजके वरिष्ठ चूनाव आयोगकी तो बात छोडो, क्या उच्च न्यायालयके मी – लोर्डकी भी हिमत है कि ममताको चार वर्षके बाद भी सवाल करने कि हिमत करें कि वे प्रताडित गरीब हिंदुओंका हाल क्या है? कितने वापस आये और कितने वापस आना बाकी है?

वास्तविकता यह है कि भारतके प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी बीजेपी सरकार मानवीय अधिकारोंकी सुरक्षाके विषयमें कई लाख गुना विश्वसनीय है. 

शिरीष मोहनलाल दवे

चमत्कृतिः

प्रश्नः

क्या ममता एक निडर औरत है?

क्या अखिलेश एक निडर आदमी है?

क्या केज्रीवाल एक निडर आदमी है?

क्या लालु यादव एक निडर आदमी है?

उत्तरः

जो सच बोलनेसे डरता है  वह कैसे निडर हो सकता है?

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क्या नहेरु/वीअन्स “आर. एस. एस.” के उपर प्रतिबंध लगा सकते है?

भाई लोग, आर. एस.एस. की परिभाषाको समज़ लो.

इस ब्लोग साईट पर जब भी “नहेरु/वीअन्स” ऐसा शब्द प्रयोग होता है तब उससे कौन परिभाषित होते है?

जे. एल. नहेरु, इंदिरा नहेरु-गांधी, [हाँजी, इंदिरा गांधी की सरनेम चूनाव आयोग के अंकन (रेकॉर्ड) के अनुसार,  नहेरु-गांधी है. इंदिराके पतिका नाम था फिरोज़, और उनकी सरनेम घान्डी थी. फिरोज़ गांधीके विषयमें अधिकतर लोगोंमें अति मात्रामें भ्रम है. किंतु उनकी चर्चा हम नहीं करेंगे. इंदिराको “नहेरु” सरनेमका, एवं, पतिकी सर्वमान्य विकृत की हुई सरनेम “गांधी” का पूरा लाभ उठानेकी चाहना थी. इस लिये इंदिराने अपनी सरनेम नहेरु – गांधी रक्खी थी. वैसे तो एम. के. गांधी, और इंदिरा गांधीमें, प्रकृतिकी और विचारोंकी, कोई तुलनात्मकता नहीं है. इस बातको तो  भारतकी जनता तो पहेलेसे ही जानती है. किंतु विदेशी लोग तो भ्रमित हो ही सकते है, और इंदिरा गांधी यही चाहती थीं], राजिव गांधी, सोनिया गांधी, रोबर्ट वांइदरा, प्रियन्का (वक्रनासिका) वांइदरा, [(काठीयावाडी भाषामें यानी कि सौराष्ट्रकी भाषामें) बंदरको “वांईदरा” कहेते है. नुक्ता यहाँ का वहाँ बैठ सकता है. गुस्ताखी माफ. हास्य भी तो साहित्यमें एक रस है.] और उसके फरजंदान, राहुल घांडी, शेख अब्दुल्ला और उसके फरजंदान, मुफ्ति महम्मद सैयद, महेबुबा और उनके फरजंदान, कश्मिरके आतंकवादी संगठन के सदस्य, ममताएं, मुल्लायम अखिलेश और उनके फरजंदान, लालु यादव और उनके फरजंदान, उध्धव और उनके फरजंदान, स्टालीन और उनके फरजंदान, शरद (पवार) और उनके फरजंदान, अरविंद केज्री और उसके फरजंदान, …

अरे भाईसाब, ये फरजंदान से मतलब क्या है? फरजंदान से मतलब है फरजंदका बहुवचन. फरजंद मतलब संतान. संतान के प्रकार होते है. हम संतान (फरजंदान) का अर्थ इस ब्लोगमें जीवशास्त्रीय (बायोलोजीकल) संतान, एवं वैचारिक संतान ही करेंगे.

उपरोक्त विवरणके अनुसार नहेरुवीयन्समें यही लोग आते है. हम संक्षिप्तमें नहेरुवीयन्सके अर्थमें उपरोक्त प्रकारके लोगोंको शामिल करेंगे.

नहेरु/वीअनोंने अपने शासनमें “आर. एस. एस.” पर तीन बार प्रतिबंध लगाया था. कुछ लोगोंको कारावासमें भी ठूंस दिया था. हाँ जी जब ये नहेरुवीयन्स लोग जयप्रकाश नारायण तक को कारावासमें डालके मरणासन्न करके मार सकते है, तो उनके लिये “आर. एस. एस.” को प्रतिबंधित करना क्या चीज़ है! हमारे मी लोर्ड्ज़ १९४७से नहेरुवीअन्सके वचन सर आंखो पर रखते थे.

यह बात अलग है कि, २०१४में नरेंद्र मोदीके आनेके बाद ही “मी – लोर्ड्ज़ों”को (मत्कुणोंको) जरुरतसे ज्यादा दिखाई देनेवाली आँखे आई है. (गुजराती भाषामें यह मूँहावरा है कि “मांकडने आखो आवी”). कई “मी लोर्डज़” नहेरुवीअन्सको अपने माई-बाप/खाविंद/अन्नदाता/पद-दाता समज़ते थे. स्वतः संज्ञानको या उसके क्षेत्रको समज़ नहीं पाते थे.

“आर. एस. एस.” है क्या?

“आर. एस. एस.” का अर्थ है “राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ”. भारतका हित सर्व प्रथम है

राष्ट्र से मतलब है सांस्कृतिक विस्तार. जैसे कि भारत राष्ट्र, जिनमें भूमि और सांस्कृतिक धरोहर शामिल है. भारतके लोग समज़ते है कि भारतका हित सर्व प्रथम है. तात्पर्य यह है कि भारतकी भूमि और संस्कृति महान है. भारत भूमि हमारा पोषण करती है. भारत भूमि हमारी माता है. हम सर्व प्रथम भारत माता को महत्व देंगे. सुरक्षा पर्यावरण संतुलनसे  हो या दुश्मन/दुश्मनोंसे हो, हम भारतमाता की सुरक्षा करेंगे.

हम भारतमाताके प्रतिकात्मक स्वरुपकी कल्पना करेंगे और हमारी सांस्कृतिक प्रणालीके अनुसार उनकी पूजा भी करेंगे.

हाँ जी. यह भारतीय तत्वज्ञानका गुण है कि हम पर जिनका भी उपकार (अहेसान) है, वे मांगे या न मांगे तो भी हमें उनकी पूजा करना आवश्यक है क्यों कि हम कृतज्ञ है. हमारी संस्कृतिका तत्त्वज्ञान हमें कृतज्ञ बनना सिखाती है. हम कृतघ्न (एहसान फरामोश) नहीं बन सकते. भारत एक राष्ट्र है हम राष्ट्रके सेवक है. मतलब की हम भारतकी जनताके सेवक है. मतलब की सेवाभावी होना हमारा कर्तव्य है. जिन लोगोंकी ऐसी मान्यता है उनमेंसे कुछ लोग प्रतिदिन मिलते है, आदर पूर्वक संवाद करते है, ताकि कौन, कौनसी सेवा अधिक सुचारु रुपसे कर सकता है उसका पता चले. अपने शरीर को स्वस्थ रखनेके लिये कुछ व्यायाम भी करते है. और अंतमें भारतमाताकी वंदना करते है. “नमस्ते नमस्ते सदावत्सले मातृभूमि …. “

क्या भारत भूमिको भारतमाता मानना अपराध है? नहीं … नहीं … नहीं …

क्या भारतकी संस्कृतिको मान देना अपराध है? नहीं … नहीं … नहीं …

क्या भारतकी आपद्ग्रस्त जनताकी सेवा करना अपराध है? नहीं … नहीं … नहीं …

क्या शरीरको स्वस्थ रखना अपराध है? नहीं … नहीं … नहीं …

तो फिर आर. एस. एस. को प्रतिबंधित करनेकी बात पर नहेरुवीयन्स लोगोंका आधार क्या है?

“अरे भाया, ये “आर. एस. एस.” वाले लकडी (दंडा) रखते है, इस कारण से नहेरु/वीअन्सको आपत्ति हो सकती है. यह संघी, कभी किसीको मार दे तो!!

नहेरुवीयन्सने जिन कानूनोंको प्रवर्तमान रक्खा है तो उनके अनुसार तो दंडा रखना अपराध है ही नहीं उसका क्या? आपने कोई अधिकृत संस्था द्वारा विश्लेषणात्मक जांच करवाई है क्या?

“नहीं तो!!

तो फिर, आप ऐसी आधार-हीन बातें क्यों करते है? आप अपनी विश्वसनीयता नष्ट कर रहे है.

अरे हमारा शासन तो आने दो, , हमारे भारतस्थित मुसलमान लोग हमारी मददके लिये तयार है. हम पाकिस्तानकी सरकारसे साथ मिलकर आतंकी हमला करवायेंगे. हम (फर्जी) सबूत, पैदा करके आर. एस. एस. को हिंदु आतंक वादी घोषित करेंगे. उन सबको कारावासमें ठूंस देंगे. हम क्या कर सकते है वह आपको पता नहीं है. हमने तो भगवा – आतंकवाद पर एक किताब तयार करके रक्खी है, अब उसमें थोडा सुधार करके मूफ्त में बांटेंगे. एक बार हमारा शासन तो आने दो, फिर नरेंदर की खैर नहीं. इस नरेन्दरको उसकी टीम के साथ लटका देंगे.

“मतलब की आपको सेवाभावी लोगोंकी कद्र नहीं है

“जो समज़ना है वह समज़लो. हमारे दुश्मनोंको खतम करना हम हमारा प्राथमिक ध्येय समज़ते है.

“लेकिन आर. एस. एस. तो रजीस्टर्ड संस्था नहीं है. आप कैसे पता लगाओगे कि आर. एस. एस. का सदस्य कौन है!! आर. एस. एस. शाखामें तो कोई भी व्यक्ति जा सकता है. आप भी जा सकते हो.

अरे आप हमें समज़ ही नहीं पाओगे. हमने जिसको जिसको पकडा, उनको समज़ना है कि वह, आर. एस. एस. के सदस्य है. जो भी हमारे खिलाफ अनाप शनाप बोलता है वह आर. एस. एस. का सदस्य है इसलिये तो हमने पकडा है. हमने उसको पकडा है इसलिये यह सिध्ध होता है कि वह आर. एस. एस. का सदस्य है.

न करे नारायण, यदि कल आपका शासन आ जाय तो कल आप सभी बिन-गो-मांसाहारीयोंको पकडके कारावासमें ठूंस दोगे? उनकी भी एक अनरजीस्टर्ड संस्था चलती है.

अरे भाया, हम तो सभी खीचडी खाने वालोंको जेलमें ठूंसके भेजने वाले है, चाहे वह संस्था बनावे या न बनावें, रजीस्टर्ड करें या न करे. सा ….. ले … ये खीचडी खाने वालोंने ही तो हमारी नींद उडा दी है. हम तो खीचडी को ही प्रतिबंधित करने वाले है. चाहे वह मूँगकी दालकी हो, या, अरहर दालकी हो, या दोनोंको मीक्स करके बनाया हो, या सभी धान्योंको मिक्स करके सब्ज़ीयां डालके बनाया हो तडका लगाके बनाया हो, कैसे भी बनाया हो, हम खीचडी/खीचडा को प्रतिबंधित करने वाले है. फिर तो हम बडी आसानीसे खीचडी खाने वालेको कारावासमें ठूंस देंगे. … ये हमारे गोमांस खाने वाले तो बेचारे गौ जैसे होते है. जहाँ अंगूठा लगाना कहो वहाँ लगा देते है. अब हम सज्ज है. अब हमें विदेशसे आतंकवादीयोंको बुलानेकी आवश्यकता नहीं. हमने स्वयं खूब सोच लिया है. हम हिंदुओंको चून चून कर खतम करेंगे.

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शिरीष मोहनलाल दवे

चमत्कृति

हम नहेरु/वीअन्स चाय को प्रतिबंधित करनेवाले है, गोया कि, चायके बागानवालोंको, चायकी पत्ती बेचनेवालोंको, चाय बनाने वालोंको, चाय पीनेवालोंको, चाय पीलानेवालोंको, … सबको अपराधकी श्रेणीमें लानेवाले है. चायकी पीनेसे चायकी आदत पडती है. चाय का नशा भी होता है,  चायका नशा तो चाय पीनेसे पहेले भी चडता है और पीनेके बाद भी चडता है. चाय न मिलनेसे आदमी अपना दिमागका काबू खो देता है, और चाय पीनेके बाद अपने विरोधीयोंके बारेमें अपना दिमाग चलाने लगता है. ये दोनों अवस्था देशके लिये (हम नहेरुवीअन्सके लिये) हानिकारक है. यह सचका तो जब चायवाले नरेंदर सामने आया तब पता चला.

हमारे शराबको देख लो, चाहे वह देशी हो या विदेशी, कितना निर्दोष है !!! हम शराबकी पूरी छूट दे देंगे. अरे हम स्कुल, कोलेज, मदरसे, मंदिर, गुरुद्वारा, मस्जीद, स्मशान, कब्रस्तान, … आदि सभी जगहोंपर शराबकी बीक्रीकी दुकान खोलनेकी अनुमति दे देंगे. एक के साथ दो फ्री की स्कीम भी लागु करेंगे. लोगोंको व्यवसाय भी तो मिलना चाहिये. 

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क्या इस्लाम अहिंसक है और महात्मा गांधी हिंसक थे? – २

प्रथम ब्लोगमें इस्लाम वास्तव में कुरानके हिसाबसे कैसा है और अविभाजित भारतके अधिकतर मुस्लिम लोग कैसे है वह हमने देख लिया.

धारणा के अनुसार ही हुआ, कि मित्रोंको ऐसा लगा कि “अहिंसक इस्लाम” शब्द प्रयोगसे अधिक  “हिंसक गांधीजी” शब्द प्रयोग अधिक रुचीकर है. जिस शब्द प्रयोगके शिर्षकसे ब्लोग लिखना अभी तो बाकी ही था तो भी उसके उपर प्रतिभाव  मेरे इ-मेल पर आये. इस बात पर चर्चा नहीं करेंगे क्यों कि समय समय की माँग है. गोया कि २ ओक्टोबर का समय था. और वही तो सुनिश्चित प्रतिभावकों प्रदर्शित करनेके लिये मौका था.

जी हाँ. कुछ लोगोंके लिये गांधीजी हिंसक थे. वैसे तो, न तो उनके पास कोई शस्त्र थे, न तो उन्होंने किसीको आदेश दिया था कि इसको मारो, …  उसको मारो … उसको मारो … मारो ही मारो … या तो ऐसा कोई निवेदन दिया था जिसका अर्थ निकाला जाता था “मारो” “मारो” …

हाँ जी. एक व्यक्तिको कुछ वर्षो बाद बोलते हुए सूनने को मिला, गांधी भी हिंसक थे. कौन था वह व्यक्ति?

स्वयं प्रमाणित था वह व्यक्ति.

सर्व प्रथम तो वह स्वयं प्रमाणित आचार्य था, फिर वह भगवान बना और फिर ओशो (जापानीस भाषाका शब्द है जिसका अर्थ है ज्ञानी) नामसे स्वयंको प्रदर्शित करने वाला बना. वह व्यक्ति था रजनीश.

उनका कहेना था कि गांधीजी निरपेक्ष रुपसे अहिंसक नहीं थे.

गांधीजी अपनी बात मनवाते थे.

अपनी बात मनवानेका अर्थ तो क्या है?

यदि आपके पास अधिक माहिति है और सामने वाले के पास कम माहिति है, और आपके  सांनिध्यमें अधिक आपके अनुयायी बैठे है तो आप अपनी बात इस परिस्थितिमें मनवा सकते है. कल यदि सामने वालेके पास अधिक माहिति आई तो वह अपनी बात मनवा लेगा.

मानलो कि एक वृंद है. दो व्यक्ति चर्चा करने बैठे है. उनके आसपास एक के अनुयायी लोग बैठे है. दुसरेके कोई अनुयायी नहीं है. एकने बकरीको देखा है वैसा वह दावा करता है. अनुयायीओंने बकरीको देखा नहीं है. दुसरे आदमीने सचमुच बकरी देखा है. अब चर्चा चलती है कि बकरीको कितनी टांगे होती है. प्रथम आदमी जिसने बकरी देखनेका दावा किया है वह कहेता है कि बकरीको तीन टांग होती है. दुसरा आदमी जिसने सचमुच बकरीको देखा है, वह कहेता है कि बकरीको चार टांगे होती है. सच बात तो दुसरे आदमीकी है. फिर भी जीत तो “बकरीको तीन टांगे होती है” ऐसा बोलनेवालेकी ही होती है.

चलो अब निरपेक्ष अहिंसा पर आते है.

निरपेक्ष अहिंसा तो वह होती है जिसके लिये किसीको मनवानेका प्रयत्न ही नहीं करना पडता.

एक पादरी था. उसने सेंकडो मील बैठे बैठे ही दुसरे आदमीको अपनी बात मनवा ली. इसको बोलते है निरपेक्ष अहिंसा.

गांधीजी अपनी बात मनवानेके लिये दबाव उत्पन्न करते थे. यह दबाव उत्पन्न करना भी तो एक प्रकारकी हिंसा है.

एक वेश्या थी. उसने एक युवकसे कहा तुम मुज़से शादी करो. युवकने उसकी बात नकार दी. तो वह वेश्या, उस युवकके घरके सामने आमरणांत उपवास पर बैठ गई. यह भी तो एक प्रकारकी हिंसा ही तो हुई.

चर्चा भी तो वैचारिक  दबाव है.

इस प्रकार, रजनीशजीका कहेना था कि, चर्चा और दबाव भी हिंसा ही है. सच्ची अहिंसा तो वह पादरीकी है जिसने दूर बैठे बैठे एक व्यक्तिका हृदय परिवर्तन कर दिया.

कुछ लोग उस पादरीको ढूंढ रहे है. अभी तक तो मिला नहीं है.

हाँ जी. कुछ लोग के बारेमें माना जाता है कि वे मैली विद्या का प्रयोग करके व्यक्तिका दिल बदल सकते है.

डॉ. कुवुरका ईनाम

लेकिन डॉ. कुवुर का चमत्कार सिध्ध करनेका इनाम आजतक भी किसीको मिला नहीं. हाँ जी, श्रीलंकाके डॉ. कुवुरने कहा था कि चमत्कार जैसा कुछ होता ही नहीं है. यदि कोई चमत्कार सिध्ध करेगा तो उसको कुछ लाख रुपये का प्राईज़ देगा.

चर्चाको नकार करने वाली रजनीश की बात आंशिक रुपसे सत्य तो लगती है. वैसे तो जनतंत्र का होना, संसदका होना, चर्चाका होना, … आदि वेश्याके समान है. ऐसा एक महापुरुषका भी कथन है. वही महापुरुष बोलते है कि,  लेकिन उसके बिना कोई चारा भी तो नहीं है. चर्चा से और/या बहुमतसे हमेशा तो सत्य प्राप्ति न ही हो सकती लेकिन सत्यकी दीशामें आगे बढनेका और कोई तो मार्ग नहीं है.

यदि अब दबाव की बात करें तो सत्याग्रह, उपवास, असहकार …. का शस्त्र अपने स्वार्थके लिये उपयोग करना त्याज्य है. वह केवल मानवजातकी भलाई के लिये ही किया जा सकता है. आवो, बैठो, चर्चा करो. आप अपनी बात हमें समज़ाओ, हम अपनी बात आपको समज़यें. यदि आप हमें समज़ाओंगे कि आपको समय चाहिये तो हम उसपर सोचके बतायेंगे कि आप समय सीमा बताओ. हम आपको उपयुक्त समय देंगे. आप कहोगे कि आपकी बात तो सही है लेकिन हमे मानना ही नहीं है, तो हमारा अंतीम शस्त्र सत्याग्रह है.

सत्याग्रह का शस्त्र वहीं उपयुक्त है जहाँ सामनेवाला मानवजातसे प्रेम करता है.

वैसे तो अदृश्य मनः शक्तिके कुछ उदाहरण है.

अरविंद घोषने कहा था कि जब भारतके ४० कोटी लोग मनमें ऐसा संकल्प कर लेंगे कि अंग्रेजोंको भारतसे अब जाना ही है, तब अंग्रेजोंमें ही ऐसी वृत्ति जन्म लेगी कि अब उनको जाना है और वे चले जायेंगे. और सचमुच ऐसा ही हुआ. अरविंद घोषके जन्म दिवस १५ ऑगष्टको ही भारतको आज़ादी मिली.

लेकिन एक समूहकी मनोवृत्ति का असर एक शासक-नेतागण पर पडना अलग बात है. उसके पीछे संघर्षोंके योगदानका परिबळ काम करता है. तभी तो व्यापक मनोवृत्ति जन्म लेती है. एक महा मानवके आस पास एक फिल्ड (क्षेत्र = परिबल)  होता है. यह उसके उपर ही काम करता है जिसको उस महामानवके बारेमें ज्ञान हो. जो उस महामानवसे अज्ञात है उसके उपर वह फिल्ड काम करता नहीं है, सिवा कि वह व्यक्ति उस महामानवके साथ कुछ दिन बीताएं..

शिरीष मोहनलाल दवे

चमत्कृतिः

सवाल राहुल गांधीसेः “अहिंसाका अर्थ क्या है?”

राहुल गांधी उत्तर दे सकता है;  “समज़ लो कि मैं महात्मा गांधी हूँ. मै अहिंसक हूँ. क्यों कि मैं गांधीजी की तरह और आर. एस. एस. की तरह स्टिक (दंडा) रखता हूँ. लेकिन मैं उसका उपयोग चूनाव आयुक्त को, या न्यायाधीशको, या सतर्कता आयोगको, प्रवर्तन निदेशालय या गोडसेको मारनेके लिये नहीं करता हूँ. मारनेकी इच्छा हो, फिर भी न मारो, वही तो अहिंसा है. और देखो ये आर.एस.एस. वाले, जिनके पास दंडा था तो भी उसने गोली चलाई. हिंसा, इसीको  तो बोलते है. 

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क्या इस्लाम अहिंसक है और महात्मा गांधी हिंसक थे?

अभी अभी २ ऑक्टोबर आने वाली है. हो सकता है सोसीयल मीडीयामें सक्रीय रहेनेवाले और महात्मा गांधीसे द्वेष भाव रखने वाले, पहेले कथन पर मौन रहे. किंतु दुसरे कथन पर गांधी-विरोधी लोग बेबुनियाद बातें करेंगे. क्यों कि उनकी समज़से हिंसक आंदोलन करने वाले और अहिंसक आंदोलन करने वाले एक दुसरेको अपना दुश्मन मानते थे. और गांधीजीके विरुध्ध बोलनके दो ही तो मौके है! २/१० एवं ३०/१.

क्या इस्लाम अहिंसक है?

क्या हिंसाका दुसरा नाम इस्लाम है?

धर्म के नाम पर, ईसाइयोने, यहुदीयोंने और मुस्लिमोंने शताब्दीयों तक परस्पर लगातार युध्ध किया. पहेले ईसाइयोंने यहुदीयोंसे युध्ध  किया. फिर मुस्लिमोंने भी यहुदीयोंसे और बादमें ईसाइयोंसे युध्ध किया. फिर ईसाइयोंने धर्म और विज्ञान को अलग किया. और यहुदीयोंसे बार बार लडना छोड दिया. किन्तु मुस्लिमोंने यहुदीयोंसे लडना आज भी चालु रक्खा. हम इसकी चर्चा नहीं करेंगे. क्यों कि यह बात सर्व स्विकृत है.

वास्तवमें धर्म क्या है?

यहुदीयोंके हिसाबसे धर्मका अर्थ,  जीनेकी सुष्ठु  और नियम बध्ध प्रणाली जो टोराटमें लिखित है. जगतका नियंता एक ही ईश्वर है, और वह यहोवाह है.

ईसाईयोंके हिसाबसे धर्मका अर्थ जीनेकी सुष्ठु और नियम बध्ध प्रणाली जो बाइबलमें लिखित है. जगतका नियंता एक ही ईश्वर है और वह यहोवाह/गोड है. ईशु को गोड/यहोवाहने धरती पर भेजा था.

मुस्लिमोंके हिसाबसे  धर्मका अर्थ जीनेकी सुष्ठु नियम बध्ध प्रणाली जो कुरानमें लिखित है. जगतका नियंता एक ही ईश्वर है और वह यहोवाह, खुदा है. खुदाने मोहम्मदको अपने फरिस्तेके द्वारा अपना पेगाम सुनाया.

इन तीनों धर्मोंके ईश्वर तो एक समान है.

वैसे भी ईश्वर तो एक ही होना चाहिये. किंतु जो हिंदु (सनातनी) है वे भीन्न भीन्न प्रकारसे उनको परिभाषित करते है. और वे सहिष्णु भी है क्यों कि वे सोचते है कि ईश्वर/विश्व/जीनेकी प्रणाली आदि युध्धके विषय नहीं है. 

हिंदु धर्ममें धर्म का अर्थ ही भीन्न है.

धर्मका अर्थ है कर्तव्य.

ब्रह्माण्ड अनेक है. ये ब्रह्माण्ड-समूह ईश्वरका शरीर है. ब्रह्माण्ड कैसे बना, कैसे चलता है … उसमें मत मतान्तर है. जगतका व्यवहार मीथ्या है. अंतिम सत्यमें यही कहा जाता है कि नेति …  नेति … नेति … (न ईति … न ईति = ऐसा नहीं … ऐसा नहीं …  ऐसा नहीं … .)

ईश्वरको मानो या न मानो, उसकी पूजा करो या न करो, इसमें यदि ईश्वर है भी, तो भी, उसको कोई फर्क पडता नहीं. परम सत्य (सत्) को कोई जानता नहीं, न तो कोई जान सकता है. सनातन धर्ममें  “सत् की शोध (संशोधन)” यह चर्चाका विषय है.

सत् की शोध  युध्धका विषय नहीं है.

जो भी  सत (परम सत्य) होगा वह सत्य होगा, कल्याणकारी होगा और आनंद दायक होगा. सत्यं शिवं सुंदरम्.

इस्लाम को समज़ने वाले लोगोंमें दो प्रकारके लोग है.

एक वे है जो कुरानको, उसके काल और घटनाओंके संदर्भमें समज़ते है. ऐसे लोगोमें अब्दुल कलाम, तारक फतह, हस्सन निसार, आरिफ मोहम्मद खान … जैसे अनेक है.

लेकिन ऐसे सच्चे अर्थमें सेक्युलर मुस्लिमोंकी संख्या बृहद भारतमें नगण्य है.

अन्य कई देशोंमें मुस्लिम जनता, बृहद भारतके मुस्लिमोंकी तरह असहिष्णु नहीं है. वे समज़ते है कि धर्म एक अंगत (पर्शनल) विषय है. इसके कारण वे मुस्लिम और हिंदुओमें साथ भेदभाव नहीं करते. अपनी आर्थिक तरक्की, वे भारतीयों(हिंदुओं)से शॅर करते है. कई समयसे और आज भी गल्फके मुस्लिम देशोंमें भारतके लाखों हिंदु लोग व्यवसाय करते है अच्छा खासा कमाते है और चैनसे रहेते है.

लेकिन भारतमें १८५७के संग्रामके बाद अंग्रेज शासकोंको लगा कि हिंदु और मुस्लिम यदि एक हो जायेंगे तो हमारा शासनका काम कठिन हो जायेगा. वैसे भी बहादुर शाह जफरसे पहेले हिंदु – मुस्लिम युध्ध तो होते ही थे. हर राजा अपने दुश्मनको अनेक रीतियोंसे निर्बल करनेका काम करता ही है. मतलब की जयचंद हर एक युगमें होते है. मुस्लिम राजाओंने मंदिरोंको तोडनेका और लूटनेका काम बेसुमार किया. उन्होंने स्त्रीयोंको भी नहीं छोडा.

अंग्रेजोंने भारतकी जनताको हिंदु – मुस्लिम में अधिक विभाजित किया. एक दुसरेके दुश्मन बनाये. हिंदुओंको ज्ञातिमें विभाजित किया, उत्तर दक्षिणमें विभाजित किया, विभाजनवादी नेतागण पैदा किया. शिक्षाण-प्रथासे विदेशी मानसिकता वाले लोग उत्पन्न किया, और स्थानिक शासन शासनमें उनका हिस्सा अनिवार्य किया. मुस्लिमोंको भी विभाजित किया कलीफेट (खलिफाका) शासक और मोहम्मद साहबका उत्तराधिकारी के नाम पर. मुस्लिमोंके विभाजन की बात लंबी है. आम हिंदु नेताओंमें इस बातको समज़नेकी क्षमता नहीं है.

हिंदुओंमें आनंदमय (सुंदर) जीवन जीनेके मुख्य मार्ग है, जो है ज्ञान, ध्यान, कर्म, और भक्ति.

केवल भक्ति मार्गका उल्लेख करेंगे. बाकीकी चर्चा नहीं करेंगे.

भक्ति मार्ग

भक्तिमार्ग का सिध्धांत है कि आप दिमाग मत चलाओ. बस आप स्वयं, ईश्वरको समर्पित हो जाओ. एक गुरु रख लो. वह आपको सलाह देता रहेगा. बस इतना ही याद रक्खो कि ईश्वर सर्व व्यापक है, ईश्वर सर्वज्ञ है, सब कुछ ईश्वर ही करता है (आप कुछ भी करते नहीं. आप तो निमित्त मात्र है). ईश्वर आपका भला ही करेगा.

ख्रिस्ती धर्म और इस्लाम, ये दोनों, हिंदु धर्मकी परिभाषामें आते नहीं है. ये दोनों वास्तवमें भक्ति मार्ग है.

बस आप मोहम्मद पेगम्बरको मानो. ईश्वरने स्वयंने अपने फरिस्ते द्वारा मोहम्मद साहबको अपना पेगाम  पहूँचाया है. मोहम्मद साहबने उस पेगामको कुरानके रुपमें संपादित करके जगतको दिया है. वह ही आखरी  ईश्वरीय संदेश है. मोहम्मद साहब आखरी पेगम्बर है. अब कोई पेगम्बर आने वाला नहीं है. यदि आप इस्लाम कबुल कर लोगे तो स्वर्ग आपके लिये सुनिश्चित है. ईश्वर अति दयावान है. इश्वरसे आप कुछ भी छीपा नहीं सकते. आप श्रध्धासे ईश्वरकी उपासना करो. दिनमें पांच बार उसकी उपासना करो. ईश्वरके सिवा किसीकी उपासना मत करो. मनुष्य और ईश्वरके बीच कोई दलाल, एजंट, मध्यस्थी करनेवाला, सिफारिश करनेवाला नहीं है. आप और ईश्वरके बीचमें कोई भी नहीं है.

कुरानमें शाकाहार और अहिंसा

जिनको हम युग्म फल, यानी फलोंका समूह कहेते है, उनका वर्णन कुरानमें सुंदरतासे किया है, जैसे कि अनार, अंगूर, खजूर, अंजीर, … उनकी कलात्मक रचना, कारीगीरी और सफाईदार रचना देखो. ये सब ईश्वरने तुम्हारे लिये बनाये है. तुम इनको खाओ. (लेकिन) पशु, पक्षीयोंकी सुंदरताका वर्णन नहीं किया है. और ऐसा भी नहीं कहा है कि खुदाने इन सबको तुम्हारे लिये बनाया है, इस लिये इनको तुम खाओ. लेकिन ऐसा कहा है कि जिंदा रहेनेके लिये, इन्हें तुम खा सकते है हो.

मोहम्मद साहेबवाला इस्लाम आने से पहेले, रमजानमें रोजा रक्खा जाता था. उस समय, उस महीनेमें अरबस्तानके लोग केवल शाकाहार ही करते थे.

जब तक सामनेवाला आपको आपके देशसे निकाल नहीं देता उससे युध्ध मत करो. उसको दूरसे सलाम करो.

ईश्वर निराकार है. यह बात “इस्लाम” और “हिंदु” दोनोमें कही है. इस्लाममें कहा है कि आप ईश्वरको किसीभी नामसे पूकार सकते हो. लेकिन इस्लाममें साकार ईश्वरकी कल्पना करना और उसको पूजना अपराध है.

हिंदु मानते है, और तर्कसे सत्य भी है कि नाम और रूप अभिन्न है. जैसे वाणी और अर्थ. ईश्वरको निराकार (“ने ति …  ने ति … ने ति …”) मानते हुए भी आप उसकी साकार पूजा, कर सकते है.* ईश्वरके उपर भी कविता कर सकते हो.

जो इस्लाम को जाननेवाले है वे इस्लामको इमान और अमन का संदेश देनेवाला धर्म कहेते है. इस्लाममें विज्ञानको भी सबसे उपर प्राधान्य दिया गया है.

तो वास्तवमें इस्लाम कैसा है?

अरे भाया, “वास्तव”की बात छोडो. असरकारक कौनसा इस्लाम है?

मान लो कि सर्पकी प्रजातियां १०० है. उनमेंसे ४ प्रकारके सर्प ही जहरीले होते है. लेकिन हमारे घरमें हमने  १०० सर्प पकडके लाके रख दिया है. उनमेंसे ९९ सांप जहरीले निकले.

मतलब कि जो जहरीली जातिके सर्प है वे ही हमारे घरमें है. तोऽब हम क्या मानेंगे? जातिका गणित संख्यामें नहीं चलता.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

चमत्कृतिः

“आई लव यु मोहम्मद … रसुल ए गुस्ताखी … सर तनसे जूदा”

अरे भाया, “आई लव यु मोहम्मद और सर तनसे जूदाके” बीचमें संबंध क्या है? नहीं है.

“मेरी चंद्रमुखी मायके गई है. चूहा बील्ली खा गया.” इसमें भी कोई संबंध नहीं है. इस कथनके पोस्टर बनाओ और दुर्गा पूजाके मंडपमें कई जगह लगा दो. इसका भी, प्रयत्न करने पर गर्भित अर्थ निकाल सकता है.

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