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Archive for September, 2023

भारतमाताको किसने मारा? और राष्ट्रपिताको किसने मारा? – ५

हमने प्रकरण ४ में देखा कि  अंग्रेजोंके शासनमें कई महापुरुष थे जिनका नाम बडा था पण विचार अपरिपक्व थे.

जिन्होंने अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त की थी, वे अंग्रेजोंको इश्वर दत्त शासक मानते थे. इनमें बडे बडे नाम है. यदि हम इनके नाम लेंगे तो बहूतसे लोग आज भी नाराज हो जायेंगे. हमारा काम कोंगीयोंकी और उनके सांस्कृतिक साथीयोंकी तरह भारतमाताको विभाजित करने का नहीं है. हम तो सबका साथ, सबका विकास, सबका प्रयास, एवं सबका विश्वास में मानने वाले हैं.

तो क्या उस समयसे  इंडिया विरुद्ध भारतका युद्ध जारी है? जी हाँ. इंडिया विरुद्ध भारत युद्ध तबसे जारी है.

उस समय तीन प्रकारके विद्वज्जन विद्यमान थे.

. गुरुकुल से पढे संस्कृतज्ञ विद्वान,

. अंग्रेजी शिक्षा लिये हुए, और फिर भी अंग्रेजी भाषाके ही नहीं लेकिन संस्कृत भाषा साहित्यके ज्ञाता,

. केवल अंग्रेजी पढे हुए और अंग्रेजोंसे प्रभावित विद्वज्ज्न.

प्रथम प्रकारके विद्वान तो नखशिख भारतीय ही थे.

द्वितीय प्रकारके लोग विभक्त थे. कुछ लोग भारतीय थे और कुछ लोग इंडियन थे.

तीसरे प्रकारके लोगमें अधिकतर उन्नीसवीं सदीकी पैदायीश थे.  महात्मा गांधी भी प्रायः १९२० तक ऐसा ही मानते थे. लेकिन उनके उपर हिंदुधर्म (सनातन धर्मका) का अधिक प्रभाव होनेके कारण वे ऐसी मान्यतासे मूक्त हो गये.

कुछ लो ग ऐसे भी थे, जो स्वयंको गलतीसे भारतमें (इंडियामे) जन्म ले लिया है ऐसा मानते थे, अन्यथा वे तो नखशिख अंग्रेज ही है. आज भी ऐसे लोग प्रच्छन्न या अप्रच्छन्न रुपसे विद्यमान है. इनमेंसे कुछ लोग नेतागीरी करनेमें व्यस्त है और कुछ लोग  मीडीयामें विद्यमान है.

नहेरु स्वयं को अप्रच्छन्नता से कहेते थे कि मैं आकस्मिकतासे हिंदु हूँ, लेकिन स्वभावसे मैं मुल्ला हूँ, और वैचारिकतासे मैं  ख्रीस्ती  हूँ.  नहेरु वंशके लोग प्रच्छन्नतासे ख्र्स्ती है लेकिन आवश्यकता पडने पर स्वयंको हिंदु मानते है. इन लोगोंने भारतमाताकी हत्या की है, और राष्ट्र पिताकी भी हत्या की है. दोनों हत्याए बार बार लगातार कर रहे है.

भारत एक ऐसा राष्ट्र है, जिसमें वैज्ञानिक दृष्टिसे बनाये हुए शास्त्र है. और आदर्श  समाजके लिये नियम बद्ध आचार संहिता भी है. यदि इसको आप नष्ट कर दो तो भारत राष्ट्र नष्ट हो जायेगा.

अंग्रेजोंने तो भारतके सभी शास्त्र और इतिहास गलत है ऐसी हवा ही फैला दी. उनकी तो कार्य शैली ही ऐसी थी कि उन्होंने तो पराजित सभ्यताके साहित्य को तो “हवाई” घोषित कर दिया, और पराजित जनताको,  वे निम्न स्तरीय है ऐसा महेसुस करवा दिया. उन्होंने पराजित जनताकी संरचनाओंको एवं कलाकृतियोंको ध्वस्त करनेका खूब प्रयास किया. क्यूँ कि, उनका तो अनुभव ही ऐसा था कि किसी संस्कृतिको नष्ट करना है और उनके उपासना स्थलोंको ध्वस्त कर दो. उनके स्थान पर हमारे उपासना स्थल बना दो. सत्तासे जनताको ख्रीस्ती बना दो ताकि भविष्यमें कोई हमारे दुराचारोंकी बुराई न कर शके.  

नहेरुवीयन तो अंग्रेजोंसे भी बढकर थे. नहेरुवीयनोंने तो ऐसे नियम ही  बना दिये कि; दुराचार करना नियम ही बन जाय.

          नहेरुवीयनोंने तो नियम ही ऐसे बनाये कि, सनातनीयोंके धर्मिक स्थलोंकी संपत्तिसे ही विदेशी  धर्म फुले और फले. सनातन धर्मके पूजा स्थलों की केवल धन संपत्ति ही नहीं, किंतु देशकी कोई भी कहीं भी भूमि-संपत्ति भी चाहे वह किसीकी भी  हो, यदि विधर्मी मुस्लिमोंका एक सूचित  संगठन अपना हक्क बोल दें, तो भी वह भूमिगत संपत्ति उनकी हो जाय. और यदि कोई इसका विरोध करे,  अपना हक्क जताये तो, प्रारंभिक न्यायाधीश भी वही सूचित संगठन ही हो.

इससे मतलब है, अपराध करनेवाला ही न्यायाधीश.  न्यायिक प्रक्रिया भी इतनी विलंबित और जटील, कि सामान्य कक्षाका व्यक्ति ही मृतःप्राय हो जाय.

ऐसे कानून बनानेवाले नहेरुवीयन, स्वयंको जनतंत्रके रक्षक और प्रचारक मानवाते है, कहेता भी दिवाना और सुनता  भी दिवाना.

ऐसे प्रावधान भी इन नहेरुवीयनोंको और उनके सांस्कृतिक साथीयोंको, विधर्मीयों के लिये अल्प अधिकार  लगता है, उनकी तो ऐसी महेच्छा थी कि, सनातनी व्यक्ति, यदि विधर्मी के उपर तथा-कथित अपराध करे, तो सर्व प्रथम सनातनीको कारावास भेजना है, फिर उसके उपर ही दायित्व लादना कि, वह ही सिद्ध करें कि वह निरपराधी है.

न्यायिक सिद्धांतोकी अवहेलना इससे अधिक क्या हो सकती है?

यही तो मोदी/बीजेपी-विरोधीयोंकी मानसिकताकी पहेचान है.

इनके अतिरिक्त इन वंशवादीयोंके पापलीलाएं देख लो.

वे शपथ लेकर बोलते है कि हम वंशवादीयोंकी स्वयंकी सत्ता पर आपत्ति आती तो हम स्वयं सर्वसत्ताधीश बन बैठते है. यह हमारा जन्मजात हक्क है. उतना ही नहीं हम तो  न्यायालयके समक्ष शपथ पर कबूल करते है कि  हमने प्राकृतिक अधिकार भी नष्ट किया है, किनको जिनेका अधिकार है और किनको जिनेका अधिकार नहीं है वह हम निश्चित करेंगे.

हम जम्मु – कश्मिर राज्यमें  धर्म, जाति (कास्ट), लिंगके अधारपर ही नागरिक अधिकार देंगे, यदि कोई इनमें जनतंत्रके लिये सुसंगत परिवर्तन करेगा तो हम उनको जनतंत्रका अपमान घोषित करेंगे और धर्मांध लोगोंको आंतरिक युद्धके लिये एवं आतंकवाद के लिये आहवाहन करेंगे, फिर भी हम जनतंत्रके रक्ष कहेलवायेंगे,

हम भारतकी ७०००० चोरस मिल भूमि, ही नहीं अपितु ९१००० चोरस मिल भूमि, चीनको दान करते है फिर भी हमारा अपराध नहीं बनता, किंतु फिर भी हम भारतके रक्षक है ऐसा आपको मानना पडेगा. यदि भारतकी सेनाने पाकिस्तान हस्तक  जम्मु-काश्मिरका कुछ हिस्सा जित भी लिया तो हम हमारी इस भूमिको उनको वापस दे सकते हैं. संसद क्या चिज है?

हमारे पर, एवं हमारे चहितोंके पर, नियमोंका बंधन नहीं है, हम नियमोंसे पर है,

हम यदि सियासती (हमारे विरोधीयोंकी एवं या हमारे  पक्षमें मत न करनेवालोंकी) हत्याएं करें/करवायें तो इन घटनाओंके उपर हम जाँच नहीं करेंगे. सूनते हो क्या?

यदि डेड बोडी उपलब्ध है तो भी उसकी शव परीक्षा नहीं होगी,

हम जब भी बोलेंगे जूठ ही बोलेंगे, जूठके सिवा कुछ नहीं बोलेंगे,

यह है परलोकगत एवं विद्यमान नहेरुवीयन यानी भारतमाताके हत्यारोंकी मिसाल.

जूठ बोलना उनका वंशीय संस्कार है. इस संस्कारको मोदी/बीजेपी–विरोधीयोंने आत्मसात किया है. क्यूँकि, नरेंद्र मोदी और उनकी टीमकी नैतिक कक्षा इतनी उच्च है कि उनके पास जूठ बोलना अनिवार्य हो गया है.

निरपराधीको अपराधी बोलना भारतीय संस्कृतिका संस्कार नहीं है. भारतीय संस्कृति तार्किक चर्चा द्वारा ज्ञान प्राप्तिमें मानती है. जो व्यक्ति इन बातोंमे नहीं मानता वह भारतीय कहेलवाने की  योग्यता  नहीं रखता है.

ये लोग वास्तवमें गद्दार है. अपने स्वार्थके लिये आवश्यकता पडे या न पडे तो भी अपनी गद्दारी का प्रदर्शन करते ही रहते है.

अस्तुः

तो महात्मा गांधीकी हत्या किसने की थी?

(कथित एवं स्वयं प्रमाणित विद्वज्जन, “सज्ज हो जाओ. २–ओक्टोबर आ रही है”)

 नहेरु और उनके वंशज और इनके सांस्कृतिक साथी, जो इतने बडे अपराधी हो सकते है, तो जिसने इनका राज्याभिषेक किया था वह गांधी भी हत्याके योग्य ही था या होना ही चाहिये)

उपरोक्त अन्य शिर्षक पर क्रमशः

शिरीष मोहनलाल दवे.

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