अब ये लोग (सत्तामें) नहीं है … शुक्रिया अदा करो – 2
हमने इस ब्लोग के पार्ट – १ में देख लिया कि नहेरुने क्या किया.
वैसे तो उसने जनताको भ्रमित करके अपनी मृत्यु तक आरामसे शासन किया. गलतियां भी असाधारण प्रकारकी की. उसकी आपखुदीके कारण समाचार माध्यम उससे डरते थे.
किन्तु आप कहोगे कि यदि उसमें ईतनी सारे दुर्गुण थे तो भी हमे उनका शुक्रिया क्यूँ करना?
एक चमत्कार दिखानेवाली महिलाने को मैंने यही प्रश्न पूछा था.
उस देवीने मुज़े उत्तर दिया कि ईश्वर हमेशा प्रमाणभान रखके दंडित करता है. जितना कुकर्म अधिक, उतना उसको उँचा ले जाके गीराना.
नहेरुके कुकर्म आज भी उसका पीछा छोडते नहीं.
बिना श्रम किये वाहवाही की महेच्छा रखना भी एक दुष्कर्म ही तो है.
हमारे ईश्वरको चाहिये कि दुष्कर्मी बदनाम होके, इस दुनियासे विदा ले. आज यदि हम नहेरुकी गलतीयोंको देखें, तो हमें तो एक अशिक्षित नेता (मिसाल के तौर पर राहुल गांधी) भी नहेरुकी गलतियां उजागर कर सकता है. नहेरु ज्ञातिवादके विरुध्ध थे. और यह राहुल, उछल उछल कर ज्ञातिवादी जनगणनाका ब्युगल बजाता है.
ईश्वरने सोचा कि अब तो नहेरुने काफि गलतीयां कर दी है. अब इस नहेरुवीयन कोंग्रेस पक्ष सत्तासे बाहर ही करना पडेगा. लेकिन क्या शाश्वत काल के लिये?.
इंदिरा गांधीने क्या किया?
इसको समज़नेसे पहेले हमें कुछ और बातोंकी कल्पना करना पडेगा.
कोंग्रेस की केंद्रीय कारोबारीको राष्ट्रपति पद पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद को चालु रखनेका निर्णय लिया. नहेरु उस निर्णयके विरोधमें थे. लेकिन क्या करें केंद्रीय कारोबारी तो सर्वोच्च थी.
यह काल्पनिक दृश्य हो सकता है जो इंदिरागांधीने देखा होगा.
नहेरु अपने तीन मूर्त्ति घरमें ड्रोईंग रुममें अपने दो हाथ पीछे रख के एक दिवारसे सामनेकी दिवाल तक चक्कर लगा रहे थे. और जोरसे गुनगुना रहे ठे.
“ये गधे मोरार को तो जेलकी १२ बाय १२ कि रुममें ठोस देना चाहिये. ये जय प्रकाश को भी ऐसा ही करना चाहिये, वह तो ज्यादा ही चापलुसी करता है. सा … जनता भी बहूत बक बक करती है, जनताको तो शिक्षित करना ही बेकार है. उनको तो अनपढ ही रखो. पढनेसे तो वह ज्यादा चापलुसी करती है. अधिक चालुसी करे तो इनको भी जेलमें ठोस दो ….
“यहा साला जनतंत्र है तो उससे मेरे हाथ बंधे हुए है. जनतंत्र, वाणी स्वातंत्र्य … ये सब बकवास है. नाम कुछ भी रख लो पर मेरे हाथमें पूर्ण सत्ता होना चाहिये. सबका हाल श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसा होना चाहिये. नाम समाजवादी – समाजरचना रक्खा है तो क्या हो गया? मुख्य ध्येय तो सारे समाजका उत्थान करना है. लोक शाहीको तो मोहरा बनाके ही रखना चाहिये. अब तो साला कुछ ड्रामा करना पडेगा.
“अच्छा है कि वह बुढा जिंदा नहीं है. एक दफा तो मैने उसको एक प्रच्छन्न रुपसे ब्लेकमेल करके कोंग्रेसको तोडनेकी धमकी देके, पक्षका प्रमुख बनके प्रधान मंत्री बन गया. लेकिन यदी वह जींदा होता तो मुश्किलें बढ जाती, क्यों कि वह बनिया वैसे तो समजदार था. लेकिन उसका पटेल भी तो कहां जिंदा है. यह भी तो अच्छा ही है. लेकिन इन कारोबारीके सदस्योंका कुछ करना पडेगा. अब तो कुछ करना ही पडेगा. एक बार मेरी बात नहीं मानी तो कारोबारी को तो आदत पड जायेगी अपनी मनमानी करने की.
इंदिरा गांधीने ये सब सून लिया था / होगा.
उसने समज़ लिया कि सियासतमें ड्रामा करना आवश्यक है. सत्ता ही तो सब कुछ है. समाजवाद, जन तंत्र … आदि सब बकवास है.
इंदिरा गांधीने कारोबारी के सामनने शर्मीली … शर्मीली … सहेमी … सहेमी, बननेका ड्रामा शुरु किया. विपक्ष के एक नेता, उस समय, उसको गुंगी गुडीया कहेते थे. लेकिन इंदिराको उसकी कहां पडी थी. उसको तो यह दिखाना था कि वह तो कारोबारी के सदस्योंके बिना पानी भी नहीं पियेगी. उसको तो शर्मीली शर्मीली बनके, केंद्रीय कारोबारीकी आज्ञामें रहेनेका नाटक करना था.
इंदिराको पता नहीं था कि प्रकृति अपने नियमसे चलती है. जैसा आपके विचार वैसे आपकी मनोवृत्ति, और जैसे आपकी मनोवृत्ति वैसे आपके कर्म. और जब कर्म बन ही जाता है तो कर्मफल तयार हो ही जाता है.
चीनको ७१००० चोरसमील भूमि जो उनके पिताने दान करदी थी उसकी पोल न खूले इस इसलिये नहेरुके बाद इंदिराको प्रधानमंत्री बनाना अनिवार्य था. नहेरुके छोटे बडे और कई कुकर्म थे.
पाकिस्तानके १९७०के चूनावमें पूर्व पाकिस्तान की आवामी लीगको बहुमत हांसिल हुआ. लेकिन प. पाकिस्तानकी सेनाको और वहाँ की जनताको यह पसांद नहीं आया. सेनाने आक्रमण कर दिया. मुजीबुर अपनी जान बचाने के लिये यु. के. भाग गये.
अमेरिका तो अपनेको जनतंत्रवादी देश मानता है. पू.पाक को प. पाकिस्तानसे आज़ाद कराना उसका कर्तव्य था. वह उसका श्रेय भी लेना चाहता था.
लेकिन अमेरिकाने भारतमें लगातार घुस रहे पश्चिम एवं पूर्व. पाकिस्तानी अवैध मुस्लिमोंको नजर अंदाज किया. भारतीयोंको समज़ना अमेरिकाके बसकी बात नहीं.
१९७० तक, भारतमें कमसे कम दो करोड अवैध मुस्लीम आ चूके थे.
इंदिराके उपर जनताका और सेनाका दबाव भी बढ रहा था.
पाकिस्तानने भारतके उपर हवाई हमला कर दिया.
अब तो इंदिराका उत्तरदायित्व बढ गया.
पाकिस्तान की सेनाके लिये भौगोलिक परिस्थिति अति कठोर थी.
भारतीय सेनाके लिये परिस्थिति अति सानुकुल थी.
वैसे भी, कभी भारतीय सेना, सदीयोंसे जीतती थी. यदि कभी हारी है, तो वह अपने छीपे हुए गद्दारोंके कारण हारी है.
सब लोग जानते है कि १९६२में गद्दार कौन था.
स्वातंत्र्यके बाद के तीन दशकोंमें ईश्वरने भारतीय जनताको, नहेरुवीयनों द्वारा सिखाया है कि गद्दार और सत्तालालची कौन कौन हो सकते है.
भारतमें एक लोकवायका है कि मुक्ति पानी है तो ईश्वरकी शत्रुभावसे उपासना करो, जैसा रावणने किया था.
नहेरुवीयन कोंग्रेसी गेंग का भी यही हाल है. भार्त को वंशवादने मुक्ति दिलानी है तो भारतकी शत्रुभावसे सेवा करना पडेगा.
जब भारतकी जनता यह ईश्वरीय लीलाको शिघ्रातिशिघ्र समज़ लें.
शिरीष मोहनलाल दवे
चमत्कृतिः
खलः करोति दुर्वृत्तं, नुनं फलति साधुषु,
(दशाननः हरेत् सीता, बंधनं स्यात् महोदशे)
कोंगीजनैः कृता नष्टा, भारतस्य जनसंस्कृति,
कालीमा तु मुखे लिप्ता इतिहासे तस्य सर्वदा
दुर्जन गलतकाम करता है तो कभी कभी सज्जनको सहन करना पडता है.
[ रावणने सीताका हरण किया, तो समूद्रको (रामसेतुसे) बंधन हुआ ]
कोंगी गेंगने भारतके जनतंत्रको (आपात्काल द्वारा) नष्ट किया तो (भारतकी सांस्कृतिक धरोहर को) शाश्वत् कालीमा लग गई.