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Archive for September, 2025

क्या सर्वोच्च न्यायालयको बातका बतंगड बनानेकी आदत है?

१     क्या वक्फ बोर्ड एक्ट आवश्यक है?

२     मुस्लिमोंको चाहिये क्या?

३     क्या हिंदुओंके अधिकारोंके समान अधिकारोंसे मुस्लिमोंके मानवीय हक्कोंका हनन होता है?

४     क्या मुस्लिमोंको हमेशाके लिये हिंदुओंसे अधिक और अबाधित अधिकार ही चाहिये?

५     क्या हिंदुओंसे कहीं अधिक अधिकार मुस्लिमोंको देना न्यायिक सिध्धांतोके अनुरुप है?

६     तथा कथित अधिकारोंको धर्मके नाम पर स्विकृति देना और जनतंत्र के न्यायिक सिध्धांतोकी अवहेलना करना योग्य है?

७     वक्फ कानूनका हेतु क्या है?

८     वक्फ नियम का प्रावधान भारतीय संविधानमें क्यों है?

९     क्या सर्वोच्च न्यायालयको हर बातमें टांग अडाना योग्य है?

१०    भारतका उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालय मीथ्या आलाप करनेके स्थान पर स्वयं संज्ञान क्यों नहीं लेते?

 

१     वक्फ का अर्थ होता है दान. दानके पैसे सत्कार्यमें खर्च करना होता है. सत्कार्यमें वैचारिक, कौटुंबिक और सुविधा प्रदान करनेके हेतुवाले काम सामिल हो सकते है. सत्कार्यका यह दान कोई खास वर्गकी भलाईके लिये ही/भी हो सकता, ऐसे प्रावधान यदि अनिवार्य है तो लिखित रुपमें रख सकते है.

१.१    हम सब जानते है कि ये बातें सामान्य है. तो इसमें धर्म बीचमें कहांसे आ गया? अरे भाई, यदि वक्फके पैसे का खर्च कोई एक खास धर्ममें माननेवालोंके लिये करना है तो उनको एक वर्ग में परिभाषित कर दो. ये पैसे जो लोग इस्लामधर्ममें मानते है उनकी भलाई के लिये खर्च करना है. पैसेका दुरुपयोग न हो, इसके लिये इन पैसोंके हिसाबकी जांच होना आवश्यक है. अरे भाई, यह तो पैसोंका कैसे खर्च करना उसको  कानूनी प्रक्रियासे परिभाषित करना ही हुआ न !!!

१.२    मुस्लिम भाया कहेते है कि “नही भाई. वक्फमें तो भूमि भी आती है, मकान भी आते है, विद्यालय भी आते है, मदरसे भी आते है, मस्जिदें भी आती है, कब्रस्तान भी आते है, दरगाहें भी आतीं है. … हमारा एक अलग परिषद (बोर्ड) ही होता है. और हमारी यह संस्था स्वायत्त है.”

१.२.१ “स्वायत्तता” की जनतंत्रमें एक सीमा होती है. जनतंत्रमें सबसे उपर संविधान है. संविधानमें संशोधन केवल संसद कर सकती है. संसद द्वारा संशोधन करनेकी भी सीमा है. संसद भी, जनतंत्रके मूलभूत सिध्धांतका हनन न होता हो, उस पर सीमित है. संविधानके प्रावधानोंका अर्थघटन करनेका अधिकार न्यायतंत्रका है. एक न्यायाधीश से लेकर सर्व-न्यायाधीश तकका समूह भी अर्थघटनके लिये बैठ सकता है. ट्रस्टीशीपका कानून वक्फ परिषदको लागु पड सकता है. वास्तवमें वक्फ बोर्ड की कोई आवश्यकता ही नहीं. केवल नाम बदल दो. राज्य वक्फ परिषद के बदले “राज्यका नाम” – मुस्लिम – ट्रस्ट. और बात रही मकानोंकी जिसमें हर प्रकारकी  निर्मित संरचनाएं आती है, वह भी तो भूमि पर होती है. वे सब हमेशा सरकारी अधिकृत कार्यालयोमें पंजीकृत होते है. और उस भूमिके उपर जो निर्माण करना है, उनकी मान्यता सरकारके अधिकृत अधिकारीसे लेना ही पडेगा. ये सब कार्यप्रणालीयोंका पालन तो करना ही पडेगा. ऐसे नीति नियम केवल सुशोभनके लिये थोडे बनाये गये है!        

२     मुस्लिमोंको चाहिये कि वक्फ कानूनको इस्लाम धर्मके साथ जोडा जाय. क्यूँ कि इस्लाम धर्मके साथ जोडनेसे वक्फ कानून उनका धाम्रिक अधिकार बन जायेगा. और धार्मिक अधिकारोंको संविधानीय सुरक्षा प्रदान की हुई है. लेकिन कोई भी धार्मिक सुरक्षा किसी अन्य व्यक्तिके मानवीय एवं संविधानीय मूलभूत अधिकारोंको हानि पहोंचाने वाली नही होना चाहिये. तद उपरांत देशकी सुरक्षाको(सामाजिक सुरक्षा सहित) हानि/अन्याय करनेवाली भी नहीं होना चाहिये.

३     वास्तवमें तो सर्वोच्च न्यायालयका पूराना आदेश/सूचन है कि समान नागरिक संहिता बनायी जाय. लेकिन नहेरु/वीयन्स सहित अन्य विपक्षी संगठन (अब ये सब लोगोंने इंडी-गठबंधन बनाया है), जब सत्ता पर थे तब भी कोमवादी होने के कारण और स्वार्थी ध्येयोंके कारण कोमवादको बढानेका काम किया.

३.१    नहेरु/वीयन्स सरकारने मुस्लिममोंके तुष्टीकरणके लिये वक्फ बोर्डको असीमित अधिकार दिये थे कि सामान्य कक्षाका व्यक्ति अपनी संपत्ति पर यदि वक्फके नाम हक्क जमा दिया तो वह वक्फकी हो गयी. वह शख्स तो गया कामसे. भारतकी न्यायप्रणाली भी ऐसी है कि वह शख्स भारतकी न्याय व्यवस्थाको मीथ्या मानने पर बाध्य है.

३.२    वक्फके नाम पर, लेंड माफियागीरी करनेकी नहेरु/वीयन्स सरकारने मुस्लिमोंको नियमोनुसार छूट दे रक्खी है. याद करो “तीन तलाक”. मुस्लिम औरतोंसे वेश्यागीरी करवानेका एक नियमबध्ध बीना रीस्क वाला मुस्लिमोंका धंधा था.

४.     इन्डी गठबधन की नेतागीरी चाह्ती है कि मुस्लिम जनता भारतकी मुख्य धारामें कभी भी सामेल न हो. वे और मुस्लिमकी नेतागीरी भी यही चाहती है कि कुछ गरीब मुस्लिम हमेशा गरीब ही रहे और अपना वोटबेंक अकबंध रहे, इस लिये इन्डी गठबधन की नेतागीरी चाह्ती है वक्फ कानूनमें ऐसे परिवर्तन करें कि मुस्लिमोंको धर्मके नाम पर विशेष अधिकार मिले और हमारे मुस्लिम लोग बिना रोक टोक अपने काले कारनामे करते रहे. इतना ही नहीं, सीमा पारके मुस्लिमोंको भी लगे कि भारतमें ही कैसे भी करके (जो बेहद आसान है) घूसे, और जहाँ भी इन्डी गठबंधनका शासन है वहांसे अपना पहेचान पत्र बनावे और नागारिक बने, फिर विशालकाय भारतमें कहीं भी निवास बनाके आराम से रहे. मुस्लिमोंका और इन्डी-गठबंधनकी नेतागीरीका नेटवर्क इतना शक्तिशाली है कि आई.ए.एस. अधिकारीका बाप भी उनको वे चाहे वैसा दस्तावेज बनाके देगा. ४.१     मुस्लिम लोग बोलते है कि; जब केज्री, ममता, स्टालीन, लालु, अखिलेश, उध्धव, शरद … जैसी नेतागीरी भारतमें विद्यामान हो जिनकी खुली धमकीसे आई.ए.एस. तो क्या उच्च/सर्वोच्च न्यायधीशोंकी पतलुन गीली हो जाती है, इससे अधिक हमें कौनसी सानुकुलता चाहिये? हमारे लिये तो भारत जन्नत है जन्नत. चाहे हजार मोदी या योगी आवे तो भी वे सौ साल तक हमें टच नहीं सकता.

५.     मुस्लिम जनता आसानीसे कह सकती है. “… वक्फ कानून पर न्यायाधीशका आदेश देख लिया न? हमारे लिये जनतंत्र क्या चीज़ है?”

६.     आगे चलके मुस्लिम लोग कहेतें है, “ अरे भाया, २०१४से पहेले तो, हमारे “डेढ मुस्लिम” इन्डी गठबंधन-नेतागीरीका शासन था ही न !. उस समय भी, भारतमें जनतंत्र ही तो था. चाहे आर.एस.एस./बीजेपी वाले कुछ भी कहे, उनको तो हमारे नेटवर्क(इंद्रजाल)वाले, उनका मूँह “तुम तो महात्मा गांधीके हत्यारे हो … हमको तो महात्मा गांधीने कहा था कि तुम भारतमें ही रहो …” ऐसा बोलके बंद कर सकते है. अरे भैयाजी, जब हमारे पास संसदमें कम संख्या है, तो भी हम ऊची आवाज़से, बार बार लगातार जूठ बोलके, उनसे सच का असर पैदा कर सकते है, तो “शाहीन बाग” बनाना तो हमारे लिये बांये हाथका खेल है. अरे ये तुम्हारे “मी लोर्डज़” भी हमारे कहे बिना, “आंदोलन करना जनतांत्रिक अधिकार है” बोलके हमारा हौसला बढा सकते है. बोलो “किसान”-बील वापस लेना पडा न.               

७     ; नहेरु चाहे हिंदुओंके/संसद समक्ष ली हुई शपथ जानबुझ कर भूल जाय, लेकिन हमे दिये हुए करार नामे कभी भूल नहीं सकता. हांजी वह हमसे बद्तमीज़ी नही कर सकता. उसने स्वयं कबूल किया था कि वह संस्कारसे मुस्लिम है. नहेरुने लियाकत अलीके साथ किये करारनामा (नहेरु-लियाकत अली करार) में लिखा था कि भारत स्थित मुस्लिमोंके अधिकारोंकी सुरक्षाके लिये अलग कानून बनायेंगे. लियाकत अलीने पाकिस्तान स्थित हिंदुओंके अधिकारोंकी सुरक्षाके लिये अलग कानून नहीं बनाये, तो क्या हुआ? काफिरोंको दी हुई शपथको निभाना हमारे इस्लाममें अपराध है ऐसा हमारे मौलवीयोंका फरमान है.   

८     ; मुस्लिम लोग बोलते है; “वक्फ बील संशोधन रद करनेकी मोदी तो क्या, योगीकी भी ताकत नहीं है. अरे हमारे राहुल भैयाने क्या बोला है, मालुम है? ‘हमने केरोसीन छीडकके रक्खा है. बस दियासलाई लगाना बाकी है.’ समज़े न इसका मतलब क्या है? हमने कश्मिरमें हिंदुओंका क्या हाल किया था मालुम है न? क्या १९८९/९० या उसके बाद भी, ‘मी लोर्डोमें’से कोई भी ‘माँ का लाल’ निकला जो उसमें स्वयं संज्ञान (सुओ मोट्टो) लें? स्वयं संज्ञान तो क्या, केस हाथमें लेनेसे भी उसकी पतलून गीली होती थी. ये ‘मी लोर्डज़’ केस लेनेके लिये  तयार ही नहीं थे.

९, १० “अय कुफ्रके बच्चें !!!  याद रक्खो, कि वक्फ कानून तो हमारे लिये मालपानी है. आवश्यकता पडने पर हम हरेक राज्यमें कश्मिर जैसा हाल करेंगे. हमसे बुरा कोई पैदा नहीं हुआ. हमारे कुछ मुस्लिम भाई मरेंगे, लेकिन वे तो अल्लाह वाले जन्नतमें जानेके लिये तयार है. हम लोग भी, वैसे तो भारतके जन्नतमें है.

मी लोर्ड उवाचः “हिंदु मंदिरोको मिला हुआ दान का उपयोग मुस्लिमोंके लिये हो सकता है. चाहे हिंदुओंका देनेका हेतु कुछ भी हो. यदि हिंदुने सुवर्ण खरीदनेके हेतु १०००००/- रुपये दिये हो तो दुकानवाला मुस्लिम सुवर्ण ही देनेके लिये बाध्य नहीं है.” बस ऐसा ही समज़ लो.

शिरीष मोहनलाल दवे

चमत्कृतिः

बाबर उवाच; “यदि पृथ्वि पर कहीं जन्नत है तो वह … यहीं है … यहीं है … यहीं है … यहीं है … यहीं है …  

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Can you say that this is not possible from the end-of “Me – Lord/s”?

Recall the case of Indira Ghandi’s withdrawal of 60 lakhs Rupees Cash from SBI. This case is known as Nagarwala – SCAM. Nagarwala was a security officer of Indira Ghandi.

Before we talk on the Nagarawala Scam (of Indira Ghandi), let us discuss to a point/s, related with the SPEED of  xxx … on the earth.

1       A speed of an aged persons walks slowly,

2       Faster to it, is to walk fast or run fast by a healthy person,

3       Faster to it, is a Horse of a race,

4       Faster to it is a Local train,

5       Faster to it is an Express Train,

6       Faster to it is a Supper Fast Train,

7       Faster to it is a Bullet Train,

8       Faster to it is Bullet itself.

Then O !!! Common men, what about the judiciary on a case.

9       Can we take MP MLA court, as the fastest? Yes. Off course. It is supposed to be.

10      But what is about SUO MOTTO case? Yes it is faster.

11      But what is about in a case which is neither related with a SUO MOTTO nor a case filed by a MP MLA? It would be snail mail.

12      What is about a case with no name of a MP MLA mentioned? God knows.

One Version out of a thousand versions.   

Indira Ghandi made a phone call to a Branch Manager of SBI, that her man is coming to the Branch to withdraw some CASH from (or her / party’s) Currency Chest Account i.e. Currency Chest?

Nagarwala went to the SBI Branch. He got identified by the Bank authorities.

Nagarwala collected Cash worth 60 lakhs rupees. Manager/Cashier ask for the receipt. Nagarwala said this was the secret money and to be used in relation with Bangladesh activities. The Manager should collect the receipt from Indira Ghandi-Nehru.

(It is said that Nagarwala had to give this Cash to Sanjay Gandhi at some place (say Connaught Place). At the handing over the brief case, the brief case gets fallen down and the money bundles scattered down on the foot path. Sanjay Gandhi ran away immediately without collecting the suit case. A lot people saw Nagarwala collecting money. Hardly few people saw Sanjay Gandhi.

The manager went to Indira’s place and asked for the receipt. Indira showed her unawareness. (Because the incident of falling down of the briefcase had been conveyed to her by Sanjay Gandhi).

The Manager immediately lodged a police complaint. The police registered the complaint. The Police caught hold of the criminal viz. Nagarwala. The statements of all the persons involved was taken except Sanjay Ghandi, Indira Ghandi. The charges were framed. The case was prepared and filed. The court registered the Case. The Hearing was carried out by the Court. Court gave the judgement. Punishment of prison was imposed on Nagarwala. God knows whether an opportunity was given to Nagarwala to engage a lawyer or not. WHOLE PROCESS FINISHED ON THE SAME DAY. i.e. LESS THAN ONE DAY.

The quickest disposal of this case, can be written in Guinness Book of the World Records.

Most surprising point is that, Indira was not called to give her statement before the court, though on Indira’s phonic instructions the Manager has allowed Nagarwala to collect the CASH.

There are many EXPRESS DELIVERY cases. We have come across such cases where even the SC was opened up at midnight. But this had been happen to grant the bail to an activist lady, and not to hear a case and give a final order.

As for the Nagarawala Scam case, the judgement was a “Bullet delivery”. WOW.

Has the HC/SC CJs taken SUO MOTTO when Sonia Gandhi voted 3 months before she became the citizen of India?

Is this not a matter of research?

No. It is not a matter of research, because when Indira Ghandi had not been called for giving her statement before the lower court, then how we can expect SC/HC to take SUO MOTTO in the (Nagarwala-Indira Ghandi)’s case.

People having public interest should know that Nagarwala died in Jail. One more political death in Nehru/vian’s rule period.

Shirish Mohanlal Dave

Miracle (चमत्कृति);

Possible (!!!)

Me Lord: Who is this person?

Gov. Agency: The person is an infiltrator.

Me Lord; How do you say, this person is a Muslim infiltrator?

Gov. Agency; The person does not have valid Electoral Personal Identity Card of our country.

Me Lord; That does not mean that the person is non-citizen. Have you found out that the person has the citizenship of which Country?

Gov. Agency; Yes Sir. We have recovered an identity card from the person. This indicates that the person belongs to Bangladesh.

Me Lord; But how do you say that the Identity Card of the person is not a fake one?

Gov. Agency: Yes Sir. We have got the person’s Passport where the person’s photo tellies biometrically to the voter’s card, besides the person’s residential.

Me Lord; But you are not the authority to say that the I-card or passport are fake one. This must be examined by our Government, through Bangladesh Government.

Gov. Agency; Me Lord, it is very difficult to get reply from Bangladesh Government.

Me Lord; But you should try for that. First you try … then we will look into the case.

After 5 years.

Gov. Agency; Sir, we got reply from the Government of Bangladesh. They have confirmed with this letter.

Me Lord; Who has signed this letter?

Gov. Agency; The Secretary of Home Department.

Me Lord; Call him here. He should say that this has letter has been signed by him and this signature is his signature only.

Gov. Agency; Sir, had you asked parents of SUKANYA to produce their Aadhar Cards?

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काश !! हमारे पूर्वज नहेरु/वीयन्स जैसे होते …

जनता; “अरे भाई सा’ब, आप कौन है?

सियासती गेंग; “अरे आप, हमें पहेचानते नहीं ?…  हम आंदोलनकारी है. हम जब भी सुयोग्य मौका मिलता है तो सरकारके सामने आंदोलन पर उतर आते है …

जनता; “लेकिन आप है कौन यह तो बताओ …

सियासती गेंग; “हमें चाहे आप स्वार्थी कहो, गद्दार कहो या गद्दार जैसी हरकत पैदा करने वाले कहो …. हम तो हम है … हम एक नहीं है … हम अनेक है …  मतलब,  हम अनेक गेंग है.

जनता; “गेंगका मतलब तो यह हुआ कि आपके समूहमें आंतरिक मतभेद हो सकते है, किंतु एक सुनिश्चित ध्येय प्राप्तिमें आप एक है …

सियासती गेंग; “ जी हाँ, जैसे कि … हमें चाहिये आरक्षण … आरक्षण हमारा ध्येय है … और उसमें हमारा समूह एक मत है …

जनता; “आपका समूह ? आपका समूह से क्या मतलब है?

सियासती गेंग; “ समूहसे तात्पर्य है जाति, ज्ञाति …

जनता; “जाति? अरे हम सब तो मनुष्य जाति के है !! आप स्वयंको मनुष्येतर क्यूँ समज़ते हो?

सियासती गेंग; “अरे चलो …  समज़ लो ज्ञाति … हम मानव समाजमें इतने पीछडे रह गये है कि हमारी स्थिति पशुजातिसे भी बदतर हो गयी है …“

जनता; “लेकिन पीछडी ज्ञातियोंके लिये तो आरक्षण है ही …. तो इससे अधिक  और क्या चाहिये?

सियासती गेंग; “अरे!! हम हरिजन (अस्पृश्य, भंगी) थोडे है !! ?

जनता; “ तो क्या है आप ? क्या वनवासी, या पर्वतवासी है ?

सियासती गेंग; “नहीं तो ! क्या आरक्षण के लिये अस्पृश्य, वनवासी, पर्वत वासी होना आवश्यक थोडा है? हम वे है जो पीछडे रह गये. हाँ जी हम वे है.

जनता; “तो आप लोग कौन कौन है?

सियासती गेंग; “हम कुशवाहा है, हम यादव है, हम मौर्य, हम मराठा है, हम पटेल है, हम लिंगायत है …,

जनता; “रुको … रुको … रुको … आप भगवान रामवाले कुश के वंशज है. मतलब कि आप भगवान रामके वंशज है. अरे भैया, राम तो बडे पराक्रमी राजा ही नहीं … सिध्धांत प्रिय और एक वचनी राजा थे. राजा राम तो जनतंत्र वादी थे. वे जनतंत्रमें विश्वास रखते थे. वे समज़ थे कि शासन की प्रणालीयां तो ॠषी लोग ही सुनिश्चित कर सकते थे. राजाका अधिकार केवल उसका पालन करना ही है. क्यों कि वे जानते है कि राजाके पास नियम बनानेका अधिकार रहेगा तो वह स्वार्थी बन जायेगा, और वह जनताके साथ आततायी जैसा व्यवहार करेगा. आप सबने देखा ही है कि नहेरुवीयनोंने और खास करके इंदिरा घान्डीने आपातकालमें क्या किया था. भारतकी जनता आज भी राम-राज्य चाहती है. भारतकी जनताके कारण ही भारतमें जनतंत्र कायम है. क्यों कि सनातन धर्म मानने वालोंके हार्द में ही जनतंत्र है. रामके पूत्र लव और कुशने भी सीताकी पवित्रता सिध्ध करने के लिये जनजागृतिका अभियान चलाया था. आपने रामराज्यका फिलम तो देखा ही होगा. और यह गीत भी सूना होगा ‘भारतकी एक सन्नारीकी कथा सुनाते है … ‘ आप तो जनतंत्रकी अवमानना करते है. आप कह दो न … कि हमारे पूर्वज मूर्ख थे … मूढ थे … वे आर्षदृष्टा नहीं थे,  मतलब कि दूरदर्शी नहीं थे  जिन्होंने अपने वंशजोके लिये कोई भी पूर्व व्यवस्था नहीं की … वे धूर्त और दंभी थे …  आप बस इतना बोल दो … .      

जनता; “ आप कौन है?

सियासती गेंगः “हम यादव है …

जनता; “रुको … रुको … रुको … यादव तो वे थे जिनके वंशमें भगवान कृष्ण हुए! जिनकी ध्वज-पताका विश्वके हर समूद्र तटके व्यापारी बंदरों तक फहरती थी. और यह कृष्ण ईतने ज्ञानी थे कि उन्होने विश्वका महान तत्वज्ञानसे भरपुर ग्रंथ गीता लिखा था. यही कृष्ण जो बडे योगी भी थे कि उन्होने ईश्वरका साक्षात्कार किया था. जनता आज भी उनको स्वयं विष्णु (सूर्य)का अवतार यानी कि भगवान मानती है. वे अनन्य और अपराजित थे. क्या आप उनके वंशज है?

सियासती गेंग; “हाँ जी, हम वही यादव है .. ! .. !

जनता; “तब तो आप उनकी निंदा कर रहे है और स्वयं की भी निंदा कर रहे है. आप कह दो न … कि वे मूर्ख थे मूढ थे … वे आर्षदृष्टा नहीं थे,  मतलब कि दूरदर्शी नहीं थे  जिन्होंने अपने वंशजोके लिये कोई भी पूर्व व्यवस्था नहीं की … वे धूर्त थे …  आप बस इतना बोल दो … . और आप कौन है?

सियासती गेंग; “हम तो मौर्य है … !!!

जनता; “क्या आप वही चंद्रगुप्त मौर्यके वंशज है जिन्होंने नंद साम्राट धननंदको हराया था. यह वही धननंद था जिसकी सेना की विशालता देखकर, विश्व विजेता एलेकझांडर (अलक्ष्येंद्र यानी सिकंदर)  को और उसके सेनानीओंको अपनी नानी याद गयी थी, और यह विश्व विजेता, बिना लडे ही अपनी नानीके पास चला गया था.   आप कह दो न … कि वे मूर्ख थे मूढ थे … वे आर्षदृष्टा नहीं थे,  मतलब कि दूरदर्शी नहीं थे  जिन्होंने अपने वंशजोके लिये कोई भी पूर्व व्यवस्था नहीं की … वे धूर्त थे.  आप बस इतना बोल दो … . और आप कौन है?

सियासती गेंग; “हम मराठा है … !!!

जनता; “अरे वाह आप तो एक महा योध्धा शिवाजी महाराज के वंशज है. हमारे टीचर हमे कहेते थे कि औरंगज़ेब अपने संडासमें शिवाजी महाराजका चित्र रखता था ताकि जिससे उसका जल्दी ही “मोशन (मलोत्सर्जन)” हो जाय. अरे भाया हमारा दिल मानता नहीं है कि आप ऐसे महान योध्धा शिवाजी महाराज जिसने औरंगज़ेब जिसके कालखंडमें   मोगलोंका साम्राज्य सबसे अधिक विस्तीर्ण था, उसको तहस नहस कर दिया था. बस आप यही बोल दो …  आप कह दो … कि शिवाजी महाराज मूर्ख थे मूढ थे … वे आर्षदृष्टा नहीं थे,  मतलब कि दूरदर्शी नहीं थे  जिन्होंने अपने वंशजोके लिये कोई भी पूर्व व्यवस्था नहीं की … वे  धूर्त थे.   आप बस इतना बोल दो … . और आप कौन है?

सियासती गेंग; “ हम पटेल है … मतलब की पाटीदार है … !!!

जनता; “ओह ! आई सी, पहेचान गया.  आप वही पटेल, मतलब सरदार पटेलकी ज्ञातिके है जिन्होने ५५०+ ब्रीटीश साम्राज्यके देशी राजाओंको अपनी अक्ल से मनाके स्वतंत्र भारतमें विलय करवा दिया था. यदि अंतरीम समयके लिये बनाये गये प्रधान मंत्री के स्थान पर सरदार पटेल होते कश्मिर-देशी राज्यका पूरा हिस्सा भी स्वतंत्र भारतमें होता. उतना ही नहीं पख्तूनिस्तान, बलुचिस्तान भी भारतका हिस्सा होता. अरे भाया, चर्चीलने तो कहा था कि ये हिंदु लोग तो इतने विभक्त, मानसिकता वाले है कि वे ५०० सालमें भी इन ५५०+ देशी राज्योंका भारतमें विलय नहीं कर पायेंगे. लेकिन उस चर्चीलको इस सरदारने गलत सिध्ध कर दिया. केवल कुछही महिनोंमें ५५०+ देशीराज्योंका विलय भारतमें कर दिया.  क्या आप इस सरदार वल्लभभाई पटेल की ज्ञातिके हो !! कमाल है !!! आज उद्योगपतियोंमें बनियोंके बाद पटेलोंका नाम आता है. सरदार वल्लभभाई पटेल तो सांप्रतकालमें ही हुए. आपको तो क्या पुरे भारतको सरदार पटेल पर गर्व है. और आप उनको मूर्ख थे मूढ थे … वे आर्षदृष्टा नहीं थे,  मतलब कि दूरदर्शी नहीं थे  जिन्होंने अपने ज्ञातिके लिये कोई भी पूर्व व्यवस्था नहीं की … वे तो धूर्त थे … ब्ला ब्ला ब्ला.  आप बस इतना ही बोल दो … . आप कौन है?

सियासती गेंग; “हम तो लिंगायत है … !! हमें तो नहेरुवीयन कोंग्रेसने हम अलग धर्म वाले है और हमारे लिंगायतको एक अलग धर्म की मान्यता देनेका आश्वासन दिया था ताकि हम पर हिंदु-कोड बील लागु न हो. हमारे मंदिरोंकी आय पर केवल हमारा ही अधिकार रहे.

जनता; “लिंगायत से क्या मतलब है ?

सियासती गेंग; “हम शिव लिंग को गलेमें पहनके ही रखते है.

जनता; “अरे भाया, अगर हिंदु धर्ममेंसे शिवजी को ही निकाल दोगे तो बचेगा क्या? हिंदु धर्मकी पहेचान ही तो शिवसे है, शिव तो अनंत ब्रह्माण्डोके स्वामी है. अरे वे ही तो विश्वमूर्ति, विश्वात्मा, परमात्मा है. अग्नि – शक्ति – उर्जा – चेतना स्वरुप है. एक ओर आप शिवजीको गलेकी माला में रखते हो और दुसरी ओर आप स्वयं को सनातन धर्मसे भीन्न मानते हो. अब तो हमें लगता है कि   आप ही मूर्ख है … आप ही लघुदृष्टा है.  आप बस इतना बोल दो कि हम गद्दार है.

बात खतम.

सियासती गेंग; “हे भगवान … हे ईश्वर … हमारा भारत में यदि जनता सनातनीस्ट नहीं होती … तो … नहेरुवीयन लोग, मोदी योगी को पैदा ही नहीं होने देते … 

खबरदार

शिरीष मोहनलाल दवे

चमत्कृतिः

“ज्यां जोइए त्यां कूडे कूड, सामे सामां बेठां घूड;

कोई आवी वात सूरजनी करे, ते आगळ जई चांच ज धरे;

अमारे हजार वर्ष अंधारे गयां, तमे आवा डाह्या क्यांथी थया;

अखा मोटनी तो एवी जाण, मूकी हिरो उपाड्यो पाण.” अर्वाचिन कालके गुजराती कवि “अखो”

જ્યાં જોઇએ ત્યાં કૂડેકૂડ, સામે સામાં બેઠાં ઘૂડ;
કોઇ આવી વાત સૂરજની કરે, તે આગળ જઇ ચાંચજ ધરે;
અમારે હજાર વર્ષ અંધારે ગયાં, તમે આવા ડાહ્યા ક્યાંથી થયા;
અખા મોટાની તો એવી જાણ, મૂકી હીરો ઉપાડ્યો પાણ. 

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