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Archive for June, 2024

आपात् कालकी कुछ सूनी – अनसूनी बातें – ५

आपात्काल किसकी समस्या है?

विनोबा भावे ने बोला कि यदि देशके उपर बडी समस्याएं है तो वह समस्या केवल प्रधान मंत्रीकी नहीं है. जो भी समस्याएं है वे हरेक देशवासी की है. इस स्मस्याओंको कैसे हल किया जाय उसके लिये देशके विभीन्न क्षेत्रोंके ज्ञानी लोगोंको ईकठ्ठा होना पडेगा और सर्वसंमतिसे निर्णय लेना पडेगा.

“आपात्काल अनुशासन पर्व है”का घटस्फोट

शासन और अनुशासनके बीचका अंतर क्या है?

आपात्काल में अनुशासन होना चाहिये. अनुशासन से मतलब है आचार्यों द्वारा सूचित शासन. मतलबकी अहिंसक शासन. आचार्योंका शासन अनुशासन कहेलाता है, जिसमें जनता अपने आप समज़से अपनेको नियंत्रित करती है. सरकारका (शासकका) शासन, शासन होता है जो दंड द्वारा चलता है और वह हिंसक है.

आपात्कालकी समय सीमा क्या है?   

हम आपात्काल अनियत कालके लिये चालु नहीं रख सकते. आपात्काल की समय सीमा सुनिश्चित करनी पडेगी.

आपात्कालके कारावासीयोंको शीघ्र ही मूक्त करो.

जिनको भी आपात्कालके अंतर्गत बंदी बनाया है, उनको तूर्त ही मूक्त करना है.

इस प्रकारका प्रस्ताव आचार्य संमेलनने पास किया.

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चमत्कृतिः

सत्संगकी महिमा

शिक्षापत्री की एक कथा

एक बार नारदमूनीने भगवान विष्णुसे पूछा, कि हे भगवन् सब लोग हर समय “सत्संग करना चाहिये … सत्संग करना चाहिये …. ऐसा बोला करते है” तो हे भगवन् ये सत्संगकी महिमा क्या है.

विष्णु भगवानने कहा, हे नारद, आप फलां वनमें फलां वटवृक्षकी फलां डाली पर फलां पर्ण पर एक कीटक है उसको पूछो कि सत्संगकी महिमा क्या है?

नारदजी तो गये वहां. उस कीटकसे पूछा कि हे कीटक, सत्संग की महिमा क्या है?

तो कीटक तो सूनते ही मर गया.

नारदजी वापस भगवानके पास गये और पूछा कि भगवन् वह कीटक तो मर गया. अब आप बताओ कि सत्संगकी महिमा क्या है?

बछडा

भगवानने बोला फलां गाँवमें एक कृषके घर जाओ, उसकी एक गाय ने बछडेको जन्म दिया है. आप वहां जाके उस बछडेको पूछो कि सत्संग की महिमा क्या है.

नारदजी उस गांव गये और कृषकके घर गये और उस बछडेके पास जा कर उन्होंने उससे पूछा कि हे वत्स, सत्संगकी महिमा क्या है?

ऐसा पूछते ही वह बछडा मर गया.

नारदजी तो दौडके वहांसे भाग निकले. और भगवानको सारी घटना सूनाई.

नगरशेठ

भगवानने कहा, नारद जी, जब आपने ठान ही लिया है कि सत्संगकी महिमा को जानना है तो आप फलां शहरमें एक नगरशेठ है, उनके घर एक लडका जन्मा है. आप उससे पूछो कि सत्संगकी महिमा क्या है?

नारदजी तो उस शहर को गये और नगर शेठको मिले, नगरशेठने उनकी बडी आगता स्वागता की, फिर आनेका प्रयोजन पूछा. नारदजीने उनके वहां नवजात शिशुको देखनेकी ईच्छा प्रकट की. नगर शेठ नारदजीको वहाँ ले गये. नारदजीने उस बच्चे को पूछा कि सत्संगकी महिमा क्या है. इस को सूनते ही बच्चा मर गया. नारदजी तो जान बचाकर भागे.

नारदजी भगवानके पास गये, और बोले हे भगवन् आप मुज़पर क्यों नाराज है. फिर नारदजीने पूरी घटनाका विवरण किया.

नारदजी आप हिमत रक्खो

विष्णु भगवानने बोला, ऐसा कुछ नहीं है. लेकिन नारदजी आप हिमत रक्खो. आप फलां देशमें उसके राजा यहां, पूत्ररत्न ने जन्म लिया है. उस पुत्र को आप पूछो कि सत्संगका महिमा क्या है.

राजकुमार

नारदजी उस राजाके पास गये. और कुंवरको देखने की इच्छा व्यक्त की. राजा, नारदजीको कुंवरके पास ले गया. नारदजीने उस पुत्रको पूछा कि सत्संगकी महिमा क्या है. ऐसा प्रश्न सूनते ही कुंवर बेहोश हो के मर गया. फिरसे नारदजी जान बचाकर भागे.

नारदजी भगवान विष्णुके पास पहूँचे और उन्होंने भगवानको थोडा डाँटा भी. भगवान हंसकर बोले, अरे नारदजी सज्ज्न वही है जो प्रश्न का उत्तर प्राप्त करके ही संतोष प्राप्त करता है. आप अब स्वर्ग लोकमें जाओ और इंद्रसे ही पूछो कि सत्संगकी महिमा क्या है.

नारदजी देवराज ईंद्रके पास गये. नारदजीने देवराज इंद्रसे कहा कि यदि मुज़े पता होता कि आपको मेरे प्रश्नका उत्तर मालुम है, तो मैं सीधा आपके पास ही आता. लेकिन भगवानने क्या पता किस कारण मुज़े पृथ्वीपर बार बार भेजा. अब हे देवराज, आप की कहो कि सत्संगकी महिमा क्या है.

देवराज इंद्रने बोला “क्या नारदजी आप मुज़े ही बार बार एक ही सवाल पूछते हो कि सत्संगकी महिमा क्या है. अरे मूनि राज आपके सत्संगसे ही तो मैं एक कीटकसे इंद्रके स्तर पर पहूँचा हूँ. यही तो सत्संगकी महिमा है.

फिर नारदजी विष्णु भगवान के पास आ गये. और उनको थेंक्यु कहा.

फिर नारदजीने सोचा कि सत्संगकी महिमा तो मैंने जाना, लेकिन कुसंगकी महिमा भी तो जानना आवश्यक है.

कुसंगकी महिमा

नारदजीने भगवान विष्णुसे पूछा कि हे भगवन् आपने मुज़े सत्संगकी महिमा तो अवगत कराई, लेकिन अब मुज़े यह भी बताओ कि कुसंगकी महिमा क्या है?

भारतदेशमें जाओ

भगवानने बोला कि हे नारदजी इस समय भारत देशमें इ.शा. १९५० – ६० का दशक चल रहा है. आप यशवंत राव चवाण और बाबु जगजिवनराम, इन दोनोंका पता लगाओ कि जनतामें उनके बारेमें क्या अभिप्राय है?

नारदजी तो गये भारतवर्षमें. जनताको पूछा कि यशवंतराव चवाण कौन है और कैसे है? जनतने बोला कि अरे वह तो हमारे शूरवीर नेता है. हमारे लिये तो वे शिवाजी – २ है. जय हो शिवाजी महाराज – २.

फिर नारदजीने पूछा कि जगजीवनराम कौन है. जनताने बोला, अरे ये तो हमारे दलितोंके महान नेता है. निडर और शूरवीर. वे तो अंग्रेजोंके जमानेमें अंग्रेजोंकी बंदूककी गोलीयोंसे भी डरते नहीं थे. वे तो सीना तानके खडे रहेते थी. हम दलितोंके ही नेता नहीं है, वे तो हम सब भारतवासीयोंके भी सर्वस्विकृत नेता है.

फिर नारदजी विष्णु बगवानके पास आये. और अपना रीपोर्ट दिया.

विष्णु भगवानने नारदजीको बोला कि अब भारतमें १९७६ की साल चल रही है. अब आप वहाँ जाके इन्ही दो नेताओंके बारे में पता लगाओ कि जनता उनके बारेमें क्या कहेती है?

नारदजी भारत आये. और जनतासे पूछा कि यशवंत राव चवाण कैसे है, जनताने जवाब दिया, उसकी बात ही मत करो. हमने तो उसको समज़ा था शिवाजी – २. लेकिन वह तो शेरके बदले निकला शृगाल. डरपोक कहींका. जब देशको आपात्कालमें अपनी शूरवीरता दिखानेकी आवाश्यकता थी तो वह  तो इंदिराकी गोदमें बैठ गया. डरपोक कहींका …

फिर नारदजीने जगजीवनराम के बारेमें पूछा. तो जनताने बोला … उसकी बात ही मत करो. वह तो पहेले ऐसा था कि अंग्रेजोंकी बंदूकसे नहीं डरता था, लेकिन वह तो इंदिराकी लाल आँखसे डर गया. और उसकी गोदमें बैठ गया. ऐसा कोई नेता होता है!!

फिर नारदजी विष्णु भगवानके पास गये. तो विष्णु भगवानने बोला क्या नारदजी, अब तो पता चल गया कि कुसंगकी महिमा क्या होती है.?

हाँ भगवन्, सत्संगसे छोटा आदमी भी महान इंद्र समान बन जाता है, और (इंदिरा जैसेका) कुसंग करनेसे महान व्यक्तिभी छोटा और निकम्मा बन जाता है.

विष्णु भगावनने बोला ऐसे कुसंगवाले तो तुम्हे भारतमें बहूत ही मिल जायेगे जो अपने स्वार्थके कारण अंधे होकर कुसंग करते है और स्वयंको अविश्वसनीयता और अनादरके पात्र बनाते है.

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आपात् कालकी कुछ सूनी – अनसूनी बातें – ४

आपात्काल विफल होनेकी कगार पर

आपात्काल के एक साल व्यतित होने पर, आपात्काल विफल होनेकी कगार पर आ गया था. भयके कारण वस्तुओंके दाम जो गीर गये थे, वे सब अब बढने लगे थे. रेल्वे ट्रेनें जो शरुआतमें समय पर चलने लगी थीं, वह अब लेट होने लगी थी.

इंदिरा गांधी विदेशोमें बदनाम हो रही थी. इसका अब इंदिरा गांधीको पता लगने लगा था.

वर्तमान पत्रोंमें सरकार समाचार छपवाती थी कि कुछ नेताओंको एक एक करके कारावाससे छोडा जायेगा. किसको कब छोडा जायेगा वह जनताको पता चलने नहीं दिया जायेगा. उतना ही नहीं उसका स्वागत “हिरो”-जैसा न हो उसका भी पूरा ध्यान रक्खा जायेगा.

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विनोबा भावे सक्रीय नहीं बने

विनोबा भावे इस लिये सक्रीय नहीं बने क्योंकि उनको पता था कि इंदिरा गांधी उतनी सक्षम नहीं कि वह सुचारु रुपसे लंबे समय तक शासान चला सके. क्यों कि उसमें वहीवटी क्षमता नहीं थी. न तो उसके पास आर्ष दृष्टि थी कि  वह लंबा सोच सकें. सिमला समज़ौताके अंतर्गत ही उसको समज़ना आसान हो गया था कि आम  स्त्रैण सीमा से वह परे नहीं थीं. विनोबा भावेने सोचा होगा कि यदि वह सचमुच “पूर्ण पागल” बनजाय तो उसको समज़ानेके लिये कोई न कोई तो होना चाहिये जो उसको सच बता सके.

आचार्य संमेलन

विनोबा भावेने अपने आश्रम ग्राम, पवनारमें (महाराष्ट्रमें) आचार्य संमेलन बुलाया. आचार्य संमेलनमें सबको आने की छूट थी. “आचार्य”से मतलब है, जो स्वयंको विचारक, अन्वेषक, तत्त्वज्ञानी, शिक्षक … मानते है वे सब लोग.

आचार्य संमेलनमें जाने से, वैसे तो कई लोग डर रहे थे. लेकिन विनोबा भावेका एजंडा साफ था कि यह आपात्कालके विषयमें है. विनोबा भावे ने बोला, “किसीको डरनेकी आवश्यकता नहीं है. सब लोग खूल कर बोल सकते है.” फिर भी लोग डर रहे थे.

“निर्भय बनो” असंविधानिक

आपात् कालमें जनता डर गयी थी तो लेकिन गुजरातमें तो बाबुभाई जशभाई पटेलकी सरकार थी.  गीरनेके बाद जनताकी तरफसे पोस्टर चीपकाये गये थे कि “निर्भय बनो”. बाबुभाई जशभाई पटेल बोलते थे कि भारतमें चाहे आपात्काल लगा हो, लेकिन गुजरातमें जनतंत्रके अधिकार चालु रहेंगे.

इंदिराका कमाल देखो

इंदिराका कमाल देखो. इंदिराई कोंग्रेसके नेतागण कोई न कोई फालतु मुद्दा लेके धरणा, प्रदर्शन, सरघस गुजरातमें करते रहेते. जबकी इंदिराई कोंग्रेस शासित राज्योंमे ये सब अनुशासनहीनता और अपराध माना जाता था, और उसका सरकारी प्रत्याघात केवल कारावासमें ठोस देना ही था.

वही इंदिरा नहेरु-गांधी के भक्त, गुजरातमें बाबुभाई जशभाई पटेल शासित सरकारके विरुध्ध आंदोलन करते थे. यही तो प्रदर्शित करता है कि इंदिराई कोंग्रेसके नेता गण कितने छीछोरे और निम्नस्तरकी मानसिकता रखते है. इन्ही इंदिराई कोंग्रेसने दलित लोगोंको यह कहकर उकसाया था कि, देखो ये सवर्ण लोग, जो आपको हजारों साल, आपात्काल की यातनाएं देते रहे, उनके उपर इंदिरा ने तो अभी अभी ही आपात्काल डाला, तो ये सवर्ण लोग कितने अस्वस्थ हो गये. आप दलितोंने तो हजारो साल आपके उपर का अत्याचार सहन किया. और ये सवर्ण जातिके थोडे ही लोगोंको जब करावासमें डाले, तो इंदिराकी घोर निंदा करने लगे.

वैसे दलितोंको सवर्णोंके विरुध्ध उकसानेका प्रचार तो इंदिरा गांधीने गुजरातमें नवनिर्माण आंदोलन के समय से चालु किया था. लेकिन आपात्काल को सवर्णोंसे जोडनेका काम इंदिराने १९७५से चालुकिया. “निडर बनों” वाले पोस्टर सभी जगहसे फाडनेका काम बाबुभाई जशभाई पटेलकी सरकार गीराने और तो प्रेसीडेंट रुलके के आते आते पूरा किया.

हिंदुओंमें विभाजन

वैसे तो गुजरातमें हिंदु – मुस्लिम के दंगे १९४८ तक आम बात थी. लेकिन १९४८के बाद वे मृतप्राय हो गये थे. नहेरुने अपने कोंग्रेस गुटको मजबुत करनेके लिये और मोरारजी देसाईके कोंग्रेस गुटको कमजोर करने के लिये बिना कोंग्रेसको तोडे अथाक प्रयत्न किया था. लेकिन नहेरु गुजरातमें हिंदु – मुस्लिम एकता को तोडनेमें असफल रहे. लेकिन इंदिरा गांधी, वह काम गुजरातमें अहमदाबादमें १९६९ के हिंदु – मुस्लिम दंगे करवाके गुजरातकी जनताको धर्मके आधार पर विभाजित करनेमें सफल रही,  और इंदिरा  गांधीने, १९७२के गुजरात विधान चूनावमें प्रचंड जीत प्राप्त की.

लेकिन नवनिर्माण आंदोलनके समर्थनमें कुछ युवा मुस्लिमओंने भी हिस्सा लिया था. इसलिये इंदिरा गांधीको लगा कि गुजरातकी जनताको विभाजित करने के लिये गुजरातकी जनताको हिंदु – मुस्लिम मे विभाजित करना पर्याप्त नहीं है. गुजरात की जनताको सवर्ण हिंदु – और दलित हिंदुमें विभाजित करना अति आवश्यक है.

गुजरातकी जनताको विभाजित करनेमें आपात्कालका लाभ, इंदिरा ने भरपूर उठाया.

इंदिरा गांधीने राजकीय प्रपंच करना अपने पितासे पर्याप्त रुपसे सिखा था. लेकिन इंदिरा शासकीय वहीवट करनेमें अपने पिता जैसी ही निर्बल एवं विफल रही थीं.

आपात्कालमें इंदिरा की कौनसी सेना कहां लड रही है वह उसको मालुम नहीं था. इस कारणसे आपात्काल फेल होनेकी कगारसे नज़दिक आ रहा था.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

चमत्कृतिः

रुसके साइबीरीयाके कारावासमें तीन कैदी संयोगवश मिल गये.

एक कैदीने दुसरेको पूछा कि तुमको किस गुनाहके कारण जैलमें डाला गया है?

दुसरे कैदीने बोला मैं “कोमरेड पोपोविच”की निंदा करता था, इस लिये मुज़े जैलमें डाला है. फिर यह कैदीने पहेले कैदीसे पूछा “तुम्हे किस गुनाहके कारण जैलमें डाला गया है?

पहेले कैदीने बोला मैं  कोमरेड पोपोविचको सपोर्ट कर रहा था इसलिये मुज़े जैलमें डाला गया है.

फिर ये दोनों कैदीने तीसरे कैदीसे पूछा कि तुम्हे क्यों जैलमें डाला गया है?

तो तीसरे कैदीने बोला “मैं पोपोविच हूँ.”

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आपात् कालकी कुछ सूनी – अनसूनी बातें – ३

मोरारजी देसाई

मोरारजी देसाई को कारावासके एक १२’ * १२’ के कमरेमें रक्खा था. बाहरसे उनका कमरा बंद किया जाता था.  मोरारजी देसाईको वर्तमान पत्र पढनेकी भी छूट नहीं थी. मोरारजी देसाईने इन पाबंदीयोंके विरुध्ध अनशन करनेकी धमकी दी, तो फिर उनको वर्तमान पत्र मिलने लगा और बाहरसे दरवाजे पर ताला लगाना भी बंद किया.

मोरारजी देसाई हमेशा कुछ किलोमीटर चलनेका व्यायाम और योगासन करते थे. वे अपने १२’ * १२’ के रुममें अपनी ३’ * ६.५’ खटीयाका चक्कर लगाकर अपना चलनेका व्यायाम पूरा करते थे.

मोरारजी देसाई ने ठान लिया था कि कारावासमें वे केवल फलाहार ही करेंगे, ताकि इंदिरा गांधीकी सरकार भोजनमें कुछ गडबड न कर सकें. फलमें यदि विष डालो तो फल हमेशा जवाब दे ही देता है.

वर्तमान पत्रोंमें समाचार दिया जाता था कि “एक वयोवृध्ध नेता के खानेके लिये हररोज २०कीलो ग्राम के फल लाने पडते है क्यों कि यह नेता फलके सिवा कुछ भी खाता नहीं है. वह अपनी जीद पर अडा है.

[समय आने पर मोरारजी देसाईने पूछने पर बताया कि यदि कोई २०कीलो फल खाय तो मर ही जायेगा.]

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अटल बिहारी बाजपाई

अटल बिहारी बाजपाई को गलत इंजेक्सन दे दिया गया था. इनके कारण अटल बिहारी बाजपायीकी  करोड राज्जुकी हालत बिगड गयी थी. जो उनको जिंदगी तक भूगतना पडा.

अरे इंदिरा कोंग्रीसमें भी एक बाजपाई है. राजेंद्र कुमारी (!!) बाजपाई. वह तो कोंग्रेसी होनेके नाते हमेशा कोंग्रेसके (इंदिरा गांधीके पक्षमें ही बोलती थीं. तो राजेंद्र कुमारी बाजपाई के स्थान पर केवल बाजपाई लिखके, उसके कथन प्रकाशित होते थी. इसलिये आम जनता समजती थी के ये सब अटल बिहारी बाजपाई बोल रहे थे.

ऐसी तो बहूत सी बातें है आपात्कालकी.

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रविशंकर महाराज

आपात्काल के अंतर्गत सर्वोदय कार्यकरोंमेंसे जो सक्रीय थे उनको कारावासमें ठोस दिये थे. गुजरातके रविशंकर महाराज को गिरफ्तार रखने कि साज़िस रची गयी थी. लेकिन यशवंत राव चवाणने इंदिराको समज़ाया कि उनको न पकडे क्यूंकि वे तो ९४ सालके है और वे काफि वृध्ध है. उनको गिरफ्तार करना ठीक नहीं रहेगा.

इंदिरा गांधी एक समय विनोबा भावे को भी गिरफ्तार करनेका प्लान बना रही थी.

विनोबा भावे भी महात्मा गांधीकी तरह अर्धनग्न फकीर थे मतलब कम वस्त्र पहेनते थे.

एक विदेशी महिलाको सुबह सुबह उनको मिलनेके लिये भेजा. इस विदेशी महिला को शायद पता था या नहीं था कि विनोबा भावे तो अर्ध नग्न फकिर थे. यदि उस विदेशी महिलाको पता था तो उसको एक नाटक करना था कि जब यह अर्धनग्न फकीर अपने बाथरुममेंसे केवल धोती पहनके निकले तब उस महिलाको शोर मचा देना कि, विनोबा भावे उस विदेशी महिला पर दुष्कर्म करनेको आ रहे थे. फिर इस महिलाकी फरियाद पर विनोबा भावेको गिरफ्तार करके कारावासमें डाल देनेका.

लेकिन यशवंत राव चवाणने इंदिरा सरकारको विनोबा भावेको गिरफ्तार करनेसे रोका.

इस विनोबा भावेने आपात्काल लगने पर “आपात्काल एक अनुशासन पर्व है” ऐसी प्रतिक्रिया दी थी. और इस कथनके पोस्टर हर जगह पर चिपकाये थे. और इसका अर्थघटन ऐसा किया गया था कि आपात्कालमें सबको अनुशासनमें (डीसीप्लीनमें) रहेना है. विनोबा भावेका स्पष्टीकरण दिया था या नहीं  उसका किसीको पता नही है. लेकिन यदि देते तो भी उसके उपर सेंसर शीप लग जाती.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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आपात् कालकी कुछ सूनी – अनसूनी बातें – २

आपत्कालके समय इन्दिरा गांधी डरी डरीसी रहती थीं. रातको सोती थी तो थोडी भी कहींसे आवाज़ आती तो वह डर जाती थीं. संजय गांधी की आवाज़ इन्दिरा गांधीका अधिकृत आवाज़ माना जाता था. सभी आदेश जबानी होते थे. और उसको मानना पडता था.

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इन्दिरा गांधीको जयप्रकाश नारायण दुश्मन नंबर वन लगते थे. उनकी गिरफ्तारीके दुसरे दिन उनको शहरमें बंद कारमें घुमाया और बताया कि देखो शहरमें कैसी शांति है, और लोगोंने आप लोगोंकी गिरफ्तारीका विरोध तक नहीं किया. सब कुछ सामान्य है.

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बिमार जयप्रकाश नारायण

जयप्रकाश नारायणका स्वास्थ्य पहेलेसे ही नरम गरम रहेता था. उनकी चिकित्सा चल रही थी. जब उनको गिरफ्तार किया तब भी जयप्रकाश नारायण की तबियत ठीक नहीं थी.

इन्दिरा गांधीने गिरफ्तारीके समय जयप्रकाश नारायणका, मेडीकल चेक अप तक नहीं करवाया. वास्तवमें ऐसा करना कायदेसे अनिवार्य था. जयप्रकाश नारायणके लिये भोजनमें क्या क्या चीजे दी जा सकती है और क्या क्या नहीं दी जा सकती उसका रीपोर्ट भी मंगवानेकी इन्दिराने परवाह तक नहीं की थी. इंदिरा सरकार ने जयप्रकाश नारायणके डॉक्टरका संपर्क तक नहीं किया था. उस समय, जयप्रकाश नारायण के लिये भोजनमें नमक पर संपूर्ण पाबंदी थी. लेकिन फिर भी इंदिरा सरकार जयप्रकाश नारायणको ठीक ठीक नमकवाली चीज़े भोजनमें दी जाती थी. यह सब हेतुपूर्वक किया जाता था. परिणाम स्वरुप जयप्रकाश नारायण की दोनों कीडनी फेल हो गयी.

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कोंग्रेसके एक मंत्रीने विनोबा भावेको एक पत्र द्वारा संपर्क किया और उसमें लिखा कि विनोबा भावे इन्दिरा गांधीको बोले कि जयप्रकाश नारायण को मूक्त करें क्यों कि उनका स्वास्थ्य भयजनक अवस्थामें है, और कभी भी मर सकते है. विनोबा भावेने वही पत्र “जय प्रकाश नारायण को मूक्त करें” उन शब्दोंके नीचे रेखा अंकित करके इंदिरा गांधीको भेज दिया. तो इंदिरा गांधीने उस मंत्रीको मंत्रीपदसे पदच्यूत कर दिया. इस बातसे पता चलता है कि इंदिरा गांधीकी मानसिकता किस हद तक रोगिष्ठ हो गयी थी.

ऐसे समाचार वर्तमान पत्रोंमें छपते थे कि इंदिरा गांधीकी सरकारने एक नेताकी (जय प्रकाश नारायण की) अंतीम क्रियाके लिये सभी तयारीयां कर रक्खी थीं, जो एक महापुरुष के लिये उपयुक्त हो. लेकिन  अंतिम क्रियामें किसीको भी उपस्थित रहेने नहीं दिया जायेगा.

जब जयप्रकाश नारायण बेहोश रहेने लगे तो उनको पेरोल पर रिहा किया. लोग बोलते थे कि जयप्रकाश नारायणकी बेहोश अवस्थामें ही, उनसे एक कागज पर हस्ताक्षर ले के उनको पेरोल पर रिहा किया. अखबारमें प्रचार ऐसा किया कि जय प्रकाश नारायणने स्वयंने आवेदन दिया था कि उन्हे अपने खराब स्वास्थ्यके कारण पेरोल मांगा और इंदिराने उनको पेरोल पर छोडा.

जयप्रकाश नारायण के बारेमें हर रोज एक बुलेटीनके तौर पर एक बात अवश्य लिखी जाती के उन्होंने सुबहमें एक अंडा खाया. ताकि गुजरातके लोगोंको पता चले कि जयप्रकाश नारायण तो अंडा भी खाते है. गुजरातमें अंडा, मछली … सब मांसाहारके अंतर्गत आता है.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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आपात् कालकी कुछ सूनी – अनसूनी बातें – १

इंदिरा नहेरु-ग़ांधीने आपात्काल कैसे लगाया?

इंदिरा गांधीने आपात्कालका अध्यादेश लानेसे पूर्व  ठीक ठीक होमवर्क किया था. क्यों कि उसको पता था कि यदि कोई कोर्टमें जायेगा तो हो सकता है कि न्यायालयका आदेश राष्ट्रपतिके अध्यादेशको निरस्त्र करें. आपात्कालके अध्यादेश के लिये ऐसी संभावना बिलकुल रहेना नहीं चाहिये. वैसे तो इंदिराने अपने हिसाबसे न्यायाधींकी नियुक्ति की थी.

भयका माहोल ऐसा बना देना आवश्यक है कि कोई डरके मारे विरोध कर ही न शके.

इंदिराने अपने विरोधीयोंका लंबा लीस्ट बनाया था और कौन कहां पर है उसका पता भी लगा लिया. कौन गिरफ्तार करने जायेगा कब जायेगा, वह भी पूर्व निश्चित किया था.

जो टेढे वर्तमान पत्र थे उनका इलेक्ट्रीक सप्लाय बंद कर दिया था.

आपात्काल अध्यादेश घोषणा समय रात्रीका था.

जब अध्यादेशपर हस्ताक्षर लेनेके लिये कर्मचारी राष्ट्रपतिके घर गया तो, राष्ट्रपति फकरुद्दीन अली एहमद बाथरुममें स्नान कर रहे थे. एक कोमिक है कि राष्ट्रपतिने अर्धनग्न अवस्थामें ही बाथरुमके अल्प उद्घाटित द्वारमेंसे प्रवेशित अध्यादेश पर बिना पढे ही हस्ताक्षर किया था.

अपने वक्तव्यमें इंदिरा गांधीने कहा कि “ …. किसीको डरने कि आवश्यकता नहीं है …” और सुबह होते होते तो हजारो नेतागण कारावासमें डाल दिया है ऐसा जनताको पता चला. तो डरना तो अब जरुरी था ऐसा जनताको लगा.

जब हिंदुधर्मके महानायक बाला साहेब ठाकरेने इंदिराके आपात्कालका अनुमोदन किया और “सूतकी माला” के कवि-मूर्धन्य हरिवंश राय बच्चनने एक प्रच्छन्न रुपसे “जूठकी माला” के अनुरुप आपात्कालका अनुमोदन किया तो डर तो लगनेवाला ही था.

एक बात तो बच्चनजीकी सही ही निकली, बच्चनजीको बादमें पता चला होगा कि;

“जब राष्ट्र भवनका सबसे उंचा कंगूरा,

लपटोंसे घीर कर, जलकर गीरकर क्षार हुआ,

तब हमें तो पता चला कि, घरमें तो लगी है आग.

नहेरुने अपने समयसे ही वैसे तो जनतंत्र पर प्रहार करनेकी आग लगाई थी.

यही आग इंदिराके समयमें आखरी मंजील तक पहूँच गई, तब हमे तो पता चला कि भारतका जनतंत्र तो पूरा खाक हो गया है.

आपात्कालमें पूलिस सक्रीय हो गई थी. सक्रीय मतलब नये प्रकारके हप्ता वसुलीमें.

पूलिस दुकानदारके पास जायेगी और बोलेगी हमे हर सप्ताह, कुछ न कुछ हप्ता दो, नहीं तो हम आपके उपर सरकारके विरुध्धके प्रचारका साहित्य आता है ऐसा सरकारको बोलेंगे और आपको कारावास भेज देंगे.

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कोई एक जगह (दक्षिण भारतमें) कुछ यारदोस्त  इकठ्ठे हुए थे. पूलिसने उनको पकडा. अभी मिसाके अंतर्गत पकडनेका तो कोई भी प्रत्य्क्ष या परोक्ष आधार नहीं था. तो उनको न्यायधीशके समक्ष प्रस्तूत किया.

न्यायधीशने पूछा “क्या बात है?

पूलिसने बोला “ये लोग आपसमें बात कर रहे थे कि आपात्काल हटना चाहिये.

न्यायाधीश ने कहा “तो … उससे क्या है?

पूलिसने बोला “ऐसा क्या सोचा जा सकता है?

न्यायाधीशने कहा ; “सोचने पर कहाँ पाबंदी है? … छोड दो इनको…

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एक गांवमें एक सन्यासी और ग्रामवासीयोंके बीच झगडा हो गया.

ग्रामवासीयोंने पूलिसको बताया कि एक सन्यासी “त्राटक करता है … और बच्चोंका कीडनेपींग करता है

पूलिसने सक्रीयतासे सन्यासीको पकड लिया और न्यायाधीशके समक्ष प्रस्तूत किया.

न्यायधीशने पूछा “क्या बात है?

पूलिसने बोला “ यह सन्यासी बच्चोंके उपर त्राटक करता है और बच्चोंको कीडनेप करके ले जाता है …

न्यायाधीशने बोला “किसी ग्रामवासीने पूलिसको फरियाद की है कि उसके बच्चे गुम हुए है?

पूलिसने बोला “नहीं ऐसी कोई फरियाद तो जबानी या लिखित नहीं हुई है….

न्यायाधीशने पूछा क्या किसी ग्रामवासीका बच्चा गुम हुआ है?

पोलिसने बोला ; नहीं जी, किसीका बच्चा गुम भी नहीं हुआ है.

न्यायाधीशने बोला “ क्या इस सन्यासीके पाससे कोई बच्चा मिला है?

पूलिसने बोला “ नहीं. इस सन्यासीके पाससे कुछ भी मिला नहीं है. लेकिन यह सन्यासी त्राटक अवश्य करता है. उसने एक कौए पर त्राटक किया, तो कौआ उपरसे नीचे गीर पडा और मर गया.

न्यायाधीशने बोला “ वह कौआ कहाँ है? उसका डेड बोडी कहाँ है?

पूलिसने बोला “कौएको तो कुत्ते ले गये  और खा गये. लेकिन यह एक पींछ है, वह हम आपके सामने प्रस्तूत करते है.” ऐसा बोलके पूलिसने एक काली पींछ न्यायाधीशके टेबल पर रक्खी.

न्यायाधीशने पूलिसको डांटके सन्यासीको मूक्त कर दिया.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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फरेबी नहेरु और नहेरुवीयन्स: आपात्काल – ३

नव निर्माण आंदोलनके समय कौनसी विचारशालाएं चल रही थीं?

  • एक विचारधारा यह भी चल रही थी कि निर्वाचित सदस्यको वापस बुलेनाका हक्क भी जनताको होना चाहिये.

जब कोई किसी कर्मचारीको नियुक्त करता है तो उसको उस कर्मचारीको निकाल देनेका (पदच्युत कारनेका) भी उस नियुक्त करनेवालेको हक्क है. जैसे कि हम हमारे घरमें सफाईके लिये किसी नौकरको रखते है तो उसको निकाल भी देते है. यह हमारा हक्क है. तो उसी प्रकार हमने हमारे प्रतिनिधिको नियुक्त किया है तो उसको हम वापस भी बुला सकते है. यदि इसकी कोई प्रक्रिया (प्रोसीजर) नहीं है तो प्रक्रिया तो बनायी भी जा सकती है.

  • विधान सभा, पक्ष हीन होना चाहिये.

इस विज्ञानके युगमें पक्षकी विचारधारा कोई महत्त्व नहीं रखती. यदि आपको मानसिक विकास करना है, तो शिक्षण संस्थाएं है. उनको कैसे चलाना उसके लिये, बैठके चर्चा करो, और श्रेष्ठ निर्णय लो.

  • पक्षीय विचारधाराका, विकाससे कोई संबंध नहीं.

भौतिक विकास कार्योंके लिये भीन्न भीन्न क्षेत्रके ज्ञाताओंको विधान सभामें भेजो. फिर उस विकासको कैसे करना है, उस पर सब साथमें बैठके विचार विमर्श करो. फलां योजनाके लिये  सबसे अच्छी तकनीकी कौनसी लागु करना चाहिये उसके उपर कलन करके निर्णय लो. इसमें पक्ष कहाँ बीचमें आता है? योजनाओंको समय-बद्ध बनाओ. समयकी मांग यही है.

जयप्रकाश नारायण और जे. एल. नहेरु के बीचमें यही तो मतभेद था. जय प्रकाश नारायण चाहते थे कि हर कार्यक्रम का आरंभ दिन और अंतीम दिन निश्चित करना आवश्यक है. बिना प्रारंभ और बिना समय बद्धता वाला काम प्रलंबित हो जाता है और जनताके अधिक पैसे बरबाद होते है.

अब हम मूल बिंदु पर आवें.

इन सब बातें विधानसभाका विसर्जन होनेके बाद भूला दी गयी.

जय प्रकाश नारायण ने गुजरातकी मुलाकात ली.

वैसे तो और नेतागण भी आते रहेते थे. जयप्रकाश नारायणको आश्चर्य हुआ कि युवाओंने भ्रष्टाचारको मुद्दा बनाया है. अब तक अन्य राज्योंमें जब आंदोलन होता था तो किसी सरकारी योजनाकी मांग के लिये आंदोलन होता था. भ्रष्टाचार/भ्रष्टाचारीयोंको हटाने के लिये आंदोलन करना आश्चर्य जनक था. आंदोलन तेज चल रहा था. आंदोलन पूर्णतः अहिंसक था. लेकिन हडताल, बंध, संचार बंधी आम बात थी. आमजिवन अस्तव्यस्त हो गया था. बाते बहूत लंबी है. …  अंतमें विधानसभाका विसर्जन हुआ.

इस समयके दरम्यान भारतके अन्य राज्योंके आंतरिक प्रवाह, कोंगीके विरुद्ध हो रहा था. क्यों कि इंदिरा गांधी वैसे तो वैचारिक क्षमतामें, वहीवटी क्षमतामें और ज्ञान होने की क्षमतामें आम कक्षाकी थीं. सियासती क्षेत्रमें,  और वह भी, जब अपनी कुर्सीपर आपत्ति आ पडे, तब वह, शिघ्रतासे निर्णय ले सकती थीं. यदि कोई मंत्री स्वयंको आगे करें, ये बात इंदिरा गांधीको पसंद नहीं था. उ.दा. हेमवतीनंदन बहुगुणा जो स्वयं श्रेय ले रहे थे. उनको पदच्यूत किया था.

गुजरात राज्य विधान सभाका फिरसे चूनाव हुआ. और विपक्ष यानी कि जनता फ्रंट [कोंग्रेस (संस्था), चिमनभाईका किमलोप, जनसंघ और स्वतंत्र सदस्योंका गठन] सत्ता पर आया.

जय प्रकाश नारायणको लगा कि “भ्रष्टाचार” आंदोलनका मुद्दा बन सकता. यदि मूलभूत क्रांति करना है तो इस मुद्देको उजागर किया जा सकता है.

“इंदिरा हटाओ” आंदोलन देशभरमें चालु हुआ”

१९७१के लोकसभा चूनावमें इंदिरा गांधीने अपने प्रचारके लिये सरकारी मशीनरीका और सरकारी कर्मचारीका उपयोग किया था. इस बातको लेकर अल्लाहबाद उच्च न्यायालयमें इंदिरागांधीके प्रतिस्पर्धी प्रत्याषी राजनारायणने केस डाला था और केस चल रहा था. उसका आदेश आया. इंदिरा गांधीकी संसद सदस्यता रद हुई और इंदिरा गांधी ६ वर्षके लिये चूनावके लिये अयोग्य घोषित हुई.

वैसे तो इंदिरा गांधीने प्रचार किया कि यह तो टेक्नीकल कारण है. लेकिन टेक्नीकल कारण भी तो एक कारण ही तो है. वह कोई शोभामें वृध्धि करनेके लिये तो सामेल किया नहीं था.

इस दरम्यान कभी, जयप्रकाश नारायणने सुरक्षा दलोंको कहा होगा कि यदि  आपको गैर कानूनी आदेश दिया जाय तो आपको उसका पालन नही करना.

गैर कानूनी आदेशको न मानना वास्तवमें भी सही ही है.

यदि कर्मचारीको उसका उपरी अफसर गैर कानूनी आदेश दे तो कर्मचारीको चाहिये कि वह आदेश लिखित रुपमें मांगे. यदि अफसर उसको लिखित रुपमें देता है तो फिर जीम्मेवारी अफसर की बनती है.

हम आज भी देख रहे है कि लीब्रांडु लुट्येन लोगा कोई भी घटना पर जनताको गुमराह करनेमें उस्ताद है. इंदिरा गांधीने, जय प्रकाश नारायणके उपरोक्त कथन को सेनाको देशके विरुध्ध उकसाया ऐसा अर्थघटन किया. और उसने देशके उपर आंतरिक आपात्काल ठोक दिया.

पथ-भ्रष्ट और मति-भ्रष्ट केवल पैसेके लालची लोग ही नहीं होते है. वर्तमान पत्रके मूर्धन्य/कोलमीस्ट्स भी होते है, चाहे वे नहेरुवीयनोंसे १९७५में प्रताडित हो या न हो. हो सकता है उनके बीजेपीमें संपर्क न हो और कोंगी में पूराने संपर्क हो.

बाजपाई जब मुख्य नेता थे तब ये लोग उनकी बुराई करते थे. जब बाजपाई निस्क्रीय हुए और अडवाणी मुख्य नेता बने तो उनको बाजपाई शालीन नेता लगने लगा. और अडवाणी कठोर लगने लगे. जब अडवाणी निस्क्रीय बने और नरेंद्र मोदी मुख्य नेता बने तो उनको अडवाणी शालीन नेता लगने लगे. और मोदी कठोर नेता लगने लगा है. आजका बुधवारका दिव्य भास्कर पढ लो. पता चल जायेगा. यदि आदित्यनाथ योगी मुख्य नेता बन जायेंगे तो इन लोगोंको नरेंद्र मोदी शालीन नेता लगने लगेगा और योगी जी …..

यही तो कमाल है मतिभ्रष्ट मूर्धन्योंकी …

शिरीष मोहनलाल दवे

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फरेबी नहेरु और नहेरुवीयन्स: आपात्काल – २

आपात्काल लगनेका कारण क्या था?

गुजरातके अहमदाबादमें एक एल.डी. एंजीनीअरीग कोलेज है उसकी होस्टेलके रसोई घरमें कुछ आर्थिक अनियमितता के कारण  आंदोलन चालु हुआ. वह अन्य महाविद्यालयोंमें प्रसरा. और चूंकि उस समय के मुख्य मंत्री चिमनभाई पटेल एक समय अध्यापक थे, यह आंदोलन उनके विरुद्ध हो गया.

चिमनभाई पटेल एक होनहार नेता थे.

चिमनभाई पटेल, प्रारंभमें वे मोरारजी देसाईवाली कोंग्रेस (संस्था)में थे. लेकिन जब कोंग्रेस (आई) १९७१के चूनाव में जीत गई, तो वे कोंग्रेस (आई)में चले गये.

जब इंदिराने पाकिस्तान – भारत युद्धके विजयके बाद, (और सिमला समज़ौता के पहेले), विधान सभाका चूनाव करवाया तो गुजरात राज्य में कोंगीको १६८मेंसे १४० सीटें पर विजय मिली.

उस समय विधान सभाके अधिकतर सदस्य चिमनभाई पटेलके समर्थक थे, तो भी इंदिराने मुख्यमंत्रीके पद पर घनश्यामभाई ओझा को नियुक्त किया. चिमन भाई पटेलने इसका पक्षके अंदर रहकर ही विरोध किया. हार कर इंदिरा गांधीको चिमनभाई पटेल को मुख्य मंत्री बनाना पडा. घटनाक्रम बहुत लंबा है. लेकिन इस प्रकारकी घटना गुजरात राज्यके लिये नयी थी, जिसमें चिमनभाई पटेलको अपने समर्थकोंको पंचवटी फार्म हाउसमें रखना पडा था.

महंगाई और बेकारी देशके लिये आम बात है. गुजरात में “ग्राउंडनट ओईल” का बडा कारोबार है. मुख्य तैल भी यही है. इस तैल के उपर सियासत भी अधिकमात्रामें होती है. चिमनभाईके लाख प्रयत्न पर भी महंगाई और तैलकी किमत बढ रही थी. एकबार तो मुख्य मंत्रीने तैलकी किमत फिक्स कर दी कि, अब तो ₹ ९/- प्रतिकिलोग्रामसे किमत नहीं बढने देंगे. दुसरे दिन ही किमत ₹ ९.२५ हो गई.

छात्रोंने अपना आंदोलन तेज़ कर दिया. गोलीबारी भी हुई. कुछ विद्यार्थी मर भी गये. चिमन भाई पटेलको हटाओ आंदोलन शुरु हो गया.

गुजरातके कुछ मूर्धन्योंका भी विद्यार्थीयोंको समर्थन था. शहरोमें आंदोलन बहुत घनीष्ठ था. सर्वोदय संस्थाओंके नेतागणका भी विद्यार्थीयोंको समर्थन था.

विधानसभा विसर्जन भी अपने आप नहीं हुआ था. कोंग्रेस (संस्था) के सदस्योंने तूरंत ही अपना त्यागपत्र दे दिया था. कोंगीके सदस्य थोडा टेढा चलते थे. उन १४० सदस्योंके घर जाकर युवा कार्यकर पीकेटींग करते थे. और कोंगीयोंके  लिये घरसे बाहर निकलना दुष्कर हो गया था. हार कर कोंगी सदस्य भी अपना त्याग पत्र देने लगे. विधान सभा को पूनर्जिवित करनेकी ताकत किसीमें भी नहीं थी. हर मोहल्लामें नवनिर्माण समिति बन गई थी. ये लोग भ्रष्टाचारके विरुद्ध स्ट्रीट ड्रामा, सभाएं, मनोरंजन प्रोग्राम कर रहे थे. कुछ लोग प्रभात-यात्रा भी निकालते थे. अनेक विविध प्रोग्रामोंसे आंदोलन जिवित रहेता था.

चिमनभाई  पटेल जब मुख्य मंत्री बने तो, उनका शपथ विधि गुजरातके बडे सर्वोदय नेता रविशंकर महाराजने करवाया था. आंदोलन नियंत्रणसे बाहर था. रविशंकर महाराजने भी चिमन भाई पटेलको कहा कि मैंने आपका शपथ विधि करवाया था. अब मैं कहेता हूँ कि आप मुख्यमंत्री पदसे त्याग पत्र दे दो. फिर चिमन भाई पटेलने त्याग पत्र दे दिया. इंदिरा गांधीने विधान सभा निलंबित कर दी थी. लेकिन इसमें विलंब हो गया था. आंदोलन अब तो “विधान सभाका विसर्जन करो” उस सीमा तक पहूंच गया था.

उस समय कौनसी विचारशालाएं चल रही थीं?

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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लीब्रांडुओंकी सीट बढी तो उन्होंने समज़ लिया है कि वे अब जित गये हैं, और बीजेपीका जीना वे हराम कर देंगे. अब ये लिब्रांडु लोग पहेलेसे भी अधिक हवाई बाते करेंगे, जूठ बोलेंगे, फर्जी विवाद करेंगे और जिस राज्यमें उनका शासन है वहां और आपखुदी करेंगे.

आपात्काल यानी जनतंत्रकी हत्या.

नहेरुवीयंस हमेशा जनतंत्र पर प्रहार करते आये है. इंदिराने तो जनतंत्रकी हत्या ही कर दी थी.

नहेरुने भी कईबार जनतंत्र पर प्रहार किये थे और जनतंत्रकी परिभाषा ही बदल दी थी ताकि उनका जनतंत्रका नेरेटीव आम जनताके लिये कन्फ्युज़ींग रहे. नहेरुका स्वातंत्र्य संग्राममें ठीक ठीक  योगदान था, इसलिये वे खुले आम जनतंत्र पर प्रहार करते नहीं थे. वे प्रच्छन्न रीतसे जनतंत्र पर प्रहार करते थे, ताकि वे भारतकी गरीब अनपढ जनताको गुमराह करनेमें सफल रहे.

लेकिन इंदिरा गांधीका तो स्वातंत्र्य संग्राममें योगदान ही नहीं था. नंगेको नाहना क्या और निचोडना क्या?

इंदिराने ५० साल पहेले आपात्काल लगाया था.

आपात्कालमें इंदिराने क्या क्या किया था उनकी विगत को जाननेवाले अधिकतर लोग जीवित नहीं है. जो लोग उस समय वयस्क और जवान थे वे आज ७५ वर्षसे उपरके हो गये है.  जो उस समय ३० के या ३०+के थी वे ९९ प्रतिशत स्वर्गवासी हो गये होगे.

एक ही रातमें करोडों पोस्टरें छपवाके रास्तोंकी दिवालों पर चीपका दिये कि, जब देशके उपर देशके आंतरिक दुश्मनो द्वारा हमला हुआ तो वह (इंदिराकी छवी)  चट्टान की तरह खडी रही. … इंदिरा अब भी प्रधान मंत्री पद पर चालु है … हमारा काम सबसे नम्र व्यवहार … सरासर जूठ फैलाना प्रारंभ हुआ

एक ही रातमें सभी विपक्षके नेतागण, विपक्षकी भाषा बोलनेवाले वर्तमान पत्रोंके लेखकोंको, अन्य वैसे ही लेखकोंको कारावासमें धकेल दिया. लगभग ६६०००+ लोग जिनमें सक्रीय सर्वोदयवादी लोग भी सामेल थे, वे सब कारावासमें. गिरफ्तारीका दौर चालु ही रहा. अखबारमें कोंग्रेस और कोंग्रेसकी सरकार के विरुध्ध प्रत्यक्ष या परोक्ष भाषामें लिखना भी निसिध्ध था.

भयका साम्राज्य था. लोग, बसमें, ट्रेनमें और कहीं भी सरकारके विरुध्ध बोलनेसे डरते थे. उनको कारावासका डर था,

एक नियम था कि कहीं भी सभा या मिलन समारंभ करो तो सबसे प्रथम कर्तव्य था ठराव द्वारा आपात्कालका समर्थन करना,

सभी कर्मचारी मंडल, वहेपारी मंडल, … की वर्कींग समितिओंको  एक संकल्प को पास करना पडता कि वे आपात्कालका अनुमोदन करते है.

कुछ कोलमीस्ट्स और लेखकोंने भी आपात्कालको समर्थन घोषित किया था. गुजरातके एक लेखक तो अहमदाबादके इंकमटेक्ष चौराहे पर ट्राफिक पूलिस द्वारा ट्राफिकके हेंडलींगके जो परिश्रम दिखाते थे उससे प्रभावित होके आपात्कालका समर्थन किया था. बालासाहेब ठकरेने भी समर्थन किया था. 

आपात्काल तो लाद दिया, लेकिन उसको चलाना आहिस्ते आहिस्ते कठीन होने लगा. “जनता समाचार” और “जनता छापुं” (गुजरातीमें छापुंसे मतलब है वर्तमान पत्र), प्रकाशित होने लगा जब तक गुजरातके मुख्य मंत्री बाबुभाई जशभाई थे. इंदिरा गांधीने बाबुभाई पटेलकी सरकारको पलटुरामों द्वारा गीरा दिया.

आज, तथा-कथित गांधीवादी (या गांधी-मित्र) जब एंटी-बीजेपी/एंटी-मोदी पक्षोंका परोक्ष रुपसे सहयोग करते है. ऐसा, वे सब, अपने शब्दोंकी चापलुसी द्वारा करते है. नहेरुवीयंस और नहेरुवीयन कोंगीके काले कारनामोंको डाईल्युट करनेके लिये, वे बीजेपी/मोदीको,  “कोंग्रेस – युक्त बीजेपी” ऐसा लेबल देते है. यह भी किसी भी आधारके बिना. लेकिन यही तो लुट्येनोंकी पहेचान है.

आम सुज्ञ जनोंको इन गांधी-मित्रोंकी दया आती है कि ये लोग सत्यकी खोजमें कितनी हद तक निकम्मे है. जो सत्य सामने निर्भेल रुपमें प्रत्यक्ष है उनको पकड नहीं सकते है. तो उनके लिये “सत्यके प्रयोग” को समज़ना असंभव ही है. ये लोग, अडवाणी के कुछ छूट पूट शब्दोंको वाक्योंके द्वारा मनघडंट अर्थघटन करके प्रच्छन्न रुपसे नरेंद्र मोदी/बीजेपीको तानाशाह कहेने पर तूले हुए है. ऐसा करनेसे उनकी मानसिकता किस स्तर पर है और वे कितने अविश्वसनीय है, उसका ही प्रदर्शन करते है.

आपात्काल लगनेका कारण क्या था?

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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कैसे मुक्त और निष्पक्ष चूनाव हो सकता है – २

हमने पार्ट – १ में देखा की कैसे चूनाव आयुक्त के कार्यालय परावलंबी है. चूनाव आयुक्त और चूनाव आयुक्त के कार्यालयोंका परावलंबी होना ही उसकी कमजोरी है. मतलब कि चुनाव आयुक्त जो शक्य है वैसा मुक्त और स्वतंत्र चूनाव नहीं कर सकता है.

चूनाव आयुक्तके कार्यालयोंका जो वर्ग – १, २ और ३ के कर्मचारीगण है वह केवल चूनाव घोषित हो और चूनाव के परिणाम घोषित हो जाय और जब निर्वाचित सदस्य अपने होद्देकी प्रतिज्ञा ले लें तब तक ही ये कर्मचारी गण मुख्य चूनाव आयुक्तके प्रशासनिक नियंत्रणमें रहेते है. अन्यथा तो वे मुख्य सचिव, मंत्री, मुख्य मंत्रीके आधिन रहेते है.

मानव सर्जित क्षतियाँ तकनिकी प्रणालीयाँ द्वारा दूर हो सकती है.

निष्पक्ष और मूक्त  चूनाव के अंतर्गत मानवसर्जित क्षतियाँके कर्ता कौन कौन है?

यदि राज्यका मुख्य मंत्री ममता बेनर्जी जैसा, केजरीवाल जैसा, …. गुंडोंके/आतंकवादीयोंके गुटोंका हिस्सा हो तो उनके अफसर सहित कर्मचारीगण हमेशा उनसे भयभित ही रहेते है. हमने देखा ही है कि केजरीवालकी चेंबरमें एक मुख्य सचिवकी पीटाई भी हुई थी. ममता तो बेनर्जी तो केंद्रकी जांच एजन्सीयोंकी पीटाई करवाती, गवर्नरको भी पीटवाने की धमकी देती है … तो ममताके लिये रेवन्युके अफसर तो क्या चीज़ है? ममताने तो स्वयंके पक्षको मत न देनेवाले मतदाताओंके उपर आतंक फैलाया था.

क्या चूनाव आयुक्तको यह बात ज्ञात नहीं है?

जो मुख्य मंत्री गुंडोंके नेटवर्कका हिस्सा होता है वह बडी आसानीसे पोलींग बुथका कबजा कर सकता.

पोलींग बुथ पर कबजा कैसे होता है?

(1)  जो भी पोलींग बुथके भौगोलिक विस्तार पर, मुख्य मंत्रीका गुन्डा नेटवर्क सशक्त है वहाँ अपने विरोधी मतदाताओंको भयभित करके उन्हें घरके बाहर ही नहीं निकलने दिया जाता है. इस प्रकार उन्हें मतदानसे रोका जाता है.

(2) पोलींग बुथके सरकारी कर्मचारी जो मतदाता का फोटो आईडेंटींटी चेक करता है उसको अलिखित आदेश होता है कि पहेचानके लिये वह सख्त न हो. कभी कभी चिन्हित मतदाता जिसका सीग्नल एक सुनिश्चित व्यक्ति देता है उसकी पहेचान न करें या बिलकुल नर्मीसे करें.

(3) बुर्खे वाली महिलाओं की पहेचान न करें,

(4) पोलींग बुथके उपर उपस्थित पक्षीय बुथ एजंटको मतदाताको पहेचाननेकी सुविधा एवं हक्क नहीं होता है. इतना ही नही चूनावके प्रत्याषीको भी यह हक्क होता नहीं है कि वह मतदाताका फोटो वाला पहेचान कार्ड चेक करें.

(5) वैसे तो पोलींग बुथका पुरा वीडीयो रेकोर्डींग होता है. लेकिन पोलींग बुथके पक्षीय एजंटको इस ईडीयो रेकोर्डींग की कोपी मिलती नहीं. पक्षके प्रत्याषीको भी सभी पोलींगबुथकी वीडीयो रेकोर्डींगकी कोपी मिलती नहीं है.

ऐसी व्यवस्था विद्यमान होनेसे से बोगस मतदान को नकारा नहीं जा सकता. बोगस व्यक्तिद्वारा मतदान करवाना बुठ केप्चरींगके ही है. फर्क केवल प्रमाणका है, या फर्क नहीं भी हो सकता है.

हर किस्सेमें मतदाता व्यक्ति सही है या नहीं उसका फोटो चेक करनेसे या हस्ताक्षर चेक करनेसे सही पहेचान नहीं हो सकती है.

क्या मतदानकी प्रक्रिया बिलकुल क्षति रहित हो ऐसा नहीं हो सक?

मानव चाहे मुख्य मंत्री हो या/और गुंडा नेटवर्कका हिस्सा हो या न हो, वह पोलींगबुथके स्टाफको भयभित कर सकता है. ऐसा किया हो या न किया हो, पक्षीय एजंटोंको करप्ट किया हो या न किया हो, लेकिन इन सक्यताओंको लक्ष्यमें लेना अनिवार्य बनना आवश्यक है.

बुथ केप्चरिंग करनेकी “सियासती आदत” नहेरु और नहेरुवीयनोंने व्यापक रुपसे डाली हुई है. नहेरुवीयन्स और उनके सांस्कृतिक साथी लोग इसीलिये तो बेलेट पेपरवाली प्रणाली लानेके लिये लगातार आग्रह कर रहे है. और उनकी बात न मानने पर न्यायालय और चूनाव आयुक्तको बिके हुए मानते है. वर्तमान प्रणालीमें बुथकेप्चरींग करने कि शक्यता प्रमाणमें कम है. यही उनको नडता है.

मतदान को अवश्य १०० प्रतिशत मुक्त और स्वतंत्र किया जा सकता है. ऐसी तकनीकी प्रणाली बनायी जा सकती है, जिसमें मतदान संपूर्ण क्षतिरहित हो, और चाहकर भी कोई फर्जी मतदान न कर सकें. जो नागरिक मतदान करनेको आया है वही सिर्फ वही मतदान कर सके.

मतदान सही नागरिक द्वारा ही हो, भय मुक्त हो ऐसा कैसे किया जा सकता है?

सबसे पहेले तो देशका “नागारिक रजीस्ट्रेशन सूचि” बनाना चाहिये. इस क्रियामें व्यक्तिको अपनी नागरिकता सिद्ध करनेके लिये डॉक्युमेंट (पेपर) तो दिखाना ही पडेगा.

मुस्लिम घुसपैठीयोंका भारतमें आना १९६५के भारत – पाकिस्तान  युद्धके बाद अधिकमात्रामें प्रारंभ हुआ था. १९६५के पूर्व यदि कोई मुस्लिमने अथवा उसके माता पिताने वोट दिया था तो उनका नाम उस समयके मतदाता सूचिमें है या नहीं, वह सरकारको चेक करना पडेगा. जनगणना सूचिमें भी चेक करवाना पडेगा. यदि वह बिन-मुस्लिम है तो उसको ऐसी कोई आवश्यकता नहीं. क्यों कि “नहेरु – लियाकत अली” समज़ौतेके अंतर्गत वे अपने आप नागरिक बन जाते है. सी. ए. ए. के अनुसार भी वे नागरिक बन जाते है. लेकिन उनको और/या उनके माता-पिता को एक रजीस्टर्ड प्रतिज्ञापत्र देना पडेगा कि, वे बिनमुस्लिम होनेके कारण पीडीत हुए थे और इसके कारण वे भारत आये थे.

भारतीय नागरिकताकी पहेचान वाला पत्र, बायोमेट्रीक पहेचान पत्र होना चाहिये जिनमें दश उंगलीयां और फेसीयल पहेचान भी सामेल हो.

तकनीकी प्रणाली कैसी होनी चाहिये?

आप पेंशनरका “ओन लाईन लाईफ सर्टीफीकेट” (जीवन प्रमाण)की प्रणाली देखो. उस प्रणालीमें पेंशनर को स्क्रीनके सामने १५ ईंच की दूरी पर अपना चहेरा रखके आपनी दो आंखे दो तीन बार झपकाना पडता है. इससे व्यक्तिके चहेरेकी बायोलोजीकल पहेचान सिद्ध हो जाती है.

इसी प्रकारकी प्रणाली (सीस्टम), मतदान बुथके माईक्रोप्रोसेसरमें अपलोड करना है.

पोलींग बुथके उपरोक्त स्क्रीन के उपर एक ग्रीन लेंप होगा. बायोलोगीकल आईडेंटीटी चेक हो जाने पर वह ग्रीन लेंप जलेगा. ग्रीन लेंप आनेसे “पोलींग पेड” एक्टीवेट हो जायेगा. व्यक्ति, अपने मन पसंद प्रात्याषीके प्रतिकका बटन दबायेगा. तब ग्रीन लेंप ओफ हो जायेगा और बाजुके वी.वी. पेक बोक्समें प्रत्याषीका चूनाव चिन्ह क्षणभरके (चार सेकंडके) लिये दिखाई देगा और परची भी उसमें गीरेगी.

ग्रीन लेंप ऑफ जाना बुथ लेवल अधिकारीको दिखाई देगा. फिर वह गेट सुरक्षा पर खडे दुसरे मतदाताको बुलायेगा. उसके पास अपना मतदाता फोटो पहेचान पत्र है या नहीं वह देखेगा कि वह यही पोलींग बुथका लीस्टवाला मतदाता है या नहीं. उसके बाद उसको पोलींग बुथके कोर्नर पर मतदान के लिये भेजेगा. पोलींगबुथके इलेक्ट्रोनिक नेटवर्कके सभी उपकरण वायरसे कनेक्टेड रहेगे. कुछ भी वायरलेस नहीं होगा. माईक्रोप्रोसेसर होट-स्टेंड बाय टाईप होगा.

सीस्टम ऐसा होगा कि जिसने मतदान किया है वह फिरसे मतदान नहीं कर पायेगा. मतदाता उसी पोलींग बुथ विस्तार का होना अनिवार्य है.

गुंडाग्रस्त पोलींग बुथ मतदान विस्तार में क्या प्रक्रिया करना है वह सब विस्तारसे चूनाव आयुक्त के परिचालन (मेन्युअलमें) है. वह कितना असरकारक है वह बात एक संशोधनका विषय है.

नंदीग्रामके गरीब मतदाता के उपर कैसा आतंक ममताके गुंडोंने फैलाया था वह जनता जानती है. उच्च  न्यायालय भी जानता है, राज्यका गवर्नर भी जानता है, चूनाव आयुक्त भी जानता है. ऐसी घटनाओंकी जाँच, न्यायिक कार्यवाही शिघ्रातिशिघ्र होना अनिवार्य है. ममता और उनके गुण्डोंको जब तक न्यायिक कार्यवाही अंतिम पडाव तक न पहोंचे उस समय तक उनको कारावासमें रखना चाहिये.

शिरीष मोहनलाल दवे

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कैसे मुक्त और निष्पक्ष चूनाव किया जा सकता है?

  • लुट्येनोंका कोमवादको बढावा देना

हमने गत ब्लोग “ उत्तर प्रदेशमें बीजेपीकी पराजय के फर्जी कारण एवं विवरण –४ में , लुट्येन लोग, बीजेपी/मोदीसे संबंधित हर एक इवेंट (घटना) को कोमवादी स्वरुप कैसे दे देते है. और अधिकतर मुस्लिम लोगोंकी आदत भी लुट्येन जैसी कैसे हो गयी है ये सब हमने देखा.

  • लुट्येनों द्वारा हर घटनामें कोमवाद उजागर करना

जैसे कि कोराना कालमें कोरोना महामारीको फैलनेसे देशकी जनताको बचानेके लिये  नरेंद्र मोदी सरकारने कुछ सूचनाएं अनिवार्य रुपसे  पालनके लिये कहा था. तो लुट्येनोंने मुस्लिम जनताको पालन न करनेके लिये कैसे उकसाया था!! जैसे कि तबलीघी जमातका भारतमें आंतर राष्ट्रीय कोन्फरंस बुलाना, केजरीवाल द्वारा  उसको अनुज्ञा (परमीसन) देना. केंन्द्र सरकारसे यह बात गुह्य रखना. और जब बात का पता जनताको चले और उसकी टीका हो जाय तो उसको मुस्लिमोंके विरुद्ध कोमवादी स्वरुप दे देना. यह सब हमने देखा है.

  • लुट्येनों द्वारा जनताको वोटबेंक के लिये धर्मके आधार पर विभाजित करना

जब लुट्येनोंने अपने ६५ सालके शासनके  अंतर्गत  ईच्छापूर्वक एवं प्रपंच पूर्वक, देशका  ऐसा हाल कर दिया हो, उस देशमें मुक्त और निस्पक्ष चूनाव करवाना कठिन है. और लुट्येनों द्वारा शासित राज्योंमें तो असंभव है. इसके उदाहरण आपको लुट्येन शासित पश्चिम बंगाल, दक्षिण भारतके कुछ राज्य एवं जहाँ मुस्लिम बाहुल्य वाले विस्तार है वहाँ मिल जाते है.

वैसे तो कुछ लुट्येन नेता लोग और कुछ  दलित के नेता   लोग भारतके संविधानके रचयिता डॉ. आंबेडकर के गुणगान गाते थकते नहीं, लुट्येन उनको अपने प्रचारमें अपना मसिहा मनवाते है.

  • लुट्येनो द्वारा हिंदुओंको भी ज्ञातिके आधारसे विभाजित करना

लेकिन इन दलित नेता लोग  लुट्येन कोंगी के पास बिक जाते है. कोंगी लुट्येनने आंबेडकरको कमसे कम  तीन बार अपमानित किया था  और पचासके दशकमें हराया था. आंबेडकरने जब कोंगी द्वारा कोमवादी प्रावधानोंको संविधानमें सामेल किया तो घोर विरोध किया. आंबेडकरजीने,  उस तत्कालिन  लुट्येन कोंगी (नहेरुवीयन कोंग्रेस) पक्षको  वॉटबेंक सियासत के बारेमें भी चेतावनी  भी दी थी.

  • लुट्येनो द्वारा दलितोंको समज़ाना कि आप हिंदुओंसे भीन्न है.

आज ये दलितोंके नेता लोग, इन बातोंको लक्ष्यमें लेते ही नहीं है. क्यों कि वे बिक गये है. अलबत् दलित जनता सब की सब, इन दलित नेताओंसे भ्रमित नहीं होती है. कई लोग बीजेपीके समर्थक भी है. जब ऐसी स्थिति बनती है तो ये लुट्येन  पक्षोंके नेतागण यदि उनका प्रत्याषी हार गया तो वे लोग  मुस्लिम गुंडों द्वारा गरीब दलितोम्को  प्रताडित करवाते है. ऐस करना  कोंगी और उसके सांस्कृतिक गठबंधित पक्षोंके लिये आम बात है. वैसे भी सुज्ञ मुस्लिम (जो हमेशा एक दुष्प्राप्य होते है) को छोडकर आम मुस्लिमोंसे कोमवादी न होनेकी अपेक्षा नहीं रख सकते.

ऐसी स्थितिमें मुक्त और निष्पक्ष चूनाव असंभव है.

लेकिन ऐसा भी एक कथन है कि, कुछ भी अशक्य नहीं है.

यह बात भी सही है. आजके विज्ञान और तकनिकी युगमें कुछ भी असंभव नहीं है *. लेकिन इसमें एक बात इस ” * “की है. शर्तें लागु पडती है..

चूनाव आयुक्त, उनका स्टाफ और उनका कार्यालय, सबके सब स्वतंत्र होना चाहिये. यह मुद्दे पर हम बादमें चर्चा करेंगे.

अब कैसा है?

फिलहाल तो, एक मुख्य चूनाव आयुक्त, और दो चूनाव आयुक्त होते है. उनका छोटासा कार्यालय होता है. जब चूनाव नज़दिक आता है तो अन्य सरकारी कार्यालयोंसे कर्मचारी लोग और अफसर लोग  डेप्युट होते है.  आमतौर पर ये लोग  रेवन्यु डीपार्टमेंटमेंसे आते हैं.

राज्य की एक विधानसभा सीटके लिये एक मामलतदार चूनाव अधिकारीके रुपमें नियुक्त होता है. उसको अन्य कार्य भी दिया जाता है. न तो वह कभी इमेल पढता है. न तो  वह मोबाईल पर प्रेषित आवेदनका उत्तर देता है. उससे काम करवाना है तो आपको उसको मिलने जाना पडता है. लेकिन वह आपको, और सरकारी अफसरोंकी तरह यह बात, लिखके नहीं देगा. जिल्ला मेजीस्ट्रेट (डीस्ट्रीक्ट कलेक्टर) के कार्यालयमें एक और चूनाव अधिकारी होता है. राज्यके सचिवालयमें एक खास (स्पेसीयल ड्युटी) सचिव होता है. इनका काम क्या होता है वह पता नहीं है. लेकिन इनके साथ आप लिखित संवाद नहीं कर सकते क्यों कि वे आपके आवेदनका उत्तर नहीं देगा.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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