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१९७७ का विपक्षी गठ बंधन २०२४ का विपक्षी गठबंधन भाग – १

१९७७का गठबंधन क्यों हुआ था?

विपक्षी गठबंधन के समय शासक पक्ष नहेरुवीयन इंदिरा कोंग्रेस पक्ष था जो कोंग्रेस (आई) यानी कि, कोंगी नामसे जाना जाता था.

प्रस्तावनाः

कोंग्रेसका पक्षका जन्म कब हुआ?

१९२०में कोंग्रेसने अपना ध्येय पूर्ण स्वराज्य का घोषित किया. तबसे कोंग्रेसका जन्म हुआ.

ऐसा क्यों?

पक्ष हमेशा अपने ध्येय से और उस ध्येयको कैसे प्राप्त करना उसके तरिकेसे जाना जाता है. संपूर्ण  स्वराज्यका तरिका था अहिंसक आंदोलन.

१९२० में कोंग्रेसमें  जो गुट  बाजी चलती थी  उसका अंत हो गया और लोकमान्य टीळख और गोपालकृष्ण गोखलेके गुट मिल गये. १९२० से १९४६ तक के कोंग्रेसके इतिहासकी हम चर्चा नहीं करेंगे. अनेक विपक्षोंका जन्म हुआ और नष्ट भी हुए. अनेक आंदोलन भी हुए और बंद भी हो गये. किंतु इसके अंतर्गत आम जनता अति जागृत हो गयी थी. और इस कारण अंग्रेज सरकारको लगा कि अब उन्हे जान पडेगा. अंग्रेज सरकारने अपनी आदत के अनुसार ऐसा सोचा कि हम भारतको अनेक टूकडोमें विभाजित करके ही जायेंगे ताकि भारत सौ साल तक सक्षम बन ही न शके. भारतकी जनता को  फर्जी इतिहास पढाके,  भारतको और धर्म को आधार बनाके भारतको हिंदुस्तान, पाकिस्तान, दलितीस्थान, खालिस्तान, द्रविडीस्तान, एवं देशी राज्योंको उकसाके उनको स्वतंत्र हिंदुस्तानसे अलग रहेनेका विकल्प भी दिया था. चर्चील को अनुभूति भी हो गयी थी के स्वार्थी और भ्र्ष्ट और लालची लोग इकट्ठा रह ही नहीं पायेंगे.

लेकिन उसने महात्मा गांधी, सरदार पटेल, क्रिपलानी, जयप्रकाश नारायण, विनोबा भावे, कनैया लाल मुंशी, मोरारजी देसाई, चक्रवर्ती राजगोपाला चारी आदि कईयोंको अक्षम और उलज़े हुए मानने की गलती की. गांधीजीने सबको संभाला और नहेरु और जीन्ना के सिवा सबको मना लिया. नहेरुने सोचा कि यही सबसे अच्छा मौका है सत्ता प्राप्तिका और प्रधान मंत्री बनने का. वे कोंग्रेसको तोडनेके लिये सज्ज हो गये. नहेरुने बोला  जीन्नाको तो मैं अपने कार्यालयमें चपरासीके पद पर भी नहीं रखुंगा. इस तरह हिंदुस्तान और पाकिस्तान ऐसे विभाजन होना सुनिश्चित हो गया.

पक्षमें एक केंद्रीय कार्यकारी समिति होती  है और विभागीय कार्यकारी समितियां होती है. विभागीय समितियां आम सदस्योंसे जूडी हुयी होती है.

आम सदस्य जनतासे जुडे हुए ते है.

नहेरु, संगठन कक्षा पर मजबुत नेता नहीं थे. पर आम जनतामें ठीक ठीक लोकप्रिय थे. आम जनता को नौटंकी पसंद होती है, और नहेरुभी नौटंकी बाज थे. इसलिये उत्तरभारतमें वे युवाओंमें लोकप्रिय थे (क्यों कि नेताजी सुभाष चंद्रबोज़ का अभाव था). गांधीजीको नहेरुका चरित्र मालुम था. गांधीजीने सोचा यदि कोंग्रेस का विभाजन हो गया तो कोंग्रेस कमजोर बन जायेगी और जो केबीनेट मीशन आया है उसके साथ विभाजन के विषय लेनदेन में दबाव बनानेमें अक्षम रहेगी. यदि नहेरुको पक्षप्रमुख नहीं बनाया तो वह कोंग्रेसको तोडकर  समाजवादी कोंग्रेस बना देंगे और उनको उत्तरभारतमें समर्थन भी मिल जायेगा. तो एक और टूकडा बन जायेगा. नहेरुको कुछ मुस्लिम नेताओंका भी समर्थन प्राप्त था. नहेरुने स्वयं कहा था कि वे वैचारिक तरिकेसे ख्रीस्ती हूँ. गांधीजीने सरदार पटेलको विश्वासमें ले के नहेरुको पक्षके प्रमुख बना दिया.

गांधीजीने कोंग्रेसको आदेश दिया कि केबीनेट मीशनका ही बहिष्कार करो. लेकिन कोंग्रेस कारोबारी इसके उपर सहमत नहीं थी. गांधीजीने केबीनेट कमीशनके साथ संवाद करनेमें अपनी सदस्यता रद कर दी. उन्होंने कहा जिस कोंग्रेसने विभाजके लिये संमति दी हो, उस संवाद समितिका मैं हिस्सेदार नहीं रह सकता. कोंग्रेसको जो कुछ भी करना है वह अपनी जवाबदारी पर करें. जीन्नाने डाईरेक्ट एक्षन का एलान किया और दंगे फसाद होने लगे तो गांधीजीने कहा मै इन दंगोंको रोकनेमें सक्षम हूँ. क्या आप लोग सक्षम है? गांधीजीने देशके विभाजन के लिये सहमति दे दी.

सरदार पटेल की मुत्सद्दीसे भारतका दो ही टूकडोमें विभाजन हुआ. सरदार पटेलने साम, दाम, और दंड के तरिके अपनाके सभी देशी राज्योंका भारतमें विलीनीकरण कर दिया. देशी राज्योंके भारतमें विलीनीकरणसे सरदार पटेलका कद बहूत ही बढ गया था.

गांधीजीने बोला “अब कोंग्रेसका ध्येय पूरा हो गया है. अब कोंग्रेसका विलय कर दो.“ अब यदि कोंग्रेसके टूकडे भी हो जाय तो भी कोई हर्ज नहीं था. यह बात लंबी है. इस लिये इस बात को यहीं पर ही विराम देते है.

१९४८ जानवरीमें गांधीजीका खून हो गया. और चूनाव आते आते सरदार पटेलका भी देहांत हो गया. अब नहेरुका संगठन पर संपूर्ण कबजा हो गया. और उन्होनें अपने प्रतिस्पर्धीयोंको एक एक करके निकम्मे बनाना चालु किया, और जो प्रतिस्पर्धी थे वे भी कोंग्रेस छोडके अलग हो गये. और कुछ नेताओंने अपना पक्ष भी बना लिया. अब कोंग्रेस नहेरुवीयन कोंग्रेस बन गयी.

इस प्रकार विपक्षोंका जन्म हुआ.

एक तरफ भ्रष्ट और सत्ताकी लालची नहेरुवीयन कोंग्रेस थी. और दुसरी तरफ नैतिकतासे जूडे हुए भीन्न भीन्न वैचारधारा वाले विपक्ष थे.

क्रमशः

शिरीष मोहनलाल दवे

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हम कैसे वितंडावादीको परिलक्षित (आइडेन्टीफाय) करें?

हम कैसे वितंडावादीको परिलक्षित (आइडेन्टीफाय) करें?

वितंडावाद क्या है?

यदि कोई, चर्चाके विषय पर असंबद्ध, प्रमाणहीन और स्वयंसिद्ध विधिसे चर्चा प्रस्तूत करें, इसको वितंडावाद कहा जाता है. वितंडावादका प्रयोजन वैसे तो पूर्वग्रह भी हो सकता है. किन्तु क्वचित ऐसा भी होता है कि, स्वयंमें कोई पूर्वग्रह है या नहीं वह लेखक स्वयंको ज्ञात होता नहीं है.

यदि लेखकको ज्ञात होता है कि, अपना पक्ष सही नहीं है तत्‌ पश्चात्‌ भी वह वितंडावाद करता है तो उसका प्रयोजन वह किसी सांस्कृतिक समूहके ध्येय पर वह काम कर रहा है. लेखक उस समूहका सदस्य हो सकता है. कोई एक समूहका सदस्य होनेके कारणसे वह उस समूहके ध्येय के अनुसार लिखता है. तात्पर्य यह है कि लेखक जो विवरण उसके ध्येयके अनुरुप नहीं है उसको प्रकट नहीं करता है और जो ध्येयको अनुरुप है उसको किसी भी प्रकार प्रकट किया करता है.

वितंडावादी को कैसे परिलक्षित (पहेचाने) करे?

कोमन मेन

जैसे कि, कोई एक समय “जे.एन.यु.” में देशविरोधी सूत्रोच्चार किया गया. इस घटनाका विवरण किन किन वैचारिक जूथोंने कैसे किया था? याद करो.

सर्व प्रथम सूत्रोच्चारोंसे अवगत हो

“भारत तेरे टूकडे होगे, इन्शाल्ला इन्शाल्ला

“कश्मिरको चाहिये आज़ादी … आज़ादी …  छीनके लेंगे आज़ादी … आज़ादी … लडके लेंगे आज़ादी … आज़ादी…

“अफज़ल हम शर्मींदा है … तेरे कातिल जिन्दा है …

“कितने अफज़ल मारोगे हर घरसे अफज़ल निकलेगा …

इन सूत्रोंसे संदेश क्या मिलता है?

संदेश तो यह है कि इन लोगोंको “भारतको तोडना है”,

सूत्रोच्चार करनेवाले देशहितके विरोधी है,

सूत्रोच्चार करनेवाले देशविरोधी वातावरण बनानेका प्रयत्न कर रहे है,

सूत्रोच्चार करनेवाले जनतंत्रमें मानते नहीं है,

सूत्रोच्चार करनेवाले संविधानमें मानते नहीं है,

सूत्रोच्चार करनेवाले अहिंसामें मानते नहीं है, पर्याप्त जनाधार न होनेके कारण इन्होंने हिंसा नहीं की किन्तु हिंसाके लिये प्रचार अवश्य किया.

हिंसाका साक्ष्य नहीं

कुछ मूर्धन्य लोग, इस घटनामें  प्रत्यक्ष हिंसाका साक्ष्य (एवीडन्स) नहीं होने से,  इन सूत्रोंच्चार करनेवालोंको अहिंसक मानते है और ऐसी ही एक प्रणाली स्थापित करना चाहते हैं,

चूकि इसमें प्रत्यक्ष हिंसाका साक्ष्य नहीं है इसको लोकतंत्रके अधिकारके रुपमें देखते है,

यह विद्यार्थीगण, जे.एन.यु.में शिक्षा प्राप्त करनेके लिये आते है और इन सूत्रोच्चारोंको शिक्षाके एक  परिमाणके रुपमें समज़ते है और स्थापित करना चाहते हैं. यानी कि ऐसा करना शिक्षाका एक भाग है.

इस घटनाके संबंधित बिन्दु (टोपिक) क्या है?

ये सभी सूत्र घटनाकी चर्चाके  बिन्दु ही तो हैं. इनके उपर चर्चा हो सकती है.

प्राथमिकता किन किन बिन्दुओंको दी जाय?

(१) सूत्रोंको  प्राथमिकता देना आवश्यक है,

(२) सूत्रोंका पूर्वनियोजित रीतिसे समूह द्वारा उच्चारण करवाना इनमें विद्यार्थीयोंका ध्येय तो निहित है, तो इन विद्यार्थीओं पर कार्यवाही किस प्रमाण-प्रज्ञाने होना आवश्यक है, तो इनके उपर चर्चा की जाय.

(३) इन विद्यार्थीयोंकी पार्श्वभूमि क्या है उसका भी अन्वेषण होना आवश्यक है इसके उपर चर्चा होना आवश्य्क है,

(४) इन विद्यार्थीयोंने क्या और कैसे आयोजन किया था उसके उपर अन्वेषण होना आवश्यक है इसके उपर भी चर्चा हो सकती है,

(५) यह घटना देशके लिये श्रेय है या नहीं इसके उपर चर्चा हो सकती है,

(६) इन विद्यार्थीयों पर कार्यवाही करके कितना दंड देना आवश्यक है इसके उपर चर्चा हो सकती है,

(७) इन विद्यार्थीयोंके बाह्य सहयोगी कौन कौन है और उनका कार्यक्षेत्र क्या है उसके उपर अन्वेषण होना आवश्यक है इसके उपर चर्चा आवश्यक है.

किन्तु यदि आप बीजेपी शासनके विरोधी है तो आप क्या करोगे?

तो आप सूत्रोंका उल्लेख ही विवरणमें करोगे नहीं.

कुछ समाचार माध्यमके विश्लेषकोंने “सूत्रों”का उल्लेख ही उचित नहीं माना, यानी कि “सूत्रों”के अर्थका कोई महत्त्व ही नहीं है. इन महानुभावोंने “सूत्रों”को उपेक्षित ही किया.

उनका कहेना है  शासनके विरुद्ध अहिंसक विद्रोह करना संविधानिक अधिकार है … सूत्रोंसे देशको हानि नहीं होती … कई राजकीय पक्षोंके नेता और समाचार माध्यमोंके संवादक इन विद्यार्थी नेताओंका साक्षात्कार करनेके लिये तत्पर बने और उनका साक्षात्कार भी किया. राहुल गांधी जैसे मूर्ख नेताओंने तो इन नेताओंको कह भी दिया कि “ … तूम आगे बढो … हम तुम्हारे साथ है …”

मूर्धन्योंके, नेताओंके और समाचार माध्यमोंके इस प्रकारके प्रचारसे क्या होता है?

ऐसी घटनाओंका पुनरावर्तन होता है. 

अन्य कोमवादी मानसिकता रखनेवाली शिक्षा-संस्थाओंके विद्यार्थीओंने जे.एन.यु. के विद्यार्थीयोंके समर्थनमें प्रदर्शन किये. इनसे जे.एन.यु. के विद्यार्थीयोंके मनोबलमें असीम वृद्धि हुई.

बीजेपी शासनने जे.एन.यु. के नियमोंमें कुछ संशोधन किया.

क्यों संशोधन किया?

“अरे भाई, हम तो दोघलापन दिखानेवाले है ही नहीं. जो अन्य सरकार संचालित संस्थाएं है उसमें जो शिक्षण फीस और अन्य शुल्क शिक्षार्थीयोंसे लिये जाते है उसके साथ जे.एन.यु. के फीस और शुल्क तुलनात्मक होना आवश्यक है. यह आवश्यक नहीं है कि यदि कोई न्यायालयमें जाके न्याय मांगे और न्यायालय आदेश करें तभी हम फीस और शुल्कमें तुलनात्मकतासे परिवर्तन करें. सरकारी अन्य संस्थाएं, जे.एन.यु.से, प्रतिविद्यार्थी दशगुना खर्च करती है. यह सरकार पक्षपात्‌ नहीं कर सकती. पक्षपात्‌ करना भारतीय संविधानके विरुद्ध है.

“लेकिन जे.एन.यु. एक विशिष्ठ संस्था है …

“देशमें कई संस्थाएं विशिष्ठ है … वीजेटीआई, खरगपुरकी आई.टी.आइ. रुडकी आई.टी.आई. …

जी हाँ … सरकारने जेएनयुमें फीस और शुल्कमें वृद्धि की. अब इस वृद्धिका विवरण हम करेंगे नहीं. क्यों कि ये सब विवरण “ऑन-लाईन” पर उपलब्ध है.

किन्तु अब आप देखो मूर्धन्योंका वितंडावाद.

किस मूर्धन्यकी हम बात करेंगें?

प्रीतीश नंदीकी बात हम करेंगे.

डीबीभाईने [(दिव्य भास्कर दैनिक दिनांक २०-११-२०१९) गुजराती प्रकाशन ] प्रीतीशका लेख

यह प्रीतीशभाई, “जे.एन.यु. घटना”की सद्य घटित घटना जिसमें  फीस-शुल्क वृद्धिके अतिरिक्त कुछ विशेष भी संमिलित है उन बातोंको पतला-दुर्बल करनेके लिये नक्षलवादके जन्म तक पहूँच जाते है. और विवरणका प्रारंभ वहाँसे करते है.

“विद्यार्थी तो पहेलेसे ही विद्रोही होता है,

 “मैं जब महाविद्यालयमें था …. मुज़े पता चला कि कुछ अदृष्य हुए विद्यार्थी क्या कर रहे थे !!! अरे वे तो किसान और भूमिहीनोंकी लडाई लडनेके लिये देहातोंमें गये थे. वे तो संघर्ष करते थे. और कुछ तो उसमें शहिद भी हो गये. … अरे ये विद्रोही विद्यार्थीयोंमें कई लोग तो धनवान माता-पिताकी संतान थे … ये विद्यार्थी लोग सुविधाजनक जिंदगीसे उब चूके थे …” वगैरा वगैरा … तत्त्वज्ञान और त्याग … की बातें हमारे प्रीतीशभाईने लिख डाली. क्यों कि उनको जे.एन.यु. के विद्यार्थीयोंकी असाधारणता और उत्कृष्टता सिद्ध करनेके लिये ऐसी एक भूमिका बनानी है. चाहे उसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुपसे भी सीधा या टेढा-मेढा संबंध भी न हो, तो भी.

जैसे कि

“हालके नोबेल पुरस्कारके विजेता के पिता भी हमारे महाविद्यालयमें हमारे अध्यापक थे.”

भला ! यह भी कोई तर्क है?

फिर हमारे प्रीतीशभाई, इन कुछ विद्यार्थीयोंकी तथा कथित “जीवनकी सार्थकताकी शोधकी तालाशामें थे” इस बातका जीक्र करते है.

“उस समयकी कविताएं, नाट्यगृहके नाटक, मूवीज़, शानदार वार्ताएं … आदि, उनकी निरस जीवनको पडकार दे रही थीं. … ये लोग तो समाजको एक कदम आगे ले गये थे … लेकिन समाजको बदलनेका उनके स्वप्नको किसीने भी सहयोग नहीं दिया … कोंग्रेस ने भी … (हंसना मना है)

फिर हमारे प्रीतीशभाई फ्रांस, जर्मनी, युरोपके देशों की बाते करते है. उन देशोंके तथा कथित हिरोका नाम लेते है. चाल्स द गॉल के विरुद्ध युवानोंने अभियान चलाया इस बातका भी उल्लेख करते है.

शायद प्रीतीशभाई पचास या साठके दशककी बातें कर रहे है.

“विद्यार्थी तो विद्यार्थी है, उसको तो पढाईमें ध्यान देना चाहिये”. इस बातको प्रीतीशभाई नकारते है. और उसी तर्क का आवर्तन करते है कि सूत्रोच्चार करने के लिये विद्यार्थीयोंको “टूकडे टूकडे गेंग” और “देश द्रोही” के आरोपी बनाये जाता है. प्रीतीशभाई यह भी लिखते है कि “विद्यार्थी विरोध नहीं करेगा तो कौन विरोध करेगा?” प्रीतीशभाई इस के समर्थनमें लिखते है कि अमेरिकाके  विद्यार्थीयोंने विएटनाम युद्धका विरोध किया था, ब्रीटनके विद्यार्थीयोंने  ब्रेक्ज़िटका विरोध किया था तो किसीने भी उनको “देशद्रोह”का लेबल नहीं लगाया था, तो यदि “जे.एन.यु. घटना” पर जे.एन.यु.के विद्यार्थीयों पर देशद्रोहका आरोप क्यों?

प्रीतीशभाईने  “वादोंका” भी जीक्र भी करते है.

१०० प्रतिशत लेख इन असंबंध विवरणोंसे भरा है.

क्या हमारे मूर्धन्य लोग सीधी बात नहीं कर सकते?

लोकशाहीमें सूत्रों को पूकारे जाते हैं किन्तु उसकी एक प्रक्रिया होती है. केवल सूत्र पूकारना एक गंदी सियासत है. आओ चर्चा करें…

आपके विश्वविद्यालयमें ही आपसे भीन्न विचारधारा रखनेवालोंसे  चर्चा सभा आयोजित करो. वियेतनाम युद्ध या चाल्स द गॉल या ब्रेक्ज़िट और अफज़लको फांसी   आदि ये तुलनात्मक विषय नहीं है. कमसे कम भारतके मूर्धन्यों की प्रज्ञानेमें यह भ्रम नहीं होना चाहिये.

प्रीतीश भाई कहेते है कि;

“ जे.एन.यु. के विद्यार्थीयोंका अनुरोध (डीमान्ड) न तो विश्वविद्यालय की फीसमें वृद्धि के विरोधमें है, न तो शुक्ल वृद्धिके विरोधमें है, न तो नियमोंमें किये गये परिवर्तनके विरोधमें है, न तो उपाहार गृह ११ बजे तक ही खूला रहेगा उसके विरोधमें है … वास्तवमें उनका विरोध वे उस जगतका विरोध कर रहे है जिसमें वे है, जिस दुनिया उनकी सरलता, निरापराधताकी परीक्षा ले रही है…..

इन विद्यार्थीयोंको (जिनके नेताविद्यार्थीगण २६ वर्षसे ४१ वर्षके है) उनको नियमबद्ध करना और भयभित करना बंद करो …. क्यों कि ऐसा करनेसे हमारे ये विद्यार्थी, वाहियात कायदाओंको मानने वाले हमारे जैसे स्वप्नहीन और बिनादिमागवाले बन जायेंगे … आदि आदि आदि “.

भाई मेरे प्रीतीश, क्या तत्त्वज्ञान चलाया है आपने, जिसमें कोई सुनिर्देशित मुद्दा ही नहीं है. प्रीतीशभाई का लेख एक ऐसे असंबंद्ध अनिश्चित बातोंसे पूर्ण होता है.

पढनेके पश्चात्‌ हमे लगता है कि हम कोई मूर्धन्यका लेख पढ रहे है या  कोई स्वयं प्रमाणित, स्वयंप्रमाणित सर्वतत्त्वज्ञ संत रजनीश मल जैसे बाबाका लेख?

लोकशाहीमें विरोध आवश्यक है. चर्चा आवश्यक है.  यह बात तो नरेन्द्र मोदी भी कहेते है. किन्तु विरोध करने की भी रीत होती है.

महात्मा गांधीको पढो.

कमसे कम उनका “मेरा स्वप्नका भारत” पढो और विरोध कैसे किया जाना चाहिये उनके उपर भी उन्होंने स्पष्ट रुपसे लिखा है. यदि आप शास्त्र पढनेमें मानते नहीं है और आप जिसको आपका हक्क समज़ते है और वही हक्क दुसरोंका नहीं होना चाहिये ऐसा ही मानते है तो सरकार अपनी दंड संहितासे आपको दंडित करेगा.

किन्तु दुःखकी बात यह है कि भारतके मूर्धन्य भी पूर्वग्रह से पीडित है और वे स्वयं वितंडावाद में ग्रस्त है.

शिरीष मोहनलाल दवे

चमत्कृतिः

अविज्ञातप्रबंधस्य वचः वाचस्पतिः इव I

व्रजति अफलतां एव नयत्युह इव अहितम्‌ II

बृहस्पतिकी वाणी जैसी उक्ति भी यदि संदर्भहीन हो तो, वह भी अन्याय करने वाले मनुष्यकी तरह निरर्थक है.

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सोमनाथका मंदिर कैसे तोडा जाय? भाग-१

सोमनाथका मंदिर कैसे तोडा जाय? भाग-१

यदि आप बछडेकी सरे आम और वह भी सडक पर हत्या कर सकते है और बछडेके मांसको पका सकते है और मांसका वितरण कर सकते है और भोजन समारंभ कर सकते है तो अब तुम कई सारे कार्य कर सकते हो. सोमनाथका मंदिर तोडने के लिये आगे बढो. प्रदर्शन करना, कानुन भंग करना जनतंत्रमें आपका अधिकार है.

लोग पूछेंगे आप किससे बात कर रहे हो? कौन तोडेगा सोमनाथका मंदिर?

नहेरुवीयन कोंग्रेस ही सोमनाथका मंदिर तोड सकती है. सामान्य मुसलमान लोगोंके लिये यह बसकी बात नहीं है. यदि नहेरुवीयन कोंग्रेस द्वारा सोमनाथका मंदिर तोडा जाय तो भारतके अधिकतर मुसलमान अवश्य आनंदित होगे. पाकिस्तान के लोग भी आनंदित होगे. इससे पाकिस्तान और हिंदुस्तानके संबंधोंमे सुधार आयेगा. नहेरुवीयन कोंग्रेसका और उसके सांस्कृतिक साथीयोंका ध्येय मुसलमानोंको आनंदित करना ही तो है.

“दो बैलोंकी जोडी”

गाय के ब्रह्मरंध्रके हिस्सेमें परमेश्वरका वास है. वैसे तो गायमें सभी देवताओंका वास है. किन्तु सबसे वरिष्ठ, ऐसे देवाधिदेव महादेव ब्रह्मरंध्रमें बिराजमान है. देवताओंके अतिरिक्त सप्तर्षियोंका भी वास है. गाय का दूध, गोबर और मूत्र, औषधि माना जाता है. हमारे बंसीभाई पटेल, कुछ वर्षोंसे केवल गायके दूध पर ही जीवन व्यतित कर रहे हैं. वे ९५ वर्षके है और तंदुरस्त है.

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महात्मा गांधीकी कार्य सूचिमें मदिरा-निषेधके पश्चात्‌ गौ-वंश वध निषेध आता था. उसके पश्चात्‌ स्वावलंबन और अहिंसा आदि “मेरे स्वप्नका भारत और हिन्द स्वराज”में लिखी गई कार्य सूचिमें आते थे.

नहेरुको महात्मा गांधीकी यह मानसिकता पसंद नही  थी. किन्तु नहेरुका कार्य सूचिमें प्रथम क्रम पर सत्ता, और उसमें भी सर्वोच्च शक्तिमान प्रधानमंत्री पद था. यदि वे निर्भय होकर सामने आते और “मनकी बात” प्रदर्शित करते तो उनके लिये प्रधानमंत्रीका पद आकाशकुसुमवत बन जाता.

इस कारणसे नहेरुने महात्मा गांधीका कभी भी विरोध नहीं किया.

भारतीय संविधानमें ही मदिरा-निषेध, गौवध-निषेध और अहिंसक समाजकी स्थापना, ऐसे कर्य-विषयोंका समावेश किया जाय ऐसी महात्मा गांधीकी महेच्छा थी. ये बातें महात्मागांधीके “हिन्द-स्वराज्य”में स्पष्ट रुपसे लिखित है. संविधानकी रचनाके कालमें तो कई सारे महात्मा गांधीवादी, विद्यमान थे. नहेरुने तो कोई संविधान लिखा नहीं. हां नहेरुने भारतका इतिहास जो अंग्रेजोने लिखा था उसका “कोपी-पेस्ट” किया था. नाम तो डीस्कवरी ऑफ ईन्डीया लिखा था, किन्तु कोई डीस्कवरी सुक्ष्मदर्शक यंत्रसे भी मिलती नहीं है.

बाबा साहेब आंबेडकरने भारतका संविधान लिखा है. नहेरुने केवल स्वयंको जो विपरित लगा उनको निर्देशात्मक सूचिमें समाविष्ठ करवा दिया. निर्देशात्मक सुचिमें समावेश  करवाया उतना ही नहीं, उनको राज्योंके कार्यक्षेत्रमें रख दिया.

उत्तर प्रदेश सर्वप्रथम राज्य था जिसने गौवध निषेध किया. उस समय नहेरुने आपत्ति प्रदर्शित की थी, और त्याग पत्र देनेकी भी धमकी भी दी थी, किन्तु तत्कालिन पंतप्रधानने उनकी धमकीकी अवगणना की.

नहेरु अपने को धर्म निरपेक्ष मानते थे और वे अपने अल्पसंख्यकोंको अनुभूति करवाना चाहते थे कि वे (स्वयं परिभाषित परिभाषाको, स्वयं द्वारा ही प्रमाणित) धर्मनिरपेक्षता पर प्रतिबद्ध थे.

नहेरुकी यह मानसिकता, नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण और उनसे अभिभूत अनुयायीगणमें भी है. अभिभूत शब्द ही सही है.

एक समय था जब कोंग्रेसका पक्षचिन्ह दो-बैलोकी जोडी था. बैल भी गायकी ही प्रजातिमें आता है. १९६९में नहेरुवीयन कोंग्रेसका, नहेरुकी फरजंद ईदिरा गांधीकी नेतागीरीवाली, और कोंग्रेस संगठनकी सामुहिक नेतागीरीवाली, कोंग्रेसमें विभाजन हुआ. कोंगी [कोंग्रेस (आई)], कोंगो [कोंग्रेस (ओ)].

गाय बछडावाली नहेरुवीयन कोंग्रेस

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ईन्दीरा गांधीमें नहेरुके सभी कुलक्षण प्रचूर मात्रामें थे. अपने पक्षका चिन्ह उसने गाय-बछडा रक्खा जिससे हिन्दुओंको और खास करके कृषक और गोपाल समाजको आकर्षित किया जा सके. ईन्दिरा गांधीने आचारमें भी जनताका विभाजन, धर्म और ज्ञातिके आधार पर किया. जब वह शासन करनेमें प्रत्येक क्षेत्रमें विफल रही तो उसने आपत्‌ काल घोषित किया.

I CAN DEFEAT YOU

इस आपात्‌ काल अंतर्गत विनोबा भावे ने ईन्दिरा गांधीको पत्र लिखा की “गौ-हत्या”का  निषेध किया जाय, नहीं तो वे आमरणांत अनशन पर जायेंगे. आपात्‌कालके अंतर्गत तो समाचार माध्यममें शासनके विरुद्ध लिखना निषेध था. इस लिये विनोबा भावे के पत्रको प्रसिद्धि नहीं मिली. ईन्दिरा गांधीने आश्वासन दिया की वह गौ-हत्या पर निषेध करेगी और उसने समय मांगा. विनोबा भावे तो शतरंजके निपूण खिलाडी थे. उनको तो परीक्षा करनेकी थी कि इन्दिरा गांधी पूरी तरह मनोरोगी हो गई है या नहीं. विनोबा भावेको लगा कि ईन्दिरा गांधी पूर्णतया मनोरोगी नहीं बन गयी है किन्तु रोग अवश्य आगे बढ गया है. इसलिये उन्होने आचार्य संमेलन बुलाया. इसकी बात हम यहां नहीं करेंगे.

विनोबा भावे को यह अनुभूति नहीं हुई कि जब कोई पक्षका नेता स्वकेन्द्री और दंभी बन जाता है तो ऐसी मानसिकता उनके पक्षके अधिकतर सदस्योंमें भी आ जाती है. ये लोग तो अपने नेतासे भी आगे निकल जाते है. और शिर्षनेतागणको यह उचित भी लगता है क्यों कि पक्षके एक सदस्यने यदि कोई अभद्र व्यवहार किया और पकडा गया, तो शिर्ष नेतागण स्वयंको उससे वे सहमत नहीं है ऐस घोषित कर सकते है और आवश्यकता अनुसार स्वयंको वे, उससे असहमत और भीन्न है ऐसा दिखा सकते है.

नियमोंवाला संविधान किन्तु आचारमें मनमानी

नहेरुवीयन कोंग्रेसने नियम तो ऐसे कई बनाये है. किन्तु नियम ऐसे क्षतिपूर्ण बनाये कि वे नियम व्यंढ ही बने रहे. ऐसे नियम बनानेका उसका हेतु अबुध जनता को भ्रमित करनेका था. उनका कहना था कि “देखो, हमने तो नियम बनाये है, किन्तु उसका पालन करवाना शासनका काम है. यदि कोई राज्यमें विपक्ष का शासन है तो नहेरुवीयन कोंग्रेस ऐसा कहेगी कि “यह तो राज्यका विषय है” यदि वहां पर नहेरुवीयन कोंग्रेसका शासन है तो उसका कथन होगा “हमने विवरण मांगा है ….” या तो “अभी तो केस न्यायालयके आधिन है … देखते हैं आगे क्या होता है. … हम प्रतिक्षा कर रहे हैं”. यदि न्यायालयने नियम तोडनेवालेके पक्षमें न्याय दिया तो नहेरुवीयन कोंग्रेस कहेगी कि “हम अध्ययन कर रहे है कि कैसे संशोधन किया जाय.”

नहेरुवीयन कोंग्रेस द्वारा आपने गौ-मांस-भोजन-समारंभ तो देखे ही है.

निर्देशात्मक नियमोंका दिशा सूचन

समाजमें सुधार आवश्यक है. किन्तु समाज अभी पूरी तरह शिक्षित हुआ नहीं है. इसीलिये क्रमशः सुधार लाना है. निर्देशात्मक नियमोंका  यह प्रयोजन है. वे दिशासूचन करते हैं. यदि कोई राज्यका शासन नियम बनानेकी ईच्छा रखता है तो वह निर्देशात्मक नियमकी दिशामें विचारें और नियमका पूर्वालेख, नियमको उसी दिशामें, आचारके प्रति, शासनको प्रतिबद्ध करें. यही अपेक्षा है. निर्देशित दिशासे भीन्न दिशामें या विरुद्ध दिशामें नियम बनाया नहीं जा सकता.

नहेरुवीयन कोंग्रेस शासित राज्योंमें, जो नये नियम बने, वे अधिकतर निर्देशित सिद्धांतोसे विपरित दिशामें है. जैसे कि मद्य-निषेध. उन्नीसौसाठके दशकमें महाराष्ट्र स्थित नहेरुवीयन कोंग्रेसने मद्यनिषेधके नियमोंको सौम्य बनया ताकि ज्यादा लोग मद्यपान कर सके.

असहिष्णुताकी वोट बेंक बनाओ

 

धर्म के आधार पर विभाजन इस हद तक कर दो कि लोग अन्य धर्मके प्रति असहिष्णु बन जाय. हिन्दुओंको विभाजित करना तो सरल है.

वेमुला, अखलाक, कन्हैया जैसे प्रसंगोंको कैसे हवा दी गयी इस बातको हम सब जानते है. यदि कोई हिन्दु जरा भी असहिष्णु बने तो पूरे हिन्दुओंकी मानसिकताकी अपकिर्ती फैला दो.

नहेरुवीयन कोंग्रेसने ऐसी परिस्थिति बना दी है कि यदि कोई सुरक्षाकर्मी,  जीपके आगे किसी पत्थरबाज़ को बांध दे और सुरक्षा कर्मीयोंको पत्थरबाज़ोंसे बचायें और परिणाम स्वरुप आतंक वादियोंसे जनताकी भी सुरक्षा करें, तो फारुख और ओमर जैसे मुस्लिम लोग आगबबुला हो जाते हैं.

यदि फारुख और ओमर इस हद तक जा सकते है तो नहेरुवीयन कोंग्रेसको तो फारुख और ओमरसे बढकर ही होना चाहिये न !!

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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पी.के. ने पीके किया नशा? कथांक – १

कूर्म पुराण और महाभारतमें एक सुसंस्कृत श्लोक है.

(१) आत्मनः प्रतिकुलानी परेषां न समाचरेत.
इसका अर्थ है;

जो वस्तु, स्वयंके लिये (आप) प्रतिकुल (मानते) है, (उसको आप) दुसरोंके उपर मत (लागु) करो.
इसका अर्थ यह भी है, कि जो आचार आप स्वयंके हितमें नही मानते चाहे कोइ भी कारण हो, तो वह आचार आप अन्यको अपनाने के लिये नही कह सकते.
इसका निष्कर्सका गर्भित अर्थ भी है. यदि आपको अन्य या अन्योंको आचारके लिये कहेना है तो सर्व प्रथम आप स्वयं उसका पालन करो और योग्यता प्राप्त करो.

क्या पी.के. में यह योग्यता है?

पी.के.की योग्यता हम बादमें करेंगे.
सर्व प्रथम हम इस वार्तासे अवगत हो जाय कि, फिलममें क्या क्या उपदेश है. किस प्रकारसे उपदेश दिया है और सामाजिक परिस्थिति क्या है.

संस्कृतमें नीतिशतकमें एक बोध है.
(२) सत्यं ब्रुयात्, प्रियं ब्रुयात्, न ब्रुयात् सत्यं अप्रियं.
सच बोलना चाहिये, किन्तु सत्य ऐसे बोलना चाहिये वह प्रिय लगे. अप्रिय लगे ऐसे सत्य नहीं बोलना चाहिये.
यदि आप स्वयंको उपदेश देनेके लिये योग्य समझते है तो आपके पास उपदेश देनेकी कला होनी आवश्यक है. क्या यह कला पी.के. के पास थी?

पी. के. की ईश निंदा

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(३) पूर्व पक्षका ज्ञानः
यदि एक विषय, आपने चर्चाके लिये उपयुक्त समझा, तो स्वयंको ज्ञात होना चाहिये कि चर्चा में दो पक्ष होते है.
एक पूर्व पक्ष होता है. दुसरा प्रतिपक्ष होता है.
पूर्वपक्ष का अगर आप खंडन करना चाहते है और उसके विरोधमें आप अपना प्रतिपक्ष रखना चाहते है, तो आपको क्या करना चाहिये?
पूर्वपक्ष पहेलेसे चला आता है इसलिये उसको पूर्वपक्ष समझा जाता है. और उसके विरुद्ध आपको अपना पक्ष को रखना है. तो आपका यह स्वयंका पक्ष प्रतिपक्ष है.
अगर आप बौद्धिक चर्चा करना चाहते है तो आपको पूर्वपक्षका संपूर्ण ज्ञान होना चाहिये तभी आप तर्क युक्त चर्चा करनेके लिये योग्य माने जायेंगे. अगर आपमें यह योग्यता नहीं है तो आप असंस्कृत और दुराचारी माने जायेंगे.
असंस्कृति और दुराचार समाजके स्वास्थ्य के लिये त्याज्य है.

(४) चर्चा का ध्येय और चर्चा के विषय का चयनः
सामान्यतः चर्चाका ध्येय, समाजको स्वस्थ और स्वास्थ्यपूर्ण रखनेका होता है. किसको आप स्वस्थ समाज कहेंगें? जिस समाजमें संघर्ष, असंवाद और विसंवाद न हो तदुपरांत संवादमें ज्ञान वृद्धि और आनंद हो उसको स्वस्थ समाज माना जायेगा. यदि समाजमें संघर्ष, वितंडावाद, अज्ञान और आनंद न हो तो वह समाज स्वस्थ समाज माना नहीं जायेगा.
आनंदमें यदि असमानता है तो वह वैयक्तिक और जुथ में संघर्षको जन्म देती है. उसका निवारण ज्ञान प्राप्ति है.
ज्ञान प्राप्ति संवादसे होती है.
संवाद भाषासे होता है.
किन्तु यदि भाषा में संवादके बदले विसंवाद हो तो ज्ञान प्राप्ति नहीं होती है.
ज्ञान प्राप्तिमें संवाद होना आवश्यक है. संवाद विचारोंका आदान-प्रदान है. और आदान प्रदान एक कक्षा पर आने से हो सकता है. विचारोंके आदान प्रदान के लिये उसके नियम होने चाहिये. इन नियम को तर्क कहेते है. कोई भी संवाद तर्कयुक्त तभी हो सकता है जब पूर्वपक्षका ज्ञान हो.

पी. के. स्वयंमें क्या योग्यता है?
स्वयंमें विषयके चयन की योग्यता है?
स्वयंमें विषय की चर्चा करनेकी योग्यता है? स्वयं को स्वयंके पक्षका ज्ञान है?
स्वयंमें पूर्वपक्षका ज्ञान है?
स्वयंके विचारोंका प्रदान तर्कपूर्ण है?

पी. के. अन्यको जो बोध देना चाहता है उस बोधका वह क्या स्वयं पालन करता है?
अंधश्रद्धा निर्मूलन यदि किसीका ध्येय है तो प्रथम समझना आवश्यक है कि अंधश्रद्धा क्या है.
अंधश्रद्धा क्या है?
अंध श्रद्धा यह है कि, कोई एक प्रणाली, जो परापूर्वसे चली आती है या कोई प्रणाली अचारमें लायी गई हो और उस प्रणालीकी उपयोगिता सही न हो और तर्कशुद्ध न हो.
क्या प्रणालीयां और उसकी तर्कशुद्धता की अनिवार्यता सिर्फ धर्म को ही लागु करने की होती है?
क्या अंधश्रद्धा धर्मसे ही संबंधित है?
क्या अंधश्रद्धा समाजके अन्य क्षेत्रों पर लागु नहीं होती है?
अंधश्रद्धा हर क्षेत्रमें अत्र तत्र सर्वत्र होती है.
अंद्धश्रद्धा समाजके प्रत्येक क्षेत्रमें होती है.
अगर अंधश्रद्धा हरेक क्षेत्रमें होती है तो प्राथमिकता कहा होनी चाहिये?

जो प्रणालीयां समाजको अधिकतम क्षति पहोंचाती हो वहां पर उस प्राणालीयों पर हमारा लक्ष्य होना होना चाहिये. इसलिये चयन उनका होना चाहिये.

पी. के. ने कौनसी प्रणालीयों को पकडा?
पी. के. ने धार्मिक प्रणालीयोंको पकडा.
पी. के. ने धार्मिक प्रणालीयोंको क्यूं पकडा?
पी. के. समझता है कि वह सभी धर्मोंकी, धार्मिक प्रणालीयोंके विषयोंके बारेमें निष्णात है. हां जी, अगर उपदेशक निष्णात नहीं होगा तो वह योग्य कैसे माना जायेगा?

पी. के. समझता है कि वह भारतीय समाजमें रहेता है, इसलिये वह भारतमें प्रचलित धार्मिक, क्षतिपूर्ण और नुकशानकारक प्रणालीयोंकी अंद्धश्रद्धा (तर्कहीनता) पर आक्रमण करेगा.
अगर ऐसा है तो वह किस धर्मकी अंधश्रद्धाको प्राथमिकता देगा?
वही धर्म को प्राथमिकता देगा जिसने समाजको ज्यादा नुकशान किया है और करता है.

कौनसे कौनसे धर्म है? ख्रीस्ती, इस्लाम और हिन्दु.

हे पी. के. !! आपका कौनसा धर्म है?
मेरा धर्म इस्लाम है.
आपके धर्ममें कौनसी अंधश्रद्धा है जिसको आप सामाजिक बुराईयोंके संदर्भ, प्रमाणभानके आधार पर प्राथमिकता देंगे?
पी. के. समझता है कि मुस्लिमोंकी अंधश्रद्धा वह शराब बंधी है, और वह भी प्रार्थना स्थलपर शराब बंधी है.
अब देखो पी. के. क्या करता है? वह मस्जिदके अंदर तो शराब ले नहीं जाता है. इस्लामके अनुसार शराब पीना मना है. लेकिन उसकी सजा खुदा देगा. शराबसे नुकशान होता है. अपने कुटूंबीजनोंको भी नुकशान होता है. शराब पीनेवालेको तो आनंद मिलता है. लेकिन पीने वालेके आनंदसे जो धनकी कमी होती है उससे उसके कुटुंबीजनोंको पोषणयुक्त आहार नहीं मिलता और जिंदगीकी सुचारु सुवाधाओंमें कमी होती है या/और अभाव रहेता है. शराब कोई आवश्यक चिज नहीं है. शराबके सेवनके आनंदसे शराबको पीनेवालेको तो नुकशान होता ही है. शराब पीना इस्लाम धर्मने मना है. किन्तु क्या इस्लामकी प्राथमिकता शराबबंधी है?

इस्लाममें क्या कहा है? इस्लामने तो यह ही कहा है कि, इस्लामके उसुलोंका प्रचार करो और जिनको मुसलमान बनना है उन सबको मुसलमान बनाओ. जब तक अन्य धर्मी तुमको अपने घरमेंसे निकाल न दें उसका कत्ल मत करो. उसका अदब करो.
क्या मुसलमानोंने यह प्रणाली निभाई है?
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. इसका अर्थ यह है कि भारतमें सब लोगोंको अपना अपना धर्म और प्रणालीया मनानेकी स्वतंत्रता है. इस स्वतंत्रताका आनंद लेनेके साथ साथ दुसरोंको नुकशान न हो जाय इस बातका ध्यान रखना है.

इस बातको ध्यानमें रखते है तो मुसलमान अगर शराब पीये या न पीये उससे अन्य धर्मीयोंको नुकशान नहीं होता है. अगर कोई मस्जिदमें जाता है तो वह वहां ईश्वरकी इबादतके बदले वह शराबी नशेमें होनेके कारण दुसरोंको नुकशान कर सकता है. इसलिये पूर्वानुमानके आधार पर इस्लामने शराब बंदी की है. यह बात तार्किक है. किन्तु यदि इसमें किसीको अंधश्रद्धा दिखाई देती है यह बात ही एक जूठ है.

तो पी. के. ने ऐसे जूठको क्यों प्राथमिकता दी?
प्राथमिकता क्या होनी चाहिये थी?
यदि अंधश्रद्धाको भारत तक ही सीमित रखना है तो, मुसलमानोंने किये दंगे और कत्लोंको प्राथमिकता देनी चाहिये थी. आतंकीयों और स्थानिक मुसलमानोंने मिलकर हिन्दुओंकी धर्मके नाम पर कत्लें की, हिन्दुओंको यातनाएं दी और दे भी रहे है वह भी तो अंधश्रद्धा है.

मुस्लिमोंकी अंधश्रद्धा क्या है?
इस्लामको अपनानेसे ही ईश्वर आपपर खुश होता है. अगर आपने इस्लाम कबुल किया तो ही वह आपकी प्रार्थना कबुल करेगा और आपके उपर कृपा करेगा.
ईश्वर निराकार है इस लिये उसकी कोई भी आकारमें प्रतिकृति बनाना ईश्वरका अपमान है. अगर कोई ईश्वरकी प्रतिकृति बनाके उसकी पूजा करगा तो उसके लिये ईश्वरने नर्ककी सजा निश्चित की है.
इस बातको छोड दो.

अन्य धर्मीयों की कत्ल करना तो अंधश्र्द्धा ही है.

१९९०में कश्मिरमें ३०००+ हिन्दुओंकी मुसलमानोंने कत्ल की. मुसलमानोंने अखबारोंमें इश्तिहार देके, दिवारों पर पोस्टरें चिपकाके, लाउड स्पीकरकी गाडीयां दौडाके, और मस्जीदोंसे घोषणाए की कि, अगर कश्मिरमें रहेना है तो इस्लाम कबुल करो, या तो इस मुल्कको छोड कर भाग जाओ, नहीं तो कत्लके लिये तयार रहो. इस एलान के बाद मुसलमानोंने ३००० से भी ज्यादा हिन्दुओंकी चून चून कर हत्या की. पांचसे सात लाख हिन्दुओंको अपना घर छोडने पर विवश किया. इस प्रकर मुसलमानोंने हिन्दुओंको अपने प्रदेशसे खदेड दिया.
आज तक कोई मुसलमानने हिन्दुओंको न्याय देनेकी परवाह नहीं की. इसकी वजह सिर्फ और सिर्फ मुसलमानोंकी अंधश्रद्धा ही तो है. लाखोंकी संख्यामें अन्यधमीयोंको २५ सालों तक यातनाग्रस्त स्थितिमें चालु रखना आतंकवाद ही तो है. यह तो सतत चालु रहेनेवाला आतंकवाद है. इससे बडी अंधश्रद्धा क्या हो सकती है?

किन्तु पी. के. ने इस आतंकवादको छूआ तक नहीं. क्यों छूआ तक नहीं?
क्यों कि वह स्वयंके धर्मीयोंसे भयभित है. जो भयभित है वह ज्यादा ही अंधश्रद्धायुक्त होता है. पी. के. खुद डरता है. उसके पास इतनी विद्वत्ता और निडरता नहीं है कि वह सच बोल सके.
कश्मिरके हिन्दुओंको लगातार दी जाने वाली यातनाओंको अनदेखी करना विश्वकी सबसे बडी ठगाई और दंभ है. इस बातको नकारना आतंकवादको मदद करना ही है. उसकी सजा सिर्फ और सिर्फ मौत ही हो सकती है.

तो फिर पी. के. ने किसको निशाना बनाया?

पी. के. ने बुत परस्तीको निशाना बनाया.
लेकिन क्या उसने पूर्व पक्ष को रक्खा? नहीं. उसने पूर्वपक्षको जनताके सामने रक्खा तक नहीं.
क्यों?
क्यों कि, वह अज्ञानी है. अद्वैतवादको समझना उसके दिमागके बाहरका विषय है. अद्वैतवाद क्या है? अद्वैतवाद यह है कि ईश्वर, सर्वज्ञ, सर्वयापी और सर्वस्व है. विश्वमें जो कुछ भी स्थावर जंगम और अदृष्ट है वे सब ईश्वरमें ही है. उसने ब्रह्माण्डको बनाया और आकर्षणका नियम बनाया फिर उसी नियमसे उसको चलाने लगा. उसने मनुष्यको बुद्धि दी और विचार करने की क्षमता दी ताकि वह तर्क कर सके. अगर वह तर्क करेगा तो वह तरक्की करेगा. नहीं तो ज्योंका त्यों रहेगा, या उसका पतन भी होगा और नष्ट भी होगा. ईश्वरने तो कर्मफलका प्रावधान किया और समाजको सामाजिक नियमो बनानेकी प्रेरणा भी रक्खी. जो समाज समझदार था वह प्रणालियोंमें उपयुक्त परिवर्तन करते गया और शाश्वतता की और चलता गया.
हिन्दु समाज क्या कहेता है?
सत्यं, शिवं और सुंदरं
सत्य है उसको सुंदरतासे प्रस्तूत करो तो वह कल्याणकारी बनेगा.
कल्याणकारीसे आनंद मिलता है वह स्थायी है.
आनंद स्थायी तब होता है जब भावना वैश्विक हो. न तो अपने स्वयं तक, न तो अपने कुटुंब तक, न तो अपने समाज तक, न तो अपनी जाति तक, मर्यादित हो, पर वह आनंद विश्व तक विस्तरित हो.
विश्वमेंसे जो कुछ भी तुम्हे मिलता है उसमेंसे विश्वको भी दो (स्वाहा).
यज्ञकी भावना यह है.
शिव तो तत् सत् है. ब्रह्माण्ड स्वरुप अग्निको उन्होने उत्पन्न किया. जो दृश्यमान अग्नि है वह यज्ञ है. अग्नि यज्ञ स्वरुप है. अग्निने आपको जिवन दिया. आप अग्निको भी तुष्ट करें और शांत भी करें. हिन्दुओंके लिये ईश्वरी शक्तियां अपने जिवन प्रणालीका एक भाग है. शिव लिंग एक ज्योति है. उसको जो स्वाहा करेंगे वह धरतीके अन्य जीवोंको मिलेगा. जीनेका और उपभोग करनेका उनका भी हक्क है.
तुम्हे ये सब अपनी शक्तिके अनुसार करना है. तुम अगर शक्तिमान नहीं हो तो मनमें ऐसी भावना रखो. ईश्वर तुम्हारी भावनाओंको पहेचानता है. संदर्भः “शिवमानसपूजा”

यदी पी. के. ने “अद्वैत” पढा होता तो वह शिव को मजाकके रुपमें प्रस्तूत न करता.

मनुष्य एक ऐसी जाति है कि इस जातिमें हरेक के भीन्न भीन्न स्वभाव होते है. यह स्वाभाव आनुवंशी, ज्ञान, विचार और कर्मके आधार पर होते है. इसलिये उनके आनंद पानेके मार्ग भी भीन्न भीन्न होते है. ध्यान योग, ज्ञान योग, कर्मयोग और भक्तियोग इस प्रकार चार योग माने गये है. अपने शरीरस्थ रासायणोंके अनुसार आप अपना मार्ग पसंद करें. हिन्दुओंके लिये ईश्वरकी उपासना एक प्रकृति उपासनाका काव्य है. काव्य एक कला है जिनके द्वारा तत्त्वज्ञान विस्मृतिमें नही चला जाता है. मूर्त्ति भी ईश्वरका काव्य है.

तो क्या पी. के.ने विषयके चयनमें सही प्राथमिकता रक्खी है?
नहीं. पी. के. को प्राथमिकताका चयन करने की या तो क्षमता ही नहीं थी या तो उसका ध्येय ही अंधश्रद्धाका निर्मूलन करना नहीं था. उसका ध्येय कुछ भीन्न ही था.

प्राथमिकता की प्रज्ञाः
अगर आपके घरमें चार चूहे और एक भेडिया घुस गये है तो किसको निकालनेकी प्राथमिकता आप देंगे?
चूहे चार है. भेडिया एक है. चार संख्या, संख्या एकसे ज्यादा है. तो भी जो ज्यादा नुकशानकारक है वह भेडिया है. इसलिये यहां पर प्रमाणभान स्वरुप संख्या नहीं है. किन्तु नुकशानका प्रमाणभान रखना है.
एक अरब हिन्दु है. २० करोड मुस्लिम है. लेकिन दंगे मुस्लिमोंने ज्यादा किया. अत्याचार भी मुस्लिमोंने ज्यादा किया. इसलिये समाजको होने वाले नुकशानके प्रमाणभानके अधारपर मुस्लिम अंधश्रद्धाको हिन्दुओंकी तथा कथित अंधश्रद्धाके विषयोंकी अपेक्षा ज्यादा प्राथमिकता देनी चाहिये.
किन्तु पी. के. ने ऐसा नहीं किया.

प्रमाणभानकी प्रज्ञाः
शिवलिंग पर दूध चढाना दूधका व्यय है. वह दूध गरीबोंके बच्चोंके मूंहमें जाना चाहिये.

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दूधका व्यय है या नहीं? अगर व्यय है तो भी कितना व्यह है? किसका व्यय है? किसका पैसा है? किसकी कमाई है? क्या ईश्वरके उपर दूध चढाना अनिवार्य बनाया गया है? ऐसा कोई आदेश भी है?
दूधके पैसे तो पी. के.के या औरोंके है ही नहीं. दूधके पैसे तो दूध डालनेवालेके अधिकृत पैसे है. उसको कोई “लेन्ड ओफ लॉ” या और किसीकी सत्तका भी आदेश नहीं है, कि वह दूध डाले. किसी “लॉ ऑफ ध लेन्ड”ने उसे विवश भी नहीं किया है, कि वह दूध डाले. अगर वह दूध न डाले को उसको कोई दंड देनेवाला भी नहीं है. दूधका प्रमाण भी निश्चित नहीं है. वह अपनी ईच्छाके अनुसार दूध डाल सकता है या न भी डाले. वह अपनी मान्यताके अनुसार समझता है कि उसने कोई व्यय नहीं किया. क्यों कि विश्वने उसको दिया है वह उसमेंसे थोडा विश्वको वापस देता है. जो गाय है उससे वह आभारवश है और उसको भी वह सब देवोंका निवास समझता है और वह गायके प्रति आभारवश है (थेन्क फुल है. थेंकलेस नहीं है) वह गायको माता समझता है.
वह यह समझता है कि दूध चढाना कोई पाप नहीं है. खुदके पैसे है. अपने पैसे का कैसे उपयोग करना वह उसकी पसंद है. खुदकी पसंदका निर्णयकरना उसका अधिकार है.

आप कहोगे, वह जो कुछ भी हो, दूधका तो व्यय हुआ ही न? उसका क्या?
वह हिन्दु कहेता है; अगर आप गायको, भैंषको खाते है तो क्या आनेवाले दूधका घाटा नहीं हुआ?
वह आगे कहता है कि हम तो दूधसे अपनी भावना ईश्वरके प्रति प्रकट करते है. और इससे धरतीके जिवजंतुओंकी पुष्टि करते हैं ताकि धरतीकी फलद्रुपता बढे. हम गायका या ऐसे पशुका बली तो नहीं चढाते है ताकि विश्वमें दूधका स्थायी घाटा हो जाय.

वह आगे कहेता है, कि हमारा पावभर दूध ही क्यों आपकी नजरमें आता है?
हम जो टेक्ष भरते है, उनमेंसे एक बडा हिस्सा गवर्नर और राष्ट्रप्रमुखके और उसकी सुविधाओंके और मकानके रखरखावमें जाता है. टेक्ष द्वारा पैसा देना तो हमारे लिये अनिवार्य है और उसके लिये हम विवश भी है. हमारे पैसे का यह व्यय ही तो है. इसका प्रमाण भी तो बहुत बडा है. यह भी तो एक अंधश्रद्धा मात्र है. आपकी प्राथमिकता तो इस व्यय के विषय पर होनी चाहिये. क्यों आपकी प्रमाणभानकी प्रज्ञा इस बातको नहीं देख सकती?

आप खुद करोडों रुपये कमाते हो. आपको खानेके लिये कितना चाहिये? आपको कितना बडा मकान चाहिये? आप दाल चावल रोटी खाके आनंद पूर्वक जिन्दा रह सकते है, और बाकीके पैसोंसे हजारों कीलो दूध गरीबोंको बांट सकते है. लेकिन आप ऐसा नहीं करते है, क्यों कि दूसरे आप जैसे कई लोग ऐसा नहीं करते हैं. आप उन्हीकी प्रणालीको अनुसरते है. तो यह आपकी भी तो अंधश्रद्धा है. आपकी अंधश्रद्धा तो हमसे भी बडी है. आपकी प्राथमिकतामें वह क्यों नही आयी? अगर आप स्वयंकी कमाईको कैसे खर्च करें उसमें अपनी मुनसफ्फी चलाते हैं तो हमारे लिये क्यों अलग मापदंड?
ऐसी तो कई बातें लिखी जा सकती है.
(क्रमशः)
शिरीष मोहनलाल दवे
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