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Posts Tagged ‘दुश्मनके तर्क को स्विकारना’

सबसे बडे देश द्रोही (गद्दार) कौन ? भाग – ३ / ३

गद्दार के स्तर कितने है

अपने देशकी भूमिको जानबुझ कर हार जाना,  ( हवाई सेना का उपयोग नहीं करना भारत  और चीन युध्ध)

अपने देशकी भूमिको असुरक्षित रखके हार जाना, (चीन की सेनाकी घुसपैठ दशक से चालु थी. फिर भी सीमा पर भारतीय सेना रखी नहीं थी.

अपने देशकी भूमिको कोई बारबार चेतावनी दे तो भी उनको अनदेखा करना और फिर हार जाना, (सरदार पटेलने और संसदके देशप्रेमी सदस्योंने नहेरुको चेतावनी दी थी)

अपने देशकी भूमिको  गलत व्युहरचनासे चेतावनी मिलने पर भी हार जाना, (भारतीय भूमि गत सेना को सीमा पर सज्ज रखी होती और वायु सेनाका भी उपयोग किया होता तो भारतकी पराजय न होती.)

हमारे देशकी पराजयको जूठलाना और उसके साथ खेला करना, (प्रदीपजी नहेरुद्वारा गीत लिखवाना)

व्युहात्मक भूमि यदि मिले तो देशको फायदा भी हो तो भी उसको नहीं लेना, (पीओके, बलुचिस्तान, पख्तुनिस्तान, जो भारतके साथ जुडनेको तयार थे, उसका नहेरुने किसीको बिना पूछे अस्विकार कर दिया था)

देशकी सेना यदि विजयी बनती रहे तो उसको रोकना, (भारतकी सेनाकी पीओके परकी आगेकुचको नहेरुने रोक दी थी.)

अपनी  देशहितकी शपथोंको जानबुझ कर भूल जाना, (भारतकी चीनके साथ युध्धके बाद  नहेरुने संसदके समक्ष कभी निभाई नहीं और समय सीमा भी तय करनेसे इंकार कर दिया)

अपने देशकी इतिहासकी घटनाओंकी क्षतियोंसे बोधपाठ न लेना और   चेतावनी मिलनेपर भी और याद दिलाने पर भी भूल जाना, (नहेरुद्वारा, तिब्बट पर चीनके आक्रमणको न्यायिक दिखाना और तिब्बट को मदद नहीं करना, भारतके आधिपत्य वाली भूमि चीनकी सेनाकी घुस पैठको अनदेखी करना)

दुश्मनके गलत तर्कको स्विकार करलेना, (चीनने तिब्बट के बारेमें कहा था कि तिब्बट तो चीनके आधिपत्यमें था. उसको नहेरुने स्विकार लिया था. लेकिन भारतके कई राजाओंने भी तिब्बट पर शासन किया था तो भारतका भी तिब्बट पर हक्क बनता है. लेकिन यह तर्क   नहेरुको स्विकार्य नहीं था.

देशके साथ गद्दारी करनेवाले अपने चहितेके मदद करना, (नहेरुके लिये मेनन और शेख अब्दुलाह चहिते थे. मेननको चीनसे हारनेके बाद भी नहेरुने मेननको मंत्रीमंडलसे हटाया नहीं था. शेख अब्दुलाको खुश करनेके लिये ३७० और ३५ए का प्रावधान किया था.))

जो मान्य दुश्मन है जो अपनी फर्ज जानबुझ  कर चूकता है तो भी उसको मदद करते रहेना. (नहेरु लियाकत अली समजौता के अनुसार अल्प मत कोम्युनीटीको सुरक्षित रखनेके लिये संविधानमें प्रावधान रखके उसका अमल करना था. नहेरुने तो मुस्लिमोंको जनतंत्रके सिध्धांतोकी भी अवहेलना करके मुस्लिमोंको हिंदुओंसे भी अधिक अधिकार दिये थे. पाकिस्तानकी सरकारने तो ऐसा कुछ भी किया नहीं. इंदिराने सभी पाकिस्तानी युध्धकैदीयोंको जो औसत ९३००० थे. उनको छोड दिया. पाकिस्तानने औसत ४५० भारतीय  युध्ध कैदीयोंको छोडा नहीं.)

इंदिराने तो पीओके की जो भूमि हमारी सेनाने जीत ली थी वह भी पाकिस्तानको परत कर दी. यह बात संविधानके विरुध्ध थी. १९७१ इंडो – पाक युध्धके बाद सुरक्षा मंत्री जगजिवन रामने संसद समक्ष कहा था कि इस समय हम दुश्मन देशकी जीती हुई भूमिको (१९६५के युध्धकी तरह) वापस नहीं करेंगे. लेकिन इंदिराने संसदको बताये बिना और सुरक्षा मंत्रीसे मसलत किये बिना परत कर दी थी.   

शिरीष मोहनलाल दवे

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