सबसे बडे देश द्रोही (गद्दार) कौन ? भाग – २ / ३
चीनकी सेनाकी अस्खलित आगेकूच को देखकर, सरकारके वाजिंत्रोंने सेनाके जवानोंकी तकलिफोंका गान चालु किया.
जनताको जब पता चला सरकारको पैसे की अति आवश्यकता है, तो जनताने सोनेके गहेने और वस्त्र दानमें देने लगी. किसीको भी इसका अता पता नहीं कि उन सोनेके गहनोंका क्या हुआ. जिस सी.एम. ने इन गहेनोंकी कस्टडी ली थी, उसने कहा कि, ये गहने तो मेरी मां के गहेने है. मेरी माँ वेश्या थी. वह कैसे हिसाब रखती?
नहेरुने भारतकी पराजयका कैसे बचाव किया?
नहेरु उवाच “ दुश्मनने हमें दगा दिया है” “दुश्मनने हमारा विश्वासघात किया है” …. “अब हम खोई हुई भूमि वापस लिये बिना चैनसे बैठेंगे नहीं.” “आराम हराम है.”
राजगोपालाचारीने कहा “दुश्मन दगा नहीं देगा तो और कौन दगा देगा”?
दुश्मनकी (चीनकी) सेनाको कोई रोकनेवाला नहीं था इस लिये उसने अपने क्लेमसे अधिक १८००० वर्ग मील भूमि पर कब्जा कर लिया. फिर उसके ध्यान पर यह बात आयी तो उसने उस भूमि खाली कर दी और युद्ध विराम घोषित कर दिया.
सर्वोदय नेता विनोबा भावेने चीनकी सराहना भी की कि “यह घटना जगतके इतिहासमें प्रथम है जहाँ विजयी देशने युद्धविराम किया हो.”
नहेरुने पराजयसे जनताका ध्यान हटाने के लिये प्रदीपजीसे कहा कि हमारी सेनाके जवानोंके त्याग और वीरताको दिखाने वाला गीत बनाओ. उनके बलीदानोंकी प्रशंसा करो. लेकिन याद रक्खो कवितामें चीनका नाम तक नहीं आना चाहिये.
प्रदीपजीने गीत लिखा, सी रामचंद्रने उसको संगित दिया और लताजीसे अपना स्वर दिया.
ऐ मेरे वतन के लोगों, तुम खूब लगा लो नारा [ अरे भाया! काहेका नारा?]
ये शुभ दिन है हम सबका, लहरा लो तिरंगा प्यारा [ पराजयका दिन क्या शुभ दिन है? अरे नहेरुजी, आपने हवाई सेना भेजी होती तो भारतीय जनता विजय दिन मनाती. चीन हमसे हर क्षेत्रमें पीछे था. और ऐसा आपके चहिते समाजवादी अशोक महेताने ही कहा था ]
पर मत भूलो सीमा पर, वीरों ने है प्राण गवाए [बीना शस्त्र कोई भी जवान प्राण गवाता]
कुछ याद उन्हें भी कर लो, जो लौट के घर न आए [1] [अस्त्र शस्त्र हीन जवान लडने जाते तो वापस आ ही नहीं सकते. नहेरुने अपनी जीम्मेवारीको छूपादी]
ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी
जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो कुर्बानी [1] [रोना नहीं आता है तो भी आंखे गीली भी तो कर लो. हमारे जवानोंने बलिदान ही तो दिया ही है.]
- जब घायल हुआ हिमालय, खतरे में पड़ी आजादी, संगीन पे धरकर माथा, वो अमर बलिदानी सो गए। [1] [ अरे नहेरुजी, हिमालय नहीं घायल हुआ था. भारतके जवान और भारतीय जनताका नहेरु परका विश्वास घायल क्या मर ही गया था.]
- जब हम घरों में दीपावली मना रहे थे, वो सरहद पर गोलियां सहकर होली खेल रहे थे। [1] [सुख विरुध्ध दुःख का विरोधाभाष उत्पन्न करनेसे नहेरु अपनी माया उत्पन्न करते है]
- हर वीर भारतवासी (सिख, जाट, मराठा, गुरखा, मद्रासी) सरहद पर शहीद हुआ। [1] [ अरे भाया नहेरु, यह बात भारतकी जनता को तो हजारों सालसे पता है. केबीनेट मीशनका स्वागत तो नहेरुने ही तो किया था. गांधीजीने तो केबीनेट मीशनको बोयकोट करनेका बोला था]
- खून से लथपथ होने के बावजूद उन्होंने दस-दस दुश्मनों को मारकर अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ी। [1] [ वैसे तो यह जूठ ही था. भारतके १३८३ जवान मरे थे. चीनके ७२२ सैनिक मरे थे. यदि भारतकी सेनाके एक जवान ने चीनके १० सैनिकोंको मारा होता तो चीनके १३८३० सैनिक मरते. लेकिन चीनके ७२२ सैनिक मरते. लेकिन यदि यह सच बताते भारतीय सेनाकी प्रशंसा नहीं होती. नहेरुकी बुराईको ढकने के लिये, हमारे जवानकी प्रशंसा कर दी. वास्तवमें भारतके जवान बीना अस्त्र शस्त्र के अभावमे लडे और यदि उन्होने ७२२ चीनी सैनिकोंको मारा तो भी वे प्रशंसा के योग्य थे.]
- ये निर्भय और अभिमानी वीर, जो अपनी मुट्ठी में मौत लेकर लड़े, उनकी कहानी हमें भूलनी नहीं चाहिए। [1, 2, 3] [भाया नहेरुजी, दुसरोंको कहेनेसे पहेले अपने आपमें ज़ाखो. “खोई हुई भारतकी भूमिको वापस लिये बिना हम कोंगी लोग चैनसे बैठेंगे नहीं” यह आपकी शपथ आपने आपके पक्षने संसद समक्ष ली थी, और आप और आपके फरजंद जानबुझ कर भूल ही गये. इतिहास गवाह है.]
जय हिन्द, जय हिन्द की सेना…
क्रमशः
शिरीष मोहनलाल दवे