Feeds:
Posts
Comments

Posts Tagged ‘कालावधि’

What is expected by the people of India from Narendra Modi – Part – 2

नरेन्द्र मोदी जब प्रधान मंत्री बन जाय, तब भारतीय जनता उनसे क्या अपेक्षा रखती है? – २

जनप्रतिनिधि के चयन, निर्वाचन, नियुक्ति और उसको पदच्यूत करनेवाली प्रक्रियामें संशोधनः

जनप्रतिनिधिके अधिकार, कर्तव्य और उसकी सीमा और परिसीमाके बारेमें हमें स्पष्ट हो जाना पडेगा.

जनप्रतिनिधि कौन है?

जनप्रतिनिधि क्या जनताका कर्मचारी है?

अगर हां, तो उसके उपर सरकारी कर्मचारीगण वाली (पब्लिक सर्वन्ट के लिये निर्धारित और सूचित) आचार संहिताको उपयोजित (एप्लीकेबल) करनी चाहिये. लेकिन भारतीय संविधानके अनुसार जनप्रतिनिधिके लिये अलग, अर्धदग्ध और अस्पष्ट, उपबंधन (प्रोवीझन) और प्रक्रिया है.

जनप्रतिनिधि, वास्तवमें जनताका प्रतिनिधि है जो अपने अपने क्षेत्रकी जनताकी समस्याओंका, विचारोंका, इच्छाओंका, आकांक्षाओंको विधान परिषद [विधि, विधान और उनकी प्रक्रियाओंके विषय पर विधेयकका प्रारुप (ड्राफ्ट) बनानेवाली और उसको स्विकृति देने वाली जनप्रतिनिधियों की सभा)में प्रतिबिंबित करता है. और कर्मचारीगण द्वारा जनहितमें कार्यान्वित करवाता है और उनके उपर अनुश्रवण (मोनीटरींग) करता है.

जनप्रतिनिधिका कार्यकाल ५ वर्ष है या तो विधान परिषद भंग हो जाने पर नष्ट हो जाता है.

क्या जनता, अपने जनप्रतिनिधिको उसके कार्यकालकी निश्चित अवधिके पूर्व उसको पदच्यूत कर सकती है?

उत्तर है; “ना” और “हां.”

“ना” इसलिये कि, भारतीय संविधानमें जनप्रतिनिधिको कार्यकालके पूर्व ही, पदच्यूत करनेकी कोई प्रक्रिया नहीं है.

“हां” अगर विधान परिषदका प्रमुख चाहे तो वैवेकिक शक्ति (डीस्क्रीशनरी पावर) से संविधानमें बोधित प्रक्रियाके अनुसार उसको पदच्यूत कर सकता है.

लेकिन इसमें तत्‍ क्षेत्रीय जनताके अभिप्राय और ईच्छाका प्रतिबिंबन अस्पष्ट है. जनता अपनी ईच्छासे अपने प्रतिनिधिको पदच्यूत नहीं कर सकती. यदि जनता अपने प्रतिनिधि पर कोई भी प्रकारके आंदोलन द्वारा मनोवैज्ञानिक प्रभाव लावे और उसको पदत्याग पत्र देना पडे वह परिस्थिति अलग है.

तो इसमें क्या करना चाहिये?

हम एक जन वसाहतका उदाहरण लेते है.

एक जन वसाहत है. इस वसाहतमें कई प्रकारके आवास है, बडे आवास है, छोटे आवास है, बहुमंजीला आवास है, झुग्गी झोंपडीयां भी है, कार्यालय है, उद्योग है, पैदल मार्ग है, वाहन मार्ग है आदि आदि … .

यहांके आवासीयोंने विचार किया कि, इस वसाहतमें कई सारे काम है. इनकी सफाईका काम, अनुरक्षणका काम, नव सर्जनका काम, काम करनेवालों पर अवलोकन और अनुश्रवणका काम आदि आदि…  इन सब कार्योंको कोई एक व्यक्ति करें  या करवायें ऐसा आयोजन करें.  हम किसीको इन कामोंको करनेका संविदा (कोन्ट्राक्ट) दे दें. यह व्यक्ति हमारे आदेशों और निर्देशोंके अनुसार काम करेगा और करवायेगा.

“फलां” पक्ष नामक एक अभिकर्ता

एक “फलां” पक्ष नामक एक अभिकर्ता (एजन्ट) आ गया. उसने प्रस्ताव दिया कि हम एक संविधान का प्रारुप आपको देंगे और आप जैसी कई वसाहत है. आप आपका प्रतिनिधि हमें दें. आपका यह प्रतिनिधि आपके विचारोंके अनुरुप, प्रारुपको स्विकृति देगा, या विकल्पका प्रस्ताव देगा, उसको हम संमिलित करेंगे और इन प्रतिनिधियों द्वारा जो अंतिम प्रारुप बनेगा वह संविधान बनेगा. इसमें मानवीय अधिकारोंका, शोषण हिनताका, न्याय, प्रतिनिधि के चूनाव आदि आदि सब कर्तव्योंका संमिलन होगा और इस संविधानके आधार पर कर्योंका निष्पादन (एक्झीक्युशन) और अनुश्रवण होगा. यह प्रतिनिधि आपसे कर द्वारा खर्च वसुल करेगा और थोडीसी मझदूरी / वेतन लेगा.

अब हुआ ऐसा कि ऐसा संविधान बन जाने पर और स्विकृत हो जाने पर वह एजन्टने  अपनी तरफसे जनप्रतिनिधिका नाम भी प्रस्तावित किया. जनताने उसको चूनाव द्वारा स्विकृत किया, किंतु यह जनप्रतिनिधि और उसका पक्ष कपट करने लगा और करवाने लगा. कर बढाने लगा, अपने सभ्योंकी मझदूरी, सुख सुविधाओंमें वृद्धि करने लगा. ऐसे विधेयक पसार करने लगा कि जनताकी दीनता बढे और संपत्तिवान ज्यादा संपत्तिवाले बने.

ऐसा कई वसाहतोंमें होने लगा. तो एक वसाहतने पारदर्शिताके लिये सूचनाका अधिकार संमिलित करवाया. प्रयोजन यह था कि जन प्रतिनिधि संविधानके अंतर्गत जो कुछ भी सुधार करे वह पारदर्शितासे करे.

पक्षने कहा ठीक है आप जो माहिती मांगेंगे वह हम देंगे. बात खतम.

ऐसी परिस्थितिमें भी जनप्रतिनिधि अपने वर्तनमें कोई सुधार नहीं लाता है.

जनप्रतिनिधि कहेता है पक्षने मेरे नाम का प्रस्ताव रक्खा था और आपने मुझे पांच वर्षके लिये स्विकृत कर ही लिया है. इसलिये मेरा उत्तरदायित्व पक्षके साथ है. संविधानके अनुसार मेरा कार्यकाल रहेगा.

जनताने कहा तू हमारा प्रतिनिधि है. पक्षने तो तुम्हे सिर्फ प्रस्तावित ही किया है. पक्षने तुम्हारा चयन किया है. हमने तुम्हारा निर्वाचन किया है.

जनप्रतिनिधि और पक्षने कहा, संविधानमें जो प्रावधान है उसके उपर आप जनता लोग नहीं जा सकते. संविधान के उपर कोई नहीं है.

जनता कहेती है संविधानके उपर जनता है. जनता है तो संविधान है.

पक्ष कहेता है, संविधानमें संशोधनके लिये अधिकृत हम ही है. तूम लोग कौन होते हो?

जनता कहेती है कि तो हमारे मूलभूत अधिकारोंका क्या? यदि हमने प्रतिनिधिको चूना है तो उसका प्रतिनिधित्व नष्ट करना हमारा मूलभूत अधिकारा है. यदि वह ढंगसे काम नहीं करता है तो हम उसको पदभ्रष्ट कर ही शकते है.

पक्ष कहेता है, संविधानमें कोई ऐसा प्रावधान और प्रक्रिया नहीं है. हमने आपके सामने हमारा चूनावका घोषणा पत्र रखा था. अगर हमारा व्यवहार ठीक नहीं है तो तुम लोग हमे आगामी चूनावमें निर्वाचित मत करो. तुम लोग हमारे मध्यावधि कार्यकालमें, विरोध प्रदर्शन करके, बहुमत तुम्हारे साथ है ऐसा सिद्ध नहीं कर सकते हो.

जनता कहेती हैः तुम्हारा चूनाव नीति-घोषणा एक कपट है. तुमने घोषणापत्रमें जो वचनबद्धता प्रकट की थी उसका तुमने पालन नहीं किया. जो घोषणा पत्रमें  नहीं था उसका तुम लोग विधेयक लाये. यह एक छलना और विश्वासघात है.

पक्ष कहेता हैः हमने विश्वासघात किया है, ऐसा सिद्ध कौन करेगा? हमने वादा किया था कि, हम लोकपाल विधेयक का प्रस्ताव लायेंगे और हम उस विधेयकको लाये.

जनता कहेती है तुम्हारा लोकपाल विधेयकका प्रारुप अर्थपूर्ण और परिणाम लक्षी नहीं है. यह एक कपट है. तुम्हे तुम्हारे चूनाव नीति-घोषणा पत्रमें ही लोकपाल विधेयकका प्रारुप (लोकपाल बीलका ड्राफ्ट), प्रकट करना चाहिये था. तुमने व्यवहारमें निरपेक्ष पारदर्शिता नहीं प्रदर्शित कि. तुमने अपने नीति-घोषणा पत्रमें यह कभी भी लिखा नहीं था कि, तुम लोग अपना वेतन / मझदुरीमें वृद्धि करोगे और सुख सुविधा बढाओगे, तो भी तुमने अपने खुदके लाभवाला सब कुछ किया. वास्तवमें तुम जो कोई भी विधेयक लाने वाले थे उन सबका प्रारुप हमारे सामने प्रकट स्वरुपमें रखना तुम्हारे लिये आवश्यक था. किंतु तुमने यह कुछ भी किया नहीं. पारदर्शिता रखना तुम्हारा कर्तव्य है. तुम अपने कर्तव्यसे च्यूत हुए हो इसलिये तुम निरर्हित (डीसक्वालीफाईड) बन जाते हो.

पक्ष और जनप्रतिनिधिः लेकिन इस का निर्णय तो न्यायालय ही कर सकता है.

न्यायालय क्या कर सकता है?

न्यायालय, सूचना अधिकार की आत्माको केन्द्रमें रखकर पारदर्शिताका निरपेक्ष पारदर्शिताके रुपमें   अर्थघटन कर शकता है. और जो विधेयका प्रारुप चूनावके नीतिघोषणापत्रमें नहीं है उन सबको शून्य, प्रभावहीन और अप्रवर्तनीय घोषित कर सकता है. और पक्षको शासनके लिये और राजकीय पक्ष के स्थान पर भी निरर्हित कर सकता है.

और कोई विकल्प?

यदि जन प्रतिनिधिके क्षेत्रके समग्र मतदातामेंसे २०% मतदाता, चूनाव अधिकारीको आवेदन दें कि इस जनप्रतिनिधिको वापस बुलालो तो चूनाव अधिकारीको उस जनप्रतिनिधिके प्रतिनिधित्वके बारेमें जनताके “हां”, “ना” या “निश्चित नहीं” का बटन दबाके मत लेना पडेगा. यदि ५०+% मत, जनप्रतिनिधिके विरुद्ध गये तो वह पदच्यूत हो जायेगा.

ऐसी प्रक्रियाकी अनुपस्थितिमें, जनप्रतिनिधिको पदच्यूत करनेके लिये ५०+% मतदाताओंको अधिकृत अधिकारी या न्यायाधीशके सामने या क्षेत्रके चूनाव अधिकारीके सामने शपथपत्र बनाना पडेगा कि वह अपने क्षेत्रके जनप्रतिनिधिमें विश्वास रखता नहीं है और वह उसकी पदच्युतिके पक्षमें है. और वह अपने जनप्रतिनिधिको पदच्युत करना चाहताहै. ऐसे सर्व शपथ पत्रकी संख्या ५०+% होती है तो जनप्रतिनिधि पदच्यूत हो जायेगा.

तो हमें क्या न्यायालयके अर्थघटनकी प्रतिक्षा करना है?

क्या हमें जनप्रतिनिधि के चयन, निर्वाचन, नियुक्ति और उसको पदच्यूत करनेवाली प्रक्रियामें संशोधन करना है?

Last supper

(Artist’s curtsy)

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः संविधान, जनप्रतिनिधि, चयन, चुनाव, पक्ष, अभिकर्ता, एजन्ट, विधेयक, प्रारुप, ड्राफ्ट, निष्पादन, एक्झीक्युशन, निरर्हित, डीसक्वालीफाईड, अर्थपूर्ण, निरपेक्ष, पारदर्शिता, कर्तव्य, अधिकार, कालावधि, विश्वासघात, पदच्यूत, नीति, घोषणा, पत्र, वैवेकिक शक्ति, डीस्क्रीशनरी पावर 

Read Full Post »