आपात् कालकी कुछ सूनी – अनसूनी बातें – ५
June 30, 2024 by smdave1940
आपात् कालकी कुछ सूनी – अनसूनी बातें – ५
आपात्काल किसकी समस्या है?
विनोबा भावे ने बोला कि यदि देशके उपर बडी समस्याएं है तो वह समस्या केवल प्रधान मंत्रीकी नहीं है. जो भी समस्याएं है वे हरेक देशवासी की है. इस स्मस्याओंको कैसे हल किया जाय उसके लिये देशके विभीन्न क्षेत्रोंके ज्ञानी लोगोंको ईकठ्ठा होना पडेगा और सर्वसंमतिसे निर्णय लेना पडेगा.
“आपात्काल अनुशासन पर्व है”का घटस्फोट
शासन और अनुशासनके बीचका अंतर क्या है?
आपात्काल में अनुशासन होना चाहिये. अनुशासन से मतलब है आचार्यों द्वारा सूचित शासन. मतलबकी अहिंसक शासन. आचार्योंका शासन अनुशासन कहेलाता है, जिसमें जनता अपने आप समज़से अपनेको नियंत्रित करती है. सरकारका (शासकका) शासन, शासन होता है जो दंड द्वारा चलता है और वह हिंसक है.
आपात्कालकी समय सीमा क्या है?
हम आपात्काल अनियत कालके लिये चालु नहीं रख सकते. आपात्काल की समय सीमा सुनिश्चित करनी पडेगी.
आपात्कालके कारावासीयोंको शीघ्र ही मूक्त करो.
जिनको भी आपात्कालके अंतर्गत बंदी बनाया है, उनको तूर्त ही मूक्त करना है.
इस प्रकारका प्रस्ताव आचार्य संमेलनने पास किया.
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चमत्कृतिः
सत्संगकी महिमा
शिक्षापत्री की एक कथा
एक बार नारदमूनीने भगवान विष्णुसे पूछा, कि हे भगवन् सब लोग हर समय “सत्संग करना चाहिये … सत्संग करना चाहिये …. ऐसा बोला करते है” तो हे भगवन् ये सत्संगकी महिमा क्या है.
विष्णु भगवानने कहा, हे नारद, आप फलां वनमें फलां वटवृक्षकी फलां डाली पर फलां पर्ण पर एक कीटक है उसको पूछो कि सत्संगकी महिमा क्या है?
नारदजी तो गये वहां. उस कीटकसे पूछा कि हे कीटक, सत्संग की महिमा क्या है?
तो कीटक तो सूनते ही मर गया.
नारदजी वापस भगवानके पास गये और पूछा कि भगवन् वह कीटक तो मर गया. अब आप बताओ कि सत्संगकी महिमा क्या है?
बछडा
भगवानने बोला फलां गाँवमें एक कृषके घर जाओ, उसकी एक गाय ने बछडेको जन्म दिया है. आप वहां जाके उस बछडेको पूछो कि सत्संग की महिमा क्या है.
नारदजी उस गांव गये और कृषकके घर गये और उस बछडेके पास जा कर उन्होंने उससे पूछा कि हे वत्स, सत्संगकी महिमा क्या है?
ऐसा पूछते ही वह बछडा मर गया.
नारदजी तो दौडके वहांसे भाग निकले. और भगवानको सारी घटना सूनाई.
नगरशेठ
भगवानने कहा, नारद जी, जब आपने ठान ही लिया है कि सत्संगकी महिमा को जानना है तो आप फलां शहरमें एक नगरशेठ है, उनके घर एक लडका जन्मा है. आप उससे पूछो कि सत्संगकी महिमा क्या है?
नारदजी तो उस शहर को गये और नगर शेठको मिले, नगरशेठने उनकी बडी आगता स्वागता की, फिर आनेका प्रयोजन पूछा. नारदजीने उनके वहां नवजात शिशुको देखनेकी ईच्छा प्रकट की. नगर शेठ नारदजीको वहाँ ले गये. नारदजीने उस बच्चे को पूछा कि सत्संगकी महिमा क्या है. इस को सूनते ही बच्चा मर गया. नारदजी तो जान बचाकर भागे.
नारदजी भगवानके पास गये, और बोले हे भगवन् आप मुज़पर क्यों नाराज है. फिर नारदजीने पूरी घटनाका विवरण किया.
नारदजी आप हिमत रक्खो
विष्णु भगवानने बोला, ऐसा कुछ नहीं है. लेकिन नारदजी आप हिमत रक्खो. आप फलां देशमें उसके राजा यहां, पूत्ररत्न ने जन्म लिया है. उस पुत्र को आप पूछो कि सत्संगका महिमा क्या है.
राजकुमार
नारदजी उस राजाके पास गये. और कुंवरको देखने की इच्छा व्यक्त की. राजा, नारदजीको कुंवरके पास ले गया. नारदजीने उस पुत्रको पूछा कि सत्संगकी महिमा क्या है. ऐसा प्रश्न सूनते ही कुंवर बेहोश हो के मर गया. फिरसे नारदजी जान बचाकर भागे.
नारदजी भगवान विष्णुके पास पहूँचे और उन्होंने भगवानको थोडा डाँटा भी. भगवान हंसकर बोले, अरे नारदजी सज्ज्न वही है जो प्रश्न का उत्तर प्राप्त करके ही संतोष प्राप्त करता है. आप अब स्वर्ग लोकमें जाओ और इंद्रसे ही पूछो कि सत्संगकी महिमा क्या है.
नारदजी देवराज ईंद्रके पास गये. नारदजीने देवराज इंद्रसे कहा कि यदि मुज़े पता होता कि आपको मेरे प्रश्नका उत्तर मालुम है, तो मैं सीधा आपके पास ही आता. लेकिन भगवानने क्या पता किस कारण मुज़े पृथ्वीपर बार बार भेजा. अब हे देवराज, आप की कहो कि सत्संगकी महिमा क्या है.
देवराज इंद्रने बोला “क्या नारदजी आप मुज़े ही बार बार एक ही सवाल पूछते हो कि सत्संगकी महिमा क्या है. अरे मूनि राज आपके सत्संगसे ही तो मैं एक कीटकसे इंद्रके स्तर पर पहूँचा हूँ. यही तो सत्संगकी महिमा है.
फिर नारदजी विष्णु भगवान के पास आ गये. और उनको थेंक्यु कहा.
फिर नारदजीने सोचा कि सत्संगकी महिमा तो मैंने जाना, लेकिन कुसंगकी महिमा भी तो जानना आवश्यक है.
कुसंगकी महिमा
नारदजीने भगवान विष्णुसे पूछा कि हे भगवन् आपने मुज़े सत्संगकी महिमा तो अवगत कराई, लेकिन अब मुज़े यह भी बताओ कि कुसंगकी महिमा क्या है?
भारतदेशमें जाओ
भगवानने बोला कि हे नारदजी इस समय भारत देशमें इ.शा. १९५० – ६० का दशक चल रहा है. आप यशवंत राव चवाण और बाबु जगजिवनराम, इन दोनोंका पता लगाओ कि जनतामें उनके बारेमें क्या अभिप्राय है?
नारदजी तो गये भारतवर्षमें. जनताको पूछा कि यशवंतराव चवाण कौन है और कैसे है? जनतने बोला कि अरे वह तो हमारे शूरवीर नेता है. हमारे लिये तो वे शिवाजी – २ है. जय हो शिवाजी महाराज – २.
फिर नारदजीने पूछा कि जगजीवनराम कौन है. जनताने बोला, अरे ये तो हमारे दलितोंके महान नेता है. निडर और शूरवीर. वे तो अंग्रेजोंके जमानेमें अंग्रेजोंकी बंदूककी गोलीयोंसे भी डरते नहीं थे. वे तो सीना तानके खडे रहेते थी. हम दलितोंके ही नेता नहीं है, वे तो हम सब भारतवासीयोंके भी सर्वस्विकृत नेता है.
फिर नारदजी विष्णु बगवानके पास आये. और अपना रीपोर्ट दिया.
विष्णु भगवानने नारदजीको बोला कि अब भारतमें १९७६ की साल चल रही है. अब आप वहाँ जाके इन्ही दो नेताओंके बारे में पता लगाओ कि जनता उनके बारेमें क्या कहेती है?
नारदजी भारत आये. और जनतासे पूछा कि यशवंत राव चवाण कैसे है, जनताने जवाब दिया, उसकी बात ही मत करो. हमने तो उसको समज़ा था शिवाजी – २. लेकिन वह तो शेरके बदले निकला शृगाल. डरपोक कहींका. जब देशको आपात्कालमें अपनी शूरवीरता दिखानेकी आवाश्यकता थी तो वह तो इंदिराकी गोदमें बैठ गया. डरपोक कहींका …
फिर नारदजीने जगजीवनराम के बारेमें पूछा. तो जनताने बोला … उसकी बात ही मत करो. वह तो पहेले ऐसा था कि अंग्रेजोंकी बंदूकसे नहीं डरता था, लेकिन वह तो इंदिराकी लाल आँखसे डर गया. और उसकी गोदमें बैठ गया. ऐसा कोई नेता होता है!!
फिर नारदजी विष्णु भगवानके पास गये. तो विष्णु भगवानने बोला क्या नारदजी, अब तो पता चल गया कि कुसंगकी महिमा क्या होती है.?
हाँ भगवन्, सत्संगसे छोटा आदमी भी महान इंद्र समान बन जाता है, और (इंदिरा जैसेका) कुसंग करनेसे महान व्यक्तिभी छोटा और निकम्मा बन जाता है.
विष्णु भगावनने बोला ऐसे कुसंगवाले तो तुम्हे भारतमें बहूत ही मिल जायेगे जो अपने स्वार्थके कारण अंधे होकर कुसंग करते है और स्वयंको अविश्वसनीयता और अनादरके पात्र बनाते है.
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