हिंदी और उर्दु गझल-4
-------------------------------------------- जलती दोपहरी हो,ठंडी के दिन हो या,जालिम बरसात हो नही ऐसा दिन,तुजे याद नही किया,ना ऐसी कोइ रात हो समजो,फासलो की दुरी का डर मुजे अब सताता नही है जब भी तुम्हे महेसुस किया,लगता है के तुंम आसपास हो कभी कभी छु लेते हवाओ में कुछ अनजाने से अहेसास मेरा जिक्र आया होगा ,एसा लगता था के तुम उदास हो रिश्तो का ये ताल्लुक ऐसे जुड गया है महोतरमा आप से ना पाया है,ना खोया है,फिर भी लगता है तुम खास हो चाहु या ना चाहु,तुम मुजे और में तुम्हे,कया फर्क होता? लेकिन तुम्हे सोचता हुं तब लगता है तुम मेरे अहेसास हो सदीयो से लोग इश्क के नाम से ताल्लुकात रखते आये है चलो आज से कुछ नया करे,जैसे रिश्तो की नयी जात हो वफादारी,इंतेजारी,रुठ जाना,मिन्नते करना,ये सब कया है जब भी मिलो,लगता है हमारे भी कुछ नये जझबात हो महोतरमां हमारे रिश्तो की उंचाइ आसमान को छु गइ है चलो चरागो को बुजा देते है,जहां हवा उन के खिलाफ हो ना आये हमारे बिच कोइ एसी मुलाकाते जो दरारे बना दे जवाब हमे ऐसा मिल जाये,उस पे फिर कोइ सवालात हो नरेन,कयां आलादरज्जे की नजाकत आ गइ है गझलो मे! लगता है गझले नही,महोतरमां कि रानाइ की सौगात हो (नरेश के.डॉडीया) --------------------------------------- जिंदगी आसान होती,कुछ जवान पल मे बचा के लाता गर जवान सांसे बच शकती तो उस को सजा के लाता लम्हे बित गये उस को याद कर के कयुं रोया करुं मे तेरे लिये गुजरा वकत,मेरे कंधे पे कैसे उठा के लाता? अगर वकत से दुश्मनी होती तो वोह लम्हा चुरा लाता किस्मतने छीन लिया वोह पल कहा से चुरा के लाता? तुं ख्वाब बन के आयी तो,ख्वाब बन के आंखो मे रहे हक्कीत बन गइ तो,वो फसाना कहा से बना के लाता? तुं कोन है,में कोन हुं,इस मस्कत हम कयुं करते है? पहेचान हो गइ तो,आयने कितनी शकले छुपा के लाता? महोतरमां वकत और जमाने से डरती रहेती है,कयुं? गर तुं कहे खुद जमाने को पावं के निचे दबा के लाता? (नरेश के.डॉडीया)
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तुजे ना पाया तो इस काइनात में खोना कयां है
जिन आंखो में ख्वाब नही,रात को सोना* कयां है
जिंदगी आंसान होती,अगर तेरा सांया साथ होता
तकदीर का साथ नही,तो हमसायेका रोना कयां है
तमन्ना गर पुरी होती,फिर गजले कोन लिखता?
इश्क के बिना शायरी करे,तो उनका होना कया है
जिन आंखो की गहेराइ को आप समज शके नहीं
गर मोती नही,तो संमदर के अंदर गोता कया है
नाझ करते है बहेतरीन आलादरज्जे की रानाइ पे
जौहरी किंमत ना करे वो सोनां भी सोना कयां है
सीना छल्ली ना हुवा लहुं की किंमत कया जाने?
वो नाजुक मोती से हार ना बने तो पीरोना कया है
(नरेश के.डॉडीया)
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में उस गली से गुजारता था अकसर शाम होती थी
बरसो बाद जाना नरेन,आरझु वहा तमाम होती थी
सालो ऐसे बित गये जैसे एक जमाना बित गया है
जब भी सोचा तुंजे मेरे तस्सवुर की अवान*होती थी
कैसी है रिश्तो की जुडाइ जो लोग कभी मिलते नही
जब याद आये,लगता था जिंदगी ए कयाम*होती थी
किसी की एक मुश्कुराहट पे जिंदगी कैसे बसर करे?
शायर से पुछो,वो मुश्कुराहट उन की गुमान होती थी
सिलसिले सदीओ से चले आ रहे है चाहतो के नाम
आशीक की जिंदगी सनम के नाम इनाम होती थी
आशीक ए जाविंदा* कोइ नही होता है इस काइनात मे
रांझा से मजनु के नाम से एक जिंदा जहान होती थी
जनाना की रूसवाइ से कितने लोग जिगर अफगार*हुवे
आशीक के लिये उनकी यादे खूश्बू ए जाफरान*होती थी
अगर मिल गइ होती खुदा के लिये जिंदगी बसर होती
महोतरमां जब भी मिली तब जिंदगी तनाझ*होती थी
(नरेश के.डॉडीया)-
अवान*-સૌભાગ્યવતી,નસીબવાળી સ્ત્રી
कयाम*-આરામ કરવાની જગ્યા,સ્થિરતા
आशीक ए जाविंदा*-આશીકની જિંદગી
खूश्बू ए जाफरान*-કૈસરની સુંગધ
तनाझ*-લટક મટક ચાલ,સંકેતોથી ઇશારાથી વાત કરવી
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तडप तडप के मेरी रूह के चराग जल जाते है
प्रिये,जब भी तेरी यादो के रूपक बदल जाते है
पाये या ना पाये सजनी,इस जिवन के दोर मे
प्रिये सिर्फ तेरे नाम से अरमान मचल जाते है
बेरंग सी दुनिया मे नयना तेरा रंग दिखता है
तेरी पनाह में ये जिंदगी के रंग निखर जाते है
कहा से दे नजराना तुजे मेरा ये खुन ए जिगर?
ये खुन श्याही बने के गझलो से लिपट जाते है
आयने की तरह टूट जाना हे टूकडॉ मे बटकर!
देख लो,टूकडॉ की तरह तेरे चहेरे बिखर जाते है
मेरी आशीकी का नया अंदाझ देख जाने ए हयात
फिर कहेगी,तुम्हारे ख्याल रुह मे उतर जाते है
मे अखबार नही,जो दुसरे दिन पुराना हो जांउ
जिंदगी का वो पन्ना हुं,जहां लम्हे ठहर जाते है
सिर्फ तुजे पाने की हसरत मे लिखता हुं गजले
तेरे ख्याल से दिल से अलफाझ निकल जाते है
बडी बेसब्री रहेती है रातो में जल्दी निंद आ जाये
और तेरी यादो के लुटेरे मेरी निंद लूंटकर जाते है
महोतरमां बहुत हो चुकी तेरी खौफनाक बेरुखी
अब’नरेन’तस्स्वुर मे बाते करने से डर जाते है
(नरेश के.डॉडीया)
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माना के तुजे पाने के लिए मेरी एक जिंदगी काफि नहीं है
किसी जनम मे ना पाया तो खुदा तुजे मेरी माफी नही है
काफीर की तरह जिंदगी मैने गुजारी है,खलिक से पुछ लो?
तेरे दिदार सिवा के मैने आज तक कोइ दुआ मांगी नही है
…
शायरी और गझल लिखना मेरे लिये इतना आसान नही है
पहेला ओर आखरी शेर मे तेरे सिवा किसी को चाही नही है
पुछ लो जुनुन ए इश्क क्यां है,अकसर मेरा नाम आता है
महोतरमा!तेरे लिये लिखी एक भी गझल मे खामी नही है
चाहत जतानां जुनुनी पेशा बन गयां,शायरी सिर्फ बहाना है
इश्क को मझहब बना के लडनेवाला मेरे जैसा गाजी नही है
कयां पता हम इस काइनात मे रहे ना रहे,नाम जरूर रहेगा
नाम से नाम जुड गया तो जन्नत मे भी परेसानी नही है
आप की शक्ल बस गइ है आंखो मे,ये ही मेरी परेसानी है
उस दिन से लाखो हुस्नकारा मे से किसी को जानी नही है
जुठ बोलना मेरे लिये इतना आसान नही,आप समज लेना
कितनी रानाइ की गझले लिखने की सिफारीस मानी नही है
बस इतना बता दो,महोतरमां इतना गुमान किस बात का है?
ना बताओ तो फर्क नही है,मैने तुजे छोडने की ठानी नही है
(नरेश के.डॉडीया)
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तुम्हारे ख्याल हर वकत मेरे दिल को ऐसे छुते है
जैसे शबनम सुबह को मासुम गुलो को चुमते है
चाहत हो या सजदे,बंदो का अंदाज ए इश्क नेक है
सनम हो या खुदा की चोकट,ये अकसर जुकते है
जश्न ए बारात हो,या जुदाइ का गम,तो क्यां हुवा?
शादी हो या हिज्र की शब,चाहनेवाले सदा जुमते है
मिलना,बीछडना,फिर मिलना,ये कैसा सिलसिला है
चाहनेवालो के सितारे तो अकसर गर्दीश में डुबते है
ख्वाब या,बिजली के तार कभी ना तुटे ये दुवा करे
आंखो के सामने अंधेरा होता है,जब दोनो तुटते है
सनम मिले तो खुदाइ है.ना मिले तो जुदाइ तो है!
सनम और खुदा,ना मिले तो उन के राझ खुलते है
दरिया की प्यास जब शहेरो-गलीओ में पहोचती है
शाहिल से लोटी नदी को,दरिये गलीओ में ढुंढते है
शहेझादी से हुर तक,ये शायरो चाहते जताते रहेते है
सच्चा इश्क हो,तो खुदा कि स्मत के धागे बुनते है
कयुं करते.दोस्ती,मुहोब्बत,इक तरफा मुहोब्बत कयुं!
खुशी मिले या गम,रिश्तो से लोग अकसर जुडते है
अमीर से शायर की अदाकारी बाखुबी निभाइ है’नरेन’
हमारे जल्वे देखने,आज भी हुस्न के पाव रुक़ते है
(नरेश के.डॉडीया) ..
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उस के आशीकाना मिजाज से गजलो मे महेकता रहेतां हुं
मुजे कहेतां है,में तेरी ख्वाहिशो क़ी माला गुनता रहेता हुं
वोह हमे होंसला देकर कहेता है इस लिये में दूर रहेता हुं
फांसला बहुंत है लेकिन कहेतां है, दिल धडकता रहेतां हुं
वो कहेता है,में तेरे ख्वाबो को अकसर छेडता रहेता हुं
पुछा तो हसके बोला,इसी बहाने में तुजे जगाता रहेता हुं
गुफतुगु नही हमारे दरमियां फिर भी गूनगूनाता रहेता हुं
हक्कीत बन गइ है फसाना मेरा,फीर भी हसतां रहेतां हुं
दुर रहेके भी जान लेने की अदा की तारिफ करता रहेतां हुं
ये उनका शोख है या हुन्नर,वो सोच के चाहता रहेतां हुं
मालूम है वो आयेगा नही,फिर भी उम्मीद पे टीका रहेतां हुं
मिलो की दूरी से उनके नाम का एक दिया जलातां रहेतां हुं
(नरेश के.डॉडीया)
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तसल्ली तुम्हारे रोने से मुजे नही होगी
बात तुम्हारे मेरे बनने से ही सही होगी
कुछ बाते होती,जो जबाने नही जानती
हम समजे थे आपकी आंखोने कही होगी
जवाब नही मिलेगा तुमे उन सवालो का
फिर भी उन जवाब की आश रही होगी
कभी कभी उन को याद किया करे आप
ख्वाबो मे कभी हलचल तो मची होगी
इस दुनिया मे वो दुनियां नही मिलेगी
तुम्हारी चाहत की दुनिया दुर बसी होगी
चाहनेवालो की तुमने कहां फितरत देखी
शादीवाली लडकी की आंखे मे नमी होगी
थकना मनां है,लिखनां मना नही’नरेन’
मेरी गझलो में उनकी हमेंशा कमी होगी
(नरेश के.डॉडीया)
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वफादारी का ताल्लुक हद से गुजर गया है
एक नाम दिल से रूह तक उतर गया है
कहा खिलते गुल शाखो से मुहोब्बत करे!
खिलते है वो हि शाख से बिखर गया है
नहीं मिलती नफरत जितनी मे चाहता था
चाहतो का एक जखिरा मेरी अंदर गया है
रोया था कभी उनकी तस्वीर से लिपट के
तब से तस्वीर में मेरा रंग उभर गया है
अकसर खुदा मुज से नाराज से रहेते है ?
मेरे सजदे युं देखे है तब से डर गया है
क्यां बता के आप उन से मिलने जाते हो
‘नरेन’उनसे मिलने चाहतो के शहर गया है
(नरेश के.डॉडीया)
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ना जाया करो वहा कोइ सहारा नही
तुम्हारे नसीब में कोइ किनारा नही
ना सोचा करो तुम हद से ज्यादा
तुम्हारे लिए खुदा का इशारा नही
ना बढाया करो अपनी औकात को
तुम्हारे जैसा दुनिया मे बेचारा नही
ना छेडॉ राग किसी को पंसद नही
एक बार मे समजो तो दुबारा नही
ना करो बाते ऐसे लोगो को सामने
ये लोगो के जहन में कुछ भरा नही
ना करो शेरो-शायरी मे बाते ज्यादा
जंग में कभी दुश्मन को मारा नही
ना लिखा करो ऐसी किताब’नरेन’
पढे लिखो का वकत बेसहारा नही
(नरेश के.डॉडीया)
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एक खूबसूरत औरत एक आदमी का हिस्सा बन जाती है
लोगो के मुंह पे खूबसूरत कहानिया किस्सा बन जाती है
उसे पाने की उम्मीद लिये बेठे दिवानो को जिने के लिये
उजालेमे नये मयखाने की राह रोशन फिझा बन जाती है
कोइ दिवाना बन जाता है शायर तो कोइ बनता है फकिर
तकदीर के मारो के लिए पुरी जिंदगी परिंशां बन जाती है
कही किस्से बन जाते है,कुछ जाने और कुछ अनजाने से
लिखे हुवे कागझ और आंसु मिशाले रिश्ता बन जाती है
उम्मीद पे टीकती है ये दिलजले और दिवानो की दुनिया
गझलो मे उन की यादे तो मत्ला या मकता बन जाती है
दर्द मुहोब्बत का बेवफाइ के किस्से मे तबदिल नही होता
तब तक उनको पाने की कभी ना कभी मंशा बन जाती है
(नरेश के.डॉडीया)
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रोज मिलकर भी कयुं दूर नही होती है दो दिलो की दुरीया
हम दोनो में से कोइ बताये,आखीर क्यां है ये मजबूरीया
कुछ अपनी कहे,हम अपनी सुनाये,युंही फासले कम करे
माहोल कुछ ऐसा बनाये,जैसे पहेले बजती थी तेरी चुडीया
कुछ सख्ती की पांबदी लगी है ऐसा महेसुह करने लगा हुं
ऐसा मिजाज मखमली बनाये जैसे मख्खन में चले छुरीया
चाहत की ये आग में दोनो तरफ फिर से देखना चाहता हुं
नहीं चाहता हमारे बिच कोइ भी बात कभी ना रहे खुफिया
मजबुरीया किस इंसान की नही होती,कोइ तो हल होता है
दिल की गीराह खोल दो,कभी ना रहेगी आफत की पुडीया
मुहोब्बत को मुहोब्बत रहेने दो,अहेसान का नाम ना दो
ऐसे गले मिलो यार!मिट जाए हमारे बिच की आपखूदीया
अहेसान गर चाहते हो,बेपनाह मुहोब्ब्त करो जान ए हयात
महोतरमां आप को देख ,लोग कहे ये है नरेन की दुनिया
(नरेश के.डॉडीया)
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तेरे नाम की आश है,बस कुछ उम्मीद की प्यास है
तुं नहीं तो जिंदगी के साथ ये आलम भी उदास है
जिंदगी मे कितने लोगो से मुलाकातो का दोर चला
तुजे मिल के लगा,चहेरे के साथ ये नाम भी खास है
झुंझलाहट मे लगता है,खुद मेरा वजुद भूल चुका हुं
मुज में तुं नहीं तो खुद तो क्यां वजुद भी आभास है
अजीब कशीश है तेरी,अजीब कश्मकश तुजे पाने की
दोस्ती से इश्क के सफर में कितने दुर और पास है
बहुत उलझ गया,तेरे ख्यालो और सवालो के घेरे मे
तेरे चहेरे के सिवा ना और कोइ चहेरा मुजे रास है
मुहोब्बत एक गुना है,जमाने से लोग कहेते आये है
तुजे देख के लगा,गुनाह करना भी खूबसूरत राझ है
हुस्नवालो की ताकझाक से मे अकसर बचता रहेता हुं
ये कदम रुके है तो,वजह सिर्फ तेरे दिलकश अंदाज है
कितने बेचेन है हम,पलको की छाव मे बसने के लिए
मरने के मेरी गजले तो कहेगी उपर भी तेरी आश है!
(नरेश के.डॉडीया)
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युं हीं हसते हसते जुदा होने का मजां कयुं लेना है?
चाहनेवालो को हिज्र में रहेने के सजा कयुं देता है?
रूकता नही यादो का कारवां दिन रात कहां देखता है
उन की आंखो मे देखो,नमी का दरिया कयुं बहेता है
इश्क कबूल ना करे तो उन को तौहिन नहीं समजो!
फिर भी एक तरफा मुहोब्बत में दर्द कयुं सहेता है?
कहेते है खुदा तो यहां सब लोगो का ख्याल रखता है
फिर भी हर चाहनेवाले सनम को खुदा कयुं कहेता है?
हर एक बात पें कयुं उन का जिक्र आता है बोलो!
बोलो दिल में रहेनेवालो नाम जबा पे कयुं आता है?
जुदा होने का असर जाना नही है गझल लिखनेवाले!
फिर जुदाइ के सबब किस्से गझलो मे कयुं लिखता है
कभी इश्क किया नही,नरेन,फिर गझले गुलाबी कयुं?
तस्सवुर के वाकीए,फिर सच्चाइओ मे कयुं बदलता है
(नरेश के.डॉडीया)
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आप जाँच लीजिये मुझको,आप परख लीजिये,
गर माल चौकस लगे तो दिल मे रख लीजिये
अच्छाइ,बुराइ,पहेले मुज मे देख लीजीये आप
काम होने के बाद कबाडी के पास मत भेजीये
किस्मत ने कहीं का नही छोडा है आप जानीये
कुछ न करे तो,किस्मत के भरोसे छोड दीजीये
सुनो!कुछ लोगो के आने से किस्मत बदलती है
ऐसा नही हुवा तो,जाने भी दो ये बात छोडीये
बताये आप!ये शायर अपनी चाहत कैसे जताये?
चाहो नही तो,दुर जाने का रास्ता तो दिखायीये
कयां है’नरेन’कैसा दिवानगी का पागल दोर है!
रूठनेवालो के गझलो से नही प्यार से मनायीये
(नरेश के.डॉडीया)
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चाहना हि मेरी खवाहिश थी तो तुम्हारी क्यां मजबूरी थी
गर मजबूरी नही थी तो हमारे बिच कयुं इतनी दूरी थी
बंयाबा सी जिंदगी को कोइ ख्वाहिश नही कि बारिस कि
प्यास भडक उठी,एक निगाह से तब से हालत बूरी थी
बडी शीद्दत से तुजे पाने का सफर का आगाझ किया था
चाहतो से सजायी सफर जो,जरूरत से ज्यादा जरुरी थी
जिंदगी के मिजाज और तौर-तरीके ऐसे तो ना थे पहेले
कैसा दोर आया,के तेरे आने से पहेले जिंदगी अधुरी थी
कभी सोचा,चाहनेवालो की हालात कया होती अकेले मे?
एक पल कटती थी,जैसे गले पे किसीने रखी छूरी थी
ना तुम्हे बेवफा कहे,ना हमने बेवफाइ की,ये दूरी कयुं?
कोनसे तस्कीन की तहद सोच लिया ये कहानी पुरी थी
तुम्हारे चाहनेवालो की कमी नही है.मेरा मिजाज कुछ है
बर्दास्त नही होता,यकीनन ये मेरी चाहत की मगरूरी थी
हैरतअंगेझ कारनामे की तरह चाहत को देखा था लोगोने
मेरी गझले लिखाइ नही,सिर्फ आप के नाम की नूरी थी
(नरेश के.डॉडीया)
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देखी नही मैने जिंदगी मे ऐसी खुदाइ राहत
कि जन्नत के शायरने भेजी हो अपनी चाहत
तेरे साथ दो कदम चल दिये लोग परींशा है
तेरे चाहनोवालो के लिये बन गया में आफत
…
सहेमे से माहोम में तेरा चहेरा नजर आया!
ना जाने कहां गायब हो जाती थी वो आहट
सरेआम चाहत जताना झूनूनी पेशा बन गया
पिंदार ए मुहोब्ब्त में गझले देती थी दावत
हर चमन,मुशायरे में तेरा हि जिक्र होता था
मुश्कुरा के बोलता था महोतरमा तो है यासम
जब भी तुम्हे उदास पाया,मायुश हो जाता था
तुं मुश्कुराती तो लगता था जैसे खुदाइ रहेमत
तेरी रानाइ का गुमान गझले बंया करती थी
कया पता!कलम चलती या रानाइ नजाकत
कोन जानता था नरेन,चाहतो के दोर से पहेले?
हैरत है लोग,गझलो मे पायी है कैसी महारत!
(नरेश के.डॉडीया)
यासम – जुइ का फूल
रानाइ -खूबसूरती
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बहाने और भी है दुनिया मे मशहुर होने के लिये
एक पल मुजे दे,तेरी आंखो का नूर होने के लिये
कीसीने मुहोब्बत मे अफलातुन सलुक पाया नही है
कुछ हांसिल किये बिना हो चला,जुज होने के लिये
लिखता गया,लिखता गया गझले उन के नाम से,
लोगो के नजरो वो बन गया महरूम होने के लिये
मुहोब्बत करके कया पाया,क्यां खोया सोचा नही था
प्यार ना पाया तो,मशहुर तो हुवा गुम होने के लिये
पता नही था रानाइ खवातिनो के अंदाजेबंया के राझ?
पता चला,तो बेचारा चल पडा मगलूब होने के लिये
पता नही महोतरमा का इश्क मकसुम होगा के नही?
नरेन होंसालां रखो,पैमाने भरलो,मखमूर होने के लिये
(नरेश के.डॉडीया)
जुज-
महरूम-
मगलूब-
मखमूर
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मौत से नही डरते,जितना तेरे दुर जानेसे डरते थे
हिज्र की शब में यादो के साये आसपास घुमते थे
ना हम समज शके चाहतो के आलदरज्जे के फन!
एक ही पल मे मुजे’तुम’नही ‘आप’ बना देते थे
कैसी बेरुखी है जो चाहनेवालो की समज के बहार है
बोलने से दिल बहेल जाये,आप है के चुप रहेते थे
दोस्ती और चाहत मै सुरज और चांद जैसा फर्क है
पता नही दिन-रात सिर्फ आपको कयुं हम चाहते थे
जो तरीका खुदा के पास वो तरीके से कैसे मनावुं?
इस लिये आपकी चौकट पे हम बार बार रुक़ते थे
वफादारी के माइने बहेतरीन तरीके से निभाते गये
चाहतो मे मसले हुवे गुल इत्र बन के महेकते थे
(नरेश के.डॉडीया)
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माशुक गर तुमसा खूबसूरत होता,इश्क नही जंग का मैदान होगा
ऐसा होता तो हर आशिक का जंग ए झुनून में एक पैदान होता?
खुशनसीब वोह इन्सांन है,उन का वास्तां चाहतो से पडा नही है
ऐसा होता तो हर माशुक के लिए सनम तो खुदाइ खैरात होता?
दिवाना कहेतां है,लड जांउगां मेरे रकिब के साथ मरते दम तक
ऐसा होता तो,हर हुस्नवालो पे कितने कतलो का इल्जाम होता?
खूबसूरत आंखोवाले,कालीघने बालो वाले,’एक नजर इधर भी’
बरसो पहेले सुना होता,आज हमदोनो का मिजाज जवान होता
जनानाओ की रानाइओसे,रुस्वा करता रहा,जब से तुम्हे देखा है
गर हुस्न का खौफ गझल लिखते वकत सामने ना तैनात होता
लगता है के तुम्हारी खूबसूरती किसी अनजाने खुदा की तौकीर है
गझलो मे तेरा जिक्र देखके खुदा बोला हमे ये नही बरदास्त होता?
(नरेश के.डॉडीया)
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इझहार ए मुहोब्बत गझलो मे हम बताते रहेते थे
फांसलो की दुरी से भी लगातार वो सताते रहेते थे
जितने रास्ते थे,सभी रास्तो से गुजर के देखा मैने
मिलो के पथ्थर मे नाम उन का लिखते रहेते थे
कैसे समजाये उन को दिल की बेकरारी का आलम
एक एक शेर में मेरी हालत अपनी बताते रहेते थे
काश कोइ ऐसा इल्म खुदा से जो मिल जाये अगर
ऐसा इल्म जो नजुमी हुबहुं आदमी बनाते रहेते थे
कयुं नही होती है,उन के दिलो की हालात बेकरार
वो ख्वाब उन की आंखो हो,जो मुजे जगाते रहेते थे
किसी दिन तो उन को भी लगे कोइ मुजे चाहता है
एहसास हो, कयुं सब चाहतो किस्से सुनाते रहेते थे
खवाब जो गझलो मे लिखते है,कभी पुरा नही होता
फिर भी प्यासी आंखो से ख्वाब शायरे देखते रहेते थे
किस्सा जो कागजो पे लिखनेवाला पुरा हो जाये गर!
वो ही शायरकी कब्र पे फुल अकसर खिलते रहेते थे
(नरेश के.डॉडीया)…..
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कभी कभी तनहाइया सरेआम मेरे वजुद से लिपटती है
जब तुम्हे सामने चाहु,एक खूश्बू गजल में सिमटती है
रबने भले तुजे मेरे लिये नही बनाया,ये अब किक्र नही
इस लिए चाहनेवालो की अर्ज खुदा के पास अटकती है
मकसद जिंदगी का है तुजे चाहना,कया खोना,कया पाना
चाहतो में अच्छे अच्छो कि नियत बिच रास्ते भटकती है
जुदाइआ क्यां है सुफीबंदो के लिए,तेरे सजदे करता है
बंदा तेरे नाम से बंदीशे छेडे तो सारी फिझा महेकती है
सारी रुसवाइआ तुं मेरी तनहाइ के नाम कर के देख ले
तस्वीरो मे तुजे मुश्कुराती देख के मेरी गजले बहेकती है
हसरते और भी जवान होती तेरे लिबासो के रंगो जैसी
लिबास कोइ भी पहेने जिंदगी तेरी चाल सी थीरकती है
घोसंलो में परींदे की तरह तेरी पनाह मे महेफुझ रहेता हुं
तेरी खातिरदारी मे मेरी इंसानी जात परींदे सी चहेकती है
कैसा दोर है,दिमाग में तेरे ख्यालो के सिवा कुछ नही है
पता है नरेन,महोतरमां की आंख़े भी बार बार छलकती है
*नरेश के.डॉडीया
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तुम मेरे नही हो जानता हुं,फिर भी तुमसे मुहोब्बत है तो है
लिखता हुं गझले भी तेरे नाम से,शायर की महारत है तो है
हक्कीत है कें मेरा वजुद तुंज में नही,पर तेरा अक्स जैसा है
अगर चाहे या ना चाहे तेरे साथे चलने की खसलत है तो है
यकीन खुदा पे करता हुं उसी तरह ये यकीन तुज पे जिंदा है
गर काइनात में खुदाइ नही,मुज पे तेरी खुदाइ रहेमत है तो है
वास्ता चाहे किसी गैर के साथ हो,कोइ फर्क नही पडता मुजे
आंखरी सांस तक तेरा वजुद हुं में,ये मेरी काबिलियत है तो है
कैफियत अकसर सुनता रहेता हुं,तनहाइ पंसद करने लगी है!
बेंइंतिहा मुहोब्बत से डर लगता है,फिर भी मेरी चाहत है तो है
महोतरमां,इतनी बेरूखी से मुजे डर सा लगने लगा है समजो
रुसवा नही कर शकता तुज से नरेन,समजो मिन्नत है तो है
(नरेश के.डॉडीया)
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इश्क में दुनिया बदलती है ये जमाना बदलता है
जान ए हयात मगर दिल कहा पुराना बदलता है
रस्म,रिवाझे,दिवारे,दुरिया,सरहदे ये बाते है सब
माशुक से नाम से जमाना हर दिवाना बदलता है
कितने जनम की प्यारकी प्यास तुज से जुडी गइ
इश्क तो पुराना होता है सिर्फ अफसाना बदलता है
दर्दे आशोब* जैसे इश्क साथे जुडके आता रहेता है
ये दोस्ती का इश्क के नाम से ठीकाना बदलता है
दिल में आवाजेपा* सुनाइ देती अनजान शख्स की
आयना पुराना रहेता है सिर्फ कयाफा* बदलता है
कमबख्त इश्क कीसी नही छोडतां मंदिरे-मस्जिद मे
पुजारी की आरती या आलिम का कलमा बदलता है
काफिला जुड गया कलम-शाहि के सरो-सामान से
सिर्फ तेरा नाम लिखता हुं,सिर्फ खामां* बदलता है
गजाला सी तेरी आंखो में क्यां मासुमियत देखी मैने
रुबारुं मे’नरेन’का शिकारी जैसा ये इमां बदलता है
(नरेश के.डॉडीया)
आवाजेपा*-पाव की आहट
कयाफा* – चहेरा-शकल
खामां* – कलम
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कितने महान थे वोह लोग,जो दिलकश गझले लिखकर गये
क्यां पतां!किसी की मुस्कुराहट पे अपना फन लूटा कर गये
राह चलते न जाने कितने देरो-हरम हमे नजर आते रहेते है
जब तेरी चोकट से गुजरे है,हम तो सजदे कर के गुजर गये
रोज आना जाना लगा रहेतां तेरी गली से मुसाफीर की तरह
एक दिन आंख मिल गइ,और मंजिल समज के ठहर गये
पतां नही था हुस्न कयां चीज है,किताबो मे किस्से पढते थे
बहिश्त की हसीनां जैसी शकल देख आप दिल में उतर गये
अंदाज बदलने कां हमे हुन्नर कहां आता थां मिलने से पहेले
एक झलक क्यां देखी आप की,अंदाझेबंया हमारे बदल गये
बहारे हमारे लिए बशारत बन के आती रहेती थी सालो साल
बरकत ए बहार बन के आप आयी है,मौसम जैसे संवर गये
गुलाबी रंगो से लबरेज लबो पर लर्जिश पंसदीदा लगने लगा
रूठ जाती थी तब दांतो से दबे लबो को देख हम बिखर गये
हसरते कां मुसलसल दोरा चलता रहा तेरी पनाहो मे हमारा
तेरे करम से हुस्न की खूबीयावाली गझले बस लिखकर गये
कयां पतां कल इस महेफिल में नाचीज का नाम रहे ना रहे,
महोतरमां तेरे नाम से नरेन के कलम कें रंगढंग निखर गये
(नरेश के.डॉडीया)
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रूठ जाओगे तुंम ऐसी तो कोइ बाते नही
भुल जाओ तुंम ऐसी कोइ मुलाकाते नही
तुटके हम से कभी कहे ना पाओगे तुम
याद नही किया तुमे ऐसी कोइ राते नही
…
ये ना सोचो के इश्क को हम भूल जायेंगे
इश्क तुम से कियां औरो से चाहते नही
जुठ ना बोलेंगे तुम से ये ना सोचो तुम
तुम को ऐसा लगे बाते ऐसी करते नही
हम ना चाहेंगे तुंम किसी से मिला करो
किसी से इश्क हो ऐसा हम सुनते नही
ये ना सोचो के हम कभी बेवफाइ करेंगे
चाहते है उन को ख्वाबो मे छोडते नही
रबने युं मिला दिय़ा है महोतरमा दिलसे
कुछ करम है,अरमां हमारे रुक़ते नही
मुसलसल लिखते है तुम्हारी चाहतो मे
तेरा हि नाम है,दुसरा नाम लिखते नही
ऐसी समा नही,उन के परवानो नही है
सचमे फरिशता हुं,इस लिए जलते नही
सिलसिले रुक़े नही चाहतो के शुरुं हुवे
खुदा करे चाहतो के सिलसिले तुटे नही
(नरेश के.डॉडीया)
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में समजता था चाहनां मेरी अकेले की मजबूरी थी
पता चला!मेरे सिवा और लोगो की हालत बूरी थी
जो चाहता गर मिल जाता उन से कुछ कहे बिना
वो नहीं सुनना चाहते लबो से जो कहानी अधुरी है
…
बात वफादारी की होती हमारा दरज्जा अवल रहा था
मुजे पता है,ये बात खूद उनकी जबां से कबुली थी
जझबा हमारा नेक था आलादरज्जे की मुहोब्बतो मे
फिर भी हमे महेसुस हुवा के हमारी कुछ कसुरी थी
कारवां कहा अटका,कयुं अटका,किस जगह पता नही
अंजान रास्ते की सफर के आगाज की तैयारी पुरी थी
अब बात करने से बात बनती नही है हम कया करे
ऐसा लगा के सामने भरी जाम से होठो की दूरी थी
थक चुके है हमारे अशरार पहेलीबार महेसुस किया है
वोह बात कयुं दोहराते हो नरेन,जिस बात पे रूठी थी
(नरेश के.डॉडीया)
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मेरे एहसासो में अभी तक उनकी यादे अटकी हुवी है
जैसे मेरे जिस्म से मेरी रूह मुज से भटकी हुवी है
बरदास्त नही होता है अपनो का अपनो से रूठ जाना
जैसे वकत की शाख पे अपनी जिंदगी लटकी हुवी है
एक शाम पहेले होती थी,अब वो शाम कहा होती है
वकत से पहेले,वकत के बाद तकदीर उलजी हुवी है
असुल और सच्चाइ पर चलने से पहेले पीछे देख लो
आप की शकल से ओरो की शकल मिलती हुवी है?
तकदीर के मेदान में चारो और बयाबां सा लगने लगे
किसी की आंखो में देख लो एक झिल बहेती हुवी है
नझरीया बदल के भी देख लो नफरतभरी निगाहो मे!
शायद निगाहो में दोस्ती की एक मशाल जलती हुवी है
इश्क करना गुनाह नही है,तरीकामंद बनना जरूरी है
कोइ काजलभरी आंखोवाली की सांसे भी थंभती हुवी है
प्यार करो या दोस्ती करो,रिश्तो की एहमियत समजे
मौसम की तरह खिजा के बाद बहारे महेकती हुवी है
बदलता नही है,महोतरमा का रिश्ते निभाने का तरीका
जब भी देखो,लबो पे रिश्ते कि बुलबुल चहेकती हुवी है
(नरेश के.डॉडीया)
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मेरी लिखाइ है,उस दिलचाहे शख्स की रहेनुमाइ है
सर से पाव तक देखो,उस में रानाइ ही रानाइ है
कुछ अरसा हुवा है!आंसुंने नही रहेने की ठानी है
जिस दिन से उन की मुश्कुराहट मुज मे समाइ है
पता नही,खुद अपने वजुद से बहुत दुर चला गया
क्यां हुवा मे हुं या वोही शख्स मेरे जैसा सौदाइ है
चारो और वोही शख्स की आवाझेपा सुनाइ देती है
पहेलीबार ऐसा लगा मेरी जिंदगी भी एक कमाइ है
ताल्लुकात ऐसे जुडे,उन के बिना कुछ अधुरा है
उन की चाहतो में खुदाने अपनी हेसीयत दिखाइ है
आधी जिंदगी ऐसे कटी है जैसे उम्रकेद में बिताइ
जब भी तुजे मिला तो लगा के तुं मेरी रीहाइ है
कुछ लोगो को मिलाने की साजिस कोन करता है?
तुम्हारा युं मुजे मिलनां जैसे खुदा है या खुदाइ है
बडा बेफिक्र सा मिजाज रहेता है तुम्हारी पनाह मे
मेरा अंदाज बदलनां तो तेरी रस्म ए मुहंदिखाइ है
दिल परिंदे सा मासुम बन गयां आपकी आवाज से
आपकी दिलकश आवाज मे जैसे खुदा की रुबाइ है
‘महोतरमां’चाहतो के रास्ते मे रुकावट ना आये
नरेन के साथ चल दिये तो मंजिल ही रुकाइ है
(नरेश के.डॉडीया)
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तेरे कमाल की हद कब कोई इन्सां समझा है
उसी क़दर उसे हैरत है,जिस क़दर उलझा है
हुस्न और नजाकत की बाते इस कदर समजा
शर्मशार हुवा बचपन तब मामला सुलझा है
कइ बार तेरे मतलब को बेमतलब समजा
समज मे आयेगा कुछ राझ अब खुलना है
ना समजा तेरी मुहोब्बत को अब तुं समजा
समज में आयेगा तेरी बाहो मे मुजे मरना है
ना खुल शका तेरी इल्मी बातो का राज
समज में आयेगा मेरी किसी से तुलना है
इस कदर में हेंरान हुं हुस्न के फनकार से
जवानी को हसीन फन के काबिल करना है
नही उठते है कदम मेरे मयखाने की और
बहेका हुं जल्वे से साकी को जाम भरना है
महोतरमा तेरे ख्यालो में जिंदगी उलझ गइ
पता नही तेरे लिये किस मोड से गुजरना है
(नरेश के.डॉडीया)
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आंखो में आसुं है,चहेरे पे शुकुन नही,फिर भी एक मुश्कान है
पता है!आप के नाम से किसी के चहेरे पे आज भी पहेचान है
भले उन से रुठ गये है,अगर कोइ वास्ता नही रहा है,फिर भी
भीखारी की तरह बेठा शख्स,जैसे सामने हलवाइ की दुकान है
चाहनेवालो की फितरत भी कहा देखी है,मेदान मे डटे रहेने की
लडेगा आखरी दम तक,जब तक आपकी रूसवाइ की थकान है
खोना या पाना किसी को पता नही,उम्मीद की मशाल जलती है
चाहनेवालोने एक ही मानी है,आपके दिल मे आखरी मकाम है
उम्मीद की एक किरन सजा ली है आप के नाम की आंखो मे
हमारा दिल खोल के देख लेना,आप के नाम और भी पैगाम है
पता नही हमारे बिच की दूरी कैसे तय होगी,ये वकत बतायेगा
वोही रस्ते पे चलने की आदत है,जहा तेरे पांव के निशान है
महोतरमां खूशीया हमारी सिर्फ आप से जुडी है,ये जानो आप!
आप का हमारे साथ होना,सिर्फ और सिर्फ गझलो की जान है
(नरेश के.डॉडीया)
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यार अगर तुंम जैसा होता,अपना खुद का रुआव होता
ख्वाब गर तुं जैसा होता,नींदो में मिजाज नवाब होता
चाहतो मे चाहनेवालो को चाहत मिल जाये तो क्या है
गर तेरी चाहत मुंक्ममिल हो,तो अपनां मकाम होता
जिंदगी क्यां है जान ए हयात,कुछ सालो का सफर है
गर हमसफर तुंम हो,हर सफर का सही आगाझ होता
ख्वाहिश गर पाने की है तो सिर्फ और सिर्फ आप की
गर ना पाया,तो काइनात मे हमारा वजुद नाकाम होता
रूखसत मिले या हाथ मे हाथ डालके चले,कुछ तो हो
तुंम से मिलना या बिछडना,ताल्लुक का अंजाम होता
तुट चुका हुं,रुह से जहन तक,तुम्हारी बेरूखी से जानो
गर तुम से मुहोब्बत ना होती,ना इतना बदनाम होता
ताल्लुक तेरा मेरे लिये कभी बोज नही बन शका कयुं?
जमाने का डर ना होता,गझलो तेरा जिक्र सरेआम होता
वफादारी हमारी समज लेना महोतरमां खुदाइ तौकिर है
तेरी चाहतो मे लिखा हर लब्झ खुदाइ का पैगाम होता
(नरेश के.डॉडीया)
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कुछ तो है उन के जलवे मे, हर पल ख्यालो मे मचलते है
रुह में वो लिपटे है,जैसे उन को देखते ही मिजाज बदलते है
आम इन्सान जैसे उस नाझनिन के तोरतरीके है फीर कयुं?
उन के रूतबे देख के मेरे दिल मे खूबसूरत किस्से पलते है
दिल को चेन नही मिलता है,गर उन को एक पल सोचा नही
ख्यालो के चमन में सिर्फ उन के नाम के ही गुल खिलते है
बारीस का महिना हो,शरदीओ के मौसम या,तपती दोपहरी हो
लोग बहार इस को कयुं कहेते है,जब उन के बाल बिखरते है
में जिंदगी में महेफुझ कभी नहीं था,उन को मिलने से पहेले
उन की पनाह में मेरे गम के सांये मुजसे बहुत दूर ठहरते है
कभी कभी मिन्नते का मौका मिलता है,तब बडा फक्र होता है
इतमिनान से खूबसूरत लब्झ मिन्नतेवाली गझल मे लिखते है
रोज मिलता हुं,कही बार मिलता हुं,ख्वाबो मे उसे छोडता नही
एक शेर लिखता है,फिर उन के नाम के कही अफसाने बनते है
महोतरमा,कितनी अदा दिखा के सिर्फ एक ही दिवाने को मारा
नरेन का दिल मंदिर है,वहा तुम्हारे नाम के हि दिये जलते है
(नरेश के.डॉडीया)
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बेंइंतिहा मुहोब्बत है तो है,मेरा दिल भी कहता है
पहेले जो दरिया था,आज नदी के साथ बहता है
कभी जो एक ख्वाब था हमारी सोच के बहार था
आप को देख के ये ख्वाब मेरी आख़ो मे पलता है
तनहाइ से वास्ता सौतन-रकीब जैसा हो गया है
आप को साथ देख,दोनो का दिल बहुत दुखता है
आप से इश्क कया हुवा जैसे खुदा मिल गया है
तब से ये मिजाज सुफी बंदीसो मे रोज सजता है
दरिया चाहे कोइ भी हो,पार कर के जाना तो है!
गर किनारे पे तुं घर बना के इंतजार मे रहता है
जमाने की अब मत सोचो,कुछ मेरा ख्याल करो
दिन की रोशनी मे दिल चरागो की तरह जलता है
तेरे नाम की जरा सी आहट से अरमां मचलते है
मनचाहे गाने की तरह तेरा नाम कानो मे बजता है
सुना है महोतरमां इन दिनो मेरी गझले पढती है?
दोस्ती या इश्क मे,कोइ है जो बडाप्यारा लगता है?
अदाकारी माइने हम अच्छी तरह से रास आने लगे
किरदार कोइ भी हो,अंदाज सिर्फ आप का जचता है
ख्वाहीसे सरेआम तेरे नाम से चारोदिशा मे फेली है
महोतरमा,तेरा वजुद मुजे हर गमो से दूर रखता है
(नरेश के.डॉडीया)
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दिल की गहेराइ मे हर वकत तेरी सदा आइ है
जैसे में खुद नहीं,मुज मे तेरी ही अदा छाइ है
रिस्तो की बुनियाद से आसानी से जुड शकते है
पता नहीं तेरे दिल में मैने कैसे जगह बनाइ है
इस्तेहार की तरह पन्नो पे छपती है प्रेमकहानी
हमारी कहानी मे हमदोनो का वजुद अक्षर ढ़ाइ है
दिन मे सुरज से,रात को चांद से रोशन है जहां
मेरे हिस्से की रोशनी सिर्फ तेरी ही मुहंदिखाइ है
जमाने को रास नही जो ताल्लुकात के नाम नही
तेरे नाम से मेरा नाम जुडना,ये तौकिर खुदाइ है
महोतरमा,सिर्फ मुजे आप की रहेनुमाइ हि चाहीए
चाहनेवालेने तेरे लिए अपनी हालत क्यां बनाइ है
मशहुर होने का कोइ तरीका मुजे कहा आता था?
महोतरमां तुं मिली तब से चांदनी मेरी परछाइ है
नही जचती है जन्नत की हुर से काइनात की परी
तेरे जिक्र से कितने शायरो की मेरे साथ रूसवाइ है
महोतरमां,मेरी चाहत के चर्चे सरेआम कयुं होते है
इसी बात पे गैर हसीना से दुरी की रस्मे निभाइ है
(नरेश के.डॉडीया)