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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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जापान में एक छोटा सा गाँव था। उस गाँव में आया था एक संन्यासी, एक युवा संन्यासी। बहुत सुंदर, बहुत स्वस्थ, बहुत महिमाशाली। उसकी प्रतिभा का प्रकाश शीघ्र ही दूर – दूर तक फैल गया। उसकी सुगंध बहुत से लोगों को मन को लुभा ली। गाँव का वह प्यारा हो गया। वर्ष बीते, दो वर्ष बीते, वह उस गाँव का प्राण बन गया। उसकी पूजा ही पूजा थी।
            लेकिन एक दिन सब उलट हो गया। सारा गाँव उसके प्रति निंदा से भर गया। सुबह ही थी अभी, सर्दी के दिन थे। सारा गाँव उस फकीर के झोपड़े की तरफ चल पड़ा। उन्होंने जाकर उस फकीर के झोपड़े में आग लगा दी। वह फकीर बैठा हुआ था बाहर, धूप लेता था। वह पूछने लगा, क्या हो गया है, क्या बात है आज सुबह ही सुबह इतनी भीड़, आज सुबह ही सुबह इस झोपड़े में आग लगा देना? हो क्या गया है, बात क्या है?
            भीड़ में से एक आदमी आगे आया और एक छोटे से बच्चे को लाकर उस संन्यासी की गोद में पटक दिया और कहा :हमसे पूछते हो बात क्या है? इस बच्चे को पहचानो!
             उस संन्यासी ने गौर से देखा और उसने कहा :अभी मैं अपने को ही नहीं पहचानता तो इस बच्चे को कैसे पहचान सकूंगा? कौन है यह बच्चा, मुझे पता नहीं है!
              लेकिन भीड़ हंसने लगी और पत्थर फेंकने लगी और कहा बहुत नादान और भोले बनते हो। इस बच्चे की मां ने कहा है कि यह बच्चा तुमसे पैदा हुआ है और इसीलिए हम सारे गाँव के लोग इकट्ठे हुए हैं। हमने तुम्हारी जो प्रतिमा बनायी थी वह खंडित हो गई। हमने तुम्हें जो पूजा दी थी वह हम वापस लेते हैं और इस नगर में हम तुम्हारा मुंह दुबारा नहीं देखना चाहेंगे।
            उस संन्यासी ने उनकी तरफ देखा। उतनी प्यार से भरी हुई आँखें – उसकी आँखे तो सदा ही प्यार से भरी हुई थीं, लेकिन उस दिन का उसका प्यार देखने जैसा था। लेकिन वे लोग नहीं पहचान सके उस दिन उस प्यार को, क्योंकि वे इतने क्रोध से भरे थे कि प्यार की खबर उनके हृदय तक नहीं पहुंच सकती थी। नहीं पहचान सके उस दिन उन आँखों को जिनसे करुणा छलक पड़ती थी, क्योंकि अंधे सूरज को कैसे देख सकते हैं? सूरज खड़ा रहे द्वार पर और अंधे वंचित रह जाते हैं। उस दिन वे अंधे थे क्रोध में, निंदा में। उस दिन नहीं दिखाई पड़ा उस संन्यासी का प्रकाश।
          वह संन्यासी हंसने लगा। फिर वह बच्चा रोने लगा जो उसकी गोद में गिर पड़ा था। वह उस बच्चे को समझाने लगा। और उन लोगों ने पूछा :कहो, यह तुम्हारा बच्चा है? है न?
           उस संन्यासी ने सिर्फ इतना कहा :  इज़ इट सो? ऐसी बात है? आप कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे। फिर वे गाँव के लोग वापस लौट गए।
            फिर दोपहर वह संन्यासी भीख मांगने उस गाँव में निकला। कौन देगा उसे भीख लेकिन? वे लोग जो उसके चरण छूने को लालायित रहते थे, वे लोग जो उसके चरणों की धूल उठा कर माथे से लगाते थे, उन्होंने उसे देखकर अपने द्वार बंद कर लिए। लोगों ने उसके ऊपर थूका, पत्थर और छिलके फेंके। और वह संन्यासी चिल्ला – चिल्ला कर उस गाँव में कहने लगा कि होगा कसूर मेरा, लेकिन इस भोले बच्चे का कोई कसूर नहीं। कम से कम इसे दूध तो मिल जाए। लेकिन यह गाँव बहुत कठोर हो गया था। उस गाँव में उस बच्चे को भी दूध देने वाला कोई न था। फिर वह उस घर के सामने आकर खड़ा हो गया जिस घर की लड़की ने यह कहा था कि यह बच्चा संन्यासी से पैदा हुआ है। वह वहां चिल्लाने लगा कि कम से कम इस बच्चे कि कम से कम इस बच्चे के लिए दूध मिल जाए।
          वह लड़की आई बाहर और अपने पिता के पैरों पर गिर पड़ी और उसने कहा :क्षमा करना! इस संन्यासी से मेरा कोई भी संबंध नहीं है। मैंने तो इस लड़के के असली बाप को बचाने के लिए संन्यासी का झूठा नाम ले दिया था। भीड़ इकट्ठी हो गई। बाप उस संन्यासी के पैर गिरने लगा और कहने लगा :लौटा दें इस बच्चे को। नहीं – नहीं, यह बच्चा आपका नहीं है।
               वह संन्यासी पूछने लगा : इज़ इट सो ? नहीं है मेरा? ऐसा है क्या, मेरा नहीं है यह बच्चा?
           वे लोग कहने लगे :तुम हो कैसे पागल! तुमने सुबह ही क्यों न कहा कि यह बच्चा मेरा नहीं है।
         वह संन्यासी कहने लगा :इससे क्या फर्क पड़ता है। बच्चा किसी का तो होगा। इससे क्या फर्क पड़ता है कि किसका है। बच्चा बच्चा है, इतना ही साफ है, इतना ही काफी है। और इससे क्या फर्क पड़ता था, तुमने एक झोपड़ा तो जला ही दिया था और एक आदमी को तो गालियाँ दे ही चुके थे। अब मैं और कहता कि मेरा नहीं है, तो तुम एक झोपड़ा शायद और जलाते, किसी एक आदमी को और गालियाँ देते। उससे फर्क क्या पड़ता था?
          पर वे लोग कहने लगे :तुम हो कैसे पागल! तुम्हारी सारी इज्ज़त मिट्टी में मिल गई और तुम चुपचाप बैठे रहे जब कि बच्चा तुम्हारा नहीं था।
             वह संन्यासी कहने लगा :उस इज्ज़त की अगर हम फिकर करते तो चौथे दरवाज़े पर ही रुक जाते। नहीं, उस इज्ज़त की कोई चिंता नहीं है, उसकी कोई अपेक्षा नहीं है। वह तुम्हारा जो आदर तुमने दिया था, हमारी तरफ से मांगा नहीं गया था और चाहा नहीं गया था। तुमने छीन लिया, तुम्हारा दिया हुआ आदर था, तुम्हारे हाथ की बात थी, न हमने मांगा था, न छीनते वक़्त हम रोकने के हक़दार थे। नहीं वह कहने लगा चौथे द्वार पर हम रुक जाते। गाँव के लोग पूछने लगे, कौन सा चौथा द्वार?
            उसी चौथे द्वार (प्रभु – मंदिर का पहला द्वार :करुणा, दूसरा द्वार :मैत्री, तीसरा द्वार :मुदिता) की मैं आपसे बात कर रहा हूं। उस चौथे द्वार पर लिखा है :उपेक्षा, इनडिफरेंस। जीवन में जो व्यर्थ है उसके प्रति उपेक्षा। उस संन्यासी ने अद्भुत उपेक्षा प्रकट की। नहीं, जरा भी चिंता न ली इस बात की कि लोग क्या कहेंगे, पब्लिक ओपिनियन, जनमत क्या कहेगा!
           जो आदमी जनमत के संबंध में सोचता रहता है, वह कभी परमात्मा तक नहीं पहुंचता है, इसे स्मरण रख लेना। लोग क्या कहेंगे? इससे ज्यादा कमजोर, इस बात को सोचने से ज्यादा नपुंसक कोई वृत्ति नहीं है कि लोग क्या कहेंगे। जो लोग भी इस चिंता में पड़ जाते हैं कि लोग क्या कहेंगे, वे भीड़ के जो असत्य हैं उन्ही असत्‍यों में जीते हैं और उन्हीं असत्‍यों में मर जाते हैं, वे कभी सत्य की खोज नहीं कर पाते हैं।

🌹💐ओशो “साधना पथ” 🌺🍁

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बहुत समय पहले की बात है। देवलोक में तीन अप्सराएँ रहती थीं—मृणालिनी, चंद्रलेखा और पद्मिनी। तीनों अपनी कला, सौंदर्य और मधुर स्वभाव के लिए प्रसिद्ध थीं, लेकिन तीनों के स्वभाव बिल्कुल अलग थे।

मृणालिनी को नृत्य से प्रेम था, चंद्रलेखा को संगीत से और पद्मिनी को दूसरों की सहायता करने में आनंद मिलता था।

एक दिन देवराज इंद्र ने तीनों को बुलाकर कहा—

“पृथ्वी पर एक ऐसा राज्य है, जहाँ राजा तो शक्तिशाली है, लेकिन उसकी प्रजा वर्षों से दुखी है। तुम तीनों वहाँ जाओ और पता लगाओ कि उस राज्य का असली संकट क्या है।”

तीनों अप्सराएँ पृथ्वी पर पहुँचीं और साधारण स्त्रियों का रूप धारण कर महल के पास रहने लगीं।

उन्होंने देखा कि राज्य में अनाज की कमी नहीं थी, धन की भी कमी नहीं थी, फिर भी लोगों के चेहरों पर खुशी नहीं थी।

मृणालिनी ने कहा,
“शायद लोगों को मनोरंजन की आवश्यकता है।”

उसने राजदरबार में ऐसा सुंदर नृत्य किया कि पूरा महल तालियों से गूंज उठा। लेकिन अगले दिन प्रजा फिर उदास थी।

चंद्रलेखा ने मधुर गीत गाया। गीत सुनकर लोगों की आँखों में आँसू आ गए, मगर उनका दुख दूर नहीं हुआ।

तब पद्मिनी गाँव में गई। उसने एक वृद्ध किसान से पूछा—

“आप लोग इतने दुखी क्यों हैं?”

वृद्ध ने कहा,
“हमारे पास खेत हैं, मेहनत करने वाले हाथ हैं, लेकिन राजा के मंत्री गरीबों से इतना कर लेते हैं कि हमारे घरों में अनाज नहीं बचता।”

तीनों अप्सराओं को असली कारण समझ आ गया।

वे राजा के सामने पहुँचीं और सारी सच्चाई बताई। राजा को विश्वास नहीं हुआ। तब पद्मिनी ने कहा—

“महाराज, यदि आपको हमारी बात पर विश्वास नहीं, तो आज रात अपना राजसी वस्त्र उतारकर एक सामान्य किसान का रूप धारण करके गाँव चलिए।”

राजा ने ऐसा ही किया।

उस रात उसने अपनी आँखों से देखा कि गरीब किसान अपने बच्चों को आधा पेट भोजन देकर सुला रहे हैं।

राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ। अगले दिन उसने भ्रष्ट मंत्री को पद से हटा दिया और गरीबों का कर कम कर दिया।

कुछ ही दिनों में राज्य में खुशहाली लौटने लगी।

जब तीनों अप्सराएँ वापस देवलोक जाने लगीं, राजा ने पूछा—

“आप तीनों कौन हैं?”

मृणालिनी मुस्कुराकर बोली,
“जहाँ कला खुशी देती है…”

चंद्रलेखा ने कहा,
“जहाँ संगीत दिल को जोड़ता है…”

पद्मिनी ने आगे कहा,
“लेकिन जहाँ किसी का दुख दूर करना हो, वहाँ सबसे बड़ी शक्ति करुणा होती है।”

इतना कहते ही तीनों के शरीर से दिव्य प्रकाश निकलने लगा और वे आकाश की ओर उठ गईं।

राजा हाथ जोड़कर खड़ा रहा।

उस दिन से उसने अपने महल के द्वार गरीबों के लिए खोल दिए और कहा—

“जिस राज्य में प्रजा खुश नहीं, उस राजा की सारी संपत्ति व्यर्थ है।”

और कहते हैं, उस राज्य की कहानी आज भी यह संदेश देती है—

🌺 “सच्ची सुंदरता चेहरे में नहीं, किसी के जीवन में खुशी लाने वाले हृदय में होती है।” 🌺

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एक महात्माजी रात्रि के समय में ‘श्रीराम’ नाम का जाप करते हुए अपनी मस्ती में चले जा रहे थे। जाप करते हुए वे एक गहन जंगल से गुजर रहे थे। विरक्त होने के कारण वे महात्मा बार-बार देशाटन करते रहते थे। वे किसी एक स्थान में अधिक समय नहीं रहते थे। वे ईश्वर नाम प्रेमी थे। इसलिये दिन-रात उनके मुख से राम नाम जप चलता रहता था। स्वयं राम नाम का जाप करते तथा औरों को भी उसी मार्ग पर चलाते।
महात्माजी गहन जंगल में मार्ग भूल गये थे पर अपनी मस्ती में चले जा रहे थे कि जहाँ राम ले चले वहाँ। दूर अँधेरे के बीच में बहुत सी दीपमालाएँ प्रकाशित थीं। महात्माजी उसी दिशा की ओर चलने लगे।  निकट पहुँचते ही देखा कि वटवृक्ष के पास अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र बज रहे हैं, नाच -गान और शराब की महफ़िल जमी है। कई स्त्री पुरुष साथ में नाचते-कूदते-हँसते तथा औरों को हँसा रहे हैं। उन्हें महसूस हुआ कि वे मनुष्य नहीं प्रेतात्मा हैं।
महात्माजी को देखकर एक प्रेत ने उनका हाथ पकड़कर कहाः ओ मनुष्य ! हमारे राजा तुझे बुलाते हैं, चल। वे मस्तभाव से राजा के पास गये जो सिंहासन पर बैठा था। वहाँ राजा के इर्द-गिर्द कुछ प्रेत खड़े थे।
प्रेतराज ने कहाः तुम इस ओर क्यों आये ? हमारी मंडली आज मदमस्त हुई है, इस बात का तुमने विचार नहीं किया ? तुम्हें मौत का डर नहीं है ?
अट्टहास करते हुए महात्माजी बोलेः मौत का डर ? और मुझे ? राजन् ! जिसे जीने का मोह हो उसे मौत का डर होता हैं। हम साधु लोग तो मौत को आनंद का विषय मानते हैं। यह तो देहपरिवर्तन हैं जो प्रारब्धकर्म के बिना किसी से हो नहीं सकता।
प्रेतराजः तुम जानते हो हम कौन हैं ?
महात्माजीः मैं अनुमान करता हूँ कि आप प्रेतात्मा हो।
प्रेतराजः तुम जानते हो, लोग समाज हमारे नाम से काँपता हैं।
महात्माजीः प्रेतराज ! मुझे मनुष्य में गिनने की गलती मत करना। हम जिन्दा दिखते हुए भी जीने की इच्छा से रहित, मृततुल्य हैं। यदि जिन्दा मानो तो भी आप हमें मार नहीं सकते। जीवन-मरण कर्माधीन हैं। मैं एक प्रश्न पूछ सकता हूँ ?
महात्माजी की निर्भयता देखकर प्रेतों के राजा को आश्चर्य हुआ कि प्रेत का नाम सुनते ही मर जाने वाले मनुष्यों में एक इतनी निर्भयता से बात कर रहा हैं। सचमुच, ऐसे मनुष्य से बात करने में कोई हर्ज नहीं।
प्रेतराज बोलाः पूछो, क्या प्रश्न है ?
महात्माजीः प्रेतराज ! आज यहाँ आनंदोत्सव क्यों मनाया जा रहा है ?
प्रेतराजः मेरी इकलौती कन्या, योग्य पति न मिलने के कारण अब तक कुँवारी हैं। लेकिन अब योग्य जमाई मिलने की संभावना हैं। कल उसकी शादी हैं इसलिए यह उत्सव मनाया जा रहा हैं।
महात्माजी (हँसते हुए): “तुम्हारा जमाई कहाँ है ? मैं उसे देखना चाहता हूँ।”
प्रेतराजः जीने की इच्छा के मोह के त्याग करने वाले महात्मा ! अभी तो वह हमारे पद (प्रेतयोनी) को प्राप्त नहीं हुआ हैं। वह इस जंगल के किनारे एक गाँव के श्रीमंत (धनवान) का पुत्र है। महादुराचारी होने के कारण वह इस समय भयानक रोग से पीड़ित है। कल संध्या के पहले उसकी मौत होगी। फिर उसकी शादी मेरी कन्या से होगी। इस लिये रात भर गीत-नृत्य और मद्यपान करके हम आनंदोत्सव मनायेंगे।
महात्माजी वहाँ से विदा होकर श्रीराम नाम का अजपाजाप करते हुए जंगल के किनारे के गाँव में पहुँचे। उस समय सुबह हो चुकी थी। एक ग्रामीण से महात्मा नें पूछा “इस गाँव में कोई श्रीमान् का बेटा बीमार हैं ?”
ग्रामीणः हाँ, महाराज ! नवलशा सेठ का बेटा सांकलचंद एक वर्ष से रोगग्रस्त हैं। बहुत उपचार किये पर उसका रोग ठीक नहीं होता।
महात्माजी नवलशा सेठ के घर पहुँचे सांकलचंद की हालत गंभीर थी। अन्तिम घड़ियाँ थीं फिर भी महात्माजी को देखकर माता-पिता को आशा की किरण दिखी। उन्होंने महात्मा का स्वागत किया।
सेठपुत्र के पलंग के निकट आकर महात्माजी रामनाम की माला जपने लगे। दोपहर होते-होते लोगों का आना-जाना बढ़ने लगा।
महात्मा: क्यों, सांकलचंद ! अब तो ठीक हो ?
सांकलचंद ने आँखें खोलते ही अपने सामने एक प्रतापी सन्त को देखा तो रो पड़ा। बोला “बाबाजी ! आप मेरा अंत सुधारने के लिए पधारे हो। मैंने बहुत पाप किये हैं। भगवान के दरबार में क्या मुँह दिखाऊँगा ? फिर भी आप जैसे सन्त के दर्शन हुए हैं, यह मेरे लिए शुभ संकेत हैं।” इतना बोलते ही उसकी साँस फूलने लगी, वह खाँसने लगा।
“बेटा ! निराश न हो भगवान राम पतित पावन है। तेरी यह अन्तिम घड़ी है। अब काल से डरने का कोई कारण नहीं। खूब शांति से चित्तवृत्ति के तमाम वेग को रोककर श्रीराम नाम के जप में मन को लगा दे। जाप में लग जा। शास्त्र कहते हैं-

चरितम्  रघुनाथस्य  शतकोटिम्  प्रविस्तरम्। 
       एकैकम् अक्षरम् पूण्या महापातक नाशनम्।। 

      अर्थातः सौ करोड़ शब्दों में भगवान राम के गुण गाये गये हैं। उसका एक-एक अक्षर ब्रह्महत्या आदि महापापों का नाश करने में समर्थ हैं। 
      दिन ढलते ही सांकलचंद की बीमारी बढ़ने लगी। वैद्य-हकीम बुलाये गये। हीरा भस्म आदि कीमती औषधियाँ दी गयीं। किन्तु अंतिम समय आ गया यह जानकर महात्माजी ने थोड़ा नीचे झुककर उसके कान में रामनाम लेने की याद दिलायी। 
      राम बोलते ही उसके प्राण पखेरू उड़ गये। लोगों ने रोना शुरु कर दिया। शमशान यात्रा की तैयारियाँ होने लगीं। मौका पाकर महात्माजी वहाँ से चल दिये। नदी तट पर आकर स्नान करके नामस्मरण करते हुए वहाँ से रवाना हुए। शाम ढल चुकी थी। फिर वे मध्यरात्रि के समय जंगल में उसी वटवृक्ष के पास पहुँचे। प्रेत समाज उपस्थित था। 
      प्रेतराज सिंहासन पर हताश होकर बैठे थे। आज गीत, नृत्य, हास्य कुछ न था। चारों ओर करुण आक्रंद हो रहा था, सब प्रेत रो रहे थे। 
      महात्मा ने पूछा “प्रेतराज ! कल तो यहाँ आनंदोत्सव था, आज शोक-समुद्र लहरा रहा हैं। क्या कुछ अहित हुआ हैं ?” 
      प्रेतराजः हाँ भाई ! इसीलिए रो रहे हैं। हमारा सत्यानाश हो गया। मेरी बेटी की आज शादी होने वाली थी। अब वह कुँवारी रह जायेगी। 
      महात्मा: प्रेतराज ! तुम्हारा जमाई तो आज मर गया हैं। फिर तुम्हारी बेटी कुँवारी क्यों रही ? 
      प्रेतराज ने चिढ़कर कहाः तेरे पाप से ! मैं ही मूर्ख हूँ कि मैंने कल तुझे सब बता दिया। तूने हमारा सत्यानाश कर दिया। 
      महात्मा ने नम्रभाव से कहाः मैंने आपका अहित किया यह मुझे समझ में नहीं आता। क्षमा करना, मुझे मेरी भूल बताओगे तो मैं दुबारा नहीं करूँगा। 
      प्रेतराज ने जलते हृदय से कहाः यहाँ से जाकर तूने मरने वाले को नाम स्मरण का मार्ग बताया और अंत समय भी राम नाम कहलवाया। इससे उसका उद्धार हो गया और मेरी बेटी कुँवारी रह गयी। 
      महात्माजीः क्या ? केवल एक बार नाम जप लेने से वह प्रेतयोनि से छूट गया ? आप सच कहते हो ? 
      प्रेतराजः हाँ भाई ! जो मनुष्य राम नामजप करता हैं वह राम नामजप के प्रताप से कभी हमारी योनि को प्राप्त नहीं होता। भगवन्नाम जप में नरकोद्धारिणी शक्ति हैं। 
      प्रेत के द्वारा रामनाम का यह प्रताप सुनकर महात्माजी प्रेमाश्रु बहाते हुए भाव समाधि में लीन हो गये। उनकी आँखे खुलीं तब वहाँ प्रेत-समाज नहीं था, बाल सूर्य की सुनहरी किरणें वटवृक्ष को शोभायमान कर रही थीं।

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“સોનિયા, શું વાત છે? બધું બરાબર તો છે ને. આજે ફરી તારા લાડલાએ કોઈ તોફાન કર્યું છે, જેની ફરિયાદ લઈને પડોશીઓ આવ્યા છે, કે પછી ઘરમાં કોઈ મહેમાન આવ્યા છે?”

સોનિયાએ તરત જ રાહુલને ચૂપ રહેવાનો ઈશારો કર્યો અને ધીમેથી બોલી, “દીદીના સાસરિયાઓ આવ્યા છે. સવારે તમારા ઓફિસ જતા જ દીદી નારાજ થઈને પોતાનો સામાન લઈને અહીં આવી ગયા હતા. મેં તેમને ઘણું સમજાવ્યા, પણ તેમણે મારી એક ન માની, અને માને પણ કેવી રીતે, મમ્મીજી તેમના પક્ષમાં જે ઊભા હતા.”

રાહુલ બોલ્યો, “એટલે કે વાત બહુ વધી ગઈ હતી, તો જ દીદીના સાસરિયાઓ અહીં સુધી આવી ગયા. તેં મને કેમ ન જણાવ્યું, મારા કહેવાથી તે માની જાત.”

સોનિયા બોલી, “મેં પપ્પાજીને કહ્યું હતું, પણ પપ્પાજીએ કહ્યું કે જ્યારે છોકરી મા-બાપનું નથી સાંભળી રહી તો ભાઈનું શું સાંભળશે, તેથી મેં તમને પરેશાન કરવાનું યોગ્ય ન સમજ્યું. હવે તમે આવી ગયા છો તો કરી લો કોશિશ.”

સોનિયા રાહુલની બેગ લઈને જતી રહી. રાહુલે બધાને નમસ્કાર કર્યા. સોનિયાની નણંદ (રાહુલની બહેન) કવિતા રાહુલની સામે રડમસ ચહેરો બનાવીને બોલી, “જોઈ લે રાહુલ, તારી બહેનની શું દશા થઈ ગઈ છે. આટલા દિવસોથી તો હું સહન કરતી રહી, છતાંય અહીં આવી ગઈ. હવે મારું અહીં આવવું પણ તેમને મંજૂર નથી, જે મને પરેશાન કરવા ચાલી આવ્યા.”

રાહુલ બોલ્યો, “દીદી, તમે તમારા પરિવારવાળાઓ માટે કેવા શબ્દોનો પ્રયોગ કરી રહ્યા છો. વાત ભલે ગમે તે હોય, આ જીજાજીના માતા-પિતા છે, તેમનું તો માન રાખો, અને એવી કોઈ વાત નથી હોતી જેને ઉકેલી ન શકાય. ખરું ને અંકલજી?”

કવિતાએ કંઈક કહેવા માંગ્યું, તો રાહુલે ઈશારાથી તેને ચૂપ કરી અને બોલ્યો, “સોનિયા, દીદીને અંદર લઈ જા.” કવિતાની જવાની ઈચ્છા તો નહોતી, પણ તેને અંદર જવું પડ્યું.

સોનિયાનાં સાસુ શારદાજી (રાહુલની માતા) બોલ્યા, “રાહુલ, તારે તારી બહેનના પક્ષમાં ઊભા રહેવું જોઈએ, ન કે તેના સાસરિયાઓના પક્ષમાં. મારી દીકરીને તકલીફ થઈ હશે, ત્યારે જ તો તે પોતાના પિયર આવી છે.”

રાહુલ મલકાઈને બોલ્યો, “માં, દીદીનું તેના પિયરમાં હંમેશા સ્વાગત છે, ગુસ્સામાં પોતાનું ઘર છોડીને નહિ પરંતુ ખુશીઓ મનાવવા માટે. મને પહેલા આખી વાત સમજવા દો.”

કવિતાનાં સાસુ બોલ્યા, “બેટા રાહુલ, વાત એટલી પણ મોટી નથી કે વહુ પોતાનું ઘર છોડીને અહીં ચાલી આવે. છતાંય જો મારાથી કોઈ ભૂલ થઈ હોય, તો હું વહુની માફી માંગી લઈશ. જે રીતે એક માં પોતાની દીકરીને સમજાવે છે, બસ મેં પણ વહુને એ જ સમજાવવા માંગ્યું હતું કે ઘરની જવાબદારીઓ આપણે બધાએ સાથે મળીને ઉપાડવી પડે છે. કદાચ મારી કહેવાની રીત થોડી કડક હશે, જેથી કવિતાને ખરાબ લાગી ગયું. પણ મારો ઈરાદો તેને દુઃખી કરવાનો જરાય નહોતો.”

રાહુલ આખી વાત સમજી ગયો. તે સમજી ગયો કે આ માત્ર બે પેઢીઓ વચ્ચેના વિચારોનો નાનો એવો ટકરાવ છે, કોઈ મોટો ઝઘડો નહીં. તેણે સોનિયાને અવાજ આપીને કવિતાને બહાર બોલાવી.

કવિતા બહાર આવી ત્યારે તેના સાસુએ સામેથી આગળ વધીને કવિતાના માથા પર વહાલથી હાથ મૂક્યો અને કહ્યું, “બેટા, જો તને મારી કોઈ વાતનું દુઃખ લાગ્યું હોય તો મને માફ કરી દે. ઘર તારા વિના સાવ સૂનું લાગે છે, તું તો મારી દીકરી સમાન છે. ચાલ હવે આપણા ઘરે.”

પોતાનાં સાસુની આંખોમાં સાચો પ્રેમ અને પોતાને પાછી લઈ જવાની તાલાવેલી જોઈને કવિતાનો બધો ગુસ્સો પીગળી ગયો. તેને પોતાની ઉતાવળ અને જીદ્દી સ્વભાવ પર પસ્તાવો થયો. તેની આંખોમાં આંસુ આવી ગયા. તેણે તરત જ સાસુને ગળે લગાવી દીધા અને રડતાં રડતાં બોલી, “ના મમ્મીજી, તમે વડીલ છો, તમે માફી ન માંગો. ભૂલ મારી છે કે હું તમારી શિખામણને ખોટી રીતે સમજી ગઈ. મારે નાની અમથી વાતનો આટલો મોટો મુદ્દો નહોતો બનાવવો જોઈતો. મને માફ કરી દો.”

આ જોઈને કવિતાના સસરા અને તેનો પતિ, જે અત્યાર સુધી ચિંતામાં હતા, તેમના ચહેરા પર મોટી રાહત અને સ્મિત આવી ગયું. શારદાજી (કવિતાની મમ્મી) ને પણ સમજાયું કે રાહુલે કેટલી શાંતિ અને સમજદારીથી વાતને બગડતા અટકાવી લીધી. તેમણે પણ પોતાના જમાઈ અને વેવાણને હાથ જોડીને કહ્યું, “તમારી મોટાઈ છે કે તમે દીકરીને લેવા સામે ચાલીને અહીં આવ્યા. અમને માફ કરજો.”

વાતાવરણમાં છવાયેલો તણાવ અચાનક ખુશીમાં ફેરવાઈ ગયો. રાહુલે હસીને કહ્યું, “લો માં, મેં કહ્યું હતું ને કે દીદીના સાસરિયાં એટલા પણ ખરાબ નથી! હવે જ્યારે બધું બરાબર થઈ જ ગયું છે, તો આજે સાંજે બધા જમીને જ જજો.”

સોનિયાએ ખુશ થઈને કહ્યું, “અરે જમવાનું તો બનશે જ, પણ અત્યારે હું બધા માટે ગરમાગરમ ચા અને નાસ્તો લઈ આવું છું!”

બધા હસી પડ્યા. અને આ રીતે રાહુલની ધીરજ અને સમજદારીથી એક તૂટતો પરિવાર ફરીથી પ્રેમ અને હૂંફના તાંતણે બંધાઈ ગયો. કવિતાએ ખુશી ખુશી પોતાના સાસરિયાઓ સાથે વિદાય લીધી.

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पितृ पक्ष


पितृ पक्ष-
सूर्य में अनेक तत्व पाए जाते हैं, लेकिन उसकी संरचना में हाइड्रोजन की प्रधानता है। सूर्य के अत्यधिक तापमान और दबाव के कारण हाइड्रोजन वहाँ गैस के रूप में नहीं, बल्कि प्लाज्मा अवस्था में रहता है।
सूर्य के केंद्र में होने वाली नाभिकीय संलयन क्रिया में प्रत्येक सेकंड लगभग 60 करोड़ टन हाइड्रोजन का संलयन होकर लगभग 59.6 करोड़ टन हीलियम बनता है। शेष लगभग 40 लाख टन द्रव्यमान ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है। इसी ऊर्जा का एक अत्यंत छोटा अंश प्रकाश और अन्य विकिरण के रूप में पृथ्वी तक पहुँचता है। वास्तव में यही हमारा भोजन है।
पृथ्वी पर पहुँचने वाली यही सूर्य-ऊर्जा पेड़-पौधों और वनस्पतियों के लिए जीवन का आधार है। वे प्रकाश-संश्लेषण द्वारा इसी ऊर्जा की सहायता से अपना भोजन बनाते हैं। फिर इन्हीं पेड़-पौधों से प्राप्त भोजन के माध्यम से पृथ्वी पर रहने वाले असंख्य जीवों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भोजन मिलता है।
संक्षेप में कहें तो सूर्य की किरणों पर सवार होकर हमारा भोजन हम तक पहुँचता है।
अब यहाँ एक प्रश्न उठता है।
यदि सूर्य से निकली ऊर्जा करोड़ों किलोमीटर की दूरी तय करके पृथ्वी तक पहुँच सकती है और उसी ऊर्जा के माध्यम से हमारे भोजन की व्यवस्था होती है, तो फिर जब हम पितृ पक्ष में अपने पितरों के लिए विधि-विधानपूर्वक अन्न, जल और अन्य पदार्थ अर्पित करते हैं, तो हमारा अर्पित किया हुआ भोजन पितृलोक तक क्यों नहीं पहुँच सकता?
विज्ञान की दृष्टि से हम पदार्थ के उस रूप और उस मार्ग को अभी नहीं समझ पाए हैं, जिसके द्वारा पितृलोक तक ऐसी कोई पहुँच संभव हो। लेकिन केवल इसलिए कि हमारी इंद्रियाँ उसे प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख पातीं, यह कहना भी उचित नहीं कि वह संभव ही नहीं है।
जिस ब्रह्मांड में सूर्य की ऊर्जा करोड़ों किलोमीटर की दूरी पार करके पृथ्वी पर जीवन का आधार बन सकती है, उसी ब्रह्मांड में पितरों को श्रद्धापूर्वक अर्पित किया गया अन्न-जल किसी सूक्ष्म माध्यम से अपने गंतव्य तक पहुँचता हो, इस संभावना को पूर्णतः नकारने का हमारे पास क्या आधार है?
मेरी श्रद्धा तो यही कहती है कि पितृ पक्ष में विधि-विधान और श्रद्धा से अपने पितरों को अर्पित किया गया अन्न-जल व्यर्थ नहीं जाता। वह पितृलोक तक अवश्य पहुँचता है।
श्रद्धा जहाँ समाप्त होती है, वहाँ हमारी जानकारी भी समाप्त हो जाती है।
जयतु जयतु सनातनम्।
वोट कमल को!

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कांन्वेंट शब्द पर गर्व न करें सच समझें। ‘कांन्वेंट’ सबसे पहले तो यह जानना आवश्यक है कि ये शब्द आखिर आया कहाँ से है, तो आइये प्रकाश डालते हैं।

ब्रिटेन में एक कानून था लिव इन रिलेशनशिप बिना किसी वैवाहिक संबंध के एक लड़का और एक लड़की का साथ में रहना। जब साथ में रहते थे तो शारीरिक संबंध भी बन जाते थे, तो इस प्रक्रिया के अनुसार संतान भी पैदा हो जाती थी तो उन संतानों को किसी चर्च में छोड़ दिया जाता था।

अब ब्रिटेन की सरकार के सामने यह गम्भीर समस्या हुई कि इन बच्चों का क्या किया जाए तब वहाँ की सरकार ने काँन्वेंट खोले अर्थात् जो बच्चे अनाथ होने के साथ-साथ नाजायज भी हैं उनके लिए काँन्वेंट स्कूल बने।

उन अनाथ और नाजायज बच्चों को रिश्तों का एहसास कराने के लिए उन्होंने अनाथालयों में एक फादर एक मदर एक सिस्टर की नियुक्ति कर दी क्योंकि ना तो उन बच्चों का कोई जायज बाप है न ही माँ है। तो काँन्वेन्ट बना नाजायज बच्चों के लिए जायज स्थान।

इंग्लैंड में पहला काँन्वेंट स्कूल सन् 1609 के आसपास एक चर्च में खोला गया था जिसके ऐतिहासिक तथ्य भी मौजूद हैं और भारत में पहला काँन्वेंट स्कूल कलकत्ता में सन् 1842 में खोला गया था। परन्तु तब हम गुलाम थे और आज तो लाखों की संख्या में काँन्वेंट स्कूल चल रहे हैं।

जब कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे ‘फ्री स्कूल’ कहा जाता था, इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के ज़माने की यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं।

मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी,  बहुत मशहूर चिट्ठी है- उसमें वो लिखता है कि:

“इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे। इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता ही नहीं होगा। इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपनी परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा।

इनको अपने मुहावरे नहीं मालुम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।” उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रुवाब पड़ेगा। अरे ! हम तो खुद में हीन हो गए हैं। जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा?

लोगों का तर्क है कि “अंग्रेजी अन्तरराष्ट्रीय भाषा है”। दुनियाँ में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में ही बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अन्तरराष्ट्रीय भाषा है? शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं बल्कि सबसे ज्यादा दरिद्र भाषा है। इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और तथाकथित ईसा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलता था। ईसा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी। समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी।

भारत देश में अब भारतीयों की मूर्खता देखिए जिनके जायज माँ बाप भाई बहन सब हैं, वो काँन्वेन्ट में जाते हैं तो क्या हुआ एक बाप घर पर है और दूसरा काँन्वेन्ट में जिसे फादर कहते हैं। आज जिसे देखो काँन्वेंट खोल रहा है जैसे बजरंग बली काँन्वेन्ट स्कूल, माँ भगवती काँन्वेन्ट स्कूल। अब इन लोगों को कौन समझाए कि भईया माँ भगवती या बजरंग बली का काँन्वेन्ट से क्या लेना-देना?

दुर्भाग्य की बात यह है कि जिन चीजों का हमने त्याग किया अंग्रेजो ने उन सभी चीजों को पोषित और संचित किया। और हम सबने उनकी त्यागी हुई गुलामी सोच को आत्मसात कर गर्वित होने का दुस्साहस किया।🙏

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મને કારાગારની અંધારી કોટડી મંજૂર છે, પણ અંતરાત્માના ભોગે કોઈની દાસી બનવું નહીં!
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ઓગણીસમી સદીના ઉત્તરાર્ધમાં, જ્યારે હિન્દુસ્તાનની સ્ત્રીનું અસ્તિત્વ માત્ર ઘરની ચાર દીવાલો અને ઘૂમટા પાછળ સમેટાયેલું હતું, ત્યારે બોમ્બે હાઈકોર્ટના કક્ષમાં એક  યુવતીના આ અડગ શબ્દો પડઘાયા હતા.

બ્રિટિશ ન્યાયાધીશે આદેશ સંભળાવ્યો હતો: ‘કાં તો પતિના ઘેર જઈ દાંપત્યધર્મ સ્વીકારો, અથવા છ મહિનાની જેલ ભોગવો.’ સામે ઊભેલી એ દ્રઢ મનોબળધારી યુવતીએ રૂઢિચુસ્ત સમાજની આંખોમાં આંખ પરોવીને નિર્ભીકપણે જેલ સ્વીકારવાની તૈયારી દર્શાવી. આ કોઈ કાલ્પનિક કથાનું પાત્ર નહોતું ,  પણ ભારતીય સ્ત્રી-સ્વાતંત્ર્ય અને ન્યાયના ઇતિહાસમાં યુગપ્રવર્તક મોડ લાવનાર સાહસિક વિરાંગના ડો. રુખમાબાઈ રાઉત હતાં.

આજે ૨૫ સપ્ટેમ્બર. વર્ષ ૧૯૫૫માં આ જ દિવસે ૯૦ વર્ષનું તેજોમય આયુષ્ય ભોગવીને નિર્વાણ પામેલા ડો. રુખમાબાઈની પુણ્યતિથિ.

મુંબઈમાં જન્મેલા રુખમાબાઈએ બાળપણથી જ વિષમતાઓ વેઠી હતી. છ વર્ષની ઉંમરે પિતાની છત્રછાયા ગુમાવી અને માત્ર અગિયાર વર્ષની  અણસમજુ વયે સાવકા પિતાના પિતરાઈ એવા ઓગણીસ વર્ષના દાદાજી ભીકાજી સાથે તેમના વિવાહ કરી દેવાયા. પરંતુ તેમના આત્માને લગ્નની એ રૂઢિચુસ્ત સાંકળો મંજૂર નહોતી. તેમણે પતિગૃહે જવાનો ધરાર ઇનકાર કર્યો અને ઘેર બેસીને જ્ઞાનની ઉપાસના જારી રાખી. ૧૮૮૫નો એ ઐતિહાસિક ‘દાદાજી ભીકાજી વિરુદ્ધ રુખમાબાઈ’ કેસ માત્ર બે વ્યક્તિઓ વચ્ચેનો વિવાદ નહોતો, પરંતુ પિતૃસત્તાક જડતા સામે સ્ત્રીના આત્મસન્માન અને સંમતિ (Consent)નો મહાસંગ્રામ હતો.

તેમની તીક્ષ્ણ કાનૂની દલીલો અને પ્રચંડ પ્રતિકારે છેક બ્રિટિશ સંસદ અને મહારાણી વિક્ટોરિયાના હૃદયને હચમચાવી મૂક્યાં. આ સંઘર્ષની જ ફળશ્રુતિ રૂપે હિન્દુસ્તાનમાં બાળલગ્નો પર અંકુશ મૂકતો ઐતિહાસિક ‘એજ ઓફ કન્સેન્ટ એક્ટ, ૧૮૯૧’  (સંમતિ વય કાયદો) અસ્તિત્વમાં આવ્યો. પાછળથી પતિને આર્થિક વળતર ચૂકવીને તેઓ એ કજોડામાંથી કાયદેસર મુક્ત થયાં.

જોકે, તેમની લડત માત્ર સામાજિક વિરોધ સુધી સીમિત ન રહી; તેમણે પોતાના ભાગ્યનું નિર્માણ ખુદ કર્યું. સુધારકોના સાથથી તેઓ ઇંગ્લેન્ડ ગયાં અને ‘લંડન સ્કૂલ ઓફ મેડિસિન ફોર વુમન’માંથી એમ.ડી.ની પદવી મેળવી. ભારતનાં પહેલાં મહિલા તબીબ ડો. આનંદીબેન જોશી ડિગ્રી મેળવ્યા બાદ પ્રેક્ટિસ કરે તે પૂર્વે કાળધર્મ પામ્યા હતા. પછીથી ડો. કાદમ્બિની ગાંગુલી દેશના પ્રથમ મહિલા પ્રેક્ટિસનર બન્યા; તે જ શૃંખલામાં ડો. રુખમાબાઈ ભારતની ભૂમિ પર તબીબી સેવા આપનારાં બીજાં મહિલા ચિકિત્સક બન્યાં.

ભારત  પરત ફરીને તેમણે સુરત અને રાજકોટની જનાના (સ્ત્રી) હોસ્પિટલોમાં ચીફ મેડિકલ ઓફિસર તરીકે દાયકાઓ સુધી સેવા આપી. રાજકોટમાં રેડક્રોસ સોસાયટીની સ્થાપના કરી અને ‘Purdah: The Need for Its Abolition’ પુસ્તક લખી પડદાપ્રથાના દૂષણ પર વૈચારિક પ્રહારો કર્યા. સુરતમાં આજે પણ તેમની સ્મૃતિ જાળવતી હોસ્પિટલ તેમના અવિરત સેવાકાર્યની સાક્ષી પૂરે છે.

અનન્યા રુખમાબાઈનું સમગ્ર જીવન એ સત્યનું પ્રમાણ છે કે સાચો સુધારો કાગળ પર નહીં, પણ પોતાના અસ્તિત્વને હોમીને લડવામાં આવે ત્યારે જ ઇતિહાસનું નિર્માણ થાય છે. એક સદી પૂર્વે બાળવિવાહની બેડીઓ તોડીને લાખો સ્ત્રીઓના સન્માનનો માર્ગ પ્રશસ્ત કરનાર આ યુગપુરુષીને તેમના નિર્વાણ દિને કોટિ-કોટિ વંદન.

#ડો_રુખમાબાઈ #નિર્વાણ_દિન #સ્ત્રી_સશક્તિકરણ  #સમાજસુધારક #DrRukhmabai #DeathAnniversary #womeninmedicine #socialreformer #WomenEmpowermentIndia

સૌજન્ય: Shri Arjun Kumar અને #Google

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विनोद काम्बली ने शारदाआश्रम विद्यामंदिर की ओर से सचिन तेंदुलकर के साथ 664 रन की साझेदारी की थी। वह पारी इसलिए भी सबसे बेहतरीन थी क्योंकि उस साझेदारी में विनोद काम्बली ने सबसे ज्यादा रन बनाए। कांबली के गेंदबाजी भी की थी और 6 विकेट भी लिए थे।

लेकिन इस मैच में दुस्साहस देखिये विनोद काम्बली इतने जिद्दी थे कि रमाकान्त आचरेकर चाहते थे कि कांबली और सचिन पारी की घोषणा जल्दी कर दें। ताकि दूसरी टीम को जल्दी आउट करके मैच जीता जा सके। यह किस्मत की बात थी कि सेंट जेवियर की टीम 146 पर जल्दी ही ऑल आउट हो गई। वरना ये मैच ड्रॉ की तरफ जाता।
जब सचिन तेंदुलकर ने कांबली से ऐसा कहा कि सर पारी की घोषणा के इशारा कर रहे तो कांबली ने कहा कि मेरा नाम ले लेना।
काम्बली थोड़ा अड़ियल किस्म के थे।
जैसे मैच प्रैक्टिस के दौरान वो फील्ड में पतंग उड़ाते हुए जाते थे। ऐसा करने का दुस्साहस सबमें नहीं होता।

योग्यता तो उनमें थी जिसने डेब्यू रणजी मैच की पहली गेंद पर छक्का लगा दिया। और एक बार शेनवॉर्न के एक ओवर में बाईस रन मार दिया था।

लेकिन खेल में अगर आपके पास निरंतरता और अनुशासन नहीं है तो आप फेलियर की तरफ बढ़ जाते हैं। तमाम दिग्गज खिलाड़ी ने यही कहते पाए गए कि कांबली केवल अनुशासन की वजह से मात खा गए।
वह सचिन तेंदुलकर के डेब्यू के तीन साल बाद आए और चौबीस साल की उम्र में आखिरी टेस्ट मैच खेला।
नौ बार ODI टीम में वापस आए लेकिन बार बार असलफल रहे। उनको सोना पहनने का बड़ा शौक था और एक अजीब बात थी कि वो अपने बल्ले को मुठिया बहुत मोटी रखते थे। बताते हैं वो नौ नौ ग्रिप लगाते थे।

विनोद काम्बली एक बड़ा उदाहरण हैं कि  कैसे एक प्रतिभावान खिलाड़ी में अनुशासन की कमी ने क्या से क्या कर दिया। और एक साथी खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर जो उनके साथ खेलकर कहां से कहां पहुंच गया।
यह उसी 664 रन की पारी के बाद का फोटो है। जिसमें कांबली और सचिन अपनी स्कूल टीचर रागिनी देसाई के साथ खड़े हैं।
#VinodKambli

Posted in हिन्दू पतन

क्या आपको ज्ञात है जुलाई 1948 में वारंगल जिले के भैरानपल्ली गांव में हैदराबाद निज़ाम के रज़ाकारों और इस्लामिक पुलिस ने 200 हिंदुओं, स्त्रियों और बच्चों सहित सबको लाइन में खड़ा करके गोली से उड़ा दिया था,इनका अपराध सिर्फ इतना था कि यह हिन्दू थे और #जजिया नामक टैक्स नहीं दे पाए थे…. जजिया टैक्स इस्लामिक स्टेट में जीवित रहने के लिए दिए जाने वाला टैक्स है….
                सच्चाई यह है कि हैदराबाद के निज़ाम के रज़ाकारों ने भारत की आज़ादी और हैदराबाद को भारत मे मिला लिए जाने की आशंका और प्रतिशोध में कम से कम 50000 हिंदुओं की जान ले ली थी !…पहले से ही हत्याओं,बलात्कारों और आगज़नियों का यह सिलसिला पिछले कई वर्ष तक चलता चला आ रहा था… नेहरू-गांधी  खामोशी से यह सब देख रहे थे,मगर सितंबर 1848 में नेहरू की इच्छा के विपरीत सरदार पटेल ने हैदराबाद रियासत के खिलाफ पुलिस और मिलिट्री एक्शन लिया और निज़ाम को सत्ता से बेदखल किया…..
             यह सब इतिहास की पुस्तकों से इसलिए गायब है क्योंकि जवाहर लाल नेहरू और देश के तत्कालीन शिक्षामंत्री अबुल कलाम आजाद…देश मे मुसलमानों की छवि चमकाना चाहते थे…देश के करोड़ों हिंदुओं को यह नहीं मालूम कि पंजाब,हैदराबाद,कश्मीर,केरल,बॉम्बे प्रेसिडेंसी, बंगाल इत्यादि में सिर्फ 2-3 महीने 50 लाख से ज़्यादा हिंदुओं को इसी तरह मौत के घाट उतार दिया गया… कोई नहीं पूछता कि जो इलाके हिन्दू बहुल थे (जैसे ढाका,चटगांव,लाहौर ,मीरपुर इत्यादि) पाकिस्तान के हिस्से कैसे बन गए… वक्फबोर्ड का विभाजित भारत मे क्या काम था ?

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

पाण्डवों को मत्स्य नरेश विराट की राजधानी में निवास करते हुए दस माह व्यतीत हो गये। सहसा एक दिन राजा विराट का साला कीचक अपनी बहन सुदेष्णा से भेंट करने आया। जब उसकी द‍ृष्टि सैरन्ध्री (द्रौपदी) पर पड़ी तो वह काम-पीड़ित हो उठा तथा सैरन्ध्री से एकान्त में मिलने के अवसर की ताक में रहने लगा।

द्रौपदी भी कीचक की कामुक द‍ृष्टि को भाँप गई। उसने महाराज विराट एवं महारानी सुदेष्णा से कहा भी कि कीचक मुझ पर कुद‍ृष्टि रखता है। मेरे पाँच गन्धर्व पति हैं। एक न एक दिन वे कीचक का वध अवश्य कर देंगे, किन्तु उन दोनों ने द्रौपदी की बात की कोई परवाह न की।

लाचार होकर एक दिन द्रौपदी ने भीमसेन को कीचक की कुद‍ृष्टि तथा कुविचार के विषय में बता दिया। द्रौपदी के वचन सुनकर भीमसेन बोले- “हे द्रौपदी! तुम उस दुष्ट कीचक को अर्द्धरात्रि में नृत्यशाला में मिलने का संदेश दे दो। नृत्यशाला में तुम्हारे स्थान पर मैं जाकर उसका वध कर दूँगा।”

सैरंध्री ने बल्लव (भीमसेन) की योजना के अनुसार कीचक को रात्रि में नृत्यशाला में मिलने का संकेत दे दिया। द्रौपदी के इस संकेत से प्रसन्न कीचक जब रात्रि को नृत्यशाला में पहुँचा तो वहाँ पर भीमसेन द्रौपदी की एक साड़ी से अपना शरीर और मुँह ढँक कर वहाँ लेटे हुए थे।

उन्हें सैरन्ध्री समझकर कमोत्तेजित कीचक बोला- “हे प्रियतमे! मेरा सर्वस्व तुम पर न्यौछावर है। अब तुम उठो और मेरे साथ रमण करो।” कीचक के वचन सुनते ही भीमसेन उछल कर उठ खड़े हुए और बोले- “रे पापी! तू सैरन्ध्री नहीं अपनी मृत्यु के समक्ष खड़ा है। ले अब परस्त्री पर कुद‍ृष्टि डालने का फल चख।” इतना कहकर भीमसेन ने कीचक को लात और घूँसों से मारना आरम्भ कर दिया। जिस प्रकार प्रचण्ड आँधी वृक्षों को झकझोर डालती है, उसी प्रकार भीमसेन कीचक को धक्के मार-मार कर सारी नृत्यशाला में घुमाने लगे। अनेक बार उसे घुमा-घुमा कर पृथ्वी पर पटकने के बाद अपनी भुजाओं से उसकी गरदन को मरोड़कर उसे पशु की मौत मार डाला।

इस प्रकार कीचक का वध कर देने के बाद भीमसेन ने उसके सभी अंगों को तोड़-मरोड़ कर उसे माँस का एक लोंदा बना दिया और द्रौपदी से बोले- “पांचाली! आकर देखो, मैंने इस काम के कीड़े की क्या दुर्गति कर दी है।” उसकी उस दुर्गति को देखकर द्रौपदी को अत्यन्त सन्तोष प्राप्त हुआ।

फिर बल्लव और सैरन्ध्री चुपचाप अपने-अपने स्थानों में जाकर सो गये। प्रातःकाल जब कीचक के वध का समाचार सबको मिला तो महारानी सुदेष्णा, राजा विराट तथा कीचक के अन्य भाई आदि विलाप करने लगे। जब कीचक के शव को अन्त्येष्टि के लिए ले जाया जाने लगा तो द्रौपदी ने राजा विराट से कहा- “इसे मुझ पर कुद‍ृष्टि रखने का फल मिल गया, अवश्य ही मेरे गन्धर्व पतियों ने इसकी यह दुर्दशा की है।” द्रौपदी के वचन सुनकर कीचक के भाइयों ने क्रोधित होकर कहा- “हमारे अत्यन्त बलवान भाई की मृत्यु इसी सैरन्ध्री के कारण हुई है। अतः इसे भी कीचक की चिता के साथ जला देना चाहिए।” इतना कहकर उन्होंने द्रौपदी को जबरदस्ती कीचक की अर्थी के साथ बाँध लिया और श्मशान की ओर ले जाने लगे।

कंक, बल्लव, वृहन्नला, तन्तिपाल तथा ग्रान्थिक के रूप में वहाँ उपस्थित पाण्डवों से द्रौपदी की यह दुर्दशा देखी नहीं जा रही थी, किन्तु अज्ञातवास के कारण वे स्वयं को प्रकट भी नहीं कर सकते थे। इसलिए भीमसेन चुपके से परकोटे को लाँघकर श्मशान की ओर दौड़ पड़े और रास्ते में कीचड़ तथा मिट्टी का सारे अंगों पर लेप कर लिया। फिर एक विशाल वृक्ष को उखाड़कर कीचक के भाइयों पर टूट पड़े और उनमें से कितनों को ही भीमसेन ने मार डाला, जो शेष बचे वे अपना प्राण बचाकर भाग निकले। इसके बाद भीमसेन ने द्रौपदी को सान्त्वना देकर महल में भेज दिया और स्वयं नहा-धोकर दूसरे रास्ते से अपने स्थान में लौट आये। कीचक तथा उसके भाइयों का वध होते देखकर राजा विराट सहित सभी लोग द्रौपदी से भयभीत रहने लगे।

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