*ઘણું વિશ્વાસપાત્ર અને કદાચ સાચું પણ!*
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મોદી
અને
મોહમ્મદ મોસાડેક
ઈરાન ૧૯૫૧
અને
ભારત ૨૦૨૫ –
શું કોઈ સમાનતા છે?
શું તમે ક્યારેય વિચાર્યું છે કે ઈરાનીઓ અમેરિકાને “શેતાનોની ભૂમિ” (Land of the Devils) કેમ કહે છે? એક સમયે, બ્રિટનનું ઈરાનના તેલ ઉદ્યોગ પર સંપૂર્ણ વર્ચસ્વ હતું; નફાનો ૮૪% હિસ્સો ઈંગ્લેન્ડને જતો હતો અને માત્ર ૧૬% હિસ્સો ઈરાનને મળતો હતો. ૧૯૫૧માં, એક સાચા દેશભક્ત, મોહમ્મદ મોસાડેક, ઈરાનના વડાપ્રધાન બન્યા. તેઓ ઈચ્છતા ન હતા કે વિદેશી કંપનીઓ ઈરાનના તેલ સંસાધનો પર નિયંત્રણ રાખે. ૧૫ માર્ચ ૧૯૫૧ના રોજ, મોસાડેકે તેલ ઉદ્યોગના રાષ્ટ્રીયકરણ માટે એક ખરડો રજૂ કર્યો, જે જંગી બહુમતી સાથે પસાર થયો. ‘ટાઈમ’ મેગેઝિને ૧૯૫૧માં તેમને “મેન ઓફ ધ યર” (વર્ષના શ્રેષ્ઠ વ્યક્તિ) તરીકે નવાજ્યા હતા!
પરંતુ આ નિર્ણયથી બ્રિટનના હિતોને નુકસાન થયું. તેમણે લાંચ, હત્યાના પ્રયાસો અને લશ્કરી બળવા દ્વારા મોસાડેકને હટાવવાનો પ્રયાસ કર્યો, પરંતુ તેમની દૂરંદેશી અને લોકપ્રિયતાએ તેમના તમામ પ્રયાસો નિષ્ફળ બનાવ્યા. જ્યારે બ્રિટન નિષ્ફળ ગયું, ત્યારે તેણે મદદ માટે અમેરિકાનો સંપર્ક કર્યો. CIAએ મોસાડેકને સત્તા પરથી હટાવવા માટે ૧ મિલિયન ડોલરની મંજૂરી આપી. આ યોજનામાં જનતામાં અસંતોષ ઊભો કરવો, મીડિયા અને ધાર્મિક નેતાઓને ખરીદી લેવા અને અંતે ભ્રષ્ટ સાંસદો દ્વારા સરકારને ઉથલાવી દેવાનો સમાવેશ થતો હતો.
મોસાડેક-વિરોધી વાતાવરણ ઊભું કરવા માટે પત્રકારો, સંપાદકો અને ધર્મગુરુઓને ૬૩૧ મિલિયન ડોલર આપવામાં આવ્યા હતા. નકલી વિરોધ પ્રદર્શનોમાં ભાગ લેવા માટે હજારો લોકોને પૈસા ચૂકવવામાં આવ્યા હતા. વૈશ્વિક મીડિયાએ પણ અમેરિકાને સમર્થન આપવાનું શરૂ કર્યું. મોસાડેક પર વ્યક્તિગત હુમલા કરવા માટે કાર્ટૂનનો ઉપયોગ કરવામાં આવ્યો હતો, જે આજે મોદીના અંગત જીવન પર થતા હુમલાઓ જેવા જ હતા. મોસાડેકને સરમુખત્યાર કહેવામાં આવ્યા. જ્યારે તેમને અહેસાસ થયો કે સંસદ દ્વારા તેમની સરકાર ઉથલાવી દેવામાં આવશે, ત્યારે તેમણે સંસદ ભંગ કરી દીધી. અમેરિકાએ શાહ પર મોસાડેકને હટાવવા માટે દબાણ કર્યું, અને નકલી વિરોધ પ્રદર્શનો બાદ, મોસાડેકે શરણાગતિ સ્વીકારી. તેમને જેલમાં નાખવામાં આવ્યા અને બાદમાં નજરકેદ રાખવામાં આવ્યા.
ત્યારબાદ, ઈરાનના તેલનું વિભાજન અમેરિકા (૪૦%), ઈંગ્લેન્ડ (૪૦%) અને અન્ય યુરોપિયન દેશો (૨૦%) વચ્ચે કરવામાં આવ્યું. કટ્ટરપંથી ખોમેની સત્તા પર આવ્યા અને સામાન્ય ઈરાનીઓની સ્થિતિ કથળી ગઈ. મોસાડેગનો ગુનો એ હતો કે તેઓ ઈચ્છતા હતા કે ઈરાનના સંસાધનો પર વિદેશીઓને બદલે ઈરાનની પોતાની કંપનીઓનું નિયંત્રણ હોય. જો મોસાડેગને સમર્થન મળ્યું હોત, તો ઈરાન ૧૯૫૫ સુધીમાં સંપૂર્ણ લોકશાહી રાષ્ટ્ર બની શક્યું હોત. પરંતુ પત્રકારો, સંપાદકો, સાંસદો અને વિરોધ પ્રદર્શન કરનારાઓએ પૈસા માટે પોતાના દેશનું ભવિષ્ય વેચી દીધું. એટલા માટે જ અમેરિકનોને “શેતાનોની ભૂમિ” (Land of the Devils) કહેવામાં આવે છે.
*હવે, ભારત પણ આવા જ એક નિર્ણાયક વળાંક પર છે. બનાવટી મુદ્દાઓ, ખોટા આંદોલનો, ખોટા આંકડા અને લોકોને જ્ઞાતિ અને ધર્મના આધારે વહેંચવા – આ બધું ભારતને ફરીથી વિદેશી નિયંત્રણ હેઠળ લાવવાના ઊંડા ષડયંત્રનો ભાગ છે. હવે સમય આવી ગયો છે કે આપણે સતર્ક રહીએ અને ભ્રષ્ટ મીડિયાના પ્રચારનો શિકાર ન બનીએ. દરેક દેશભક્તે વડાપ્રધાન નરેન્દ્ર મોદીની સાથે મક્કમતાથી ઊભા રહેવું જોઈએ. નહીંતર, ભારતનું ભાવિ પણ ઈરાન જેવું થઈ શકે છે.*
આજે, ઘણી વૈશ્વિક ગુપ્તચર એજન્સીઓ મોદી સરકારને ઉથલાવી પાડવા માટે ભારતીય રાજકારણીઓને તેમના એજન્ટ તરીકે ભરતી કરવાનો પ્રયાસ કરી રહી છે. આપણું ભવિષ્ય આપણા હાથમાં છે. આપણે બસ સમયસર આ વાત સમજવાની જરૂર છે.
‘ધ ન્યૂ યોર્ક ટાઈમ્સ’એ મોસાડેગને સરમુખત્યાર કહ્યા હતા. આજે, ‘ટાઈમ મેગેઝિન’ મોદીને “ડિવાઈડર-ઈન-ચીફ” (દેશને વિભાજિત કરનાર મુખ્ય વ્યક્તિ) કહે છે. શું આ માત્ર એક સંયોગ છે? ના, આ એક રણનીતિ છે. વિચારો, સમજો અને જાગૃત બનો. જય હિંદ.
કૃપા કરીને આ સંદેશ દરેક ભારતીય સાથે શેર કરો. તમે હિંદુ હો, મુસ્લિમ હો કે કોઈપણ જ્ઞાતિના હો, જો દેશ સમૃદ્ધ થશે તો દરેકને ફાયદો થશે. જો દેશ ડૂબશે, તો આપણે બધા સાથે ડૂબીશું.
🙏🏻🙏 *જય હિન્દ* 🙏🙏🏻
Category: भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas
15 अगस्त 1947 को दिल्ली में तिरंगा फहरा रहा था। देश आजादी का जश्न मना रहा था। लेकिन उसी दिन हैदराबाद में एक ऐसा शासक बैठा था, जो न इस जश्न का हिस्सा बनने को तैयार था, और न ही भारत का।
वो थे हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान। निजाम का सपना था कि हैदराबाद अपनी अलग हैसियत बनाए रखे। मुमकिन हो, तो आजाद मुल्क की तरह। अगर भारत का हिस्सा बनना भी पड़े, तो अपनी शर्तों पर।
मुश्किल ये थी कि हैदराबाद चारों तरफ से भारत से घिरा था। समुद्र तक उसकी अपनी सीधी पहुंच नहीं थी। निजाम के आला अफसर पाकिस्तान परस्त थे। मगर हैदराबाद का पाकिस्तान से कोई भौगोलिक संपर्क नहीं था। फिर भी निजाम को लगता था कि वो अपनी हैसियत बचा सकते हैं।
ये सोच सिर्फ आजाद रहने की जिद नहीं थी। इसके पीछे डर भी था।
निजाम को पता था कि भारत में शामिल होते ही पुरानी सत्ता बदल जाएगी। अभी उनके हाथ में पूरा प्रशासन था। सेना थी। खजाना था। जमीन और जागीरों पर पुराने रईस वर्ग का असर था। लेकिन लोकतंत्र आया तो ये सब खत्म हो जाना था।
निजाम की जिंदगी भी उनकी सत्ता की तरह ही अजीब थी। वो बेशक बेइंतहा रईस थे। 1937 में टाइम मैगजीन ने उन्हें दुनिया का सबसे अमीर शख्स बताया। वो एक बेशकीमती हीरे जैकब को पेपरवेट की तरह इस्तेमाल करते थे। मगर निजी जिंदगी में वो बेहद कंजूस माने जाते। मैले-कुचैले कपड़े पहनना। छोटी-छोटी चीजों पर भी खर्च बचाना उनकी आदतों में शुमार था। कहा तो यहां तक जाता है कि वो कई-कई दिन तक नहीं नहाते थे। पता नहीं कितना सच ये है।
दीवान जर्मनी दास ने अपनी मशहूर किताब ‘महाराजा’ में देसी रियासतों और शासकों के बारे में खूब लिखा है। उसमें निजाम साहब का भी जिक्र है। जर्मनी दास ने लिखा है, ‘वो किसी को अपने यहां बुलाते, तो खाना बहुत कम परोसा जाता। चाय पर भी सिर्फ दो बिस्कुट लाए जाते। एक उनके लिए और दूसरा मेहमान के लिए।’
अगर मेहमानों की संख्या ज्यादा होती, तो उसी हिसाब से बिस्कुट बढ़ा दिए जाते। अगर निजाम को जानने वाले अमरीकी, ब्रिटिश या तुर्क सिगरेट पीने के लिए ऑफर करते, तो वो एक के बजाय पैकेट से चार-पांच सिगरेट निकाल कर रख लेते। उनकी अपनी सिगरेट सस्ती चारमिनार हुआ करती थी। उस जमाने में 10 सिगरेट वाला पैकेट 12 पैसे में आया करता था।
हैदराबाद में रस्म थी कि साल में एक बार रियासत के अमीर लोग निजाम को सोने का एक सिक्का भेट करते थे। निजाम सिक्कों को बस छू कर वापस लौटा देता। एक तरह से दुआ के तौर पर। मगर आखिरी निजाम ने उन सिक्कों को लौटाना बंद कर दिया। उन्हें अपने सिंहासन पर रखे एक कागज के थैले में डालते जाते।
एक दफा तो ऐसा हुआ कि एक सिक्का जमीन पर गिर गया। निजाम उसे खोजने के लिए अपने हाथ और पैर के बल जमीन पर बैठ गए। और लुढ़कते सिक्के के पीछे तब तक भागते रहे, जब तक वो उनके हाथ में नहीं आ गया।
मतलब जो शख्स एक-एक बिस्कुट और सिक्कों को लिया मरता था, आप समझ सकते हैं कि उसके लिए अपनी रियासत देने का ख्याल भी कितना मुश्किल रहा होगा।
मगर सारे समीकरण निजाम के खिलाफ थे। हैदराबाद की आबादी में करीब 86 फीसदी हिंदू थे। सत्ता का ऊपरी ढांचा मगर मुस्लिम रईस वर्ग के हाथ में था। निजाम ने सितंबर 1947 में खुद अपने प्रसारण में माना कि इतनी बड़ी हिंदू आबादी वाले हैदराबाद को इस्लामी राज्य बनाया ही नहीं जा सकता।
दिल्ली भी शुरू में तुरंत सेना भेजने के मूड में नहीं थी।
नवंबर 1947 में Standstill Agreement हुआ। मतलब फिलहाल जो व्यवस्थाएं चल रही थीं, वे चलती रहें। भारत और हैदराबाद के बीच डाक, संचार और दूसरी प्रशासनिक व्यवस्थाएं बनी रहें। आगे की राजनीतिक व्यवस्था पर बातचीत होती रहे। यह समझौता एक पुल था। मगर दोनों तरफ से कोई उस पुल पर भरोसा करके नहीं चल रहा था।
दिल्ली को शक था कि निजाम समय खरीद रहे हैं। हैदराबाद को लगता था कि भारत आखिरकार उसे मजबूर करेगा। दोनों सही भी सोच रहे थे। सबसे बड़ी बात की निजाम को अपनी हैसियत पता थी। वसंत कुमार बावा ने अपनी किताब ‘द लास्ट निजाम’ में लिखा है कि निजाम ने एक ब्रिटिश बैरिस्टर सर वाल्टर मॉन्कटन को नौकरी दी थी।
मॉन्कटन ने हैदराबाद के सैन्य कमांडर जनरल एल. एदरूस से पूछा कि अगर भारत हैदराबाद पर हमला करता है तो उनकी सेना कितने दिनों तक मुकाबला कर पाएगी। एदरूस का जवाब था… चार दिनों से ज्यादा नहीं। इस पर निजाम ने बीच में ही अपने सैन्य कमांडर को टोक दिया और बोले, ‘चार नहीं दो दिन से ज्यादा नहीं।’
इस बीच निजाम ने अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने के लिए पाकिस्तान से हथियार मंगवाने लगे। ये हथियार गोवा के रास्ते आते थे। निजाम ने 1947 में पुर्तगाल से गोवा खरीदने की भी कोशिश की थी। उनका मकसद था कि इस तरह से हैदराबाद को अपना समुद्री किनारा और बंदरगाह मिल जाएगा। मगर बात बनी नहीं।
इसी दौरान हैदराबाद में कासिम रिजवी और रजाकारों का असर बढ़ता गया। रजाकार रियासत के क्रूर स्वयंसेवक सैनिक थे। उनका मकसद निजाम की सत्ता बरकरार रखना और भारत में विलय रोकना था। रजाकार हथियारबंद ताकत बन रहे थे। धीरे-धीरे वो निजाम की सरकार के काबू से भी बाहर होने लगे। उनका तरीका बेहद हिंसक होता गया।
रजाकार गांवों में दहशत फैलाने, लूटपाट, आगजनी, हत्या और महिलाओं से जबरदस्ती करने लगे। नेहरू ने मई 1948 में लिखा कि गांव जलाए जा रहे थे। लोगों की हत्या और बड़े पैमाने पर लूट की खबरें आ रही थीं। उन्होंने रजाकारों को एक निजी हथियारबंद सेना बताया। उनका सवाल सीधा था, अगर निजाम की सरकार उन्हें रोक नहीं सकती तो वह सरकार असल में कितनी ताकतवर है?
सितंबर तक स्थिति और बिगड़ चुकी थी। नेहरू ने 7 सितंबर को लिखा कि रजाकार राज्य के भीतर मुसलमानों और गैर-मुसलमानों दोनों को निशाना बना रहे थे, जो उनके खिलाफ थे। उन्होंने एक गांव की घटना का भी जिक्र किया, जहां प्रतिरोध टूटने के बाद गांव जला दिया गया और उसके मुखिया की हत्या कर दी गई।
यहां एक बात साफ करनी जरूरी है। रजाकार और हैदराबाद के मुसलमान एक ही चीज नहीं थे। बहुत से मुसलमान रजाकारों से सहमत नहीं थे। खुद नेहरू को अप्रैल 1948 में मुस्लिम नेताओं से संदेश मिल रहे थे कि रजाकारों की गतिविधियां मुसलमानों और पूरे भारत के मुसलमानों को नुकसान पहुंचा रही हैं।
दूसरी तरफ हैदराबाद में सिर्फ रजाकारों और निजाम की कहानी नहीं चल रही थी। तेलंगाना में किसान पहले से जमींदारों और निजाम की व्यवस्था के खिलाफ लड़ रहे थे। कम्युनिस्ट आंदोलन ने इस असंतोष को हथियारबंद संघर्ष में बदल दिया था। कई इलाकों में निजाम की प्रशासनिक पकड़ कमजोर पड़ गई थी। यानी हैदराबाद के भीतर एक नहीं, कई लड़ाइयां चल रही थीं।
एक तरफ निजाम भारत से बचना चाहते थे। दूसरी तरफ रजाकार उन्हें पीछे हटने नहीं देना चाहते थे। तीसरी तरफ कांग्रेस कार्यकर्ता लोकतांत्रिक सरकार और भारत से जुड़ने की मांग कर रहे थे। और तेलंगाना में किसान जमीन और सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे थे। निजाम के साथ दिल्ली के लिए ये सब बड़ा संकट था। क्योंकि आखिर में सबकुछ उसी के माथे आना था।
सरदार पटेल का रुख यहां नेहरू से ज्यादा सख्त था। मगर नेहरू भी हैदराबाद को छोड़ देने के पक्ष में नहीं थे। फर्क रास्ते को लेकर था।
नेहरू लगातार यह कोशिश कर रहे थे कि मामला बातचीत से सुलझे। अप्रैल 1948 में उन्होंने साफ लिखा कि भारत हैदराबाद पर भी वही सिद्धांत लागू करना चाहता है जो दूसरी रियासतों पर किया गया था। जनता की इच्छा का सम्मान हो। जिम्मेदार सरकार बने। उन्होंने यह भी लिखा कि अभी तलवार निकालकर हैदराबाद में घुस जाना गलत होगा।
पटेल की बेचैनी दूसरी थी। उन्हें लग रहा था कि बातचीत के साथ-साथ हैदराबाद अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। रजाकार मजबूत हो रहे हैं। हथियार जुटाए जा रहे हैं। सीमा पर झड़पें हो रही हैं।
फिर एक घटना ने दिल्ली को और परेशान किया। अगस्त में हैदराबाद सीमा के पास भारतीय सैनिकों के एक काफिले पर रजाकारों ने हमला किया। भारतीय सैनिक मारे गए। जवाबी कार्रवाई हुई। बाद की संयुक्त जांच में इस हमले को रजाकारों का संगठित और पहले से तैयार हमला माना गया।
अब मामला सिर्फ यह नहीं था कि निजाम भारत में शामिल होना चाहते हैं या नहीं। सवाल यह बन गया था कि क्या भारत अपने ही इलाके की सीमा पर एक ऐसी सशस्त्र ताकत को बढ़ने दे सकता है, जो भारतीय सैनिकों पर हमला कर रही है।
अब सरदार पटेल के सब्र का बांध जवाब दे गया। 12 सितंबर 1948 को एक कैबिनेट मीटिंग हुई। इसमें सरदार पटेल ने हैदराबाद में सैन्य कार्रवाई का प्रस्ताव रखा। उस मीटिंग में भारतीय सेना प्रमुख फ्रांसिस बुचर भी मौजूद थे। उन्होंने फौरन खड़े होकर अपनी आपत्ति जताई।
बुचर ने कहा, ‘सज्जनों, आपने हैदराबाद पर हमले का फैसला किया है। ऐसे में आप लोगों को चेताना मेरा फर्ज है। हम इस वक्त कश्मीर में भी पाकिस्तान से लड़ रहे हैं। अगर हम हैदराबाद में भी सैन्य कार्रवाई करते हैं, तो हमारी सेना के लिए एक साथ दो-दो ऑपरेशन को संभालना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए बतौर कमांडर-इन-चीफ, मेरा सुझाव है कि आप लोग हैदराबाद में सैन्य कार्रवाई ना शुरू करें।’
बुचर ने भारत की सैन्य क्षमता पर भी सवाल उठाए। चेतावनी भी दी कि अगर भारत ने हैदराबाद में कोई ऑपरेशन शुरू किया, तो पाकिस्तान, मुंबई और अहमदाबाद पर हवाई हमले भी कर सकता है। सरदार पटेल ने बुचर की सभी चिंताओं को हवा में उड़ा दिया। उन्होंने सैन्य क्षमता के मसले पर पटेल ने उलटे बुचर से सवाल किया, ‘आपको क्या लगता है, हैदराबाद के निजाम हमारे सैनिकों के सामने एक हफ्ते भी टिक पाएंगे?’
बुचर ने अपना आखिरी दांव खेलते हुए धमकी दी कि अगर उनकी सलाह पर गौर नहीं किया गया, तो वह इस्तीफा दे देंगे। सरदार पटेल ने बुचर से साफ कह दिया कि अगर आपको इस्तीफा देना है, तो शौक से दीजिए, लेकिन सैन्य अभियान तो कल शुरू होकर ही रहेगा।
अब बातचीत की जमीन लगभग खत्म हो चुकी थी। 13 सितंबर 1948 की सुबह भारतीय सेना ने कार्रवाई शुरू कर दी। इसे ‘पुलिस एक्शन’ कहा गया। नाम भी सोच-समझकर रखा गया था। भारत ये नहीं दिखाना चाहता था कि वो किसी विदेशी देश पर हमला कर रहा है। उसका कहना था कि हैदराबाद भारत के भीतर है और कार्रवाई कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए है।
13 सितंबर को हमला हुआ। 17 सितंबर तक लड़ाई खत्म हो गई। निजाम की आजादी की कोशिश भी। रजाकारों का सारा जोश ठंडा हो गया। हैदराबाद भारत में शामिल हो चुका था। लेकिन इस कहानी में सिर्फ एक रियासत का विलय नहीं हुआ था। एक पूरी राजनीतिक व्यवस्था खत्म हुई थी।
निजाम ने अपनी रियासत बचाने के लिए जितना समय खरीदा, उतना ही समय आखिरकार उनके खिलाफ गया। बातचीत से टकराव हुआ, टकराव से हिंसा और हिंसा से सैन्य कार्रवाई। पांच दिन बाद वही निजाम, जो एक साल पहले अपनी शर्तों पर आजादी की बात कर रहे थे, भारत सरकार के सामने युद्धविराम स्वीकार कर रहे थे।

1933, वियना, ऑस्ट्रिया
रेलवे प्लेटफॉर्म पर एक बुजुर्ग व्यक्ति धीरे-धीरे छड़ी का सहारा लेकर उतरे। अपने स्वागत के लिए खड़े व्यक्ति को देखकर वे हैरान रह गए। मंगोल जैसी आकृति वाले इस शख्स से उनकी मुलाकात बरसों पहले गांधीजी के सान्निध्य में हुई थी। तब यह नौजवान आई.सी.एस. जैसी अत्यंत कठिन परीक्षा में चौथा स्थान लाने के बावजूद उस सम्मानित पद को ठुकराकर, गांधी के संघर्ष को मजबूती देने के लिए भारत वापस लौट आया था,,,,,,,,
वह युवक भी वृद्ध को देखकर चौंक पड़ा। उनका प्रभावशाली चेहरा पहले जैसा नहीं रहा था, जैसे कुछ सिकुड़ गया हो। छाती तक लहराने वाले घने बाल अब काफी विरल हो चुके थे। जिस व्यक्ति के कदमों से कभी धरती कांपती थी, आज वह झुककर छड़ी के सहारे चल रहे थे,,,,,,
युवक सुभाष बोस वृद्ध विट्ठलभाई पटेल के पैर छूने के लिए जैसे ही झुके, विट्ठलभाई ने उन्हें आगे बढ़कर गले से लगा लिया,,,,,,
जनवरी 1933 की बात थी। मुंबई से कलकत्ता लौटते समय ब्रिटिश सरकार ने सुभाष को कल्याण स्टेशन पर ही गिरफ्तार कर लिया था। उन्हें शिवनी के एक सुनसान पठारी इलाके की जेल में बंद कर दिया गया। वह कारागार भी अजीब था। कोठरी में न कोई खिड़की थी, न दरवाजा, और ऊपर टिन की छत थी। तपती हुई छत और लगातार चलने वाली गर्म लू ने हालत खराब कर दी थी। इससे पहले भी सुभाष कई बार जेल जा चुके थे। सबसे कष्टदायक कारावास म्यांमार का रहा था, जहाँ उनकी स्थिति मृत्युशैय्या जैसी हो गई थी। वही पुराने रोग फिर से उभर आए,,,,,,,
कुछ दिनों बाद उनके बड़े भाई शरद दा को भी उसी जेल में लाया गया। शरद दा की पत्नी विभा जब कलकत्ता से उनसे मिलने पहुँचीं तो सुभाष को देखकर स्तब्ध रह गईं। मात्र कुछ सप्ताह में लगभग बीस किलो वजन घट जाने से वे अस्थिपंजर जैसे लग रहे थे। यह दृश्य असहनीय था। वे तुरंत दिल्ली गईं और गृह सचिव से जाकर भिड़ गईं। सुभाष का कारावास स्थानांतरित करने के लिए सचिव भी परेशान हो गए। देश का कोई भी प्रांत सुभाष को अपनी जेल में रखने का जोखिम नहीं लेना चाहता था। बंगाल क्रांतिकारियों का केंद्र था, मुंबई में गुप्त अंतरराष्ट्रीय संगठनों के नेताओं का आना-जाना लगा रहता था, और पंजाब भगत सिंह की फांसी के बाद से ही सुलग रहा था। अंततः मद्रास ने केवल इलाज भर के लिए सुभाष को रखने की सहमति दी। कुछ समय वे भुवाली में भी रहे। मद्रास के चिकित्सक कहते थे कि उन्हें टी.बी. है, जबकि भुवाली के डॉक्टरों का कहना था कि फेफड़ों में कोई रोग नहीं है,,,,
सरकार ने उन्हें विदेश में उपचार कराने की अनुमति दे दी। साथ ही यह शर्त भी रखी कि वे किसी भी हाल में इंग्लैंड और जर्मनी की सीमा में प्रवेश नहीं करेंगे। वे यूरोप जाने वाले जहाज पर बंदी के रूप में ही सवार हुए थे, लेकिन भारत का तट छोड़ते ही उन्हें बताया गया कि अब वे स्वतंत्र हैं,,,,,,,
सुभाष ने रवींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी को पत्र लिखकर दोनों से परिचय पत्र देने का अनुरोध किया था। महाकवि और महात्मा के पत्र होने से विदेश में उन्हें राजनीतिक सहयोग मिलने की आशा थी। टैगोर ने एक भावहीन परिचय पत्र भेजा, “मिस्टर सुभाष यूरोप की यात्रा पर हैं। उनकी यथासंभव मदद की जाए।” गांधीजी ने तो बेहद आत्मीय संदेश दिया, “सुभाष, तुम स्वयं एक तेजपुंज हो। तुम्हें किसी के परिचय पत्र की आवश्यकता ही क्या है,,,,,,
महाकवि और महात्मा के इस रूखे व्यवहार से बीमार सुभाष को दुख तो हुआ, मगर उन्होंने अपना मन कठोर कर लिया कि भले ही कोई साथ न दे, देश को आजाद कराने के लिए जो भी संभव होगा, वह अवश्य करेंगे,,,,,,,
सुभाष वेनिस होते हुए वियना पहुँचे और अपना इलाज शुरू कराया। वे जहाँ भी जाते, पत्रकार और भारतीय विद्यार्थी उन्हें घेर लेते। इन दो महीनों में उन्होंने जर्मन भाषा सीख ली और वहाँ की नगरपालिकाओं की कार्यप्रणाली का विशेष अध्ययन किया। आखिर वे कलकत्ता महानगरपालिका के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रह चुके थे,,,,,,
इसी दौरान उन्हें सूचना मिली कि विट्ठलभाई पटेल विश्राम के लिए अमेरिका से वियना आ रहे हैं। सुभाष के गुरु देशबंधु चित्तरंजन दास और विट्ठलभाई के बीच गहरी आत्मीयता थी। देशबंधु के इस घनिष्ठ मित्र का साथ मिलने का अवसर सुभाष कैसे छोड़ते। विट्ठलभाई भी नहीं भूले थे कि देशबंधु सुभाष को ‘मेरे खजाने का सर्वश्रेष्ठ रत्न’ कहकर सराहा करते थे,,,,,,,
दोनों एक ही होटल में ठहरे। दोनों अस्वस्थ थे, दोनों राजनेता थे, दोनों आराम करने आए थे। समय की प्रचुरता थी, इसलिए दिनभर बातें होती रहतीं,,,,,,,
एक सुबह सुभाष गुस्से में भरे हुए आए और पटेल के सामने अखबार पटककर अपना मुँह ढककर बैठ गए। अखबार पढ़कर पटेल भी अवाक रह गए। गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन बिना किसी शर्त के वापस ले लिया था। सुभाष बेहद नाराज होकर बोले, “गांधीजी ने उचित नहीं किया। यह तो उनका अपना अहिंसक आंदोलन था न! इसे वापस क्यों लिया,,,,,,
पिछले कुछ दिनों के सान्निध्य से पटेल अपनी बीमारी भूल बैठे थे, पर यह समाचार सुनकर निराश होकर बोले, “सुभाष, हमारा नेता थक चुका है। वह राजनीतिज्ञ भी है और संत भी। मगर लगता है अब उसे समझ नहीं आ रहा कि कब संत बनना है और कब राजनीतिज्ञ। अब वह दोनों को मिला रहा है,,,,,,,
थोड़ा रुककर वे फिर बोले, “सुभाष! अब एक नेता के तौर पर गांधी मेरे लिए मान्य नहीं हैं। आगे भी उनके प्रति श्रद्धा रखना अपने आप को धोखा देने जैसा होगा,,,,,,,,
दो दिन बाद पटेल और बोस ने एक पत्रकार को अपना घोषणापत्र का मसौदा सौंपा। उसमें लिखा था कि गांधीजी ने देश के लिए महान कार्य किए हैं, किंतु अब वे पुराने बेकार फर्नीचर की तरह हो गए हैं। उनकी वजह से सफलता में बाधा आती है, इसलिए कांग्रेस का पुनर्गठन आवश्यक है। यदि कांग्रेस ऐसा नहीं करती तो कांग्रेस के अंदर ही हम एक नए दल का गठन करेंगे,,,,,,,
विट्ठलभाई का स्वास्थ्य और अधिक बिगड़ने लगा। पटेल स्विट्जरलैंड के ग्लेड नामक स्थान पर चले गए। उनके पीछे-पीछे सुभाष भी वहाँ पहुँच गए। अंत समय निकट जानकर सुभाष ने उनके सभी संबंधियों को पत्र लिखे। इंग्लैंड से नाथालाल पारिख और भोगीभाई जवेरी आए। छोटे भाई सरदार वल्लभभाई पटेल नहीं आ सके। वे नासिक जेल में बंद थे,,,,,,,,
सुभाष पूरा दिन विट्ठलभाई के पास बैठे रहते। रात में उनकी जगह नाथालाल ले लेते। एक रात विट्ठलभाई ने नाथालाल से कहा, “मुझे वसीयत लिखवानी है,,,,,,,
नाथालाल ने पूछा, “इसकी क्या आवश्यकता है? आपके परिवार में तो कोई विवाद जैसी बात नहीं है,,,,,,
“मुझे परिवार से बाहर कुछ दान करना है,,,,,,
“अच्छा, तो गांधी आश्रम को दान देने का विचार है,,,,,,,
“नहीं नाथा। गांधी और वल्लभभाई के लिए देश में कई पूंजीपति तैयार बैठे हैं। मैं तो यह धन सुभाष को देना चाहता हूँ। मुझे वह बहुत अकेला दिखाई देता है। यदि उसे लोगों का साथ मिल जाए तो वह गांधी, वल्लभभाई, नेहरू जैसे नेताओं की तुलना में बहुत पहले देश को आजाद करा सकता है। उससे बात करके मैंने समझा कि आजादी के बाद देश का स्वरूप कैसा हो, इसकी कितनी स्पष्ट रूपरेखा उसके पास है। नाथा! उसे अपना नेता मानने का मन करता है,,,,,,
“लेकिन गांधीजी और संभवतः वल्लभभाई को यह पसंद नहीं आएगा,,,,,,
पटेल मुस्कुराकर बोले, “अपनी संपत्ति का क्या करना है, यह निर्णय लेने का अधिकार तो मेरा ही है न,,,,,,
अगले दिन रजिस्ट्रार को बुलाया गया और वसीयत तैयार हो गई,,,,
22 अक्टूबर 1933 की रात विट्ठलभाई ने अंतिम सांस ली। सुभाष ने उनकी देह पर गीता रखी और न जाने क्यों, सैन्य अंदाज में सैल्यूट करके उन्हें अंतिम विदाई दी,,,,,,
#वियना_की_वसीयत #जब_पटेल_ने_बोस_को_चुना #गांधी_के_बाद_कौन #विट्ठलभाई_की_आखिरी_इच्छा #नेताजी_को_मिला_खजाना #इतिहास_का_अनसुना_पन्ना #NetajiSubhasBose #VithalbhaiPatel #UntoldHistory #BoseVsGandhi #FreedomFightersUnite #1933ViennaMeeting #ForgottenHeroes

નાલંદા
#नालंदा_विश्विद्यालय का पुस्तकालय जलाने वाला और जीवन भर मूर्तियां तोड़ने वाला #बख्तियार_खिलजी अपने अंत समय मे असम के कामरूप जिले के एक मंदिर के मूर्तियों के सामने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाता मिला अपने जीवन रक्षा के लिए । लेकिन उसका अंत बहुत भयानक तरीके से हुआ , नदी के किनारे रेत पर ले जाकर भीड़ ने उसके दोनों हाथ रस्सियों में बांधकर खींचा फिर उसके दोनों हाथ काट डाला गया । इसके बाद उसे रस्सियों में बांधकर नगर के गलियों में पशुओं की तरह घुमाया गया । इस दौरान छतों पर से लगातार वे औरतें गन्दगी की बारिश उसपर करती रहीं थी । ये वही औरतें थीं जिनके मर्दों और बच्चों का इसने कत्ल किया था । गन्दगी में लिथड़ा हुआ खिलजी की कई घण्टों तो इसी तरह तड़पते हुए मौत हो गयी थी ।
यह इतिहास कितनो को पता है यह मैं नहीं कह रहा इस्लामिक दस्तावेज ही कह रहे है । लेकिन इसे क्यों छुपाया गया है समझ से बाहर है । एक #फ़ारसी_इस्लामिक इतिहासकार गुलाम हुसैन सालिम ने अपनी किताब ” Riyaju-s-Salatin ” में इसका पूरा विवरण प्रस्तुत किया है ।
Abdulkadir Abdulkadir हसन खान मेवाती के बारे में बाबर का उल्लेख👇
बाबरनामा के पेज संख्या- 545 पर बाबर ने लिखा है कि
इब्राहीम के साथ लड़ाई में हसन खान मेवाती का बेटा नाहर खान हमारे हाथ लग गया था; हमने उसे बंधक बना लिया था और दिखावे के तौर पर उसी के कारण उसका पिता (हसन खान मेवाती) लगातार हमारे पास आता-जाता रहता था और उसे बुलाता रहता था। अब कई लोगों को लगा कि अगर हसन खान को उसके बेटे को भेजकर मना लिया जाए, तो वह ज़्यादा नरम दिल हो जाएगा और मुझसे मिलने के लिए उसका आना-जाना आसान हो जाएगा। इसलिए नाहर खान को सम्मान का वस्त्र पहनाया गया; उसके पिता के लिए उससे वादे किए गए और उसे जाने की इजाज़त दे दी गई। वह पाखंडी [हसन खान] ज़रूर अपने बेटे को मुझसे जाने की इजाज़त मिलने का इंतज़ार कर रहा था, क्योंकि यह सुनकर और जब उसका बेटा अभी तक उससे नहीं मिला था, वह अलवर से निकलकर तुरंत आगरा ज़िले के तोडा भीम में राणा सांगा से जा मिला। उस समय उसके बेटे को जाने देना एक गलत निर्णय रहा।
बाबर के इस उल्लेख से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हसन खान मेवाती इब्राहीम लोदी के साथ पानीपत की लड़ाई में बाबर के विरुद्ध लड़े जिसकारण हसन खान मेवाती के बेटे हसन खान को बाबर ने युद्ध बंधक बना लिया, इब्राहीम के बाद उन्होंने राणा सांगा के साथ बाबर के विरुद्ध युद्ध करना जारी रखा।
बाबर के इस उल्लेख से बाबर के विरुद्ध हसन खान मेवाती द्वारा राणा सांगा की सेना से मिलना एक राजनीतिक कारण को दर्शाता है।
एक साधारण सी बात है दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है यहाँ पर राणा सांगा और अफगानों दोनों का दुश्मन एक था बाबर।
आजकल के इतिहासकार राणा सांगा की छवि नकारात्मक और हसन खान मेवाती की छवि एक राष्ट्रवादी के रूप में दिखाते है लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों के विश्लेषण से पता चलता है कि यह केवल एक राजनीतिक मजबूरी थी क्योंकि हसन खान मेवाती इब्राहीम लोदी के साथ थे और इब्राहीम लोदी को राणा सांगा पहले ही खतौली के युद्ध में हरा चुके थे।
(Source- The Baburnama in English, Translated by A.S. Beveridge)
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सन 1737 ई.! मुगल बादशाह मोहम्मद शाह के पास तब कुल डेढ़ लाख की सेना हुआ करती थी। मात्र तीन दशक पूर्व ही मुगल सल्तनत के सबसे प्रतापी शासक औरंगजेब की मृत्यु हुई थी। लगभग 200 वर्षों से सोने की चिड़िया भारत के बहुत बड़े भूभाग पर शासन कर रहे मुगलों के पास अब भी इतना धन था कि दुनिया वर्षों तक बैठ कर खाती।
शिवाजी महाराज की पुत्रवधू और शाहूजी महाराज की माता येशुबाई अभी कुछ वर्ष पूर्व तक मुगलों की कैद में ही रहीं थीं। कुल मिला कर बात इतनी थी मुगल सल्तनत कमजोर भले हुआ था पर अब भी उसकी शक्ति भारत में सबसे अधिक थी।
नवम्बर की संध्या! अपने किले में बैठे बादशाह मोहम्मद शाह को खबर मिली कि पेशवा बाजीराव दिल्ली पर चढ़ आया और पूरी घेराबंदी कर दी है। यह एकाएक बदहवास कर देने वाली खबर थी। लगभग पूरे देश में मुगलों के सैनिक अड्डे और गुप्तचरों का जाल बिछा था, फिर ये मराठे घुसे किधर से? किस गति से आये कि किसी को पता तक नहीं चला?
पर मुगल बादशाह इस बात पर केवल आश्चर्य कर सकता था, अविश्वास नहीं। क्योंकि उसे पता था कि वह पैंतीस वर्ष का महान योद्धा जिसका नाम बाजीराव बल्लाळ है, वह कुछ भी कर सकता है। वह हवा की तरह उड़ कर आ सकता है, और पानी की तरह सब कुछ तहस नहस कर के जा भी सकता है।
बादशाह ने पूछा, “उसके पास कितनी सेना है?” उत्तर मिला- पचास हजार से कम नहीं होगी। इतनी बड़ी सेना लेकर वह दिल्ली तक आ गया और हमें खबर तक नहीं मिली। हम उनसे क्या ही जीतेंगे।
बादशाह की हिम्मत टूट गई। फिर भी, वह बादशाह था। स्वयं युद्ध में जाना उसके खानदान की परम्परा नहीं थी! सो उसने सेनापति को आदेश दिया- हमला करो! खदेड़ दो इन मराठों को…बादशाह जानता था कि उसे पकड़ना या कैद करना तो बिल्कुल ही असम्भव है।
सेनापति मीर हसन खां कोका निकले। अपनी पूरी सेना के साथ। पर वे मराठे थे। वह बाजीराव था। ताम्बे सी वलिष्ठ भुजाएं… हवा से बात करने वाली तलवारें… हर हर महादेव के नारे के साथ हर पर्वत को लांघ जाने के साहस वाला कलेजा… न मुगल सैन्य वापस किले में जा सकी, न हसन खान कोका दुबारा कहीं दिखाई पड़े…
बादशाह मोहम्मद शाह तहखाने में छिप गए। मुगल सेना जहाँ थी, वहीं थम सी गयी। देश जान गया था कि पेशवा बाजीराव दिल्ली घेर कर बैठे हैं, पर कुछ कोस की दूरी पर ही आगरे में बैठी विशाल मुगल सेना दिल्ली की ओर झांकने भी नहीं आयी। मौत से सबको डर लगता है भाई!
किसी ने पूछा पेशवा से, “अब?” उसने मुस्कुरा कर कहा- दिल्ली देखने आये थे, सो देख लिया। इसे तो जब चाहें तब जीत लेंगे। चलो वापस, दिल्ली की कमर टूट गयी है। जिसकी कमर टूट गयी हो, उसकी गर्दन कोई भी तोड़ सकता है।”
ठीक दो साल बाद। बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला अपने ही दरबार में पैरों में घुंघरू बांध कर नाच रहा था, और उसकी गद्दी पर बैठा आक्रांता नादिरशाह उसके ऊपर गिन्नियां फेंक फेंक कर ठहाके लगा रहा था। जैसे समय पेशवा की हाँ में हाँ मिला कर कह रहा हो, “जिसकी कमर टूट जाय, उसकी गर्दन कोई भी तोड़ सकता है।”
साभार,,,,सर्वेश तिवारी श्रीमुख।।
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ભૂતકાળમાં બહુ ન જઈએ તો પણ, 1857ની ક્રાંતિ પછી, જ્યારે બ્રિટિશ વહીવટી અધિકારીઓ કલકત્તામાં તેમની ઓફિસમાં બેસતા હતા, ત્યારે પ્રોટોકોલ મુજબ, તેમની પાછળની દિવાલ પર ભારતનો નકશો હતો, જે તેઓ India તરીકે બોલાવતા.
તમને જાણીને નવાઈ લાગશે કે તે નકશા અનુસાર ભારતનો વિસ્તાર લગભગ 83 લાખ ચોરસ કિલોમીટર હતો, જે આજે ઘટીને માત્ર 33 લાખ ચોરસ કિલોમીટર થઈ ગયો છે.
એટલે કે, 1857 પછી, આપણે આપણી ભારતીય જમીનનો લગભગ 50 લાખ ચોરસ કિલોમીટર ગુમાવ્યો.
તે શા માટે ખોવાઈ ગયો તેની ચર્ચા અત્યારે નિરર્થક છે; કારણ કે આ સમયગાળા દરમિયાન આપણે શું ગુમાવ્યું અને શું ગુમાવ્યું તે આપણે જાણતા નથી. હારવાની વાત કરીએ તો લાગે છે, તે ચાલીસમાં પાકિસ્તાન ગયો અને બીજું શું? જેઓ વધુ ભણેલા છે તેઓ બર્માને ખોવાયેલી યાદીમાં ઉમેરે છે, જ્યારે સત્ય એ છે કે પાકિસ્તાન (બાંગ્લાદેશ સહિત) અને બર્માનો સંયુક્ત વિસ્તાર માત્ર સત્તર લાખ ચોરસ કિલોમીટર છે, એટલે કે આ ઉપરાંત, ત્રણ લાખ ચોરસ કિલોમીટર. અન્ય ચોરસ કિલોમીટર વિસ્તાર ગાયબ થય ગયો છે. મજાની વાત એ છે કે હારનો આ સિલસિલો 1947ની આઝાદી પછી પણ ચાલુ રહ્યો છે.
‘એડન’ વિસ્તાર ઓછામાં ઓછા 1937 સુધી તે વિસ્તૃત ભારતમાં સામેલ હતો. આ સાથે, પર્સિયન ગલ્ફના “ટ્રુસલ સ્ટેટ્સ” સમાન નકશામાં શામેલ કરવામાં આવ્યા હતા, તેમાં “સોમાલીલેન્ડ” શામેલ હતું, જેમાં શ્રીલંકા અને સિંગાપોર પણ હતા. બલૂચિસ્તાન અને ખૈબર પખ્તુનખ્વા વિસ્તાર પણ આપણો હતો.
અને એવું નથી કે આ ભાગો બ્રિટનની વસાહતો હતા, તેથી જ અમે તેને અખંડ ભારતની સીમામાં ધ્યાનમાં લઈએ છીએ, પરંતુ તે એટલા માટે છે કે અંગ્રેજો પોતે માનતા હતા કે આ બધા ભૂતકાળથી ભારતનો ભાગ છે.
અફઘાનિસ્તાન ગયો, સિંધ , મુલતાન , બલુચિસ્તાન અડધા પંજાબ અને બાંગ્લાદેશ કાશ્મીર ગયો અને આપણે કબૂતર ઉડતા રહી ગયા અને બડાઈ મારતા રહી ગયા કે આપણે બહુ શાંતિપ્રિય દેશ છીએ જેણે ક્યારેય કોઈ પર હુમલો કર્યો નથી.
જો કે અમારે કહેવું જોઈતું હતું કે અમે લૂંટતા રહ્યા અને સંકોચાતા રહ્યા, પરંતુ તેમ છતાં અમે ક્યારેય દાદ આપી નથી, અમારી માતૃભૂમિ જતી રહી પણ અમને તેનું કોઈ દુઃખ લાગ્યું નથી.
હવે સ્થિતિ એવી છે કે આપણી મોટી વસ્તીને ખ્યાલ નથી કે દેશના વિભાજન સાથે આપણે શું ગુમાવ્યું છે. આપણી નવી પેઢીમાં, જૂના લોકોની વાત જ કરીએ, ભારતના વિકૃત નકશાને જોઈને પીડા અનુભવનારા બહુ ઓછા છે.
ભગવાન રામના જીવનની સફર પર બનેલ “રામવંગમન સ્થળ પ્રોજેક્ટ”નું નામ તમે સાંભળ્યું જ હશે. ભગવાન રામના જીવનની અનેક યાત્રાઓમાંથી એક, જે અયોધ્યાથી લંકા સુધીની છે, આ પ્રોજેક્ટ તે પ્રવાસ પર આધારિત છે, પરંતુ બહુ ઓછા લોકો જાણતા હશે કે ભગવાન રામના જીવનમાં પ્રવાસના પાંચ તબક્કા છે; જેમાં એક તબક્કો એ છે કે જ્યારે ભગવાન ભારતની ભૂમિની અંદર તીર્થયાત્રા કરી રહ્યા હતા. તેમની તીર્થયાત્રાઓ દરમિયાન, ભગવાન રામે હિંગળાજ માતા મંદિરની પણ મુલાકાત લીધી હતી, જે કમનસીબે આજે પાકિસ્તાનમાં છે. પ્રભુએ આ મંદિરમાં યજ્ઞ પણ કર્યો હતો અને તે વિસ્તારના રાજ્યોની સુચારૂ કામગીરી માટે માતા પાસે આશીર્વાદ માંગ્યા હતા. પાછળથી, શ્રીરામના પુત્રો કુશ અને લવે તે વિસ્તારોમાં કુશપુર અને લવપુર નામના શહેરો સ્થાપ્યા હતા. ભગવાન પરશુરામે પણ હિંગળાજ ભવાનીના આ મંદિરની મુલાકાત લીધી હતી અને તે જ જગ્યાએ તેમના પિતા જમદગ્નિ ઋષિએ તપસ્યા કરી હતી.
આજે આપણી પાસે હિંગળાજ મંદિર નથી, તેના દર્શન કરવા માટે વિઝા લેવામાં પણ ઘણી સમસ્યાઓ છે અને આ વાર્તા એકલા હિંગળાજની નથી, પશ્ચિમ અને પૂર્વ પાકિસ્તાનમાં અસંખ્ય મંદિરો અને યાત્રાધામો હતા જે હવે નથી. દુખની વાત એ છે કે આપણામાંથી કોઈને પણ મૃત્યુ પામેલા અને અદૃશ્ય થઈ રહેલા મંદિરોની યાદી બનાવવાની કલ્પના નથી કે આ મંદિરોનો ભૂતકાળ અને ઈતિહાસ શું છે.
ચિંતા કરવી દૂરની વાત છે. કેટલા મંદિરો હતા, ક્યાં હતા, કોના દ્વારા બંધાયા હતા, કેટલા સમયથી ત્યાં પૂજા થતી હતી અને પૂજા ક્યારે બંધ થઈ ગઈ છે, જો આપણે વિચારી ન શકીએ તો આ બધું કોણ વિચારશે?
ભારતના ભાગલા થી શીખોને પણ મોટું નુકસાન થયું હતું, કારણ કે શીખ ધર્મના સ્થાપક નાનક દેવજીનો જન્મ લાહોર શહેરથી 80 કિમી દક્ષિણ-પશ્ચિમમાં સ્થિત નનકાના સાહિબમાં થયો હતો, જે હાલના પાકિસ્તાનના કપૂરથલા જિલ્લાના સુલતાનપુર લોધીમાં છે. બાબા શ્રીચંદનો જન્મ થયો હતો, તેમના બીજા પુત્ર બાબા લક્ષમીચંદ જીનો જન્મ આજના પાકિસ્તાનમાં થયો હતો. બીજા ગુરુ ગુરુ અંગદ દેવ જી (ભાઈ લહના જી) નો જન્મ હરિકે નામના ગામમાં થયો હતો, જે પંજાબના ફિરોઝપુરમાં છે. ચોથા ગુરુ રામ દાસ (પ્રથમ જન્મેલા) નો જન્મ ચુના મંડી, લાહોર (હવે પાકિસ્તાનમાં) માં થયો હતો. કરતારપુર સાહિબ ફક્ત લાહોર અને પાકિસ્તાની પંજાબમાં આવે છે જ્યાં ગુરુ નાનક દેવજી 1522 માં આવ્યા હતા. તેમણે તેમના જીવનના છેલ્લા 18 વર્ષ અહીં વિતાવ્યા હતા અને તેમનો દેહ અહીં છોડી દેવામાં આવ્યો હતો. લાહોરમાં જ નાનક જી સાથે સંકળાયેલા ઘણા કેન્દ્રો છે, જેમ કે સુલતાનપુર લોધી, બેબે નાનકીનું ઘર, ગુરુદ્વારા હટ સાહિબ, ગુરુદ્વારા બેર સાહિબ, ગુરુદ્વારા સંત ઘાટ, વગેરે, જે શીખો માટે આદરના કેન્દ્રો છે. લાહોર પોતે મહારાણા રણજીત સિંહની રાજધાની એટલે કે શીખ રાજધાની રહી છે.
બીજું કંઈ નહિ તો કમસેકમ એવુ તો નક્કી કરીએ કે ભારતની ભૂમિ બહારના આવા તમામ મંદિરો, તીર્થસ્થાનો, ગુરુદ્વારાઓ, બૌદ્ધ-ગુફાઓ વિશે થોડી માહિતી એકઠી કરીને આપણી વચ્ચે વહેંચીએ. અખંડ ભારતની યાદોને જીવંત રાખીએ.
બસ આ લાગણીઓને જીવંત રાખો, તો એક દિવસ આ કાલ્પનિક વાસ્તવિકતામાં ફેરવાઈ જશે અને જો તમે આ પણ નહીં કરી શકો તો હજુ ભાગલા માટે તૈયાર રહો, કારણ કે એક સમયે ભારતની સરહદ આખી દુનિયા સુધી વિસ્તરી હતી, જેને આજે ઘટાડો થયો છે. માત્ર 33 લાખ ચોરસ-કિમી બાકી છે અને ભાગલા આગળ પણ ચાલુ રહેશે.
, તનમે મનઃ શિવસંકલ્પમસ્તુ!!
યજુર્વેદ અધ્યાય 34 મંત્ર 1-6
~~~ બિનોદ કુમાર ઓઝા.
और तभी से अमेरिकी सेना सुरंगों से बहुत डरती है.
कहानी उस युद्ध की है जब अमेरिका की परमाणु शक्ति को ‘फ़ावड़े-टोकरी’ की तकनीक ने पस्त कर दिया था. साल 1966. वियतनाम में साइगॉन से उत्तर-पश्चिम में क़रीब 30 किलोमीटर दूर अमेरिकी सेना ने अपना एक विशाल सैन्य अड्डा बनाया, जिसका नाम था – कु ची बेस कैंप.
चारों तरफ़ कंटीले तार, वॉच टावर, फ़्लड लाइट, टैंक, और सैकड़ों हेलीकॉप्टर. कुल मिलाकर एक अभेद्य क़िला. फिर, अमेरिकियों के लिए अचानक सबकुछ बदलने लगा. रोज़ रात को वहां सैनिकों के ऊपर मौत नाचने लगी. बैरक के भीतर धमाके होते, गोलियां चलतीं और जब तक अमेरिकी सैनिक संभल पाते, हमलावर ग़ायब हो चुके होते. न कोई सुराग़, न निशान.
ऐसा लगता मानो वे भूतों से लड़ रहे हों.
अमेरिकियों ने पूरा जंगल छान मारा, कुछ नहीं मिला. महीनों बाद एक पेट्रोलिंग टीम को झाड़ियों के नीचे एक छोटा-सा सुराख़ मिला. जब एक इंजीनियर ने रोशनी डाली, तो उसे अंधेरे में उतरती एक सुरंग दिखी. अमेरिका को तब तक अंदाजा नहीं था कि जिस बेस पर वे खड़े हैं, उसके नीचे वियतनामी लड़ाकों ने 250 किलोमीटर लंबी सुरंगों का जाल बिछा रखा है.
ये सुरंगें रातों-रात नहीं बनी थीं. वियतनामी फ़ाइटर 1940 के दशक से ही फ़्रांसीसी बम हमलों से बचने के लिए इन्हें खोद रहे थे. कु ची की मिट्टी लाल मिट्टी थी, जो सूखने पर कंक्रीट जैसी सख़्त हो जाती. वियतनामियों ने फ़ावड़े और टोकरियों से इसे खोदना शुरू किया. वे रात में खुदाई करते और मिट्टी को खेतों में बिखेर देते, ताकि ऊपर से उड़ते विमानों को कुछ पता न चले.
सुरंगें तिमंज़िला थीं. पहला लेवल ज़मीन से 3 मीटर नीचे, दूसरा 6 मीटर और तीसरा स्तर 9 मीटर की गहराई पर था. इन्हें इस तरह डिज़ाइन किया गया था कि अगर अमेरिकी सैनिक बम भी गिराते तो सिर्फ़ ऊपरी लेयर डैमेज होता, नीचे सबकुछ चलता रहा.
यहां ज़िंदगी मुश्किल थी, लेकिन क्रांतिकारी लड़ाकों ने यहां पूरी बस्ती बसा रखी थी. वहां अस्पताल थे, जहां मोमबत्तियों की रोशनी में ऑपरेशन तक किया जाता. रसोइयां थीं, जहां से धुआं सैंकड़ों मीटर दूर जाकर निकलता और हथियार बनाने के कारखाने थे, जहां वे अमेरिकी कारतूसों को ही रीसायकल किया करते.
कहा जाता है कि क़रीब 10,000 लोग इन सुरंगों में वर्षों तक रहे, लड़े, बच्चे पैदा किए, और वहीं मर गए.
हफ़्तों तक सूरज की रोशनी के बिना भी लड़ने की ज़िद पाले वे लोग अमेरिकियों को छकाते रहे.
अमेरिकी सेना ने इन सुरंगों को तबाह करने के लिए सब कुछ झोंक दिया. पहले हज़ारों टन बम गिराए, जंगल जला डाले, लेकिन सुरंगों को कुछ नहीं हुआ.
ज़हरीला रसायन छिड़कर पेड़-पौधों को खाक कर दिया, सुरंगों में पानी भरा, लेकिन लड़ाकों ने इन सबकी काट निकाल ली. ज़हरीली गैस छोड़ी, पर सुरंगों की लंबाई और वेंटिलेशन ने उसे बेअसर कर दिया.
यहां तक कि प्रशिक्षित कुत्तों को भेजा गया, लेकिन वियतनामियों ने सुरंगों के मुहाने पर अमेरिकी साबुन, अमेरिकी सैनिकों के कपड़े, सिगरेट के बट और काली मिर्च रगड़ दी, ताकि कुत्तों को या तो ‘फ़्रेंडली’ गंध मिले या फिर सूंघने की शक्ति काम न करे.
हारकर अमेरिका ने एक ख़ौफ़नाक फैसला लिया. उन्होंने अपनी सेना के सबसे छोटे और दुबले सैनिकों को चुना, ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड, फ़िलिपींस से रंगरूट भर्ती किए गए. अमेरिका ने इन्हें नाम दिया ‘टनल रैट’ यानी सुरंगी चूहे. ये सैनिक सिर्फ़ एक टॉर्च और एक पिस्तौल लेकर उन 60 सेंटीमीटर चौड़ी काली अंधेरी सुरंगों में उतरते थे.
बाद के बयानों में इन ‘टनल रैट’ ने सुरंगों का ख़ौफ़नाक वर्णन किया कि कैसे वहां क़दम-क़दम पर मौत का जाल बिछा था. बिच्छुओं और ज़हरीले सांपों के मटके दरवाज़ों पर टंगे हुए थे, जो दुश्मनों के ऊपर गिर जाते. कहीं, ज़हरीले बांस के खूंटे थे, तो कहीं बारूदी सुरंगें.
अंधेरे में सैनिक को यह भी नहीं पता होता था कि उसके ठीक सामने कौन है. कई टनल रैट ने बताया कि उन्होंने अपने चेहरे के पास किसी की सांसें महसूस कीं, लेकिन अंधेरे के कारण वे कुछ देख नहीं पाए.
9 साल की जंग, अरबों डॉलर का ख़र्च और दुनिया की सबसे घातक तकनीक, सब कुछ मिट्टी में मिल गया. 1975 में जब अमेरिकी सेना हारकर वियतनाम से निकली, तब भी वे उन सुरंगों को पूरी तरह नष्ट नहीं कर पाई.
अब ये सुरंगें वहां का टूरिस्ट पॉइंट बन गई हैं, जिन्हें देखने के लिए लोग दूर-दूर से पहुंचते हैं. एक फ़ोटो सुरंग के अंदर की है और दूसरी फ़ोटो सुरंग के मुहाने का है, जहां से लोग सुरंग में उतरते हैं.
सुरंग की कहानी इसलिए सुनाई, क्योंकि ट्रंप कह रहा है कि ईरान में वह पैदल सैनिक भेज सकता है. जानकार कह रहे हैं कि ईरान ने सुरंगों का जाल बिछा रखा है. वियतनाम तो उस समय पुरानी तकनीक पर चल रहा था, ईरान के पास तो आधुनिक जख़ीरे हैं.


અધૂરું સ્વપ્ન અને દર્દનાક અંત: મોહમ્મદ અલી ઝીણાની કહાણી
૧૯૪૭નો એ સમય જ્યારે અખંડ ભારતના ભાગલા રોકવા માટે લોર્ડ માઉન્ટબેટન, ગાંધીજી, નેહરુ અને પટેલ જેવા દિગ્ગજ નેતાઓ પ્રયત્નશીલ હતા. ગાંધીજીએ તો ઝીણાને ભારતના વડાપ્રધાન બનવાની ઓફર પણ આપી હતી, જેથી ભાગલા અટકી શકે. પરંતુ ઝીણાની જીદ સામે કોઈ ઉપાય કારગત ન નીવડ્યો. “હિન્દુઓના હાથ નીચે રહેવા કરતા બધું ગુમાવવું બહેતર છે”—આ વિચારધારા સાથે તેમણે પાકિસ્તાનનું નિર્માણ કર્યું.
વ્યક્તિગત જીવન અને વિરોધાભાસ
ઇતિહાસ સાક્ષી છે કે ઝીણાના પૂર્વજો કાઠિયાવાડી હિન્દુ હતા. તેમના દાદા પૂંજાભાઈ ઠક્કર માછલીના વેપારને કારણે જ્ઞાતિ બહાર મુકાયા અને ઇસ્લામ ધર્મ અંગીકાર કર્યો. ઝીણા પોતે લંડનમાં ભણ્યા અને પાશ્ચાત્ય સંસ્કૃતિથી પ્રભાવિત થયા. તેઓ દિવસની ૫૦ સિગારેટ ફૂંકતા, દારૂ પીતા અને સુવરનું માંસ પણ ખાતા, જે ઇસ્લામમાં વર્જિત છે. તેમ છતાં, તેમણે ધર્મના નામે અલગ દેશની માંગ કરી.
પ્રેમ અને એકલતા
ઝીણાની અંગત જિંદગી પણ કરુણ રહી. ૧૬ વર્ષની પારસી છોકરી રતી સાથે તેમને પ્રેમ થયો અને લગ્ન કર્યા. પરંતુ રાજકારણ અને પાકિસ્તાનની જીદમાં તેમણે પત્ની તરફ દુર્લક્ષ સેવ્યું. ૨૯ વર્ષની વયે રતીનું અવસાન થયું ત્યારે ઝીણા ધ્રુસકે-ધ્રુસકે રડ્યા હતા. તેમની એકમાત્ર દીકરી દીનાએ પણ પારસી સાથે લગ્ન કરી લીધા અને પાકિસ્તાન જવાની ના પાડી દીધી. અંતે ઝીણા સાવ એકલા પડી ગયા.
પાકિસ્તાન: એક ભૂલ?
પાકિસ્તાન બન્યા પછી ઝીણા જ્યારે કરાચી પહોંચ્યા, ત્યારે તેમનું ભવ્ય સ્વાગત થયું. પરંતુ થોડા જ સમયમાં તેમનો ભ્રમ ભાંગી ગયો. ટીબી અને કેન્સર જેવી ગંભીર બીમારીઓ હોવા છતાં, ડૉક્ટરોએ તેમને સિગારેટ પીવાની છૂટ આપી, જાણે તેઓ તેમના મૃત્યુની રાહ જોઈ રહ્યા હોય.
૧૧ સપ્ટેમ્બર ૧૯૪૮ના રોજ જ્યારે તેમની તબિયત લથડી અને તેમને કરાચી લાવવામાં આવ્યા, ત્યારે રસ્તામાં જ તેમની એમ્બ્યુલન્સનું પેટ્રોલ પૂરું થઈ ગયું! કલાકો સુધી પાકિસ્તાનના નિર્માતા ભરતડકે રસ્તા પર તડપતા રહ્યા. માખીઓ ઉડાડવાની શક્તિ પણ તેમનામાં નહોતી બચી. આખરે, તેમણે દમ તોડી દીધો.
અંતિમ અપમાન
ઝીણા શિયા મુસ્લિમ હતા, પરંતુ પાકિસ્તાનના કટ્ટરપંથીઓએ તેમને સુન્ની રિવાજ મુજબ દફનાવ્યા. તેમની બહેન ફાતિમા ઝીણાને પણ પાછળથી હાંસિયામાં ધકેલી દેવામાં આવી. જ્યારે ફાતિમાએ રેડિયો પર ભાઈના મૃત્યુનું સત્ય કહેવાનો પ્રયાસ કર્યો, ત્યારે પ્રસારણ અટકાવી દેવામાં આવ્યું. ફાતિમાએ પાછળથી સ્વીકાર્યું હતું કે, “પાકિસ્તાન બનાવવું એ મારા ભાઈની સૌથી મોટી ભૂલ હતી.”
જે વ્યક્તિએ ધર્મના નામે દેશના ભાગલા પાડ્યા, તેને જ તે દેશમાં શાંતિ કે સન્માન ન મળ્યું. આ એક ઐતિહાસિક વિડંબના છે કે જેનું સર્જન તેમણે કર્યું, તે જ તેમના અંતનું કારણ બન્યું.
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જે સૂવર નું માસ ખાતો હોય અને સિગારેટ પીતો હોય એ માણસ પાકિસ્તાન જ બનાવી સકે જે અત્યારે આખી દુનિયાનું માથાનો દુખાવો છે
મિત્રો મને લાગે છે કે જીણા ની ભુલ કરતા આપણા સમાજ ની ભૂલ વધારે લાગે છે આપના લખ્યા મુજબ જો કોઈ પણ ધંધો કરતા વ્યક્તિ ને બહિષ્કૃત કરવા માં આવે તો જે ધૃણા ઝીણા ને સમાજ માટે થઈ તે કોઈપણ વ્યક્તિ ને થઇ શકે છે અને આવા પરિણામ ભોગવવા માટે તૈયાર રહેવું પડશે .
અહીંયા એક વાત અધૂરી છે. પુંજાભાઈ વાલજીભાઈ ઠક્કર નો માછલી વેચવા નો ધંધો નહોતો. તેઓ કરિયાણા ની દુકાન ચલાવતા હતા. પુંજાભાઇ ના એક દિકરો જે નાનો હતો. તેને લોકો મુસલમાન કહી ને ચીઢવતા હતા. કરિયાણા ની દુકાને સૌ કોઈ વસ્તુ લેવા આવતા હતા. પુંજાભાઈ વેરાવળ પાસે રહેતા હતા. એક મુસલમાન વ્યક્તિ પુંજાભાઈ ની દુકાને કરિયાણું લેવા આવતા તેમની સાથે મિત્રતા થઈ. તેના લીધે હિન્દુ લોકો એ પુંજાભાઈ સાથે ના વેવાર બંધ કર્યા. કાળ ક્રમે હિન્દુ ઓ કરિયાણું લેવા આવતા હતા તે બંધ થઈ ગયા. તેમની સાથે ના તમામ પ્રકારના વ્યવહારો હિન્દુ ઓ એ બંધ કર્યા. પુંજાભાઈ નો ધંધો બંધ થતાં તેમના મુસલમાન મિત્ર એ તેમને સુક્કી મચ્છી વેચવાનું કહેતાં પુંજાભાઈ વિચાર માં પડ્યા. થાય શું? લોકો છોકરાને મુસલમાન કહી ખીજવતા અને કરિયાણાની દુકાન બંધ થઈ કરવું શું ? આખરે, સુક્કી મચ્છી વેચવાનું શરૂ કર્યું. હિન્દુ ઓ તરફથી પરેશાની વધતાં પુંજાભાઈ પોતાના ભોઈઓ ને વતન માં છોડી કરાંચી જતાં રહ્યાં. જ્યાં આઝાદી વખતે પણ કરાંચી માં એક ગલી છે ત્યાં પુંજાભાઈ વાલજીભાઈ ઠક્કર ની કરિયાણા ની દુકાન ચલાવતા હતા. પુંજાભાઈ નો નાનો દીકરો જે ને ઝિણો હોવાથી ઝિણા તરીકે તેઓ ઓળખાયા. તેમને કરાંચી માં અંગ્રેજે ક્રિશ્ચન સ્કુલ માં ભણવા મુક્યા, કારણકે હિન્દુ સ્કુલોમાં માં એડમિશન મળતું નહોતું. બીજા છોકરાઓ સાથે ઝઘડતા થતાં હતાં.
અળધીરાતે આઝાદી ચોપડી માં ઘણું બધું છે. કાળ ક્રમે પુંજાભાઈ વાલજીભાઈ ઠક્કર કરાંચી માં ખુબ કમાયા. ઝીણા નું લગ્ન વેરાવળ ગાડુ લઈ ને આવી ગુજરાતી સાથે કર્યું હતું. એક વખત વેરાવળ પાસે ના હિન્દુ સંગઠનો એ કરાંચી જઈ ને પુંજાભાઈ પાસેથી મંદિર બાંધવા માટે પૈસા લઇ આવ્યા હતાં પણ આંખો દિવસ પુંજાભાઈ સાથે વાતો કરી પણ પાણી સુધા પીધું નહોતું. માફ કરજો કોઈ ને ખોટું લાગે તો.

પાકિસ્તાન હજુ જૂનાગઢને ‘પાંચમો પ્રાંત’ ગણે છે!
થોડા સમય પહેલા કરાચીમાં એક કાર્યક્રમ યોજાઈ ગયોઃ જૂનાગઢના નવાબે પોતાના કુંવરને ‘વઝીરે આઝમ’ની પાઘડી પહેરાવી!
જૂનાગઢ તો ભારતમાં છે, સૌરાષ્ટ્રનું માતબર નગર છે, અને પાકિસ્તાનમાં તેના નવાબ-દીવાનનો સોગંદવિધિ? આમાં નવું કશું નથી. છેક ૧૯૪૭થી જ પાકિસ્તાન કાશ્મીર, જૂનાગઢ, માણાવદરને પોતાનું ગણે છે. દસેક વર્ષ પૂર્વે કરાચીમાં ‘ઈલ્હાકે જૂનાગઢ’ પુસ્તક જનાબ લાખાણીએ લખ્યું ત્યારે જૂનાગઢને પાકિસ્તાનનો ‘પાંચમો પ્રાંત’ ગણવાની માગણી થઈ હતી.
પાકિસ્તાને ટપાલ ટિકિટ અને નકશો જાહેર કર્યો તેમાં કાશ્મીર, જનાગઢ, માણાવદર અને કચ્છની સીર ક્રિકનો સમાવેશ કર્યો છે. કચ્છ-પાકિસ્તાનની સરહદે આવેલાં સીર ક્રિકની જમીનમાં પેટ્રોલિયમ ભંડારની શક્યતાઓ છે, તો જૂનાગઢ (જેની હેઠળ સોમનાથ પણ હતું. હવે તેને અલગ જિલ્લો બનાવાયો છે.) તો સાચો સવાલ સમજવા જેવો છે.
સ્વતંત્રતા મળતાંવેત જૂનાગઢ એક મોટો અવરોધક બળ તરીકે બહાર આવ્યું અને ૧૪મી ઓગસ્ટ, ૧૯૪૭ના દિવસે જૂનાગઢના નવાબે પાકિસ્તાન સાથે જોડાયાની પોતાની ઈચ્છા જાહેર કરી! ૮૦ ટકા હિન્દુ પ્રજા ધરાવતું આ રાજ્ય પાકિસ્તાનમાં જોડાય તો અખંડિતતા પર જોખમ હતું. પ્રજાના આગેવાનો એકત્રિત થયા. મુંબઈમાં જૂનાગઢવાસીઓની બેઠક થઈ. જૂનાગઢના આગેવાનોએ પણ નવાબના નિર્ણય સામે વિરોધ વ્યક્ત કર્યો.
વી.પી. મેનન માણાવદરના નવાબને મળ્યા. માણાવદર ૧૦૦ ચોરસ માઈલનો નાનો નવાબી તાલુકો હતો. ત્યાંના ખાને પણ જૂનાગઢના પગલે પગલે પાકિસ્તાન સાથે માણાવદરને જોડવાની ઈચ્છા જાહેર કરી હતી. મેનનની સલાહ ખાને માની નહિ. માંગરોળના શેખે સ્ટેન્ડ બિલના કરાર પર સહી કરી આપી.
દરમ્યાન જૂનાગઢમાં બહુમતી હિંદુ પ્રજા પર ત્રાસ શરૂ થયો. લોકો હિજરત કરવા લાગ્યા. જૂનાગઢ તાબાનાં ૫૧ ગામ ધરાવતા બાબરિયાવાડના ગરાસદારોએ ખુલ્લો બળવો કરીને હિંદી સંઘમાં જોડાવાની જાહેરાત કરી અને વિલયના કરારપત્ર પર સહી કરી આપી.
૧૩મી ઓગસ્ટ, ૧૯૪૭ના દિવસે કેપ્ટન બનેસિંહે રાજકોટના રેસિડેન્ટનો ચાર્જ સંભાળ્યો. એજન્સીના ત્રીજાથી પાંચમા વર્ગના તમામ રજવાડાં અને એજન્સીનાં ૧૨ થાણાં આ રીતે હિંદી સંઘ તળે આવી ગયાં, પણ જૂનાગઢનો સવાલ એવો ને એવો હતો. તેણે બાબરિયાવાડ કબજે કરવા માટે પોતાનું દળ મોકલ્યું હતું. હિંદી સરકારે આ પગલાંને પોતાના પર આક્રમણ તરીકે ગણ્યું અને ગંભીર નોંધ લીધી. નેહરુને સમજાવીને સરદારે હિંદી સંઘની લશ્કરી ટુકડીઓ બાબરિયાવાડના રક્ષણ માટે મોકલી આપી.
આ દરમિયાન પ્રજાકીય લડતને પણ વેગ મળ્યો, ૨૫ ઓગસ્ટે ‘કાઠિયાવાડ રાજકીય પરિષદ’ મળી તેમાં એક સંરક્ષણ સમિતિ નિયુક્ત કરવામાં આવી. ૨૫મી સપ્ટેમ્બરે મુંબઈમાં માધવબાગ ખાતે મળેલી સૌરાષ્ટ્રવાસીઓની સભામાં ઢેબરભાઈ, દુર્લભજી ખેતાણી, નરેન્દ્ર નથવાણી, પુષ્પાબહેન મહેતા, ‘જન્મભૂમિ’ના તંત્રી અમૃલાલ શેઠ, બળવંતરાય મહેતા, શામળદાસ ગાંધી વગેરેએ જૂનાગઢની મુક્તિ માટે હાકલ કરી. ‘આરઝી હકૂમત’ સ્થપાઈ અને એના ‘સરનશીન’ શામળદાસ ગાંધી બન્યા. જૂનાગઢની કામચલાઉ સરકારના મુખ્ય પ્રધાન અને બીજા પ્રધાનોનું પ્રધાન મંડળ રચાયું. શામળદાસ ગાંધી અને બીજા નેતાઓ જૂનાગઢ તરફ નીકળવા રવાના થયા. મહમદઅલી ઝીણા અને મુસ્લિમ લીગના નેતાઓ જૂનાગઢ – બાંટવા વગેરે સ્થાનોએ જઈને હિંદી સંઘવિરોધી વ્યૂહરચના ગોઠવી આવ્યા હતા.
રાજકોટમાં જૂનાગઢ રાજ્યની મિલકત સમાન ‘જૂનાગઢ હાઉસ’નો કબજો ૩૦મી સપ્ટેમ્બરે ‘આરઝી હકૂમતે’ લીધો. યુવકોને સશસ્ત્ર તાલીમ અપાઇ. પોરબંદરની મેર, આયર, બાબરિયા વગેરે લડાયક કોમો ‘આરઝી હકૂમત’માં જોડાઈ અને કુતિયાણા, નવાગઢ, ગાધકડા, અમરાપર વગેરે મુખ્ય ગામો તેમજ બીજા ૩૬ સ્થાનો પર કબજો મેળવ્યો. કુતિયાણામાં સામે થોડીક અથડામણ થઈ, પણ એકંદરે ઝડપથી જૂનાગઢ, માણાવદર અને સરદારગઢ-બાંટવા વગેરેમાં હિંદી સંઘમાં વિલય માટેનું વાતાવરણ સર્જાતું થયું. જૂનાગઢ રાજ્યનો પોલીસ કમિશનર નકવી પાકિસ્તાની લશ્કરની મદદ માટે કરાંચી ગયો તે પાછો જ ન ફર્યો.
હિંદી સંઘે ૨૨મી ઓક્ટોબર અને ૧લી નવેમ્બરે માણાવદર, માંગરોળ અને બાબરિયાવાડમાં બ્રિગેડિયર ગુરુબક્ષસિંહની આગેવાની હેઠળ પોલીસ ટુકડીઓ મોકલી આપી એટલે આ સ્થાનોએ સોઢાણા-વડાલાના જે ‘સિંઘીઓ’ ત્રાસ વર્તાવી રહ્યા હતા તે પણ કાબૂમાં આવી ગયા. તકેદારીનાં પગલાં તરીકે પોરબંદર – માંગરોળના સમુદ્રકિનારે યુદ્ધનૌકાઓ પણ લંગરાવવામાં આવી. વાતાવરણ તંગદિલીભર્યું હતું અને ક્યારે શું બનશે એવી કલ્પનાથી હિંદુ પ્રજા ફફડતી હતી.
જૂનાગઢના નવાબ ઓક્ટોબરની ૧૭મીએ કરાંચી ગયા એટલે પાછળ વહીવટ માટે દીવાન શાહનવાઝ ખાન ભૂતો રહ્યા હતા. છેવટે એણે પણ કમિશનર બૂચને પત્ર લખીને જણાવ્યું કે ‘રાજ્યની અંદરના અને બહારના અનિષ્ટ તત્ત્વોથી પ્રજાને બચાવી લેવા માટે, નિર્દોશ લોકોને રક્તપાત તથા જાનમાલના જોખમથી ઉગારવા ભવિષ્યમાં પ્રજાની ઈચ્છા પ્રમાણે સમાધાન થાય તેવી આશાથી જૂનાગઢ રાજ્ય કાઉન્સિલ રાજ્યનો હવાલો હિંદી સંઘને સોંપવા તૈયાર છે.’ ભૂતોએ પત્ર તા. ૭-૧૧-૧૯૪૭ના કાઉન્સિલના અંગ્રેજ સભ્ય કેપ્ટન હાર્વે જોન્સને રાજકોટ મોકલ્યો. ૯મીએ ફરી વાર એ રાજકોટ ગયો. આ વિનંતીની જાણ લોર્ડ માઉન્ટબેટનને પણ કરવામાં આવી અને કોંગ્રેસ નેતાઓને એક પત્ર લખવામાં આવ્યો. કરાંચીથી નવાબે આપેલી સૂચના પ્રમાણે આમ કરવામાં આવ્યું.
સરકાર ત્યારે ચૂપચાપ ઘટના પ્રવાહ તપાસી રહી હતી. પત્ર મળતાંવેંત એમણે વડા પ્રધાનને દિલ્હી જાણ કરી. વી.પી. મેનને સરદાર પટેલની સાથે મસલત કર્યા બાદ જોડાણ – સ્વીકારપત્રનો મુસદ્દો તૈયાર કર્યો અને સૌરાષ્ટ્રના પ્રાદેશિક કમિશનર શ્રી નીલમ બૂચને હિંદી સરકાર વતી જૂનાગઢ રાજ્યનો વહીવટ સંભાળી લેવા સૂચના આપવામાં આવી.
૯મી નવેમ્બરે સાંજે પાંચ વાગ્યે જૂનાગઢ-મુક્તિ જાહેર કરાઈ અને ભારતીય સૈન્યે આ પ્રદેશમાં પ્રવેશ કર્યો. એ દિવસે જ્યારે બૂચ જૂનાગઢ પહોંચ્યા ત્યારે દીવાન શાહનવાઝ ખાન પણ કરાંચી ઊપડી ગયા હતા. રાજ્ય કાઉન્સિલના સેક્રેટરીએ બૂચને રાજ્યનો વહીવટ સોંપ્યો અને પોલીસ તથા સૈન્યની ટુકડીઓનાં શસ્ત્રો વગેરેનો કબજો સંભાળી લેવાયો. પાકિસ્તાન સરકારને જણાવવામાં આવ્યું કે રાજ્ય કાઉન્સિલની ઈચ્છા અને માગણી મુજબ જૂનાગઢનો વિલય હિંદી સંઘ સાથે કરવામાં આવ્યો છે.
આવી જાહેરાત પછી પાકિસ્તાને મોં ખોલ્યું. પાક. વડા પ્રધાન લિયાકતઅલી ખાને ૧૫મી નવેમ્બરે હિંદ સંઘના વડા પ્રધાન જવાહરલાલ નેહરુને પત્ર લખીને જૂનાગઢ વિલયનો વિરોધ પ્રદર્શિત કર્યો. એણે એમાં જણાવ્યું હતું કે, ‘જૂનાગઢ રાજ્ય પાકિસ્તાન સાથે યોગ્ય રીતે ધોરણસર જોડાયેલું હતું તેથી રાજ્યના દીવાન કે નવાબને હિંદી સરકારની સાથે એ અંગે કોઈ વિચાર કે નિર્ણય લેવાનો અધિકાર રહેતો નથી. ઉપરાંત પાકિસ્તાનની મંજૂરી સિવાય એ રાજ્યની હદમાં હિંદી સંઘનું લશ્કર મોકલીને એના વહીવટનો કબજો લેવામાં હિંદી સરકારે પાકિસ્તાનના પ્રદેશમાં સરહદી કાનૂનનો ભંગ કર્યો છે, એટલું જ નહિ, પણ આંતરરાષ્ટ્રીય કાયદાનો પણ ભંગ કર્યો છે.’
પ્રત્યુત્તરમાં નેહરુએ જણાવ્યુંઃ
‘હિંદી સરકારે જૂનાગઢ પર કોઈ આક્રમણ કર્યું નથી. જૂનાગઢ રાજ્યની કાઉન્સિલ પાકિસ્તાન સરકારની પ્રેરણાથી જ કામ કરતી હતી અને કાઉન્સિલના સભ્યો સર ભૂતો અને કેપ્ટન હાર્વે જોન્સ વારંવાર જૂનાગઢ રાજ્ય સંબંધે પાકિસ્તાન સરકારનો સંપર્ક રાખતા હતા અને જૂનાગઢમાં શું કરવું એ અંગે તમારી સલાહ લેવા માટે લાહોર, કરાંચી જતા હતા. એમણે જોયું કે જૂનાગઢનું રાજ્યતંત્ર સાવ ખોરવાઈ ગયું અને હિંદી સરકાર એનો કબજો ન લે તો તંત્ર પડી ભાંગે એમ છે, એની માઠી અસર સમગ્ર સૌરાષ્ટ્ર પર થાય. બીજી બાજુ, આરઝી હકૂમત આવા સંજોગોમાં રાજ્યનો કબજો ન લેત તો સંભવ હતો કે ખૂનામરકી અને અંધાધૂંધી પ્રવર્તી હોત. આ સ્થિતિમાં દીવાન સર શાહનવાઝ ખાન ભૂતોની લાગણીનો હિંદી સરકાર ઈન્કાર કરે તો એનું પરિણામ ખતરનાક આવે, જૂનાગઢની હયાતી ભયમાં મુકાય અને રક્તપાત તેમજ અરાજક્તા સર્જાય. આ પરિસ્થિતિનો ખ્યાલ દીવાને નવાબને આપ્યો હતો અને નવાબના સૂચન પ્રમાણે દીવાન વર્ત્યા હતા. હિંદી સરકારે જૂનાગઢને કામચલાઉ સરકારને માન્ય નથી કરી, પણ એમાં જે વ્યક્તિઓ છે તે પ્રજાની વિશ્વાસપાત્ર છે તેથી રાજ્યની પ્રજાની વિનંતીથી કાઉન્સિલે જે પગલું પ્રજાના હિતમાં ભર્યું તેની વચ્ચે હિંદી સરકાર આવે અને પ્રજાની માંગણીનો ઇન્કાર કરે એ ઉચિત નહોતું.’
વી.પી. મેનન અને બીજા રાજકીય નિરીક્ષકોની માન્યતા એવી હતી કે જૂનાગઢના પ્રશ્ને હિંદી સંઘને ભીંસમાં લઈ પાકિસ્તાન કાશ્મીર પ્રશ્નને પોતાની તરફેણમાં લઈ જવા માગતું હતું.
૧૩મી નવેમ્બર, ૧૯૪૭ના દિવસે સરદાર વલ્લભભાઈ પટેલ જૂનાગઢ આવ્યા. આરઝી હકૂમતનું કાર્ય પૂરું થયું હોઈ પ્રતીકરૂપે તલવાર શામળદાસ ગાંધીએ સરદારને અર્પણ કરી. બહાઉદ્દીન કોલેજના પટાંગણમાં જનમેદનીને સંબોધતા ‘રક્તપાત વિના વિજય મેળવવા’ માટે પ્રજાને અભિનંદન આપ્યા. આ સભામાં પણ સરદારે પ્રજાને પ્રશ્ન કર્યોઃ ‘તમે હિંદ સાથે જોડાશો કે પાકિસ્તાની સાથે?’ જવાબમાં ‘હિંદની સાથે…’ શબ્દો દ્વારા પ્રજાએ સંમતિ આપી. ત્યારબાદ સરદારે કહ્યું કે, ‘જૂનાગઢની પ્રજાનો અભિપ્રાય પણ આપણે વિધિસર – મતદાન પદ્ધતિથી લઈશું.’
એ જ દિવસે સરદાર વેરાવળ ગયા અને પ્રભાસ પાટણમાં સોમનાથ મહાદેવના મંદિરનો પુનરુદ્ધાર કરાવવાની ઘોષણા કરી.
ફેબ્રુઆરી, ૧૯૪૭માં જૂનાગઢ રાજ્યે પાકિસ્તાન સાથે જવું કે હિંદી સંઘમાં ભળવું એનો લોકમત લેવાયો. ગુપ્ત મતદાન દ્વારા લેવાયેલા આ લોકઅભિપ્રાયમાં વિશાળ બહુમતી (૧,૯૦,૮૭૦ મત) ભારત સાથેના વિલયની તરફેણમાં રહી અને માત્ર ૯૦ મત પાકિસ્તાન સાથેના વિલયને માટે પડ્યા. પ્રજાની બહુમતીએ આપી દીધેલા ચુકાદા પછી પણ પાકિસ્તાને વારંવાર આ પ્રશ્ન વ્યૂહરચનાના એક ભાગરૂપે ઉઠાવવાનો ચાલુ રાખ્યો.
પાકિસ્તાન સરકારે યુનો સત્તાવાળાઓ સમક્ષ રજૂઆત કરી, જૂનાગઢના નવાબનો હોદ્દો ચાલુ રાખ્યો અને જે ટપાલ ટિકિટો છાપી તેમાં ‘વિવાદાસ્પદ પ્રદેશો’ની નોંધમાં કાશ્મીરની સાથે જૂનાગઢ અને માણાવદરનો પણ નિર્દેશ કર્યો.
પરંતુ ઇતિહાસ, સાંસ્કૃતિક અને ભૌગોલિક તમામ પ્રકારે ‘સરવા સોરઠ’ નામે જાણીતો જૂનાગઢ વિસ્તાર ગુજરાતનો જ એક અવિચ્છિન્ન ભાગ અને એ તથ્યની અવહેલના થઈ શકી નહીં.
જૂનાગઢની સમસ્યાનો રાજકીય ઉકેલ આવવાથી વિક્ષોભક વાતાવરણ થોડુંક હળવું થયું, પણ હજુ વિલીનીકરણની લાંબી પ્રક્રિયા બાકી જ હતી. કાઠિયાવાડના રાજકીય નેતાઓની સાથે સરદાર પટેલે ચર્ચા કરી ત્યારે એક વિકલ્પ એવો સૂચવવામાં આવ્યો હતો કે જૂનાં રજવાડાંઓની જોડાણ યોજનાને પુનર્જીવિત કરવી અને કાઠિયાવાડની ૫૦ ટકાથી વધુ વસ્તી ધરાવતાં રાજ્યો (જેવા કે જૂનાગઢ, ભાવનગર, નવાનગર વગેરે)માં નાના રજવાડાં, જાગીરો અને તાલુકા ભેળવી દેવાં.
બીજી દરખાસ્ત પ્રમાણે અર્ધહકૂમતવાળા અને બિનહકૂમતવાળાં રાજ્યો – જાગીરો, થાણાંઓને મુંબઈ પ્રદેશ સાથે જોડી દેવાની વ્યવસ્થા કરી શકાય એમ હતું, પણ આ બંને યોજનાઓથી સમસ્યાનો આંશિક ઉકેલ જ આવે એમ હતું એટલે કાઠિયાવાડના તમામ એકમોનું જોડાણ કરીને એક સંયુક્ત રાજ્ય રચવાનો નિર્ણય લેવામાં આવ્યો. સૌરાષ્ટ્રની રાજકીય ચળવળોમાં મહત્ત્વનો ભાગ ભજવનારા નેતાઓની સરદાર પટેલ અને વી.પી. મેનન સાથે મંત્રણાઓ કરી ભાવનગર અને જૂનાગઢના રાજવીઓએ નવા સૌરાષ્ટ્ર રાજ્યની યોજનાને સમર્થન આપ્યું. સરદાર પટેલે બીજાં રજવાડાંઓને અપીલ કરી.
લેખતસવીર-એ-ગુજરાત
વિષ્ણુ પંડ્યા
