प्रभु का सन्देश :
कहाँ कुछ खोया है ?
तुने बहुत संजोया है
बरसों का है चिंतन तेरा
तुज में ही निवास है मेरा
सोच सोच में तुने मुझको
नित्य पिरोया है
तुने कहाँ कुछ खोया है ?
कोई संत नहीं, सिर्फ मानव है तू
विचलित होना, है मानव लक्षण
भूल जो की, वो फिर से होगी
पर प्रायश्चित के जरिये तुने
सद्गुण बोया है
तुने क्या न संजोया है ?
अंश है तू
अद्वैत है हम
ब्रहम है तू
गर आज नहीं तो कल
अज्ञानी नहीं, तू पंथी है
धर्म ही तेरा संगी है
है बालक तू, मैं साथ में हूँ
कर्तव्य निभाए चल तू चल
चैन की नींद
आखिर तू सोया है
तुने कुछ नहीं खोया है
तुने ‘निज’ को पाया है
जनक म देसाई
प्रभु को अंगीकार -चंचल साक्षी
मालिक मैने बहुत कुछ खोया है
क्या कहूँ, कुछ नही संजोया हैं।
तुम तो यही थे
दिल में मेरे
फिर भी जाने क्यू रोया है
मालिक मैने बहुत कुछ खोया है।
एक फूल थी जो भूल की
तेरे बिना मैं थुल थी
जीवन में कांटे मैने बोया है
मालिक मैने बहुत कुछ खोया है।
तुम मिले तो जग मिला
एक तुम बिन मुझे क्या गिला
तेरे नाम लेके चैन से सोया है
मालिक मैने बहुत कुछ खोया है।
तुम दिल मे हो, धड़कन मे हो,
इस पल मे हो, उस पल मे हो
तेरे लिए सपने मैंने संजोया है
मालिक मैने बहुत कुछ खोया है।
तुम पास हो, तुम आश हो,
हर जीव कि तुम साँस हो
विश्वाश में अपने तुम्हे पिरोया है
मालिक मैने बहुत कुछ खोया है। / चंचल साक्षी
जनक के कुछ सोच:
एकांत में, एकाग्र चित्त के ज़रिये, आत्मा और परमात्मा का मनन करने से ज्ञान प्राप्त होता है.
आत्म जागृति की ओर प्रयाण होता है.
यजुर्वेद में ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का उल्लेख है,
सारांशतः ‘अहं’ यानी कि मैं ही ‘ब्रह्म+अस्मि’ यानी कि ‘ब्रह्म’ हूँ.
आत्मा और परमात्मा अद्वैत है.
मनुष्य आत्मज्ञान प्राप्त करके ही ब्रह्मा की ओर जा सकता है.
ब्रहम: अर्थात आध्यात्मिक ज्ञानका व्याप होना।
अथर्ववेद = अयमात्मा ब्रह्म (आत्मा ब्रह्म है)
रुग्वेद = प्रज्ञानं ब्रह्म (सभान होना ब्रह्म है)
यजुर्वेद = अहं ब्रह्मास्मि (मैं ही ब्रह्म हूँ – स्व और सर्वस्व अलग नहीं है)
सामवेद = तत्त्वमसि (ब्रह्म.… वोह तू ही है )
અહં બ્રહ્માસ્મિ
જે બ્રહ્મ ને ગોતી રહ્યો, તે બ્રહ્મ તું જ છે
ચેતન અને જડ ના સ્વરૂપો માંય તું જ છે
જો હામ તું રાખી શકે, પામીશ તું તને
પરમાત્મામાં જીવતો આતમ એ તું જ છે
જનક મ દેસાઈ
अयमात्मा ब्रह्म
जिस ब्रह्म की जांच है, वोह ब्रह्म तू ही है
जड़ एवं चेतन, हर स्वरूप में सर्वत्र तू ही है
ज़ुर्रत और धैर्य से ही ‘निज’ की प्राप्ति होगी
परमात्मा के भीतर वोह आत्मा भी तू ही है
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