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फंड कई लेकिन कंपनियां वही, म्युचुअल फंड पोर्टफोलियो में ओवरलैप समझें, एक जगह न फंसे पैसा

एम्फी के अगस्त 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, एक्टिव इक्विटी फंड कैटेगरी में 579 स्कीम्स हैं और करीब 18.92 करोड़ फोलियो हैं। अगस्त में इन स्कीम्स में करीब 29,329 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो आया है

Balanced Hybrid Mutual Fund

प्रतीकात्मक तस्वीर । फाइल फोटो

Last Updated: अक्टूबर 1, 2026 | 6:20 PM IST

म्युचुअल फंड में निवेश करने वाले लोग अक्सर मानते हैं कि तीन से पांच अलग-अलग फंड चुन लेने से उनका जोखिम बंट जाएगा। लेकिन अलग नाम और अलग फंड हाउस होने के बावजूद इन फंड्स का पैसा एक जैसी कंपनियों में लगा हो सकता है। ऐसे में कई फंड रखने के बावजूद किसी खास कंपनी या क्षेत्र में गिरावट आने पर पूरा पोर्टफोलियो प्रभावित हो सकता है।

अलग-अलग फंड्स का एक जैसी कंपनियों में निवेश होना पोर्टफोलियो ओवरलैप कहलाता है। इसलिए सिर्फ फंड्स की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, डायवर्सिटी के लिए निवेशकों को शेयर, सेक्टर, कंपनी के आकार, निवेश रणनीति और फंड हाउस में अंतर देखना चाहिए। इससे पता चलता है कि फंड वास्तव में निवेश को अलग-अलग जगह फैला रहे हैं या पैसा बार-बार उन्हीं कंपनियों और क्षेत्रों में जा रहा है।

निवेशकों का पैसा किन फंडंस में जा रहा है?

एसोसिएशन ऑफ म्युचुअल फंड्स इन इंडिया यानी एम्फी के अगस्त 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, एक्टिव इक्विटी फंड कैटेगरी में 579 स्कीम्स हैं और करीब 18.92 करोड़ फोलियो हैं। अगस्त में इन स्कीम्स में करीब 29,329 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो आया है।

सबसे ज्यादा निवेश स्मॉलकैप और मिडकैप फंड्स में आया है। स्मॉलकैप फंड्स में करीब 7,973 करोड़ रुपये और मिडकैप फंडों में करीब 6,989 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो हुआ है। दोनों को मिलाकर यह करीब 14,963 करोड़ रुपये रहा, जो एक्टिव इक्विटी फंडों के नेट इनफ्लो का लगभग 51 फीसदी है। वहीं, फ्लेक्सीकैप फंड्स में करीब 5,059 करोड़ रुपये का निवेश आया है।

116 फंड, लेकिन कंपनियां कितनी अलग?

अगस्त 2026 में मिडकैप, स्मॉलकैप और फ्लेक्सीकैप फंडों की 116 योजनाओं में कुल करीब 20,000 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया। लेकिन सिर्फ योजनाओं की संख्या ज्यादा होना यह साबित नहीं करता कि निवेशकों का पैसा अलग-अलग कंपनियों में फैल रहा है।

इसकी वजह यह है कि अलग-अलग फंडों के पोर्टफोलियो में एक जैसी कंपनियां हो सकती हैं। खासकर फ्लेक्सीकैप फंडों को लार्जकैप, मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों में निवेश करने की आजादी होती है। वहीं, मिडकैप और स्मॉलकैप फंड भी अपने अनिवार्य निवेश के अलावा दूसरी मार्केट-कैप कंपनियों में निवेश कर सकते हैं।

यह भी पढ़ें: म्युचुअल फंड में निवेश की शुरुआत कैसे करें? SIP, सही स्कीम और जोखिम समझने की पूरी गाइड

अलग फंड, लेकिन कई शेयर एक जैसे

इक्विटी कैटेगरी के मिडकैप फंड्स की बात करें तो कुल एसेट के आधार पर टॉप 5 स्कीम्स की टॉप 10 होल्डिंग्स में कई कंपनियां बार बार दिखाई देती हैं। वैल्यू रिसर्च के मुताबिक, HDFC बैंक टॉप 5 में से 4 स्कीम्स की टॉप 10 होल्डिंग्स में शामिल है। इसके अलावा ICICI बैंक टॉप 5 में से 3 स्कीम्स की टॉप 10 होल्डिंग्स में है। वहीं NTPC, Axis बैंक, K.P.R. Mill और संवर्धन मदरसन जैसी कंपनियां दो दो स्कीम्स की टॉप 10 होल्डिंग्स में शामिल हैं।

फ्लेक्सी कैप फंड्स में पोर्टफोलियो ओवरलैप और साफ दिखाई देता है। HDFC बैंक और ICICI बैंक टॉप 5 सभी स्कीम्स की टॉप 10 होल्डिंग्स में शामिल हैं। इसके अलावा SBI, Axis बैंक और Eternal टॉप 5 में से 3 स्कीम्स की टॉप 10 होल्डिंग्स में शामिल हैं।

अलग अलग मिडकैप या फ्लेक्सी कैप फंड चुनने के बावजूद निवेशक का पैसा कुछ समान कंपनियों में दोबारा जा सकता है। सिर्फ फंड्स की संख्या बढ़ाने से पोर्टफोलियो की डायवर्सिटी उसी अनुपात में बढ़े, यह जरूरी नहीं है।

फंडों की तुलना में क्या देखें?

बीपीएन फिनकैप के सीईओ ए. के. निगम बताते हैं कि आपके फंडों में कितने शेयर एक जैसे हैं, यह जानने के लिए उनके निवेश की तुलना करनी होगी। शुरुआत उन 10 शेयरों से करें, जिनमें हर फंड का सबसे ज्यादा पैसा लगा है। देखें कि कौन-सी कंपनियां समान हैं और हर फंड ने उनमें कितना निवेश किया है।

मान लीजिए, आपके पास तीन फंड हैं। तीनों के प्रमुख निवेश में वही छह कंपनियां शामिल हैं। ऐसे में फंडों के नाम अलग होने के बावजूद आपके पैसे का बड़ा हिस्सा उन्हीं कंपनियों में लगा हो सकता है। इन शेयरों में गिरावट आने पर तीनों फंड प्रभावित हो सकते हैं।

अविसा वेल्थ क्रिएटर्स के मुख्य निवेश अधिकारी और सीएफए आदित्य अग्रवाल के मुताबिक, शेयरों के साथ यह भी देखना चाहिए कि हर फंड का कितना पैसा किन क्षेत्रों और स्मॉल, मिड और लार्ज कैप कंपनियों में लगा है। इससे पता चलेगा कि अलग-अलग फंड वास्तव में निवेश का दायरा बढ़ा रहे हैं या आपका पैसा उन्हीं कंपनियों और क्षेत्रों में जा रहा है।

यह भी पढ़ें: स्मॉल-मिड कैप फंड्स में बरसा पैसा, AUM ₹10 लाख करोड़ के पार, कब ज्यादा पैसा बन सकता है चुनौती?

कितना ओवरलैप सही है?

ए. के. निगम के मुताबिक, ओवरलैप जांचने के लिए निवेशक ऑनलाइन फ्री टूल की मदद ले सकते हैं। एक आसान तरीका दो फंडों के उन 10 शेयरों की तुलना करना है, जिनमें उनका सबसे ज्यादा निवेश है। अगर इनमें छह शेयर एक जैसे हैं, तो यह ज्यादा ओवरलैप का संकेत हो सकता है।

निगम के अनुसार, 30 फीसदी से कम ओवरलैप बेहतर डायवर्सिटी का संकेत है। 30 से 50 फीसदी तक इसे स्वीकार किया जा सकता है। वहीं, 50 से 70 फीसदी ओवरलैप होने पर फंडों की समीक्षा जरूरी है। 70 फीसदी से ज्यादा ओवरलैप होने पर वह एक जैसे निवेश वाले फंडों की संख्या घटाकर चुने हुए फंड में एसआईपी बढ़ाने पर विचार करने की सलाह देते हैं।

हालांकि, आदित्य अग्रवाल के मुताबिक, ओवरलैप का कोई एक प्रतिशत हर स्थिति में सुरक्षित नहीं माना जा सकता। खासकर सबसे ज्यादा निवेश वाले 10 से 20 शेयरों में लगातार ज्यादा समानता होने पर निवेशक अनजाने में कुछ ही कंपनियों में ज्यादा पैसा लगा रहे हो सकते हैं। इसलिए प्रतिशत के साथ यह देखना भी जरूरी है कि समान शेयरों में हर फंड का कितना निवेश है।

निवेश में डायवर्सिटी के लिए किन बातों का ध्यान रखें?

ए. के. निगम के मुताबिक, सिर्फ अलग-अलग नाम वाले फंड चुनना काफी नहीं है। उनकी निवेश की सोच और शेयर चुनने का तरीका भी अलग होना चाहिए। इसके लिए कंपनियों के आकार, निवेश की रणनीति, फंड हाउस और अपने आर्थिक लक्ष्य को ध्यान में रखना जरूरी है।

कंपनियों के आकार के हिसाब से निगम एक लार्जकैप, एक फ्लेक्सीकैप और एक मिडकैप या स्मॉलकैप फंड रखने का सुझाव देते हैं। उनके मुताबिक, पांच स्मॉलकैप फंड चुन लेने भर से निवेश में डायवर्सिटी डायवर्सिटी नहीं आती है।

निवेश की रणनीति में भी अंतर होना चाहिए। कुछ फंड उचित कीमत से सस्ते शेयर चुनते हैं। कुछ तेजी से कारोबार बढ़ाने वाली कंपनियों में पैसा लगाते हैं, जबकि कुछ मजबूत कंपनियों को प्राथमिकता देते हैं। ऐसी अलग-अलग रणनीतियों वाले फंड रखने से निवेश का बंटवारा अलग हो सकता है। अगर सभी फंड एक जैसी रणनीति से निवेश करते हैं, तो बाजार में बड़ी गिरावट आने पर वे एक साथ दबाव में आ सकते हैं।

निगम एक ही फंड हाउस के तीन फंड रखने से बचने की भी सलाह देते हैं। उनके मुताबिक, इन योजनाओं में रिसर्च और शेयर चुनने का तरीका मिलता-जुलता हो सकता है। साथ ही, हर फंड को किसी आर्थिक लक्ष्य से जोड़ना चाहिए, ताकि यह स्पष्ट रहे कि उसे पोर्टफोलियो में रखने की जरूरत क्या है।

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