14. एक फूल की आत्मकथा
પ્રશ્ન / વિષયવસ્તુ:
मैं गुलाब का फूल हूँ। मेरा जन्म जीजामाता उद्यान में एक पौधे पर हुआ था। वहाँ अन्य पौधों पर मेरे और भी अनेक साथी : थे। सबका अपना-अपना रूप-रंग था। सबकी अपनी-अपनी सुंदरता थी। पहले तो मैं बहुत छोटा था। उस समय लोग मुझे ‘कली’ कहते : थे। बड़ा होने पर लोग मुझे ‘फूल’ कहने लगे। मैं अपनी माँ की गोद में हवा के झोंकों के साथ झूमता रहता था। कितनी आनंदभरी थी उस : समय की वह प्यार भरी दुनिया! जब मैं फूल बना, तो मेरे रूप-रंग की शान निराली हो गई। जो : भी मुझे देखता, बस देखता ही रह जाता। मेरी सुगंध और सुंदरता लोगों : पर जादू जैसा असर करती थी। मधु के लोभी भरि मुझपर मंडराते रहते – थे। तितलियों भी मेरे आसपास हो रहना चाहती थीं। सचमुच. मेरे जीवन – का वह सुनहरा समय था। मगर परिवर्तन जीवन का नियम है। मेरे जीवन में भी भारी परिवर्तन हुआ। एक दिन सुबह माली बगीचे में आया। उसने बहुत निर्दयता से मुझे मेरी माँ की गोद से अलग कर दिया। उसने मुझे तोड़कर एक टोकरी में डाल दिया। इसी प्रकार और भी कई फूल तोड़कर उसने टोकरी में डाले। इसके बाद माली अन्य फूलों के साथ मुझे बाजार में ले गया। वहाँ एक आदमी ने मुझे खरीद लिया। वह मंदिर में गया और भगवान की पूजा कर उसने मुझे भगवान की मूर्ति पर चढ़ा दिया। भगवान के मस्तक पर पहुंचकर मैं फूला नहीं समाया। पर हाय री किस्मत! कुछ ही मिनट बीते थे कि मेरी तकदीर बदल गई। पुजारी ने मुझे भगवान के मस्तक से उठाया और एक भक्त को दे दिया। मुझे पाकर उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने मुझे अपने सिर-आँखों से लगा लिया। घर पहुंचकर उसने मुझे अपनी अलमारी के ऊपर रख दिया। दूसरे दिन पड़ा-पड़ा मैं मुरझा गया। मेरा रूप-रंग उतर गया था। मेरी खुशबू भी चली गई थी। सफाई करते समय नौकर ने मुझे उठाकर कचरे की टोकरी में डाल दिया। फिर वह मुझे उठाकर कूड़ेदान में फेंक आया। तब से मैं यहीं पड़ा-पड़ा अपनी किस्मत पर रो रहा है। अब तो बस एक ही इच्छा है कि किसी फुलवारी में मेरा फिर से जन्म हो।