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भारतीयदार्शनिकपरम्परायां षड आस्तिकदर्शनेषु योगदर्शनं महदुपकारकं व्यावहारिकञ्च शास्त्रं वर्तते। इदं दर्शनं मुख्यतया महर्षिणा पतञ्जलिना सूत्रबद्धं कृतम्, अतः अस्य 'पातञ्जलदर्शनम्' इति नामान्तरमपि प्रसिद्धम्। सांख्यदर्शनस्य यः सैद्धान्तिकः पक्षः वर्तते, तस्यैव व्यावहारिकः क्रियात्मकश्च पक्षः योगदर्शनम् इति मन्यते। तस्मादेव हेतोः सांख्य-योगयोः समानतन्त्रत्वं स्वीकृतं वर्तते ।
योगशब्दस्य व्युत्पत्तिः धातुद्वयात् मुख्यतया अवगम्यते-
युज् समाधौ (दिवादिगणीय): अनेन व्युत्पत्त्या योगस्यार्थः 'समाधिः' इति भवति। व्यासभाष्ये अपि उक्तम् - "योगः समाधिः" इति।
युजिर योगे (रुधादिगणीय): अनेन योगस्यार्थः संयोगः अथवा मिलनम् इति जायते, यत्र जीवात्म- एकत्वं सूच्यते।
यच्छे द्वाङ्गनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥
कठोपनिषद् (१.३.१३)
उपनिषत्सु योगस्य बीजानि सर्वत्र विकीर्णानि सन्ति। कठोपनिषदि इन्द्रियाणां स्थिरधारणा एव योग इति प्रतिपादितम्। भगवद्गीतायामपि योगस्य विविधाः परिभाषाः प्राप्यन्ते, याः योगदर्शनस्य पृष्ठभूमिकां दृढयन्ति ।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥
श्रीमद्भगवद्गीता (२.४८, २.५०)
२. प्रथमसूत्रस्य सविस्तरव्याख्या
पातञ्जलयोगसूत्रस्य प्रथमपादे (समाधिपादे) साधनायाः मूलतध्यानां निरूपणं वर्तते। तत्रत्यानां प्रथमपञ्चसूत्राणां शास्त्रीयविवेचनम् अधः प्रस्तूयतेः
सूत्रम् १ः अथ योगानुशासनम् ॥ १.१ ॥
पदच्छेदःः अथ (अव्ययपदम्), योगानुशासनम् (योगस्य अनुशासनम्, षष्ठीतत्पुरुषः, प्रथमाविभक्तिः, एकवचनम्)।
सरल-संस्कृत-व्याख्याः 'अथ' इति शब्दः अधिकारार्थे मङ्गलार्थे च प्रयुक्तः। अधुना योगशास्त्रस्य आरम्भः क्रियते। 'अनुशासनम्' नाम पूर्वैः आचार्यैः कथितस्य तत्त्वस्य पश्चात् नियमपूर्वकं प्रतिपादनम्। अतः महर्षिः पतञ्जलिः स्वपरम्पराप्राप्तं योगविज्ञानं शिष्याणां कल्याणाय उपदिशति।
सम्बद्धप्रमाणम् (याज्ञवल्क्यस्मृतिः):
हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः।
तस्मात् पुरातनं ज्ञानं योगशास्त्रमिदं शुभम् ॥
सूत्रम् २ः योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ १.२ ॥
पदच्छेदः: योगः (प्रथमा-एकवचनम्), चित्तवृत्तिनिरोधः (चित्तस्य वृत्तयः, तासां निरोधः, षष्ठीतत्पुरुषः)।
सरल-संस्कृत-व्याख्याः चित्तं नाम अन्तःकरणम् (मन-बुद्धि-अहङ्काराः)। चित्ते उत्पद्यमानानां विचाराणां तरङ्गाणां च (वृत्तीनां) सर्वथा निरोधनम्, अर्थात् शान्तीकरणम् एव योगः अस्ति। यदा चित्तं सर्वशून्यं एकाग्रं वा भवति, तदा समाधिः सिद्ध्यति।
सम्बद्धप्रमाणम् (मैत्रायणी उपनिषद्):
चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधयेत् । यच्चित्तस्तन्मयो भवति गुह्यमेतत्सनातनम् ॥अक्षरमाला |
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