1910 में कोलकाता (तब कलकत्ता) के राधा बाजार लेन में विदेशी स्वामित्व वाली कंपनी के एक छोटे से दफ्तर से शुरू हुई आईटीसी ने एक सदी से अधिक के सफर में लंबा रास्ता तय किया है। आज यह चौरंगी स्थित भव्य वर्जीनिया हाउस से संचालित होने वाला भारतीय कारोबारी समूह है जिसका कारोबार विभिन्न क्षेत्रों में फैला हुआ है। बदलते कारोबारी परिदृश्य के बीच आईटीसी ने खुद को लगातार ढाला है।
कंपनी के मुख्यालय में आईटीसी के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक संजीव पुरी से ईशिता आयान दत्त ने विभिन्न मुद्दों पर बात की। पुरी ने उदारीकरण के कारण प्रतिस्पर्धी परिदृश्य में आए बदलाव, कंपनी की विविधीकरण रणनीति तथा विकास के अगले चरण की दिशा तय करने में नवाचार तथा प्रतिभा की भूमिका के बारे में विस्तार से बताया। बातचीत के संपादित अंश:
1991 से पहले सरकारी नियंत्रण और संरक्षित बाजार ने आईटीसी के कारोबार को किस तरह प्रभावित किया?
पहले हम केवल उसी क्षेत्र में कारोबार कर सकते थे, जिनके लिए हमें सरकार से अनुमति मिलती थी। इसी तरह हमारे पेपरबोर्ड, पैकेजिंग और होटल कारोबार की शुरुआत हुई। हम पहले से ही कृषि व्यवसाय में मौजूद थे और हमने थोड़ा-बहुत निर्यात भी शुरू कर दिया था। हालांकि अत्यधिक नियमन के कारण कारोबार को पर्याप्त स्वतंत्रता नहीं थी और भारतीय उद्योग वास्तव में प्रतिस्पर्धी नहीं बन पाया था। तकनीक तक पहुंच सीमित थी। अर्थव्यवस्था बंद होने के कारण उसका आकार भी छोटा था। इसलिए कारोबार के अवसर भी सीमित थे।
नतीजतन, उद्योग का आकार कुछ हद तक छोटा था और वह वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की स्थिति में नहीं था। इन चुनौतियों के बावजूद 1969 में आईटीसी के पहले भारतीय चेयरमैन के कार्यकाल से ही यानी उदारीकरण से पहले के दौर में हमने राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया था। यही आज भी हमारा मूल सिद्धांत है। मेरा मानना है कि उस समय भारत में उपलब्ध अवसरों के सीमित आकार के बावजूद कंपनी ने अपने कारोबार के विविधीकरण में प्रगति की।
क्या 1991 से पहले होटल और पेपरबोर्ड कारोबार ही विविधीकरण वाले क्षेत्र थे?
होटल, पेपरबोर्ड और कृषि कारोबार के अलावा आईटीसी ने वित्तीय सेवाओं में भी कदम रखा, अंतरराष्ट्रीय कारोबार प्रभाग की स्थापना की और 1980 के दशक के मध्य में लोकप्रिय ब्रांड सनड्रॉप के साथ आईटीसी एग्रोटेक की शुरुआत की। हालांकि बाद में हमने जिन कारोबारों को जारी रखा वे कृषि, होटल और पेपरबोर्ड थे।
उदारीकरण के बाद मुख्य कारोबार में प्रतिस्पर्धा बढ़ी। क्या इसने आईटीसी को विविधीकरण की रफ्तार तेज करने के लिए प्रेरित किया?
कारोबार हमेशा अर्थव्यवस्था के आकार के अनुरूप विकसित होता है। आईटीसी का विविधीकरण भी अर्थव्यवस्था की वृद्धि के साथ आगे बढ़ा है। इसकी शुरुआत आईटीसी के पहले भारतीय चेयरमैन ए एन हक्सर के कार्यकाल में हुई थी। उदारीकरण के आसपास और उसके बाद आईटीसी ने खाद्य तेल, वित्तीय सेवाओं, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और बैटरी सहित कई क्षेत्रों में कदम रखा।
1996 में वाई सी देवेश्वर के चेयरमैन बनने पर उन्होंने सही निर्णय लेते हुए विविधीकृत कारोबारों में से कुछ चुनिंदा क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया।
इन क्षेत्रों में हमारे पास अपनी संस्थागत क्षमताएं और विस्तार के लिए जरूरी संसाधन थे। इसी दौरान हमने कुछ कारोबार से बाहर निकलने का निर्णय लिया। हमने चुनिंदा व्यवसायों पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया क्योंकि अब प्रतिस्पर्धा का दायरा केवल भारतीय नहीं बल्कि वैश्विक हो चुका था।
वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनने के लिए व्यापक ध्यान और संसाधन की जरूरत थी। इसलिए हमने उन क्षेत्रों में अपनी वृद्धि की रफ्तार तेज की। भारतीय अर्थव्यवस्था ने भी इसके लिए अवसर उपलब्ध कराए। अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ने और प्रति व्यक्ति आय में सुधार के साथ लोगों की आकांक्षाएं भी बदलीं। इससे खपत बढ़ी और कारोबार के नए अवसर पैदा हुए। हमने उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया, जहां हमारी संस्थागत क्षमताएं अर्थव्यवस्था में उभरते अवसरों के अनुरूप थीं।
लेकिन आईटीसी के गैर-सिगरेट कारोबार में वास्तविक तेजी 2000 के बाद एफएमसीजी कारोबार के साथ आई…
हमने 2000 में लाइफस्टाइल रिटेलिंग की शुरुआत की। 2002 में ब्रांडेड पैकेज्ड खाद्य श्रेणी में आशीर्वाद आटा बाजार में उतारा और समय के साथ एफएमसीजी में नए उत्पाद जोड़ते गए। 2005 में पर्सनल केयर उत्पादों का कारोबार शुरू हुआ।
गैर-सिगरेट एफएमसीजी कारोबार को 10,000 करोड़ रुपये का राजस्व हासिल करने में 17 साल लगे। इस बीच हमने लाइफस्टाइल रिटेलिंग कारोबार बंद करने का फैसला किया क्योंकि वह हमारी संस्थागत क्षमताओं और कारोबारी तालमेल के अनुरूप नहीं था। इसके बाद अगले 9 वर्षों में वित्त वर्ष 2026 तक हमारा राजस्व 10,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 24,000 करोड़ रुपये हो गया।
इसलिए प्रत्येक कारोबार में विकास और लाभप्रदता के नए लक्ष्य हासिल करने पर ध्यान केंद्रित करने के बाद हमारी वृद्धि की रफ्तार तेज हुई। हमने इसे आईटीसी नेक्स्ट रणनीति के तहत पेश किया था।
यह वह दौर था जब भारतीय अर्थव्यवस्था में अवसर बढ़ रहे थे। 2000 के बाद और खास तौर पर 2015 से 2025 के बीच प्रति व्यक्ति आय में काफी सुधार हुआ, जिससे हमारे लिए बड़े अवसर पैदा हुए। वृद्धि केवल एफएमसीजी में ही नहीं बल्कि कृषि और पेपरबोर्ड कारोबार में भी तेज हुई है। सूचना प्रौद्योगिकी कारोबार में तेजी अपेक्षाकृत हाल की घटना है।
होटल कारोबार में पहले हमारा अधिक ध्यान संपत्तियां बनाने पर रहता था। हाल के वर्षों में ‘ऐसेट-राइट रणनीति’ ने विकास की रफ्तार तेज करने में मदद की है।
विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (फेरा) से लेकर प्रतिस्पर्धा और विविधीकरण तक, पिछले 35 वर्षों में आईटीसी को किन बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है?
इस अवधि में हमने कई चुनौतियों का सामना किया है। इनमें से कई चुनौतियां किसी खास समय पर सामने आईं और फिर समाप्त हो गईं। लेकिन एक उद्यम के रूप में हमने अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखा और अपनी प्रतिबद्धता पर अडिग रहे। कठिनाइयों से उबरने के लिए हमने धैर्य दिखाया और प्रतिकूल परिस्थितियों से और मजबूत होकर उभरने के सिद्धांत को अपनाया। हर कठिनाई के बाद हम पहले से अधिक मजबूत होकर निकले हैं। यही हमारी पहचान रही है।
सबसे बड़ी चुनौती हमेशा यही रही है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, प्रतिस्पर्धी बने रहें। आज कारोबारी परिदृश्य में प्रतिस्पर्धा बेहद तीव्र हो गई है। हमने उदारीकरण-पूर्व दौर से उदारीकरण के दौर और अब अत्यधिक प्रतिस्पर्धी दुनिया तक का सफर तय किया है।
एक कंपनी के रूप में हमने हर दौर में प्रगति की है और आगे भी ऐसा करते रहेंगे। किसी भी संस्थान का व्यवहार उसकी संस्कृति से झलकता है। हम जिम्मेदार प्रतिस्पर्धा के मूल विचार को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध रहे हैं। इसी सोच के अनुरूप हमने ऐसे कारोबारी मॉडल विकसित किए, जिनमें सभी हितधारकों के लिए दीर्घकालिक मूल्य सृजन को प्राथमिकता दी गई। इससे हमें सभी हितधारकों का विश्वास हासिल हुआ। हमारी साझेदारियां मजबूत हुईं और ग्राहकों के साथ लंबे समय तक कायम रहने वाला भरोसा बनाने में सफलता मिली।
लंबे समय में अर्जित यह विश्वास हमारी सफलता का महत्त्वपूर्ण आधार रहा है। इसके अलावा चुनौतियां चाहे कितनी भी रही हों, हमने हमेशा गुणवत्ता सर्वोपरि के सिद्धांत का पालन किया है। आईटीसी वास्तव में एक ऐसी संस्था रही है, जिसने लगातार सीखा है और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप तेजी से खुद को ढाला है।
हमने नए क्षेत्रों में प्रवेश करने के साथ-साथ मौजूदा क्षेत्रों में भी उभरते अवसरों की पहचान करते हुए उद्यमशीलता का परिचय दिया है। कारोबार को प्रतिस्पर्धी बनाने के सिद्धांत से हमने कभी समझौता नहीं किया और समय से पहले निवेश किया। नवाचार, तकनीक और स्थिरता के माध्यम से प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत करना हमारा प्रमुख लक्ष्य रहा है।
और अंत में, सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हमने उद्यमशील प्रतिभाओं को विकसित करने पर ध्यान दिया है। किसी संगठन की मूल्य-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए प्रतिभाओं का विकास और उनकी निरंतरता बेहद अहम है। दशकों से हम प्रतिभाओं को निखारने और भविष्य के नेतृत्वकर्ता तैयार करने में निवेश करते आए हैं। यह हमारी पुरानी परंपरा रही है।
इसीलिए आज कंपनी के नेतृत्व में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जिन्होंने अपना पूरा करियर आईटीसी में बिताया है। साथ ही, हमने अन्य कंपनियों से भी प्रतिभाशाली लोगों को शामिल किया है और वर्षों के दौरान दोनों के बीच एक संतुलित व्यवस्था विकसित की है।
प्रतिस्पर्धी बने रहने की चुनौती के अलावा भी हमें कई कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है। लेकिन हमारे मूल सिद्धांतों और लक्ष्य पर केंद्रित रहने की प्रतिबद्धता ने हमें इन चुनौतियों से उबरने में मदद की है। हम हमेशा अपने उद्देश्य के प्रति सच्चे रहे हैं।
आपने किस दौर में कंपनी जॉइन की थी?
मैं जनवरी 1986 में कंपनी से जुड़ा था। उस समय मैं विनिर्माण क्षेत्र में था और शुरुआती चुनौतियों में से एक उदारीकरण और वैश्वीकरण से निपटना था। हमें पुरानी पीढ़ी की तकनीकों से अत्याधुनिक प्रक्रियाओं की ओर बढ़ना पड़ा। इसके लिए विनिर्माण के प्रति सभी की सोच और मानसिकता बदलना जरूरी था।
पहले कई बार हमें ‘जुगाड़’ से काम चलाना पड़ता था क्योंकि बहुत सी चीजें बाजार से उपलब्ध नहीं हो पाती थीं। जो उपलब्ध था, उसी से काम चलाना पड़ता था। लेकिन अर्थव्यवस्था खुलने के बाद हमें विश्वस्तरीय बनना था। इसके लिए सोच और मानसिकता बदलना जरूरी था।
उस समय युवा प्रबंधकों के रूप में हमें समाधान तलाशने और नए विचार विकसित करने के लिए विदेश भेजा जाता था। हम मनीला स्थित एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट भी गए, जहां हमने उन्नत विनिर्माण प्रक्रियाओं का अध्ययन किया। इसका मुख्य उद्देश्य सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों को सीखना और उन्हें लागू करना था।
क्या ये सर्वोत्तम कार्यप्रणालियां मुख्य रूप से सिगरेट विनिर्माण से संबंधित थीं?
उस समय इनका संबंध मुख्य रूप से सिगरेट कारोबार से था लेकिन बाद में सभी कारोबारों में बदलाव की प्रक्रिया से गुजरे। पेपरबोर्ड कारोबार में हमारी उत्पादन क्षमता अपेक्षाकृत कम थी और आपूर्ति श्रृंखला आयात पर निर्भर थी। पूरा पल्प विदेश से आता था।
इससे न केवल रोजगार के अवसर विदेशों में जा रहे थे, बल्कि हमारा कारोबार भी प्रतिस्पर्धा के लिहाज से कमजोर था। हमने बड़े पैमाने पर पौधरोपण कार्यक्रम के जरिये घरेलू फाइबर आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने, पल्प बनाने की तकनीक लाने, लागत दक्षता हासिल करने और विनिर्माण क्षमता बढ़ाने का फैसला किया।
जब आईटीसी ने गैर-सिगरेट एफएमसीजी कारोबार में प्रवेश किया, तो उसे स्थापित बहुराष्ट्रीय कंपनियों से मुकाबला करना पड़ा। इस बाजार में जगह बनाना कितना मुश्किल था?
यह चुनौतीपूर्ण था क्योंकि हर उत्पाद श्रेणी में हम एक नए प्रतिस्पर्धी के रूप में उन स्थापित ब्रांडों से मुकाबला कर रहे थे, जो 50 साल या शायद 100 साल से बाजार में मौजूद थे।
सबसे पहले, हमने सोच-समझकर उन क्षेत्रों में प्रवेश किया जहां हम अपनी संस्थागत क्षमताओं का लाभ उठा सकते थे। खास तौर पर खाद्य कारोबार में हमने कृषि व्यवसाय की खरीद और स्रोत जुटाने की क्षमता, होटल के शेफ की पाक-कला विशेषज्ञता, अपने व्यापक वितरण नेटवर्क और अन्य आंतरिक क्षमताओं का लाभ उठाया।
दूसरा, हमने तय किया कि गुणवत्ता के मामले में कोई समझौता नहीं किया जाएगा। यहां भी हमारा कृषि कारोबार एक मजबूत आधार साबित हुआ।
आज आशीर्वाद जिस मुकाम पर है, उसमें हमारे द्वारा खरीदे जाने वाले गेहूं की गुणवत्ता की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यह इसलिए संभव हुआ, क्योंकि हमारा कृषि प्रभाग केवल बाजार में उपलब्ध उपज खरीदने के बजाय अपनी जरूरत के अनुरूप उपज तैयार कराने में सक्षम है।
नवाचार, वितरण, गुणवत्ता और संस्थागत क्षमताओं का लाभ उठाना ऐसे सिद्धांत हैं, जिनका हमने अपने सभी उत्पादों में पालन किया है, चाहे वे स्नैक्स हों, पेय पदार्थ, रोजमर्रा के खाद्य उत्पाद, पर्सनल केयर, स्टेशनरी या अगरबत्ती हो। हमने आईटीसी लाइफ साइंसेज ऐंड टेक्नॉलजी सेंटर में समय से पहले निवेश किया और अत्याधुनिक नवाचार के क्षेत्र में लगातार निवेश कर रहे हैं।
आईटीसी के विकास का अगला बड़ा अध्याय क्या होगा?
हमारे सभी कारोबार मजबूत स्थिति में हैं और प्रत्येक के पास विकास के अलग-अलग अवसर हैं। हम संबंधित क्षेत्रों में अपने कारोबार का विस्तार और वृद्धि जारी रखेंगे तथा हर क्षेत्र में अपनी बाजार स्थिति बेहतर बनाएंगे। जिन क्षेत्रों में हम अभी अग्रणी नहीं हैं, वहां नेतृत्वकारी स्थान हासिल करना हमारा लक्ष्य है।
अवसरों की दृष्टि से सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्र में, जहां हमारा कारोबार अभी अपेक्षाकृत छोटा है, अपार संभावनाएं हैं। एफएमसीजी, कृषि, होटल, ताजा खाद्य उत्पाद और पेपरबोर्ड सहित जिन भी क्षेत्रों में हम मौजूद हैं, उन सभी में विकास की काफी गुंजाइश है।
