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बिज़नेस स्टैंडर्ड

1991 में जो सुधार नहीं हो पाए, 35 साल बाद भी उनसे क्यों जूझ रही भारतीय खेती?

आर्थिक सुधारों के 35 साल बाद भी भारतीय कृषि में बाजार, निजी निवेश, एमएसपी, सब्सिडी और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी कई चुनौतियां बनी हुई हैं। आखिर कृषि सुधार बार-बार क्यों अटकते रहे?

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Last Updated: सितंबर 30, 2026 | 10:48 PM IST

उर्वरक कीमतों में 40 फीसदी बढ़ोतरी के फैसले को वापस लेने के बाद 7 अगस्त 1991 को बिज़नेस स्टैंडर्ड के एक संपादकीय में पीवी नरसिंह राव सरकार पर तीखी टिप्पणी की गई थी। सरकार पर उसके सहयोगियों और विपक्ष की ओर से काफी दबाव था।

ऐसी आशंका थी कि छोटे और सीमांत किसान इन कदमों से प्रभावित होंगे जो उस समय कुल किसान समुदाय का 75 फीसदी थे। मगर तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने 24 जुलाई 1991 को अपने बजट भाषण में कहा कि उर्वरक की कीमत बढ़ाने का आर्थिक कारण इतना स्पष्ट है कि उसे बताने की जरूरत नहीं है।

उसके 35 साल बाद 16 जुलाई 2026 को बिज़नेस स्टैंडर्ड के एक अन्य संपादकीय में लगभग उन्हीं मुद्दों की बात की गई। उसमें बताया गया था कि नई यूरिया नीति आयात से निपटती है लेकिन उर्वरक सब्सिडी की गड़बड़ियों को नजरअंदाज करती है। इस बार नीति का लक्ष्य घरेलू उत्पादन बढ़ाना था। मगर सब्सिडी में असंतुलन के कारण जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल, मिट्टी की खराब होती गुणवत्ता और बढ़ती उर्वरक लागत जैसी समस्याएं बनी रहीं।

कृषि क्षेत्र देश के लगभग आधे कार्यबल को रोजगार देता है और देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में करीब 18 फीसदी योगदान करता है। यह ऐसा क्षेत्र है जिसमें वर्षों से तमाम सरकारों के लिए सुधार करना मुश्किल रहा है। इसके कारण कृषि के विकास में कई अवसर हाथ से निकल गए हैं।

इसे इस तरह समझा जा सकता है। साल 1975-76 से 1984-85 के बीच स्थिर कीमतों पर भारत के कृषि क्षेत्र की औसत सालाना वृद्धि दर 3.56 फीसदी रही। उसके बाद 1985-86 से 1994-95 के बीच यह औसतन 3.19 फीसदी रही। साल 1995-96 से 2004-05 के बीच यह घटकर केवल 2.43 फीसदी रह गई। इसी दौरान दूसरे क्षेत्रों ने उदारीकरण का फायदा उठाया और तेजी से विकास किया। केवल 2014-15 से 2024-25 के बीच भारत के कृषि क्षेत्र की औसत वृद्धि दर बढ़कर 4.45 फीसदी दर्ज की गई।

हालांकि पिछले एक दशक के दौरान हुई ज्यादातर वृद्धि मत्स्य पालन, पशुपालन, मुर्गी पालन, दूध और मांस जैसे संबंधित क्षेत्रों से आई है। इन क्षेत्रों में सरकार का हस्तक्षेप बहुत कम या नहीं के बराबर है।

उपेक्षा का शिकार

भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (इक्रियर) के प्रतिष्ठित प्रोफेसर और देश के प्रमुख कृषि अर्थशास्त्रियों में शामिल अशोक गुलाटी का कहना है कि कभी-कभी तेजी दिखने के बावजूद कृषि क्षेत्र सुधार प्रक्रिया में पीछे रह गया। इसका एक कारण वह भ्रम है कि कृषि मुख्य रूप से राज्य का विषय है या केंद्र का।

संविधान में कृषि को राज्य सूची में रखा गया है लेकिन केंद्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करती है, उर्वरक सब्सिडी देती है, कृषि व्यापार को नियंत्रित करती है और बड़े स्तर पर खरीद करती है। भूमि भी राज्य का विषय है। इससे यह मामला अधिक जटिल हो जाता है। गुलाटी ने कहा, ‘मेरा मानना है कि इस क्षेत्र को पूरी तरह समझने की कमी रही है। कृषि कई दूसरे क्षेत्रों की तुलना में बहुत ज्यादा जटिल है।’

साल 1991 के सुधार गंभीर भुगतान संतुलन संकट के कारण किए गए थे। सरकार ने तीन दिनों के भीतर रुपये का मूल्य 40 फीसदी से अधिक घटाया, आयात शुल्क कम किए, औद्योगिक वस्तुओं के लिए व्यापार नीति को उदार बनाया और औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था को खत्म किया। इन सुधारों से कृषि के व्यापार की स्थिति में अप्रत्यक्ष रूप से सुधार हुआ। मगर उस समय अल्पमत सरकार के सहयोगियों और विपक्ष ने सीधे कृषि सुधारों को आगे नहीं बढ़ने दिया।

गुलाटी कई प्रधानमंत्रियों के साथ काम कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा वाली लगातार कई सरकारों ने कृषि क्षेत्र में बड़े स्तर पर सुधार इसलिए नहीं किए क्योंकि उद्योग, व्यापार समझौतों या वित्तीय क्षेत्र के सुधारों के मुकाबले कृषि को कभी राजनीतिक रूप से आकर्षक या प्रमुख क्षेत्र नहीं माना गया। उन्होंने कहा, ‘नीति बनाने के सबसे ऊंचे स्तरों पर विशेषज्ञता की भी कमी रही है और कई लोग इन जटिल मुद्दों से जुड़ने से बचते हैं।’

सुधारों में देरी का एक परिणाम यह रहा कि जीडीपी में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी कम हुई क्योंकि उद्योग और सेवा क्षेत्र तेजी से बढ़े। इसके अलावा भारत का अनुभव चीन के तरीके से भी अलग रहा है। भारत कृषक समाज के चेयरमैन अजय वीर जाखड़ ने कहा कि चीन ने पहले 10 वर्षों तक कृषि पर ध्यान दिया और उसके बाद उद्योग एवं सेवा जैसे दूसरे क्षेत्रों की ओर बढ़ा।

भारत में नीति बनाने वाले लोग वित्त और उद्योग के सुधारों के साथ ज्यादा सहज थे क्योंकि उन्हें जल्दी लागू किया जा सकता था। जाखड़ ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘उन्होंने सेवा और औद्योगिक सुधारों को चुना जो केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते थे।’

सुधारों का क्रम

नीति आयोग के पूर्व सदस्य और फिलहाल इक्रियर के जानेमाने प्रोफेसर रमेश चंद ने कहा कि सुधारों के क्रम पर बहुत कम ध्यान दिया गया है। उन्होंने कहा, ‘भारत ने कृषि में आंतरिक सुधारों से पहले बाहरी सुधार किए। घरेलू कृषि बाजारों और संस्थानों को मजबूत किए बिना व्यापार उदारीकरण लागू किया गया।’चंद ने कहा कि 1990 के दशक की शुरुआत में कृषि सुधारों पर बहुत कम चर्चा या शोध हुआ। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की स्थापना के बाद यह मुद्दा काफी महत्त्वपूर्ण हो गया और भारत पर कृषि को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने का दबाव दिखा।’

शुरुआती सुधारों के करीब एक दशक बाद अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में 2001-02 के आसपास कृषि में बदलाव का पहला महत्त्वपूर्ण प्रयास हुआ। सरकार ने गेहूं, धान, मोटे अनाज, चीनी, तिलहन और दालों जैसी कई वस्तुओं को आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के दायरे से बाहर करके व्यापार प्रतिबंधों में ढील दी।

उसके बाद 2003 में सरकार ने कृषि वस्तुओं में वायदा कारोबार पर लगी रोक हटा दी। मगर कृषि विपणन जैसे कई क्षेत्रों और लेनदेन पर राज्य सरकारों का अधिकार होने के कारण सरकार ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकी। उसी दौरान भारत ने आनुवंशिक रूप से संशोधित कपास यानी जीएम कपास की खेती की अनुमति दी। यह अभी भी भारत में उगाई जाने वाली एकमात्र जीएम फसल है।

हालांकि कड़े नियमों ने पूंजी निवेश को हतोत्साहित किया और सुधारों की कमी ने भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा को कमजोर किया। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि एमएसपी व्यवस्था पर निर्भरता बढ़ गई। चंद ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘प्रतिस्पर्धी बाजार में कीमतें मांग और आपूर्ति की स्थिति को दर्शातीं। इसके बजाय सुनिश्चित खरीद ने उत्पादकों को बाजार के संकेतों से अलग कर दिया और लगातार असंतुलन पैदा हुआ।’

हालांकि हर कोई सुधारों के इस आकलन से सहमत नहीं है। साल 1991 की सुधार टीम का हिस्सा रहे और 2004 में योजना आयोग के उपाध्यक्ष बने मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने हाल में बिज़नेस स्टैंडर्ड के एक वेबिनार में कहा कि जो लोग कहते हैं कि सुधारों से कृषि को बहुत कम फायदा हुआ, वे पूरी अर्थव्यवस्था को एक साथ नहीं देखते।

उन्होंने कहा कि कृषि के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि औद्योगिक संरक्षण कम हुआ और विनिमय दर में गिरावट आई। इससे कृषि को बहुत फायदा हुआ क्योंकि पहले की व्यवस्था में, सुधारों के बाद के दौर में, कृषि वस्तुओं के आयात का मूल्य कम आंका जाता था क्योंकि विनिमय दर जरूरत से ज्यादा मजबूत थी। इसके कारण कीमतों में बदलाव हुआ और उसके संकेत बागवानी जैसे क्षेत्रों की वृद्धि में दिखाई दिए। उन्होंने भारतीय अनुभव की तुलना चीन से की और कहा कि भारतीय किसानों को अपनी पसंद की चीजें पैदा करने की आजादी थी।

जाखड़ के अनुसार समस्या एक ऐसे पश्चिमी आर्थिक मॉडल पर निर्भरता में है जो आय को आजीविका के बराबर मानता है। मगर छोटे खेतों के आकार और महंगाई को नियंत्रित करने वाली नीतियों जैसे तमाम कारणों से परेशान किसान समुदाय में इसकी सफलता सीमित रहेगी। इसके अलावा पिछले बदलावों से मिलने वाले वादे किए गए फायदे किसानों तक नहीं पहुंचने के कारण किसानों को नाराज करना एक बड़ी चिंता रही है। उन्होंने कहा कि भारत के खाद्य सुरक्षा हासिल करने के बाद कृषि क्षेत्र पीछे चला गया और नीति बनाने वाले आत्मसंतुष्ट हो गए।

विरोध

विडंबना यह है कि कृषि क्षेत्र में सुधारों का सबसे बड़ा विरोध प्रभावशाली किसान समुदायों की ओर से आया है। राजनीतिक दल भी इस प्रभावशाली समूह को नाराज करने से बचते रहे हैं। यह बात 2020 में सबसे ज्यादा दिखाई दी जब किसानों ने केंद्र सरकार की ओर से कृषि विपणन से संबंधित तीन कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन किया। कड़े विरोध के सामने सरकार पीछे हट गई और 1991 की तरह इन कानूनों को वापस ले लिया।जाखड़ के अनुसार इसका एक कारण बड़े संगठित राजनीतिक दलों के शीर्ष स्तर पर किसान समुदाय से आने वाले नेताओं की कमी है। उन्होंने कहा, ‘किसानों और राजनीतिक नेताओं के बीच भरोसे की दूरी बढ़ी है। यह एक महत्त्वपूर्ण अंतर है क्योंकि सुधारों से पहले कम समय में परेशानी होती है और लंबे समय में उनके फायदे मिलते हैं।’

चंद ने कहा कि इन सब कारणों से कृषि क्षेत्र बाजार की ताकतों के बजाय सरकारी हस्तक्षेप पर बहुत ज्यादा निर्भर हो गई है। बाजार भी प्रतिस्पर्धी नहीं रहे। इससे आधुनिक लॉजिस्टिक्स के विकास में बाधा आई और भंडारण, व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाओं में बड़े स्तर पर निजी निवेश हतोत्साहित हुआ।

इन सब कारणों से बड़ी चुनौतियां लगातार बरकरार रहीं। उदाहरण के लिए, बड़ी तादाद में खेतिहर मजदूर कृषि क्षेत्र से अन्य क्षेत्रों में नहीं जा पाए हैं। गुलाटी ने कहा, ‘सरकारें लगातार चलने वाले चुनावी चक्र में काम करती रहती हैं। इसलिए उनके पास गंभीर ढांचागत सुधार करने के लिए शायद ही कभी समय या राजनीतिक क्षमता होती है।’

समय के साथ-साथ कुछ ढांचागत समस्याएं अधिक गंभीर

हो गई हैं। उनमें कृषि क्षेत्र में विविधीकरण की सुस्त रफ्तार भी शामिल है। इसके कारण देश कुछ वस्तुओं का जरूरत से ज्यादा उत्पादन करता रहता है जबकि कुछ अन्य वस्तुओं की कमी बनी रहती है।चंद ने कहा, ‘निजी निवेश की कमी ने व्यापार, मूल्यवर्धन और खाद्य प्रसंस्करण को प्रभावित किया है। इन सब कारणों से भारतीय कृषि को लंबे समय में काफी नुकसान हुआ है।’

स्थिरता को लेकर भी चिंताएं हैं क्योंकि भूजल का स्तर घट रहा है, मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी बढ़ रही है और मिट्टी में जैविक कार्बन का स्तर आदर्श स्तर से नीचे जा रहा है। आहलूवालिया ने एक वेबिनार में कहा, ‘आज भी कृषि के लिए कुछ काम करने की जरूरत है और वे दूसरी पीढ़ी के सुधार हैं। लेकिन इन पर बहुत ज्यादा काम नहीं हो रहा है।’प्रगति की कमी का सबसे बड़ा संकेत यह है कि 1991 की तरह एक बार फिर भारत के राजकोषीय संतुलन पर दबाव आया है। पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण उर्वरक की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है। इससे उर्वरक सब्सिडी का बिल बढ़ गया है। शायद मनमोहन सिंह ने अपने प्रसिद्ध बजट भाषण

में जिन विक्टर ह्यूगो का उल्लेख किया था, वह आखिरकार गलत थे। कभी-कभी कोई ऐसा विचार जिसका समय आ चुका हो- इस मामले में तीन दशक पहले ही- उसे कुछ समूहों द्वारा वास्तव में रोका जा सकता है। सरकार निश्चित रूप से उम्मीद करेगी कि ऐसा न हो।

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