भारत 1990 के दशक की शुरुआत में पुरानी आर्थिक व्यवस्था को तोड़ने में व्यस्त था और उदारीकरण के दौर में पहला कदम बढ़ा रहा था। अर्थव्यवस्था में सुधार होने के साथ ही भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के नेतृत्व में अपने रॉकेटों को प्रक्षेपित करने के लिए संघर्ष कर रहा था।
भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली (इनसैट) देश के संचार क्षेत्र को धीरे-धीरे बदल रही थी। वह टेलीविजन और टेलीफोन दोनों ट्रैफिक के लिए एक अदृश्य राजमार्ग बन गई थी। भारत के पहले उपग्रह आर्यभट्ट का प्रक्षेपण 19 अप्रैल, 1975 को होने के बाद बमुश्किल 16 साल बीते थे। यह वह दौर था जब भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम प्रायोगिक से परिचालन की ओर बढ़ रहा था।
मगर 1990 के दशक में इसरो के स्मॉल लिफ्ट ऑग्मेंटेड सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (एएसएलवी) की दो लगातार विफलताएं हुईं जिसने इसे ‘ऑलवेज सी लैंडिंग व्हीकल’ यानी हमेशा समुद्र में उतरने वाला यान जैसा अपमानजनक उपनाम दिलाया। एक पूर्व वैज्ञानिक द्वारा साझा की गई ये बातें याद दिलाती है कि साइकल पर रॉकेटों के ले जाने जैसी कहानियों के पीछे 1970 से 1990 के दशक तक भारतीय वैज्ञानिकों के अपमान और विफलता का दर्द छिपा है।
यह संघर्ष 1990 के दशक से बहुत पहले ही शुरू हो गया था। इससे पहले के दो दशक भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए आसान नहीं थे। उस दौरान ऐसे मामले सामने आए जब लोगों ने इसरो की बस को रोका और उसमें बैठे लोगों का मजाक उड़ाया। एक बार कुछ तकनीकी खराबी के कारण एक साउंडिंग रॉकेट विफल हो गया और पास के एक कॉलेज परिसर में जा गिरा। इस पर छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया। वे रॉकेट को उठाकर करीब चार किलोमीटर दूर इसरो के थुम्बा केंद्र तक ले गए और रास्ते में वैज्ञानिकों का उपहास करते रहे। 1990 का दशक एक ऐसा दौर था जब भारत की अंतरिक्ष महत्त्वाकांक्षाओं के बारे में कई लोगों ने संदेह व्यक्त किया था।
अखबारों के लेखों और यहां तक कि कार्टूनों ने देश के अंतरिक्ष मिशनों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए। संचार, पृथ्वी अवलोकन और कृषि में सफलताएं स्वीकार की गईं लेकिन असली मोड़ 1994 में पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) की सफलता के साथ आया। यह सितंबर 1993 में पीएसएलवी के पहले मिशन की विफलता के बाद हुआ जिससे भारत को लगभग 150 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था।
इसरो में दशकों तक बिताने के बाद फिलहाल एक्सडीलिंक्स स्पेस लैब्स में काम करने वाले एन सुधीर कुमार ने कहा, ‘भारत के लिए पीएसएलवी एक महत्त्वपूर्ण मोड़ था। तब तक हमारे अंतरिक्ष क्षेत्र को रूस, फ्रांस और अमेरिका जैसे देशों से मदद मिल रही थी। पीएसएलवी और विकास इंजन ने 1990 के दशक में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष क्षेत्र में हमारे लिए दरवाजे खोले। पीएसएलवी पहला भारतीय प्रक्षेपण यान था जो तरल चरणों से लैस था।’ उन्होंने कहा, ‘इसके बाद जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (जीएसएलवी) की सफलता मिली जिससे इस क्षेत्र को ऊंची छलांग लगाने में मदद मिली।’
1990 के दशक के दौरान दो व्यापक प्रणालियों के तहत प्रमुख अंतरिक्ष बुनियादी ढांचा स्थापित किए गए। पहली प्रणाली थी संचार, प्रसारण व मौसम विज्ञान के लिए बहुउद्देशीय इनसैट सिस्टम। दूसरी प्रणाली भारतीय रिमोट सेंसिंग (आईआरएस) उपग्रह सिस्टम के जरिये पृथ्वी अवलोकन के लिए थी।
अक्टूबर 1994 में अपने पहले सफल प्रक्षेपण के बाद पीएसएलवी भारत के भरोसेमंद प्रक्षेपण यान के रूप में स्थापित हुआ। इसके उन्नत संस्करणों ने 2008 में चंद्रयान-1 और 2013 में मंगल ऑर्बिटर मिशन जैसे कार्यक्रमों को ताकत दी जिससे भारतीय अंतरिक्ष यान चंद्रमा और मंगल की ओर बढ़े।
भारत ने 1990 के दशक में ही व्यावसायिक तौर पर सोचना शुरू किया। एंट्रिक्स कॉरपोशन की स्थापना 1992 में अंतरिक्ष कार्यक्रम की वाणिज्यिक शाखा के रूप में की गई थी। धीरे-धीरे भारत ने सरकार से वित्तपोषित और संचालित कार्यक्रम से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपग्रह डेटा, प्रक्षेपण सेवाओं एवं अन्य संबंधित क्षमताओं को भुनाने के अवसर तलाशने शुरू कर दिए। फिर 2000 का दशक आया जब भारत की महत्वाकांक्षाएं चंद्रमा और अंततः अन्य ग्रहों की ओर पहुंचने लगीं।
चंद्रमा के लिए एक भारतीय मिशन का विचार पहली बार 1999 में इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज की बैठक में रखा गया था। उसके बाद 2000 में एस्ट्रोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया में उस पर चर्चा हुई। उनकी सिफारिशों के आधार पर एक राष्ट्रीय चंद्र मिशन कार्यबल का गठन किया गया जिसमें देश भर के प्रमुख वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकीविदों को एक साथ लाया गया। साल 2003 में उसने सर्वसम्मति से सिफारिश की कि भारत को चंद्रमा के लिए एक मिशन शुरू करना चाहिए।
इसरो के पूर्व चेयरमैन जी. माधवन नायर ने बिज़नेस स्टैंडर्ड के साथ हालिया बातचीत में अपने नेतृत्व वाले वैज्ञानिकों के एक समूह और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बीच हुई एक बैठक को याद किया जिसने प्रस्ताव को आगे बढ़ाने में मदद की। उनका कहना था कि अंतरिक्ष एजेंसी ने अपने संस्थापक अध्यक्ष विक्रम साराभाई द्वारा निर्धारित लक्ष्यों को पहले ही हासिल कर लिया था जिनमें संचार, कृषि, मौसम पूर्वानुमान आदि के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का उपयोग करना शामिल था। उनका कहना था कि अब समय आ गया है कि अब उच्च लक्ष्य निर्धारित किया जाए और भारत के प्रभाव को चंद्रमा, मंगल और उससे आगे तक विस्तारित किया जाए।
नायर ने बताया कि वाजपेयी ने उस प्रस्ताव को देखने के बाद एक खास काव्यात्मक लहजे में कहा था, ‘आइए हम इसे चंद्रयान नाम दें!’ बाकी सब इतिहास में दर्ज है। तीन चंद्रयान मिशन (2008, 2019, और 2023 में) और मंगल ऑर्बिटर मिशन (2013 में मंगलयान) ने भारत को अंतरिक्ष यान वाले दुनिया के अग्रणी देशों की श्रेणी ला दिया।
कुछ उपलब्धियां पहले ही हासिल कर ली गई हैं लेकिन तमाम उपलब्धियां हासिल करना अभी बाकी है। 23 अगस्त, 2023 को चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सॉफ्ट लैंडिंग की। उसके एक सप्ताह बाद 2 सितंबर को आदित्य-एल1 सौर मिशन प्रक्षेपित किया गया। अगला कार्यक्रम 2027 तक गगनयान है जो मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम है। भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का पहला मॉड्यूल पहले ही स्वीकृत हो चुका है। उसका प्रक्षेपण 2028 में होगा और 2035 तक आगे के मॉड्यूल आएंगे। इसके अलावा शुक्र मिशन और एक मानवयुक्त चंद्र लैंडिंग मिशन भी 2040 के लिए निर्धारित हैं।
इंडियन स्पेस एसोसिएशन (आईएसपीए) के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) एके भट्ट के अनुसार, पिछले दशक में भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र का विकास परिचालन से वाणिज्यिक कार्यक्रमों की ओर हुआ। इसमें व्यापक वैश्विक साझेदारी, मजबूत वैज्ञानिक सहयोग, प्रौद्योगिकी का आदान-प्रदान और संयुक्त मिशन विकास शामिल हैं।
भारत एक वैश्विक प्रक्षेपण केंद्र के रूप में उभर रहा है और इसका अंदाजा उसके द्वारा कक्षा में स्थापित विदेशी उपग्रहों की संख्या को देखकर जा सकता है। भारत ने 1990 और 2014 के बीच 35 विदेशी उपग्रह लॉन्च किए। साल 2014 से मार्च 2026 के बीच यह संख्या बढ़कर 399 हो गई। इसने 61 देशों और पांच बहुपक्षीय संगठनों के साथ 300 से अधिक अंतरिक्ष सहयोग समझौतों पर भी हस्ताक्षर किए हैं।
अंतरिक्ष क्षेत्र का उदारीकरण
आर्थिक उदारीकरण 1991 में शुरू हुआ था लेकिन भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र जून 2020 में ही निजी भागीदारी के लिए खुला। इससे उद्योग और स्टार्टअप को उपग्रह, प्रक्षेपण प्रणाली और अंतरिक्ष ऐप्लिकेशन सहित तमाम क्षेत्रों में प्रवेश करने का अवसर मिला।
भट्ट का मानना है कि वाणिज्यिकरण के लिहाज से 2020 के सुधार अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को खोलने वाले निर्णायक मोड़ थे। तब तक निजी क्षेत्र की भागीदारी काफी हद तक इसरो के आपूर्तिकर्ता आधार तक ही सीमित थी। फरवरी 2024 में जब प्रत्यक्ष विदेशी प्रत्यक्ष (एफडीआई) नियमों को उदार बनाया गया तो सुधारों को बढ़ावा मिला।
उपग्रह निर्माण और संचालन के लिए अब 74 फीसदी तक एफडीआई की स्वचालित रूप से अनुमति है, प्रक्षेपण यान एवं स्पेसपोर्ट के लिए 49 फीसदी और उपग्रह एवं जमीनी उपकरणों के लिए 100 फीसदी।
डेलॉयट साउथ एशिया के पार्टनर (डिजिगॉव ऐंड स्पेसटेक) श्रीराम अनंतसायनम ने कहा, ‘अंतरिक्ष क्षेत्र में वास्तविक बदलाव हाल के वर्षों में हुआ है। इस दौरान 2020 से निजी खिलाड़ियों को प्रवेश की अनुमति दी गई, 2023 में अंतरिक्ष नीति का अनावरण किया गया, 2024 में एफडीआई खोला गया और चंद्रयान-3 ने दिखाया कि भारतीय अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी मामूली बजट के साथ विश्वस्तरीय है।’ उन्होंने कहा, ‘आगे की राह यह साबित करने के बारे में नहीं है कि हम उपग्रह और रॉकेट बना सकते हैं। यह अधिक पूंजी, विनिर्माण पैमाने, प्रतिभा को आकर्षित करने और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने के बारे में है।’
इन सुधारों के कारण भारत का अंतरिक्ष परिवेश 2014 में महज एक स्टार्टअप से बढ़कर अगस्त 2026 तक लगभग 440 स्टार्टअप का हो गया है। देश ने अगले दशक में अपनी अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को मौजूदा लगभग 9 अरब डॉलर से बढ़ाकर 40-45 अरब डॉलर करने का लक्ष्य भी रखा है। अंतरिक्ष नियामक भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (इन-स्पेस) के अध्यक्ष पवन गोयनका ने इस महीने की शुरुआत में बिज़नेस स्टैंडर्ड को दिए एक साक्षात्कार में कहा, ‘हमने अंतरिक्ष में निजी क्षेत्र के निवेश में भी भारी उछाल देखा है। अपने अंतरिक्ष लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों को मिलकर काम करना चाहिए।’
गोयनका ने बाद में यह भी कहा कि भारत ने 2030 तक प्रति वर्ष 50 प्रक्षेपण करने का एक लक्ष्य रखा है। स्पेस स्टार्टअप सुहोरा टेक्नॉलजी के सह-संस्थापक अमित कुमार ने कहा, ‘1991 के सुधारों ने भारतीय उद्यमियों को आत्मविश्वास दिया कि निजी उद्यम राष्ट्र के लिए निर्माण कर सकता है। उस भावना ने आईटी क्रांति को गति दी और 2020 के अंतरिक्ष सुधारों ने अब इसे एक ऐसे क्षेत्र में पहुंचा दिया है जो कभी राज्य के लिए आरक्षित था।’
निजी निवेश छह गुना बढ़ गया है जो 2021-22 में 10.05 करोड़ डॉलर से बढ़कर 31 मार्च, 2026 तक 61.85 करोड़ डॉलर हो गया है। इसमें मौजूदा कैलेंडर वर्ष के पहले तीन महीनों के दौरान 18.7 करोड़ डॉलर के निवेश दर्ज किए गए हैं।
भट्ट ने कहा, ‘इसरो राष्ट्रीय हित की बड़ी परियोजनाओं को देखते हुए मार्गदर्शक शक्ति बनने जा रहा है जबकि निजी क्षेत्र का विस्तार भारत की एक अंतरिक्ष केंद्र के रूप में प्रतिष्ठा में इजाफा करेगा। इसरो निजी क्षेत्र, शिक्षा जगत और ग्राहक सभी को इस उदय में योगदान देना चाहिए।’
भारत ने जनवरी 2025 में अपने स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट (स्पैडेक्स) का प्रदर्शन किया। इसके साथ ही भारत अंतरिक्ष में स्वायत्त डॉकिंग और अनडॉकिंग का प्रदर्शन करने वाला चौथा देश बन गया। यह तकनीक उसके नियोजित भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन के साथ-साथ भविष्य के गगनयान मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशनों का अग्रदूत है।
शायद पिछले 35 वर्षों में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की सबसे बड़ी उपलब्धि कोई एक रॉकेट, उपग्रह या मिशन नहीं है। यह वह आत्मविश्वास है जो कभी अकल्पनीय था कि अब आसमान ही सीमा नहीं है।
