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बिज़नेस स्टैंडर्ड

सरकारी बॉन्ड पर 7.19% तक पहुंची यील्ड, निवेशक टारगेट मैच्योरिटी फंड कैसे चुनें?

अगर निवेशक को मैच्योरिटी से पहले पैसा निकालना पड़े, तो बाजार में खरीदार कम होने पर यूनिट बेचने में दिक्कत हो सकती है। ब्याज दरें घटने के बाद निवेश की अवधि पूरी होने पर पैसा दोबारा कम यील्ड पर लगाना पड़ सकता है

Investment Strategy FY27

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Last Updated: अक्टूबर 1, 2026 | 8:51 PM IST

10 साल की सरकारी प्रतिभूति पर यील्ड 28 सितंबर 2026 को 7.19 फीसदी तक पहुंच गई। इससे निवेशकों को टारगेट मैच्योरिटी फंड के जरिए मौजूदा ऊंची ब्याज दरों का फायदा लेने का मौका मिल सकता है। लेकिन फंड चुनने से पहले यह देखना जरूरी है कि निवेशक कितने समय तक पैसा लगाए रख सकते हैं।

बॉन्ड में निवेश का मौका क्यों बन रहा है?

बॉन्ड बाजार में इस समय निवेश के अच्छे मौके दिख रहे हैं। एडेलवाइस म्युचुअल फंड के अध्यक्ष और फिक्स्ड इनकम के मुख्य निवेश अधिकारी धवल दलाल के मुताबिक, दो से तीन साल की अवधि वाले एएए रेटिंग के बॉन्ड पर करीब 7.5 से 7.75 फीसदी यील्ड मिल रही है।

इनक्रेड मनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विजय कुप्पा कहते हैं कि रेपो दर 5.25 फीसदी होने के बावजूद बॉन्ड यील्ड करीब 7.2 फीसदी है। दोनों के बीच का यह अंतर काफी बड़ा है। ऐसे में निवेशक मौजूदा यील्ड को कुछ समय के लिए तय कर सकते हैं।

टारगेट मैच्योरिटी फंड (टीएमएफ) की कीमतों पर बॉन्ड की यील्ड में बदलाव का असर पड़ता है। आनंद राठी वेल्थ के कार्यकारी निदेशक मनीष श्रीवास्तव के मुताबिक, इन फंडों की कीमतें बाजार की यील्ड में बदलाव के साथ बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) की दरों के मुकाबले जल्दी बदल सकती हैं। बैंक आम तौर पर भारतीय रिजर्व बैंक की रेपो दर बढ़ने के बाद एफडी की दरें बढ़ाते हैं।

टारगेट मैच्योरिटी फंड कैसे काम करते हैं?

टीएमएफ एक तय तारीख के आसपास मैच्योर होने वाले बॉन्ड में निवेश करते हैं। फंड की भी एक तय मैच्योरिटी तारीख होती है। निवेशक इस तारीख तक निवेश बनाए रखते हैं तो उन्हें उस समय फंड की यूनिट के मूल्य के हिसाब से पैसा मिलता है।

ये फंड मुख्य रूप से केंद्र और राज्य सरकारों की प्रतिभूतियों और एएए रेटिंग वाली कंपनियों के बॉन्ड में निवेश करते हैं। ये ओपन-एंडेड फंड हैं। यानी निवेशक चाहें तो मैच्योरिटी से पहले भी यूनिट बेच सकते हैं। हालांकि, उस समय यूनिट का भाव बाजार के हिसाब से कम या ज्यादा हो सकता है।

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मैच्योरिटी तक निवेश रखने का क्या फायदा है?

टीएमएफ में आम तौर पर ऊंची रेटिंग वाले बॉन्ड रखे जाते हैं। अगर निवेशक अपनी जरूरत की तारीख से मेल खाने वाला फंड चुनकर मैच्योरिटी तक निवेश बनाए रखते हैं, तो बीच में ब्याज दरों के उतार-चढ़ाव का असर कम हो सकता है। फिर भी इन फंडों का रिटर्न तय या गारंटीशुदा नहीं होता।

दलाल के मुताबिक, मैच्योरिटी तक निवेश बनाए रखने पर रिटर्न का अनुमान लगाना आसान हो जाता है। ये फंड किसी तय बॉन्ड सूचकांक का अनुसरण करते हैं, इसलिए फंड मैनेजर के गलत बॉन्ड चुनने का जोखिम भी कम रहता है।

टीएमएफ और एफडी में क्या फर्क है?

एफडी से मिलने वाला ब्याज आपकी आय में जुड़ता है और उस पर लागू दर से टैक्स लगता है। टीएमएफ में भी मौजूदा नियमों के तहत निवेश भुनाने पर होने वाला लाभ आम तौर पर निवेशक की लागू आयकर दर के अनुसार कर योग्य होता है। टैक्स नियमों के मुताबिक, तय शर्तें पूरी करने वाले डेट म्युचुअल फंड से मिले लाभ को पूंजीगत लाभ माना जाता है।

वेंटुरा के निदेशक जुजेर गबाजीवाला के मुताबिक, टीएमएफ में निवेशक कई बॉन्ड में पैसा लगाते हैं, जबकि एफडी में पैसा एक बैंक या संस्था के पास जमा होता है। टीएमएफ की यूनिट कभी भी मौजूदा शुद्ध संपत्ति मूल्य (एनएवी) पर बेची जा सकती है। एफडी को समय से पहले तोड़ने पर जुर्माना लग सकता है।

यूटीआई एसेट मैनेजमेंट कंपनी के अध्यक्ष और फिक्स्ड इनकम प्रमुख अनुराग मित्तल कहते हैं कि टीएमएफ में टैक्स आम तौर पर यूनिट बेचने या भुनाने पर देना होता है, हर साल मिलने वाले ब्याज की तरह नहीं। इस दौरान निवेश पर मिलने वाला रिटर्न फंड में जुड़ा रहता है। एफडी में बैंक ब्याज पर स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) कर सकता है।

ब्याज दरें घटने पर पुराने बॉन्ड की कीमतें बढ़ सकती हैं। ऐसे में टीएमएफ में निवेशक को बॉन्ड की कीमत में बढ़ोतरी से फायदा मिल सकता है। हालांकि, इसके लिए मैच्योरिटी से पहले यूनिट बेचनी होगी और बाजार का भाव अनुकूल होना चाहिए।

टीएमएफ में क्या जोखिम हैं?

डेट फंड की तरह टीएमएफ के भाव में भी बीच-बीच में उतार-चढ़ाव हो सकता है। लंबी अवधि वाले टीएमएफ में यील्ड ज्यादा हो सकती है, लेकिन ब्याज दर बढ़ने पर उनकी कीमत में गिरावट का जोखिम भी ज्यादा होता है।

दलाल के मुताबिक, फंड का रिटर्न निवेश के समय सूचकांक की मैच्योरिटी तक यील्ड से थोड़ा अलग हो सकता है। बॉन्ड से मिले ब्याज को दोबारा निवेश करने की दर, फंड का खर्च और फंड में रखी नकदी इस अंतर की वजह बन सकते हैं।

अगर निवेशक को मैच्योरिटी से पहले पैसा निकालना पड़े, तो बाजार में खरीदार कम होने पर यूनिट बेचने में दिक्कत हो सकती है। ब्याज दरें घटने के बाद निवेश की अवधि पूरी होने पर पैसा दोबारा कम यील्ड पर लगाना पड़ सकता है। महंगाई भी निवेश से मिलने वाले असली रिटर्न को घटा सकती है।

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