"अमर बेलि बिन मूल की, प्रति-पालत है ताहि।
रहिमन ऐसे प्रभुहिं तजि, खोजत फिरिए काहि॥१॥
अधम बचन तैं को फल्यो, बैठि तार की छाहिं।
रहिमन काम न आवहीं, जे नीरस जग माहिं॥२॥
अनुचित-उचित रहीम लघु, करहिं बड़ेन के जोर।
ज्यों ससि के संयोग[१] तैं, पचवत[२] आगि चकोर॥३॥
अनुचित बचन न मानिए, यदपि गुराइस[३] गाढ़ि।
है रहीम रघुनाथ तैं, सुजस भरत को बाढ़ि॥४॥
अब रहीम मुसकिल परी, गाढ़े दोऊ काम।
साँचे तैं तो जग नहीं, झूठे मिलैं न राम॥५॥
अमी[४] पियावत मान बिन, रहिमन मोहिं न सुहाइ।
प्रेम सहित मरिबो भलो, जो बिष देइ बुलाइ॥६॥[५]..."
प्राचीन चिह्नमहावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित ऐतिहासिक ग्रंथ है जिसका प्रकाशन सन् १९२९ ई॰ में प्रयाग के इंडियन प्रेस लिमिटेड द्वारा किया गया था।
"इस संग्रह में जो लेख दिये जाते हैं उनमें से कुछ लेखों में बहुत प्राचीन और बहुत प्रसिद्ध बौद्धकालीन इमारतों, गुफाओं और ऐतिहासिक पदार्थों के वर्णन हैं। छः लेखों में पुराने नगरों, स्थानों और मन्दिरों के संक्षिप्त विवरण देकर उनकी प्राचीन ऊर्ज्जितावस्था का भी उल्लेख किया गया है। जो मन्दिर या स्थान अब तक अस्तित्व में हैं उनके दर्शन तो अब भी होते ही हैं; पर जो नष्ट-भ्रष्ट हो चुके उनकी स्मृति की रक्षा का एकमात्र उपाय अब उनके वर्णन से पूर्ण पुस्तकें ही हो सकती हैं। इसी से ऐसी पुस्तकों की आवश्यकता है जिनमें ऐसे वर्णन पढ़ने को मिल सकें। इस पुस्तक मे क़ुतुब-मीनार पर भी एक लेख है। उसमें इस बात का भी विचार किया गया है कि वह इमारत कब बनी, किसने बनवाई और वहाँ पर पहले कोई हिन्दू-मन्दिर या इमारत थी या नहीं।..."(पूरा पढ़ें)
"हिन्दी भाषा की उत्पत्ति का पता लगाने और उसका थोड़ा भी इतिहास लिखने में बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ हैं; क्योंकि इसके लिए पतेवार सामग्री कहीं नहीं मिलती। अधिकतर अनुमान ही के आधार पर इमारत खड़ी करनी पड़ती है, और यह सबका काम नहीं। इस विषय के विवेचन में पाश्चात्य पण्डितों ने बड़ा परिश्रम किया है। उनकी खोज की बदौलत अब इतनी सामग्री इकट्ठी हो गई है कि उसकी सहायता से हिन्दी की उत्पत्ति और विकास आदि का थोड़ा-बहुत पता लग सकता है। हिन्दी की माता कौन है? मातामही कौन है? प्रमातामही कौन है? कौन कब पैदा हुई? कौन कितने दिन तक रही? हिन्दी का कुटुम्ब कितना बड़ा है? उसकी इस समय हालत क्या है? इन सब बातों का पता लगाना-और फिर ऐतिहासिक पता, ऐसा वैसा नहीं—बहुत कठिन काम है। मैक्समूलर, काल्डवेल, बीम्स और हार्नली आदि विद्वानों ने इन विषयों पर बहुत कुछ लिखा है और बहुत-सी अज्ञात बातें जानी हैं, पर खोज, विचार और अध्ययन से भाषाशास्त्र-विषयक नित नई बातें मालूम होती जाती हैं। इससे पुराने सिद्धान्तों में परिवर्तन दरकार होता है! कोई-कोई सिद्धान्त तो बिलकुल ही असत्य साबित हो जाते हैं। अतएव भाषाशास्त्र की इमारत हमेशा ही गिरती रहती है और हमेशा ही उसकी मरम्मत हुआ करती है।..."(पूरा पढ़ें)
"ट्रात्स्की एक यहुदी किसान का पुत्र था। कीफ विश्वविद्यालय मे शिक्षा प्राप्त की। उसका असली नाम व्रान्स्टीन था, परन्तु उसने ट्रात्स्की नाम रख लिया और क्रान्तिकारी दल में शामिल हो गया। सन् १८९८ में ज़ारशाही ने उसे साइवेरिया मे निर्वासित कर दिया। सन् १९०२ मे ट्रात्सकी नाम से पासपोर्ट प्राप्त कर लिया और इँगलैण्ड को भाग गया। वहाँ उसकी दो क्रान्तिकारियो, प्लेख़ानोव तथा लेनिन, से भेट हुई, जो रूस की ज़ारशाही का खात्मा करने की युक्ति सोच रहे थे। सन् १९०५ मे वह रूस वापस आया। जब वह सेंटपीटर्सबर्ग की एक मजदूर-सभा में अध्यक्ष के पद से सभा-संचालन कर रहा था, तब उसे पुनः गिरफ़्तार करके निर्वासित कर दिया गया। सन् १९०५ से १९१४ तक उसने यूरोप के प्रत्येक देश में क्रान्तिकारी दल का संगठन किया।..."(पूरा पढ़ें)
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