Bhagavad Geeta Shloka

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Bhagavad Gita: Chapter 05, Verse 10


कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति संग त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥

कर्मयोगी आखिर क्या होते हैं? जरा उन्हें समझने की कोशिश कीजिए दोस्तों। योगी अपने शरीर, मन, बुद्धि या इंद्रियों से कर्म करते हैं लेकिन अपने अंदर से वो भगवान को समर्पित करते रहते हैं।